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Kumauni & Garhwali Poems by Various Poet-कुमाऊंनी-गढ़वाली कविताएं

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 05, 2011, 12:00:34 AM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


गुणनिधि जोशी
May 18 at 12:47pm
पैलि और आजक बखत।।।।।
पुराण दिनाक किस्स सुणों हो आज ।
यौ कस बखत ऐगो हो महाराज।।
पैली बटी सब साथ रुछि।
सब सुनछि बुजुर्ग जो ले बात कुछी।
ठुल ठुल परिवार हुछि सब जाग।
इज बोज्यू च्याल ब्वारी सब साथ रुछि।।
च्याल ब्वारी इज बोज्यू क एकले छोड़ गयी आज।।
यौ कस बखत ऐगो हो महाराज।।
पैली पड़ी लिखी नी छी लोग पर ज्ञान भौत छी।
गरीबी त छी पर आराम भौत छी।
लंबी ऊमर ताकतवर शरीर हुनेर भै।
किलैकि उ टैम में काम भौत छी।
पर हर कोई कमजोर हैगो आज।।
यौ कस बखत ऐगो हो महाराज।।
खेतुं में भौत अनाज हुछी।
गोर बल्द सबूकेँ पास रुछि।
मिलबेर करछी सब खेतुं में काम।
सब खेत हरी भरी आबाद रुछि।।
पर सब खेत बंजर है गयीं आज।।
यौ कस बखत ऐगो हो महाराज।।
पाणिक हर जाग बौछार छी।
दूध दहीक लै भौत बहार छी।
ना दुस्मणी ना नेतागिरी।
सब्बुक भलौ व्यव्हार छी।।
पर हर कोई ठुल आदिम हैगो आज।।
यौ कस बखत ऐगो हो महाराज।।
यौ कस बखत ऐगो हो महाराज।।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


हितेश उपाध्याय
May 9 at 10:07pm
आहा रे कस जमान ऐगो।
पैलाग ज्यूजाग टाटा नेगो।।
मिलन तक कुणी हाई।
जानतक कुणी बाय।।
हाथ जोड़न खुट पढ़न सब हैरेगो।
कुल ड्यूड और बेबी डौल जमान जो आगो।।
ईजा बोज्यू बुलाण में शर्म करनी।
कमर क पेट जाघो में धरनी।।
साड़ी बिलौज जमान नैगो।
आध नगाड़ मनखियों जमान ऐगो।।
इंग्लिश बुलाण में समझनी आपणी शान।
तैक खातिर पहाड़ आज ह्वेगो बिरान।।
नै शर्म नै लाज सब बेची खा हालो।
बोज्यू थे ले डियर कुणी जमान आगो।।
घर में बुढ़ ईजा बोज्यू नानतिनो लिजी बैचैन छन।
चेली च्यालक पछिन और च्यल चेलियां पछिन पागल छन।।
जै उमर में दात टूटछि हो आब दिल टूटन फैगो।
ईज बोज्यू फिकर छोड़ी जान जानू समय आगो।।
पहाड़ छोड़ी आब सब शहर के भागनी।
घर क काम में मन नि लगान।।
होटल में चाहे भान माझनी।
घुघुति हरयाई पंचमी सब हैरान फैगो।।
किस डे हग डे मनौनी जमान जो आगो।।
पहाड़ बचाओ पहाड़ बचाओ बात सब करनी।
ये बात दिल में कोई ना लीन सब बातों का शेर बननी।।
आपणी भाषा संस्कृति विरासत बिना पहाड़ कसी बचल।
जस घर और स्कूल में पाठ पढ़ाई जाल नान उसे सिखल।।
पश्चमी और आधुनिक बननी जमान आगो।
तभे आज पहाड़ विरान ह्वेगो।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

दिनेश चंद्र भट्ट
May 10 at 5:30am
बल्द बेचि हल्द
बल्द बेचि हल्द
हल्द बेचि बल्द
बाकार् गोरू भैंस
आब् गलदारि पुजि गै ठुल मैंस में
गाड़ गंङ बलुवा ढुङ
पानि बिजुलि बाॅध
गड़ खेत लिस पेड़ हाॅङ फाॅङ
गलदारि के नि छाड़
हमार गौं गाड़ बठे
ऑगन पटाॅगन बाट घाट चौबाट
गलदारि पुजि गै पवित्तर ठुल घौर
खुल्लो खेल खुल्लि बोलि
जेठ् बैशाख कच्यार कि होलि
हम्माम में सब्बै नंग
कास् कास् मलंग भुतंग
लोकतंत्र कि हैरै जंग
नैं लोक रौ नैं तंत्र
ठुल् मैंस गोठ्याई छन लुकाई छन
कि काला भै कस बज्जर पड़ो भङाल फुल
सब जोड़ जुगत कुरसि खिन

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

मि त अपरा गौं मुल्क जानू छों
मि त अपरा गौं मुल्क जानू छों
तू बी ऐजा भुला
अपरि ईं जिकुड़ी थे
तू इन और्री ना रुला
बुरांस फ्योंली फूली गेली
तै थे च क्या च पता
मस्त बसंत पहाड़ों पसरयों गे हुलो
तै थे च क्या च पता
अप्रि जल्म भूमि देख हाक देणी
तू बी विन्थे हाक देकि बथा
मि त अपरा गौं मुल्क जानू छों
तू बी ऐजा भुला
अपरि ईं जिकुड़ी थे
तू इन और्री ना रुला
मि दोल दामों बोलणो
मास्को बाजा मि रिझानु
धिगतालो वा मेरी दगडी लगाणो
ईं मेरी जिकुड़ी थे जी ऊ नचानु
तू बी ऐकि चल मेरो दगड़
विन्थे दुंला वख जैकी नचा
मि त अपरा गौं मुल्क जानू छों
तू बी ऐजा भुला
अपरि ईं जिकुड़ी थे
तू इन और्री ना रुला
बालकृष्ण डी ध्यानी
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

ये बाटो मा हिटदा हिटदा
ये बाटो मा हिटदा हिटदा
यो बाटो बी बल अब कटै जालो ...... २
ज्योति जिंदगी को यो यात्रा मा
दुक सदनि अब इन कने रालो
ये बाटो बाटो मा हिटदा हिटदा........
ये आँखा थे कबि वा हंसे देंदी
कबि यूँ थे वा रुवै जांदी
सुक की खोज करणा कोन
ये खुटा सदनि अब मिथे हिटे देंदी
ये बाटो मा हिटदा हिटदा........
सुबेर भतीक ब्योखनी काज बल
रात सैरी गुजरी सिरना गैणा गिनि बल
ऎना फिर बी कुच ऐ हात बल
सुदी सुदी यु जिंदगी को सारो कामकाज बल
ये बाटो मा हिटदा हिटदा........
बिशरा देंदी वा सब अपरा परया
बाटो न हम परी इनि कया टोटका कया
बिशरी गै मि हर्चि गै मि कख
निच मेरो खबर निच कूच अब मेरो पता
ये बाटो मा हिटदा हिटदा........
बालकृष्ण डी ध्यानी
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यूँ उट्ठरयु मा
यूँ उट्ठरयु मा माया बसीच
विं पतळी अधरों देकदा देकदा
कदगा ये बाटा बिरडया छन
यूँ उट्ठरयु मा
बैठ्युं छों कलम और कागद लेकि
तेरा रूप की जबै मिल वा गागर देकि
भूली ग्युं बिसरि ग्युं कै बाण यख मि अयुं छों
यूँ उट्ठरयु मा
तेर उट्ठरयु न इन मै परी जादू कयाई
हर्चि गै सब मेरो मैसे कुच बी न राई
यखुली नि छों मि अब तू बस साथ मैमा
यूँ उट्ठरयु मा
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बरोस बारिस बतेक
बाणग सलगी च
बरोस बारिस बतेक
मेरो जंगलता मा मेरो पहाड़ा मा
कबि हैरु भैरु घास बाण
कबी पोटगी को दांडी कंठी को आग बाण
सुपनिया का वो आँखा धैर धरिकि
बैठ्या छन वा वै भविष्या का बाटा मा
आस लगै की वैन धरिचा लुकऐंच
जिकुड़ी को कै एक भागा मा
पेटदी रैंदी इंनि सदनि
हर बारी वा रै रैकी अपरा अपरा मा
ईंनि सदनि धैय लगांदि रैंदी वा
यखुली यखुली डाली बोटी की चढ़ी कन्धा मा
कबि नि बुझेंदी वा
कबि नि वा अड़ेदी ना वा कबि थमेंदि
सर सर सर रौड़ी दौड़ी जांदी वा
कबि ना हत आंदी वा ना पकडे जांदी
मेरो जंगलता मेरो पहाड़ा की आग वा
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मि त अपरा गौं मुल्क जानू छों
मि त अपरा गौं मुल्क जानू छों
तू बी ऐजा भुला
अपरि ईं जिकुड़ी थे
तू इन और्री ना रुला
बुरांस फ्योंली फूली गेली
तै थे च क्या च पता
मस्त बसंत पहाड़ों पसरयों गे हुलो
तै थे च क्या च पता
अप्रि जल्म भूमि देख हाक देणी
तू बी विन्थे हाक देकि बथा
मि त अपरा गौं मुल्क जानू छों
तू बी ऐजा भुला
अपरि ईं जिकुड़ी थे
तू इन और्री ना रुला
मि दोल दामों बोलणो
मास्को बाजा मि रिझानु
धिगतालो वा मेरी दगडी लगाणो
ईं मेरी जिकुड़ी थे जी ऊ नचानु
तू बी ऐकि चल मेरो दगड़
विन्थे दुंला वख जैकी नचा
मि त अपरा गौं मुल्क जानू छों
तू बी ऐजा भुला
अपरि ईं जिकुड़ी थे
तू इन और्री ना रुला
बालकृष्ण डी ध्यानी
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

पलायन पर म्यार उद्गार
-
हमर गौं बटि ,
ब्याळि सुबेर सुबेर
हमर जवानी / हमर पाणी
हमर नै रोपण /हमर गाणी
हमर उत्साह / हमर ताणी
हमर एलम /हमर स्याणी
हमर दिमाग /हमर पारम्परिक शिक्षा
हमर जवानी पर लगीं जमा पूंजी / हमर भविष्य
दिल्ली -देरादूण -बम्बै भाजी गे
अर चुच्चों ! कर्ज त इखि छोड़ी गे !

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Darshan Singh

सुपिणा मा गौं
ब्यालि राति म्यारु सुपिणा मा,
म्यारु गौं म्यारु मुलुक आई।
बल खुद लगणीं च दि, तु रूणू किलै छाई।।

अरे इना सूणिदी, पैलि जरा चुप ह्वैदी।
मेरी बात पर जोर से गेड बांधि देदी।।

कैदन त्यारा दाजी परदाजी यख ऐंई।
जौंल कूड़ि फुंगडी अर घाटा बाटा सजैंई।।
पैलि त उ सिरफ चार मौं ऐंई,
आज तुम चौसठ ह्वैग्योऊ।
फुंगड्यूं का खंडका देखिदी,
भलु च भंडिसि उंद चलि ग्योऊ।।

यखी रैंदा त कनुक्वै हिटदा।
सैर्या गळ्या बाटा बिगाणां रैन्दा।।
अरै त्यारा ब्वै बाबुल इलैई त पढैई।
नौकरी कैर ब्वाल अब ज्वान ह्वैगेईं।।

वैदिन जांद तू कनु रूणु छाई।
समझ वैदिनी तिल गौं छोडि द्याई।।।

अपणा बाल बच्चों म खुश रैई।
कभि कभि मैमान सि आणु जाणु रैई।।
अपणि खुद मिटै अर मिथैं भि देखि जैई।
खुश छौं मी, तु अपुणु पराण ना झुरैई।।

अपणि बोलि भाषा संस्कार ना बिसरैई।
जख भि रैलु खुश रै,अपणि पछ्याण बणैई।।

सर्वाधिकार सुरक्षित @:-
दर्शनसिंह रावत "पडखंडाई"
दिनांक :-06/06/2016