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Kumauni & Garhwali Poems by Various Poet-कुमाऊंनी-गढ़वाली कविताएं

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 05, 2011, 12:00:34 AM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

दगड्या छे यमकेस्वर कु
दगड्या बंणीक रैयी तु
सुख दुख मा सब्युं क दगडी
दगड्या बंणी रैय्यी तु
यमकेस्वर की शान छे
मान छे अभिमान तु
बरखा बत्वांणी मा बौल्या
यमकेस्वर क छे बान तु
कमर कसीं दगड्यों तुमरी
लपोड्यांणा छा माटु मा
यमकेस्वर क बान दीदों
लग्यां छा दिन रात मां
औडलु तुफानों मा
बरखों से तु डैरी ना
यमकेस्वर क बान दगड्या
स्वार्थ अपंणु कबी देखी ना
आस छा दगड्यों तुम
धार मा की जून सी
उज्यलु बंणी यैग्या तुम
अब बिकाश क बाट मा
राजनिति क चुलख्यंदों तै
ग्वाटा सी फरकई दे
बंद पड्यां बिकास क
द्वार तु जनकैई दे
जूनी पर लौंफे की दगड्या
गैंणा सी तु तोडी दे
बिकाश की गंगा दगड्या
यमकेस्वर मा लैय्यी दे
दगड्या छे यमकेस्वर कु
दगड्या बंणी रैय्यी.....
यमकेस्वर के लिये संघर्ष रत बिकाश कार्यों के लिये सीमित संसाधनों के बाद अपने प्रयासों से यमकेस्वर को अलग पहिचान दिलाने के लिये यहां के रैबासी व प्रवासीयों की सामाजिक संगठन "दगड्या परिवार"व उसके समर्पित कार्यकर्ताओं को समर्पित ये लेख सर्वाधिकार सरक्षित@सुदेश भट्ट "दगड्या"

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Dinesh Dhyani
July 22 at 10:57am
पलायन
जौं परैं फंकुडु नि ऐेंन
वो जख्या तक्खी रैगैन
जौं परैं फंकुडु ऐेंन
वो फुर्र उड़ि गैन।
लेखी पैढि कि
जो परदेस चलि गैन
गौं का वो मनखी
परदेसी भैजी ह्वे गैन।
बगण लग्यां छन दिन -रात
पाणी सि म्यरा मुल्का मनखी
गौं म रैणा की
कैन बि जुगत नि जुटै।
काम, काज, रूप्या नाज
ह्वे ता सकदु गौं म आज,
यीं धरती म रैणा को
जब हो मन्ख्यों को मिज़ाज।
औखद इलाज, दवै -दारु
पढ़ै लिखै को होंदु सारु
कन नि रुक्दा गौं म मनखी
किलै बजेन्द गौं- गुठ्यार ?
नेता सियां, जन्ता लाचार
ड्यारादूण-नैनीताल उंदंकार
बाकि पाड़ जन्या तन्नि
समस्याओं को कु कार इलाज।
मनखि सोचा जरा विचारा
गौं भी उद्धार कारा
ठंडो पाणी, ठंडी हवा
खेती पाती समाल कारा।
रुका गौं म, भजणा किलै
अल्का-जळक्यां ह्ययना क्या छा
जरसी कुछ जतन त कारा
बगदी नि जा, गौं म रावा।
दिनेश ध्यानी २२/०७/२०१६

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

अब नि रैनु गांऊँ मा
दाज्यू छन कुमाओं मा
भजि च अमाओं मा
छूटीगियू पहाड़ मयलु पहाड़
रंगीलो पहाड़ छबीलो पहाड़

खटीमा मै मन लगा
अब नि रैनु गांऊँ मा
दाज्यू छन कुमाओं मा
भजि च अमाओं मा
छूटीगियू पहाड़ मयलु पहाड़
रंगीलो पहाड़ छबीलो पहाड़

ब्वारी लिलु घर मै रुलि
इस सोची छे ससु ले
ब्वारी को मन बिजलीगयू
भाबरी या हवेली ,भाबरी या हवेली
दाज्यू की मेवालि

खटीमा मै मन लगा
अब नि रैनु गांऊँ मा
दाज्यू छन कुमाओं मा
भजि च अमाओं मा
छूटीगियू पहाड़ मयलु पहाड़
रंगीलो पहाड़ छबीलो पहाड़

सासु को नि नत बुललो
मै अगला बरस मै
ब्वारी चढ़े अरस में तो
सासु ऐगै फरस में
ऐ टी ऐमा दाज्यू को,ऐ टी ऐमा दाज्यू को
भौजी का परस मै

खटीमा मै मन लगा
अब नि रैनु गांऊँ मा
दाज्यू छन कुमाओं मा
भजि च अमाओं मा
छूटीगियू पहाड़ मयलु पहाड़
रंगीलो पहाड़ छबीलो पहाड़

भौजील मा सेदि करो
अगिनि हनीमून रे
मई मा जबैर दज्यु
छूटी एग्या जून रे
जों रयां सुखी रयां ,जों रयां बची रयां
बुढ बड़ों को खून रै

खटीमा मै मन लगा
अब नि रैनु गांऊँ मा
दाज्यू छन कुमाओं मा
भजि च अमाओं मा
छूटीगियू पहाड़ मयलु पहाड़
रंगीलो पहाड़ छबीलो पहाड़

उत्तराखंडी गीत है
रंगीलो पहाड़ छबीलो पहाड़
उत्तराखंडी भाषा को बढ़वा देने के लिये
चल चित्र के निचे गीत लिखा है बस
उत्तराखंड मनोरंजन तुम थै कंण लग जी?
बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

म्यारा हिर्दय की दुकी दुकी मा
म्यारा हिर्दय की दुकी दुकी मा
तू स्वास बणी मठु मठु आणि जाणी लगे छे
यूँ आँखयूँ की छपी छपी मा
तेर तस्बीर देख लुकी छुपी जाणी लगे छे
म्यारा हिर्दय की दुकी दुकी मा ....
देखी जब तेरु ऊ हसणु मुखड़ी
ऐ जिकोड मेरो हुलु तब च धड़की
तेरा पिछणे पिछणे मिल ऐकी ऐ बांदा
कख कख नि मिल मार दी फेरी
म्यारा हिर्दय की दुकी दुकी मा ....
मिथे बता तेरु नोऊ च क्या
कै कॉलेज तू पड़दी तेरु गौं च क्या
देख तू अब इन औरी ना बाहण लगा
सब धणी तेरु तो मिथे दे बता
म्यारा हिर्दय की दुकी दुकी मा ....
तेरी मयलदी ऊ आँख दोई
मै बान माया देखांदी वै माया थे जता
अपरी परेली थे ना इन झपक
साफ साफ बाता कुछ ना लुका
म्यारा हिर्दय की दुकी दुकी मा ....
बालकृष्ण डी ध्यानी
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

आज किलै की
आज किलै की औ आज किलै की
तू मेरो सुपनीयू मा आणु छे
तू किलै की आज मि रुलाणु छे
आज किलै की औ आज किलै की
आँखयूँ का ऊ सुपनीयू आँखयूँ मा रैगेनि
अपडों छोड़ सात समोदर ऊ पार चलीगैनी
चखलु जनि उड़णु मिथे कैल हुलू सिखैई
आज किलै की औ आज किलै की
जून जुन्याली छे यख वख बी इनि हुली कया
जन रुणु छो यखुली यखुली ऊनि बी हुली रुंदी वा
कैल बने हुलू टक्कों थे कैल ईं पर पैल माया लगे हुली
आज किलै की औ आज किलै की
ईं अंध्यारी रात मा तू मेरो उजालू बणी की ऐई
बाटू बिरड़ी छियूँ मि मिथे बाट बथे जैई
हाथ पकड़ी की मेरो तू अपड़ो दगडी ले जैई
आज किलै की औ आज किलै की
बालकृष्ण डी ध्यानी
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

उत्तराखण्ड बनेक बल हमुल क्या पाया
उत्तराखण्ड बनेक बल हमुल क्या पाया
उत्तरांचल को खण्ड खण्ड जब हमुल कैदयाई
अपरा अपरा क्वी नि यख सब अब ह्वैगे बिराणा
घार अपरा छोड़िक सबो का परदेस ठिकाणा
राम सब यख छन पर बल मन मा रावण बस्यूचा
अंखयूं अंखयूं न रोज अब किलै सीता हरण हुनिचा
एक खुटा दून एक दिल्ली मा अब बल धरयूंचा
कैल सोचण पहाड़े की जब अपरू नाणो ही खुटुचा
देखा डामा को गढ्देश मेरो उत्तराखंड बणीग्याई
तब भतेक अपरो देऊ देबता हम से रूसैग्याई
बूढारी अंखयूंन देखिछया सब भल भली के जो सुपनिया
अब की पीढ़ी न ऊ सुपनियों को छितर बितर कैदयाई
बालकृष्ण डी ध्यानी
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कन कै रैन तेर बिगेर बल
कन कै रैन तेर बिगेर बल ,तू ऐकि मिथे बथे जैई
जियु नि लगदु तेर बिगेर ,तू ऐकि वैथे समझे जैई
बिगरैलि आंख्युं मा तेरी बल यो इन जियु अल्झि ग्याई
देख्दु रैंदु सुपनियु तेरा बल वेका सुपनियु मा तू जरूर ऐई
कन के रालो यखुली यखुली बल तै दगड़ ऐथे तू ले जैई
जब तू ना देखेली येथे समणा बल वैकि दशा कया हुलि
वैकि खुदी मा तू रालि सदनि बल सदनि ऊ रलो तेरो
इन ना दे वैथे तू सजा बल वैथे छोड़ी की वैसे इन दूर ना जा
जब आलो बसंत तेर बिगेर बल यूँ डांडियों कंठियुं मा
हेर दो रला ऊ दोई आँखा बल ऐकि ऊँ कि हेर तू मिटे दैेई
बालकृष्ण डी ध्यानी
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रंग हैरो मेरो पहाड़ा को
रंग हैरो मेरो पहाड़ा को
रंग सैरो मेरो डंडा- काठं को
रंग हैरो मेरो माया को
रंग गैरो मेरो माया को
रंग हैरो मेरो हैरी भूजि को
रंग हैरो मेरो खुदी को
रंग हैरो मेरो चूड़ी को
रंग हैरो न्यारो मेरो सारी को
हैरो रंग मा कन रंगी छन
गंगा बी जब यख बगि छन
रंग हैरो मेरो चकबंदी को
यो हैरो रंग जुड़े जन मन मा
रंग हैरो मेरो उतराखंड को
रंग हैरो फैलो मेरो गढ़ को
बालकृष्ण डी ध्यानी
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यखी छों मि
यखी छों मि
यखी ही रोलों ,अब सदनि को
अब सदनि को
यखी छों मि
यखी ही रोलों ,अब सदनि को
भेंट मेर व्हैजाली
अब यखी ही
देख्याली नजरि ने नजरि मा
माया मेरी मिल यखी ही
यखी छों मि
यखी ही रोलों ,अब सदनि को
अब सदनि को
बिसरि जोलों मिथे मि
अब यखी ही
कन बिसरि जोलों मि तैथे
जख मेर माया पाली छ्या अब यखी ही
यखी छों मि
यखी ही रोलों ,अब सदनि को
अब सदनि को
द्वि घटेक तू ऐजा भेंट को
अब यखी ही
भेंट द्यूंलो मि तैथे अब वखि ही
जख छों मि
यखी छों मि अब यखी ही
यखी ही रोलों ,अब सदनि को
अब सदनि को
बालकृष्ण डी ध्यानी
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

यो गयो जमानो प्रीति को
कब आलू हो ....
यो गयो जमानो प्रीति को
कया दिन छ्या वा कया रात वा
बस होंदी छ्या तेरी ही बात वा
कब आलू हो ....
तू और्री मि दूजो ना कुई और्री
गदनी जनि बगदि पियार
होंदी छ्या मुलकात अपरि
कब और्री कख हर्चि गै हुलु सब
कब और कन परती को आलो अब
यो गयो जमानो प्रीति को ....
हैंसदरी तेरी मुखडी
कब अब देख्याली भग्यानी
ऊ ऊकाली उंदारु का बाटा मा
कब तू अब आली जाली भग्यानी
बैठ्युं छों आसा मा की कब आलो
यो गयो जमानो प्रीति को ....
तू ही मेरी बुरांसि की डाली को
ऊ लाल लाल बुरांस साथी
ऊ फ्योंली जनि छ्या अपरू साथ
किंगोडा काफलों को आस पास
फिरदा छ्या हम ऊंका साथ
हिट दा हिट दा गयौ अब कख
यो गयो जमानो प्रीति को ....
बालकृष्ण डी ध्यानी
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