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Kumauni & Garhwali Poems by Various Poet-कुमाऊंनी-गढ़वाली कविताएं

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 05, 2011, 12:00:34 AM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

जिम कार्बेट पार्काक् शेर ......
मैं
फूलनैकी बात करुँ
कान् त
आपण् जाग् में हुनेरै भ्या । फूलनैकी - फूलों की ही , कान् - काँटे
सुख ' कि बात ले
नि भयी त
आब् दुख ' कि
के बतूँ पैं ।
" पुन्तुरि " में पुन्तुरी - पोटली , बाटुयि - हिचकी
नरै
निस्वास और
बाटुयि सब भै ।
अन्यार्
मूँख
को
देखौं ।
लगिल् कैं लगिल् - बेल , ठाँगोर् ...... बेल के सपोर्ट हेतु लट्ठा
ठाँगोर् चैं
बोट आफि है
मलिकै जाँछ् । मलिकै - ऊपर की ओर
ज्ञान पंत

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

म्यारा हिर्दय की दुकी दुकी मा
म्यारा हिर्दय की दुकी दुकी मा
तू स्वास बणी मठु मठु आणि जाणी लगे छे
यूँ आँखयूँ की छपी छपी मा
तेर तस्बीर देख लुकी छुपी जाणी लगे छे
म्यारा हिर्दय की दुकी दुकी मा ....
देखी जब तेरु ऊ हसणु मुखड़ी
ऐ जिकोड मेरो हुलु तब च धड़की
तेरा पिछणे पिछणे मिल ऐकी ऐ बांदा
कख कख नि मिल मार दी फेरी
म्यारा हिर्दय की दुकी दुकी मा ....
मिथे बता तेरु नोऊ च क्या
कै कॉलेज तू पड़दी तेरु गौं च क्या
देख तू अब इन औरी ना बाहण लगा
सब धणी तेरु तो मिथे दे बता
म्यारा हिर्दय की दुकी दुकी मा ....
तेरी मयलदी ऊ आँख दोई
मै बान माया देखांदी वै माया थे जता
अपरी परेली थे ना इन झपक
साफ साफ बाता कुछ ना लुका
म्यारा हिर्दय की दुकी दुकी मा ....
बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
http://balkrishna-dhyani.blogspot.in/search/
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में पूर्व प्रकाशित -सर्वाधिकार सुरक्षित

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

आज किलै की
आज किलै की औ आज किलै की
तू मेरो सुपनीयू मा आणु छे
तू किलै की आज मि रुलाणु छे
आज किलै की औ आज किलै की
आँखयूँ का ऊ सुपनीयू आँखयूँ मा रैगेनि
अपडों छोड़ सात समोदर ऊ पार चलीगैनी
चखलु जनि उड़णु मिथे कैल हुलू सिखैई
आज किलै की औ आज किलै की
जून जुन्याली छे यख वख बी इनि हुली कया
जन रुणु छो यखुली यखुली ऊनि बी हुली रुंदी वा
कैल बने हुलू टक्कों थे कैल ईं पर पैल माया लगे हुली
आज किलै की औ आज किलै की
ईं अंध्यारी रात मा तू मेरो उजालू बणी की ऐई
बाटू बिरड़ी छियूँ मि मिथे बाट बथे जैई
हाथ पकड़ी की मेरो तू अपड़ो दगडी ले जैई
आज किलै की औ आज किलै की
बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

उत्तराखण्ड बनेक बल हमुल क्या पाया
उत्तराखण्ड बनेक बल हमुल क्या पाया
उत्तरांचल को खण्ड खण्ड जब हमुल कैदयाई
अपरा अपरा क्वी नि यख सब अब ह्वैगे बिराणा
घार अपरा छोड़िक सबो का परदेस ठिकाणा
राम सब यख छन पर बल मन मा रावण बस्यूचा
अंखयूं अंखयूं न रोज अब किलै सीता हरण हुनिचा
एक खुटा दून एक दिल्ली मा अब बल धरयूंचा
कैल सोचण पहाड़े की जब अपरू नाणो ही खुटुचा
देखा डामा को गढ्देश मेरो उत्तराखंड बणीग्याई
तब भतेक अपरो देऊ देबता हम से रूसैग्याई
बूढारी अंखयूंन देखिछया सब भल भली के जो सुपनिया
अब की पीढ़ी न ऊ सुपनियों को छितर बितर कैदयाई
बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

पलायन
जौं परैं फंकुडु नि ऐेंन
वो जख्या तक्खी रैगैन
जौं परैं फंकुडु ऐेंन
वो फुर्र उड़ि गैन।
लेखी पैढि कि
जो परदेस चलि गैन
गौं का वो मनखी
परदेसी भैजी ह्वे गैन।
बगण लग्यां छन दिन -रात
पाणी सि म्यरा मुल्का मनखी
गौं म रैणा की
कैन बि जुगत नि जुटै।
काम, काज, रूप्या नाज
ह्वे ता सकदु गौं म आज,
यीं धरती म रैणा को
जब हो मन्ख्यों को मिज़ाज।
औखद इलाज, दवै -दारु
पढ़ै लिखै को होंदु सारु
कन नि रुक्दा गौं म मनखी
किलै बजेन्द गौं- गुठ्यार ?
नेता सियां, जन्ता लाचार
ड्यारादूण-नैनीताल उंदंकार
बाकि पाड़ जन्या तन्नि
समस्याओं को कु कार इलाज।
मनखि सोचा जरा विचारा
गौं भी उद्धार कारा
ठंडो पाणी, ठंडी हवा
खेती पाती समाल कारा।
रुका गौं म, भजणा किलै
अल्का-जळक्यां ह्ययना क्या छा
जरसी कुछ जतन त कारा
बगदी नि जा, गौं म रावा।
दिनेश ध्यानी २२/०७/२०१६

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

घास कटिक प्यारी छैला ऐ

घास कटिक प्यारी छैला ऐ
रुम्क व्हैगे घार एजादी
घास कटिक प्यारी छैला ऐ
रुम्क व्हैगे घार एजादी
दुदी का नौना की हिंगर गड़ीं चा ऐ
रुम्क व्हैगे घार एजादी
घास कटिक प्यारी छैला ऐ

घास का बाना कै बेल गैई
बौड़ी की घार किलै नि ऐई
घास का बाना कै बेल गैई
बौड़ी की घार किलै नि ऐई
वै बेल लौली मि बी बथै जा ऐ
रुम्क व्हैगे घार एजादी
घास कटिक प्यारी छैला ऐ

ऊंचा डंडा बी अछेई गैना
लोगों की ब्वारी घर बौड़ी ऐना
ऊंचा डंडा बी अछेई गैना
लोगों की ब्वारी घर बौड़ी ऐना
त्वै बिना घर मयारू सुनु हुँयूँ चा ऐ
रुम्क व्हैगे घार एजादी
घास कटिक प्यारी छैला ऐ

ऊनि बसग्याली घासे गढोली
कुछी छोरी त्वै मा गरी हुंई हुली
ऊनि बसग्याली घासे गढोली
कुछी छोरी त्वै मा गरी हुंई हुली
अफ ऐ अयुं छो मि मा दे जा ऐ
रुम्क व्हैगे घार एजादी
घास कटिक प्यारी छैला ऐ

त्यारा मैता का पौणा अंयां छिन
बांच दे सबी धे लगणा छिन
त्यारा मैता का पौणा अंयां छिन
बांच दे सबी धै लगणा छिन
एक बेर हां बोली मन थे बौथे जा ऐ
रुम्क व्हैगे घार एजादी
घास कटिक प्यारी छैला ऐ

बरखणा आंसूं सौंण भादों सी
आंखि भरी छन पाणी की रौं सी
बरखणा आंसूं सौंण भादों सी
आंखि भरी छन पाणी की रौंसी
यूँ आंसूं तू ई ऐकि पूंजी जादि ऐ
रुम्क व्हैगे घार एजादी
दुदी का नोना की पिंगल गडी चा ऐ
रुम्क व्हैगे घार एजादी
घास कटिक प्यारी छैला ऐ
रुम्क व्हैगे घार एजादी
रुम्क व्हैगे घार एजादी
रुम्क व्हैगे घार एजादी


उत्तराखंडी गीत है
रुम्क व्हैगे घार एजादी
गीत जीत सिंग नेगी जी
उत्तराखंडी भाषा को बढ़वा देने के लिये
चल चित्र के निचे गीत लिखा है बस
उत्तराखंड मनोरंजन तुम थै कंण लग जी?
बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

डांड्युं मां च कुयडी लगीं
मन मेरु खुद्यांणु मा
परांण जयुं च गौं ख्वालों मा
जिकुडी यख झुर्यांणी मा
डाली पकीं होली आम की
ककडी लगीं होली लगुल्युं मा
गौं ख्वालों की खुद मी लगदी
रात दिन मेरी जिकुडी मा
झर्र झुरांदु परांण मेरु
कुयडी यख जब लौंकदी मां
जंदर्यु सी यख घुंघ्याट गदन्यु क
तेरी खुद मी लगदी मां
डांड्युं मा च कुयडी लगीं
मन मेरु खुद्यांणु....
सर्वाधिकार सुरक्षित @सुदेश भट्ट"दगडया"

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

मनखि कू जीवन यनु होन्दु छ,
जन बंदगोभी कू पात,
अतं समय मा सोच्दु मनखि,
क्या आई मेरा हात......
-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासू

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बीठा पाखों खिलिगे वा फ्योंली
धरती बणी च देखा दूँ ब्योंलि
ऋतु वसन्त बौड़िक ऐगै
बणो -बणो तें धद् याण लेग्ये
डाळ्युं -डाळ्युं मां ललांगा बुराँस
बोड़ीगे आज फेर भौंरों की आस
उड्यारु -उड्यारु खुसबू च बासा
फिर से जगीगे पोतळ्युं की आसा
इन मां लठ्याळी तू कख लुकिं च
बाँज की डाळी बी कलबलि हुँयिं च
न जादा जाड़ो न जादा ताप
सर्ग कू बादळ बि सेळू सीं लाँप
उमेलू समौ च उमेली च बार
अ दूँ बन्दोड़ा अब धोरा -धार
उताळू सरील वनि क्वांसु पराण
तू आँखा बूजिक हुयीं च अजाण
मोळ्यारि बगत रमेलि डांडी-काँठी
रुग बुग्या ह्वेगिन घ्वीडों की चांठी
द्वि मासी वसन्त सुआ सदानि नी रैणी
ऐजा मेरी चकोर तू सरगे सीं गैणी
( @ उमा भट्ट @)
उड्यारु - गुफाएँ
पोतळ्युं - तितलियों की
उमेलू - सुहावना
बन्दोड़ा - सुन्दरी
उताळू - उतावला या दीवाना
क्वांसू - कोमल
रमेलि - मनोहर या रमा देने वाली
रुग्बुग्या - मखमली

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

वूं खुणे कुकर न ब्वाला
कुकर त बफादार हुंदन
वूं तेन सुंगर न ब्वाला
वो सुंगर से बी दलेदरी छन
ये गुरो नि छन द्वालन्यू रैंण वला
ये आस्तीन माँ रैन्दन आर आपणो तेन ही डसदन
और ता और चौर्य स्याल बि यो तेन बुबा मनंदन
पर / जो यूं तैं
कुकर/स्याल/सुँगुर/गुरो बणादिन अर बाद माँ आपणो कपाल फोड़दीन
वूं खुणे जनता ब्वल्दीन ।
Poetry by Madan Duklan