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Kumauni & Garhwali Poems by Various Poet-कुमाऊंनी-गढ़वाली कविताएं

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 05, 2011, 12:00:34 AM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


Navin Dabral
September 10
लमफसारिक स्यूणो गिजै गयुं मी
मेरा चुफला खैचदारी भग्यान नि रै अब
मेरा कंड्यूड मरोड़दरी दुद्या बोए तै
जमणु व्हेगी सरग सिधारयां
म्यार बूब्बान कबि नि बिजई हमुते
फ़जलेकि गैणा दिख्यांदा
नौनौ तै देर तक स्यूणो
म्यार बूब्बा तै भलो लगदु छाई
सच त याच क़ि चैन क़ि निन्द
बूब्बा जी का जमौनु माँ
जू हमते मिली
उन चैन आज तक नि मिली
बिजण मां अर सेणु मां अब
क्वि फर्ख नि रैगी
सीण क़ि ढब दारु जनि होंदी
ढबै गयां त छुटदि नी छ
लम फसारिक स्यूण मां
जू मज़ा मिल्दु छ
भौत कम का नसीब मां होंद
निस्फ़िकरि क़ि निन्द
लिखरदू ( नवीन डबराल )
१०/ ९/ २०१५/ .....वड़ोदरा

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

"हिटो हो भैजी चलो रै भुला "
हिटो हो भैजी चलो रै भुला, उत्तराखंड देखि औंला।
म्यारु पहाड़, देव भूमि, पित्र भूमि कू शीश नवौंला।।

उत्तराखंड पौंछण से पैलि, रामपुर तिराया मा जौंला। जौं कि ज्यान से मीली राज,बवूं भै भैण्यूं याद ल्योंला।।
हिटो हो भैजी चलो रै भुला..........

घार बूण राजि रखी,भौन देवी मा घांडि बजौंला।
कुलदेवों का थान मा छ्वारो द्यू धुपणु कैरि औंला।।
हिटो हो भैजी चलो रै भुला..........

चकबंदी कू जोर चलणू, गणेशु काका थैं सारु द्यूंला।
नै क्यारि सजीं काका की, क्यार्यूं मा पाणी चारि औंला
हिटो हो भैजी चलो रै भुला..........

क्यार्यूं मा हर्यालि आली, फुंगडी सबि अवाद ह्वैली।
ग्वीणि बांदर सुगंर भाजला, सैरि सारि खैंदि ह्वैली।
हिटो हो भैजी चलो रै भुला.........

बांजि फुंगडि यख वख, वाडा मींडा देखि औंला।
सरक्यां वाडा सै कैरिक, रळक्यां भीड़ा धैरि औंला।।
हिटो हो भैजी चलो रै भुला......

तिबरी डंडेळि कूड़ि तेरी,छनुडी बांजि समाळि औंला
हे भैजी! ब्वाडा का टैम जनि,वूं थै ई सजैक औंला।।
हिटो हो भैजी चलो रै भुला.........

वगत कु क्य बुन रै भुला, वां से पैलि समळि जौंला।
आणु जाणु लग्यूं रालु, गौं गळ्या पछ्याणि ल्योंला।
हिटो हो भैजी चलो रै भुला..........
नै क्यारि -नई पौध, new generation.
सर्वाधिकार सुरक्षित @दर्शनसिंह रावत "पडखंडाई "
दिनांक 20/11/2015

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

तू ऐ जांदी सुप्नियु मा
(ऐ जांदी सुप्नियु मा) ... २
ये मेर भग्यानी तू (ऐ जांदी सुप्नियु मा) ... २
ये मेर रुपै कि खज्यानी(ऐ जांदी सुप्नियु मा) ... २
ये मेर माय कि थैली (ऐ जांदी सुप्नियु मा) ... २
ये मेर बिगरेली पियारी (ऐ जांदी सुप्नियु मा) ... २
ये मेर रानी (ऐ जांदी सुप्नियु मा) ... २
ये मेर रस्वड़ी (ऐ जांदी सुप्नियु मा) ... २
ये मेर छन्नी -गोठ्यारि (ऐ जांदी सुप्नियु मा) ... २
ये मेर सिरणि-चदरी (ऐ जांदी सुप्नियु मा) ... २
ये मेर थकुलि (ऐ जांदी सुप्नियु मा) ... २
ये मेर बस्ग्याल -रुड़ि-ह्यून्द (ऐ जांदी सुप्नियु मा) ... २
ये मेर पुंगड़ी -कुड़ी (ऐ जांदी सुप्नियु मा) ... २
ये मेर स्वाणि (ऐ जांदी सुप्नियु मा) ... २
ये मेर रौतेली (ऐ जांदी सुप्नियु मा) ... २
ये मेर लाटी (ऐ जांदी सुप्नियु मा) ... २
ये मेर गरीबी की रुवाटी (ऐ जांदी सुप्नियु मा) ... २
ये मेर नथुली (ऐ जांदी सुप्नियु मा) ... २
ये मेर गोलोबंदा जांझरी (ऐ जांदी सुप्नियु मा) ... २
ये मेर कमरपट्टा (ऐ जांदी सुप्नियु मा) ... २
ये मेर खुटी पैजनी (ऐ जांदी सुप्नियु मा) ... २
ये मेर कंचे की चुरी (ऐ जांदी सुप्नियु मा) ... २
ये मेर माथे की बिंदी (ऐ जांदी सुप्नियु मा) ... २
ये मेर पहाड़े की नारी (ऐ जांदी सुप्नियु मा) ... २
ये मेर उत्तराखंड की दुलारी (ऐ जांदी सुप्नियु मा) ... २
ये मेर डाली बोटी तू (ऐ जांदी सुप्नियु मा) ... २
बालकृष्ण डी ध्यानी
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

छम छम शराब छम
छम छम शराब छम
मेरा पहाड़ों में शराब छम छम
ब्यो बारातों मा
मसाणों को कामकाजों मा छम छम
बरखण लगि झर झर
देस बिदेस हारे मेरो पहाड़ी बाज मारी
तुण्ड फुंड मा
पोड़ि हर पहाड़ी करम मा छम छम
देक ना देकि हुली तिल कख कख
मिल जै बी पी ले तू जख तख
नि हुनि थम थम
कन बगनी नि थमनि छम छम
आन्दु दिस शराब छम छम
ब्योखून दोपहरी मा शराब छम छम
रति सुबेर कु देक शराब छम छम
बोतलों पोतलों को धिंगतालो छम छम
छम छम शराब छम
बालकृष्ण डी ध्यानी
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

क्द्गा सौली दगडी
क्द्गा सौली दगडी
वि अप्डी कथा लगे देंदी
नानू सु जियू मेरो
कैकि बी छूईयों मा झट ऐजांदू
क्द्गा सौली दगडी ......
बल इत्गा ई सीख मिल
बल इत्गा मिथे समझ मा आई
फिर बी विंकी मुखडी
मेरा सुप्निया मा किलै की ऐ जांदी
क्द्गा सौली दगडी ......
झट रुसै झट मने मि जांदू
चट विंकी बगलि मा जा की बैस बी जांदू
फिर बी बालपण परित वा किले बिसरी जांद
ज्वानि का बाटा मा वा किले हीटे नि आंदु
क्द्गा सौली दगडी ......
सब थे पता चल जांदी
वींकी ठौर कख और्री क्या च
परी नानू जियू सी जियू मेरो
फ़िक्र कैकि तू इनि उड़दी रैंदु
क्द्गा सौली दगडी ...... २
बालकृष्ण डी ध्यानी
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

कैल जादू कै हुली
कैल जादू कै हुली
ऐ ब्योलि कैल सजै हुली
नखर्याली नाक की ये नथुली
सोना मा कैल गढ़े हुली
कैल जादू कै हुली ..................
पसरयाली बिखर्याली ये
ल्जयाली लोक्यंली धोप्यली ये
ये गैणा ढुंगा और्री गारे का
कैल इन टिप टिप्या हुला
कैल जादू कै हुली ..................
अन्ख्युं को ऊ मेरो रगरयाट
जीकोडी को मेरो ऊ झकझायट
ये मेरो भूमि को रे भूम्याला
ये जगमग- २ रे बोग्यला
कैल जादू कै हुली ..................
बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
Yesterday at 8:47am · New Delhi ·
गीतकार....
कल्‍पना मा डूबिक लिख्‍दु छ गीत,
गितांग की होन्‍दि छ जय जयकार,
पौन्‍दु छ गीत लगैक माया उपहार,
जांदु छ सात समुदर का पार,
गीतकार रै जांदु तन्‍नि,
पर मनखि यनु गौर कतै नि करदा,
कैन लिखि होलु,
कुतग्‍याळि लगौण्‍यां गीत,
जै सुणिक नि भरेन्‍दि धीत.......
चल रुपा बुरांस का फूल बणि जौला......श्री महेशानन्‍द गौड़ जी(1962)
तू होलि बीरा ऊंचि ऊंचि डांड्यौ मा......श्री जीत सिंह नेगी जी
चांद चकोरी मुखड़ि गोरी.................जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
कविमन कू कबलाट(जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु)
दिनांक 15.12.2015

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
December 4 at 3:35pm · New Delhi ·
मेरी या गढ़वाळि कविता श्री नरेन्‍द्र कठैत जी, श्री हरीश जुयाळ कुटज जी, श्री शैलेन्‍द्र जोशी जी, श्री दिनेश ध्‍यानी जी, श्री हितैषी जी, श्री केदारखण्‍डी जी अर हास्‍य दगड़या श्री लाल चंद निराला जी, श्री बिष्‍ट जी, श्री भण्‍डारी जी तैं सादर समर्पित छ, पहाड़ अर भाषा प्रेम मा।
कैन खाई होला हे,
मेरा ल्‍हयां नयार का माछा,
माछौं कू मछळ्वाणि खाण,
सपतुळि का सैण जाण,
हे भुला लाल दा,
पोटगि फर सबळाट होणु,
बिष्‍ट जी कू ख्‍याल औणु,
ह्युंद मैकु छ सतौणु,
अब खा माछा कवि 'जिज्ञासु',
कुतग्‍याळि सी लगौणु,
भण्‍डारी जी कख होला,
ह्युंद की ठंड होणि,
कठ्ठा होवा तुम सब्‍बि,
सतपुळि का सैण मा,
ह्युंद की ठंड बतौणि,
खुद लगिं गढ़वाळ की,
खुद मा अंसधारी औणि..........
-जगमोहन सिंह जयाड़ा 'जिज्ञासु'
रचना सर्वाधिकार सुरक्षित
दिनांक 4.12.2015

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

डूबिगी पुराणि टीरी.....
यीं पत्रिका तैं पढ़िक,
पुराणि टिरी की,
भौत याद आई,
धुनारु की बस्‍ती थै,
पैलि पुराणि टिरी,
गोरख्‍यौं कू राज नि होन्‍दु,
हमारा गढ़वाळ मा,
पुराणि टिरी कू,
25 दिसंबर,1815 कू,
राजधानी का रुप मा,
जल्‍म नि होन्‍दु......
-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
दिनांक 20.11.2015

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
November 17 at 7:57am ·
क्‍या यू सच छ,
आपकु क्‍या विचार छ,
आपकु अहसास,
मेरा गौळा कू हार छ......
कामना कविमन की मेरा,
हरेक तैं खुशी द्यौं,
जीवन रुपी पथ फर चल्‍दु,
दुआ सब्‍यौं की ल्‍यौं......
-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
दिनांक 17.11.2015