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Kumauni & Garhwali Poems by Various Poet-कुमाऊंनी-गढ़वाली कविताएं

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 05, 2011, 12:00:34 AM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

अरे ओ
भुमियाल देप्ता
सीमेट लो अपने निशाण
और दो पैसे वाली
अपनी पीतल की घंटियां

उठा लो
शौकारों के चढ़ाए खिरीज
बांध लो पोटली
अपने आण-बाण-बयालों के साथ
जाओ भाग जाओ पहाड़ से.

नहीं तो तुम्हें बुरी तरह खदेड़ आयेंगे
तुम्हारे ही शौकार
घाट पार
धार पार

और उठा लायेंगे
आशाराम, शांतिकुंज, साईं
राम, हनुमान के सुन्दर फोटक
हर गली, हर चौराहे में खड़े कर देंगे
आलिशान मंदिर

बुरी तरह बेदख़ल कर दिए जाओगे
भ्यार के देप्ताओं के सामने
भुताषण गए पुरखो
क्या सह पाओगे
सदैव-सदैव के लिए मृत्य ??

(अनिल कार्की)
एक नई लिखी जा रही कविता का अंश

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Dr Anil Karki

जेड़ज्याए
ददा !
धार के पार तरफ
देख रही थी जेड़ज्या,
सड़क को एक टक
देली में बैठ
गल्फु में हाथ लगाकर
बहुत देर तक
ए ददा !
बीड़ी चूसते हुए
'दिगो दिग' कह रही थी
फिर तिथान के तरफ मुँह मोड़कर
सड़क की तरफ पीठ फेर दी रे
जेड़ज्या ने
ए ददा !
घर कब आएगा तू ?
जेड़ज्या कह रही थी
ह्यून तो थाह दिया है परानी ने
पर चौमास का कोई भरोसा नहीं
पाख सड़ गयी है
पाल का भीता गोठ में गिर रहा
भुर भुर करके
छुन्तुरा धिनाली उजड़ते ही भाग गया है
दुधघर के पास से
मूसों ने बबाल मचा रखा है
तेरे लिए बचाया हुआ
साल जमाल धान
टूंग गये हैं
भकार में घुस कर
कोई चूदानी ला देता तो कितना अच्छा होता!
कह रही थी जेड़ज्या
ए ददा !
उत्तराखंड की तरह ही
खपराखंड हो गया रे गौं-घर भी!
ए ददा !
भौत टैम हो गया
घर भी नहीं तर्छा है
कमेट खोदने वाला कोई नहीं
और
पाल भी नहीं लीपी है रे
जेड़ज्या ने
कह रही थी
लाल माटा कौन लाएगा
ला भी गया कोई तो
कैसे लीपूंगी
कमर चड़क रही
ए ददा !
रिश्तों की गरमाहट वाला मूव का ट्यूब लाने वाला भी कोई नहीं रे
ए ददा!
आब-तीस बची है रे बुढ़िया में अब भी
जमीन को पौरिया रखा है
ओड़ा-बाड़ा सब की फ़िकर अभी है उसे
घोघस्याड़ी वाले
बम्बे आम के पेड़ से
आम किसी को नहीं टीपने देती रे
जेड़ज्या आज भी
मेरे बच्चे आयेंगे तो क्या खायेंगे कहती है.
ए ददा!
अपनी ही तरह उसे भी
एक बार
रियल जूस और माजा मैंगो का रस पीला जाना तो
पप्सी, कैम्पाकोला की बोतल दिखा जाना रे
ए ददा !
दस-दस के कड़कड़ाने नौट
बुढ़िया ने सीरान लुका रखे तेरे लिए
जीभ में दांत काट कर जी रही है
जेड़ज्या अब भी
ए ददा!
किसी दिन क्रेडिट कार्ड, डेविट कार्ड दिखा जाना रे
जेड़ज्या को
ए ददा !
दस-दस के नौट से याद आया
फुल संग्रात है भल रे
भिटोर खिला है
खेत-खेत में लावारिस सा
देली में दो फूल रखने वाला भी कोई नहीं हुआ
जेड़ज्या कह रही थी
अब तो मेरी नातिनी भी ठुल्ली हो गयी होगी
घर होती तो फूल रखती देली में !
फिर कहने लगी
उसको क्या पता ठैरा!
नानछना से तो बाहर ही रही ठैरी
ए ददा !
जेड़ज्या की ह्यांक शिकार में गयी है रे
दांत एक नहीं
मीरी ही मीरी बची है
उनसे ही लूछ रही थी
देवी मंदिर में शिकार का टुकड़ा
खुस्यानी ज्यादा हो रही थी
धो कर खाया
बुढ़िया ने शिकार.
ए ददा !
किसी दिन कम खुस्यानी डाल कर
भौजी के मैत से आये
होकिन्स कूकर में गला हुवा शिकार खवा जाता रे
जेड़ज्या को
ए ददा !
अब तो आंसू भी सूख गये रे बुढ़िया के
दुकान से डायिक्लोजूम की हरी गोली मंगाती है
चड़क,पीड़, बुखार में
धार चड़ नहीं पाती
उलार उतर नहीं पाती
ए ददा!
आना रे इक्की बार घर
अपना लाजम देख जाना
ठोक बजा जाना घर
दिवार दे जाना
चौमास में
खेतों की तिर उधर गयी है
इस हड्डी के ढाँचे को भी
चलते-फिरते देख जाना रे
भूत-प्रेतों जैसी हो गयी है जेड़ज्या!
आएगा तो
मडुवा, भट्ट , गहत भी ले जाएगा
खाना खा जायेगा
न खाना बाँध ले जाएगा
फोटुक भी खींच ले जाएगा
फेसबुक में लगाने के लिए
आना तो सही इक्की बार !
पता नहीं कब
जेड़ज्या
का प्राण हंस उड़ जाए रे
मुझे तो लग रहा
तुझमें ही अटके हैं
शैद उसके प्राण !

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

ज से जाती
ज से जोशी
ज से जॉनसन
ज से जफार
ज से जिन्दगी
जिन्दगी सभी ज
एक ही है
बस ब्रांड अलग़
प्रोडक्ट एक है
वो प्रोडक्ट हम मानव है ।। शैलेन्द्र जोशी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

मायादार अपणा सुवा देखी देवी दर्शन भि कर सक्दन यनु प्रयोग मेरी कलम बिटि ऐसु का नौराता मा यी रचना मेरी सब्भी मायादारो तै समर्पित चा
देवीकु रूप साकछात भगबती स्वरुप
मनखीयों मा त नि देखी इन्न नौनी
द्यब्तो का मुल्क बिटि ऐ होली स्या छोरी
दरशन विका रूप देखी होदन
सब्भी नौ देवियों का
कभि दिख्दी विका रूप मा शैलपुत्री
कभि दिख्दी विका रूप मा बरमचारणी
कभि दिख्दी विका रूप मा कुस्कमंडका
कभि दिख्दी विका रूप मा स्कंदमाता
कभि दिख्दी विका रूप मा कत्यानी
कभि दिख्दी विका रूप मा कालरात्रि
कभि दिख्दी विका रूप मा महागौरी
कभि दिख्दी विका रूप मा सिद्धधातरी
इन्ना रूपवान गौरा तै
कु शिब होलू दुनि मा
भग्यान छन जौका घौर जल्मी
देबी कु यनु रूप ...................................... शैलेन्द्र जोशी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

मी ह्युंद कुयेडी सि लौंकीगे छो
विका बुबा आंखम जाला सी
अर सट भित्र गुस ग्यो घारम
खौं बाग बणी छो कुयेडीम भैर
भित्र पौचदू पौचदू बिरालु हवे ग्यो
पर वि लोलीन कते नि माणी
कुकुर समझी लत्ती मार
भैर करदे मैकू यी ठण्डम
भैर खड़ा विकाबुबा जिन पूछी कुछे रे
भित्र कनुक्वे पौची
मिल बोली इत्गा कुयेडी लगी च
भित्र कुछ भी चीज पौच सकदी
अबे जन भि पौची तू छे कुछ
मिल बोली तुमरी छोरी मायदार
इत्गा सुणी वुकू हार्टबिट बढ़गी
कमीना लोला रुक जरा खबरदार निर्भे मौका ....................शैलेन्द्र जोशी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

हे लोळौ !
मी त अज्यूं बच्यूं छौं.
कन छुड़़णा छां तुम मी.
फून लम्बर बि / म्यरु वी.
क्वाटर बि मंडावली बिटि/
मिन बदळी नी।
कबि त / खूब ब्वल्द्या छा तुम/
कि केशवान जी!
अवा अध्यक्ष बि / बणन् तुमुन ही.
क्य बरिष्ठै जगा / अब इथगा
गरिष्ठ ह्वे ग्यों मी?
य म्यरि कबितौं पर / वाह-वाह ब्वन मा /
अब तुमारि गिच्ची छन दुखणी .
अरे! माणा कि मी दानू ह्वे ग्यों / दिमाग मा नयि रचना /
कम छन औंणी.
पर तुमारि गिच्ची बि त बल / पुराणी रचनौ च सुणौणी.
अरे द्वीयेक कबिता त अबि बि /
सांस रोकी पढ़ सक्दों मी.
झणी किलै?
साल भर बिटि / तुम गरगरा छयां /
क्य म्यरा म्वनै /
कन्ना छयां इन्तजारि?
तुम स्वचणां छयां / जणणू क्वी नी.
पर भुलौं ! याद रख्यां!
एक दिन तुमुन बि दिखणन /
दिन यी।

Narendra Kathit

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

मी ह्युंद कुयेडी सि लौंकीगे छो
विका बुबा आंखम जाला सी
अर सट भित्र गुस ग्यो घारम
खौं बाग बणी छो कुयेडीम भैर
भित्र पौचदू पौचदू बिरालु हवे ग्यो
पर वि लोलीन कते नि माणी
कुकुर समझी लत्ती मार
भैर करदे मैकू यी ठण्डम
भैर खड़ा विकाबुबा जिन पूछी कुछे रे
भित्र कनुक्वे पौची
मिल बोली इत्गा कुयेडी लगी च
भित्र कुछ भी चीज पौच सकदी
अबे जन भि पौची तू छे कुछ
मिल बोली तुमरी छोरी मायदार
इत्गा सुणी वुकू हार्टबिट बढ़गी
कमीना लोला रुक जरा खबरदार निर्भे मौका ....................शैलेन्द्र जोशी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

गीतकार....
कल्‍पना मा डूबिक लिख्‍दु छ गीत,
गितांग की होन्‍दि छ जय जयकार,
पौन्‍दु छ गीत लगैक माया उपहार,
जांदु छ सात समुदर का पार,
गीतकार रै जांदु तन्‍नि,
पर मनखि यनु गौर कतै नि करदा,
कैन लिखि होलु,
कुतग्‍याळि लगौण्‍यां गीत,
जै सुणिक नि भरेन्‍दि धीत.......
चल रुपा बुरांस का फूल बणि जौला......श्री महेशानन्‍द गौड़ जी(1962)
तू होलि बीरा ऊंचि ऊंचि डांड्यौ मा......श्री जीत सिंह नेगी जी
चांद चकोरी मुखड़ि गोरी.................जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
कविमन कू कबलाट(जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु)
दिनांक 15.12.2015

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

मेरी गढ़वाली कविताएँ


पहाड़ को भूल जाऊं... ऐसा कैसे हो सकता है. पहाड़ छोड़ दूर "दर्द भरी दिल्ली" कर्मभूमि प्रवास हो गया...लेकिन! मेरा कविमन मुझे छोड़ विद्रोह करके उत्तराखण्ड की वादियों में कल्पना में विचरण करता है. भाव उतरते हैं और लेखनी से लिखता हूँ "कितनी सुन्दर देवभूमि, देखूं उड़कर अनंत आकाश से, नदी पर्वतों को निहारूं, जाकर बिल्कुल पास से....रचना: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

पत्‍नी चालीसा......
जय हो ज्‍यु पराण सी प्‍यारी,
गुण की गागर तू हमारी-1
ससुर जी की प्‍यारी बेटी,
टी.बी. देखदि बेड मो लेटी-2
तेरी खुट्टि हम दबौन्‍दा,
जीवन अपणु सुखि बणौन्‍दा-3
हात मा तेरा रन्‍दि थमाळि,
बिट्टौं ऊद तू मारदि फाळि-4
सासू जी की बेटी प्‍यारी,
तेज सुबौं की लग्‍दि न्‍यारी-5
हैंस्‍दि मुखड़ि त्‍वैन  दिखाई,
ब्‍यो का दिन बिटि ज्‍युकड़ि जळाई-6
दुश्‍मन त्‍वैकु मुख लगौन्‍दा,
ज्‍युकड़ि मेरी खूब जळौन्‍दा-7
करदा छन ऊ तेरी बड़ाई,
त्‍वैसी सदानि दुख हि पाई-8
भूत पिचास नजिक नि औन्‍दा,
जब हम तेरु ध्‍यान लगौन्‍दा-9
तीन लोक मा तू छैं न्‍यारी,
किस्‍मत कोणा पड़ीं हमारी-10
घर बार की तू कल्‍याणी,
तेरु भेद हम्‍न नि जाणी-11
सुख दुख त्‍वैसी हम छौं पौणा,
जिंदगी का दिन लगौणा-12
जब बिटि जिंदगी मा आई,
सदानि डरदु डरदु खाई-13
तेरी डौर कू बण्‍या गंगलोड़ा,
त्‍वैकु छौं हम गधा अर घोड़ा-14
धोन्‍दा छौं हम तेरी साड़ी,
चन्‍न लगिं जिंदगी की गाड़ी-15


दिनांक 22.11.2015