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Kumauni & Garhwali Poems by Various Poet-कुमाऊंनी-गढ़वाली कविताएं

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 05, 2011, 12:00:34 AM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


Gyan Pant

December 9 at 10:11pm ·

जिम कार्बेट पार्काक् शेर .......
जैल पहाड़ देखै न्हाँ
सुँणै न्हाँ
भोगै न्हाँ
उ कि जाँणौल् कि
उकाव - उलार ले हुँनी बल्
जिन्दगी में .....
गाड़ , गध्यार्
फाँदि - फुदि बेरि
पुजी जां
गों में .....
गाड़ि ऐ ले गियी त
भुला
आपण मोव थैं
पुजणां लिजी
देयि में
खुट धरणां लिजी
हिटण जरुरी छ
" जमीन " में .....
खाल्ली जि हुँनी
ढुँङ - पाथरनां बीच
ग्यूँ - धान
आड़ू , पुलम , अलबखर
हिसालु , किनमड़ और
काफल ले , आँखिर
क्वे न क्वे त
जरुर हुन्योल् , जो
पैल - पैलीं
" पहाड़ " ग्योन्होल्
दातुल , बँणयाठ
कुट्योल् , बौस
ज्यौड़ और
हव - भान् ल्ही बेरि
बाग - भालनां बीच
कस् हुन्यौल्
जीवन
और " जमीन " ले , अहा !

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Gyan Pant
13 hrs ·

एक पुराँण् कणिंक .....
. पहाड़न् में
जिंदगी छ
शहरन् में
जिंदगी पहाड़ छ । ( फोटो - असूरचुल , पिथौरागड़ , यू०के० )

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

गिर्दा के लिए --- " पहाड़ " के बहाने !
उन्हें डर है
कहीं गिर्दा फिर न आ जाए
झील के किनारे और
लहरों को बता जाए
कि तटबन्धों के बाहर भी
एक और दुनियाँ है जो
इतनी हसीन नहीं है ।
उन्हें डर है ...
कहीं गिर्दा फिर न आ जाए
पहाड़ की चोटी पर और
पत्थरों को बता जाए
कि इतना हरा और
भरा भी नहीं है
जीवन तो
वास्तव में पहाड़ है ।
उन्हें डर है ....
कहीं गिर्दा फिर न आ जाए
भीड़ में और
लोगों को सिखा जाये
कि " नजर " के मामले में
अपनों का भी
विरोध करना जरुरी है ।
उन्हें डर है ....
कहीं गिर्दा फिर न आ जाए
महफिल में और
कोई गीत गुनगुना जाए ऐसा
कि प्रकृति ही
उठ खड़ी हो जाए
अन्याय के खिलाफ
फिर " केदारनाथ " की तरह ! ज्ञान पंत

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


Gyan Pant
November 29 at 8:18am ·
...... जिम कार्बेट पार्काक् शेर ।
सबनैकि
आपणि - आपणि ठौर भै
यो दुन्निं में मगर
मनखियैलि
धरती - अगाश और
पाताल ....
सब एक करि हालीं
गाड़ - गध्यार्
बोट - डाव
सब कब्जै हालीं
फिर ले
ठौर न्हाँ बल्
खांण् - पिंण् छाड़ौ
झिट घड़ि ले
चैन न्हाँ
यो दुन्नि में ....
सोचूँ !
ततु है बेरि ले
कयीं त्वालि
" आपणिं " दुन्नि बटी
भ्यार निकायि दियूँ त
फिर कभै
उज्याव नि होल्
मेरि दुन्नि में !

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


Gyan Pant
November 27 at 9:24pm ·
जिम कार्बेट पार्काक् शेर .......
पत्त न
के बात भै
दूध जस्
उमांव ऐ पड़ौ
कल्ज में ....
हिकुरि - हिकुरि (हिकुरि - हिकुरि माने सिंसक सिंसक कर )
डाढ़ ऐ पड़ी
आँखन् बटी
छो फुटि पड़ौ छो - पानी का सोता
हिसालु त्वाप् जास्
भौतै भल् लागीं
आज मैं कैं
त्यार्
कनमड़ खैयी गिज् ... गिज -- होंठ
एक स्वैंण छी सब स्वैंण -- सपना
जो मैलि ले देखीं !

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

भी तो आजा तू अपने उत्तराखंड में
कभी तो आजा तू अपने उत्तराखंड में
अपने घर अपने द्वार अपने गाँव में
प्रवासी बन कब तक तू भटकेगा
बाँकपन तेरा बचपन से कब तक अटकेगा
पुकारता तो होगा वो तुझे कभी अकेले में
इस दिल की बातों से तू कब तक मुकरेगा
छल ना तू ऐसे ना तू अपने को ऐसे दुःख दे
ये तेरी प्यारी सी सूरत कभी तो मेरी ओर तू कर दे
इतिहास के पन्नों को समझना तेरा अब भी बाकी है
अपने पुरखों को परखना तेरा अब भी बाकी है
तुतली बोली में तेरे गाये गढ़वाली गीत अब भी बाकी है
उन यादों की दीवारों खींची तूने वो रेखा अब भी बाकी है
चल मुझे नहीं तो अपने को देखने को आजा
खोया है तू कब से अपने में उसे खोजने तो अपने पहाड़ आजा
कभी तो आजा तू अपने उत्तराखंड में
अपने घर अपने द्वार अपने गाँव में
एक उत्तराखंडी
बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
http:// balkrishna_dhyani.blogspot.com
में पूर्व प्रकाशित -सर्वाधिकार सुरक्षित

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

तू ऐ जांदी सुप्नियु मा
(ऐ जांदी सुप्नियु मा) ... २
ये मेर भग्यानी तू (ऐ जांदी सुप्नियु मा) ... २
ये मेर रुपै कि खज्यानी(ऐ जांदी सुप्नियु मा) ... २
ये मेर माय कि थैली (ऐ जांदी सुप्नियु मा) ... २
ये मेर बिगरेली पियारी (ऐ जांदी सुप्नियु मा) ... २
ये मेर रानी (ऐ जांदी सुप्नियु मा) ... २
ये मेर रस्वड़ी (ऐ जांदी सुप्नियु मा) ... २
ये मेर छन्नी -गोठ्यारि (ऐ जांदी सुप्नियु मा) ... २
ये मेर सिरणि-चदरी (ऐ जांदी सुप्नियु मा) ... २
ये मेर थकुलि (ऐ जांदी सुप्नियु मा) ... २
ये मेर बस्ग्याल -रुड़ि-ह्यून्द (ऐ जांदी सुप्नियु मा) ... २
ये मेर पुंगड़ी -कुड़ी (ऐ जांदी सुप्नियु मा) ... २
ये मेर स्वाणि (ऐ जांदी सुप्नियु मा) ... २
ये मेर रौतेली (ऐ जांदी सुप्नियु मा) ... २
ये मेर लाटी (ऐ जांदी सुप्नियु मा) ... २
ये मेर गरीबी की रुवाटी (ऐ जांदी सुप्नियु मा) ... २
ये मेर नथुली (ऐ जांदी सुप्नियु मा) ... २
ये मेर गोलोबंदा जांझरी (ऐ जांदी सुप्नियु मा) ... २
ये मेर कमरपट्टा (ऐ जांदी सुप्नियु मा) ... २
ये मेर खुटी पैजनी (ऐ जांदी सुप्नियु मा) ... २
ये मेर कंचे की चुरी (ऐ जांदी सुप्नियु मा) ... २
ये मेर माथे की बिंदी (ऐ जांदी सुप्नियु मा) ... २
ये मेर पहाड़े की नारी (ऐ जांदी सुप्नियु मा) ... २
ये मेर उत्तराखंड की दुलारी (ऐ जांदी सुप्नियु मा) ... २
ये मेर डाली बोटी तू (ऐ जांदी सुप्नियु मा) ... २
बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
http://balkrishna-dhyani.blogspot.in/search/
http://www.merapahadforum.com/
में पूर्व प्रकाशित -सर्वाधिकार

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


Darshan Singh
November 20 at 6:35pm
शुभ संध्या दगड्यो। भोळ सुबेर, गांव की ओर
"हिटो हो भैजी चलो रै भुला "
हिटो हो भैजी चलो रै भुला, उत्तराखंड देखि औंला।
म्यारु पहाड़, देव भूमि, पित्र भूमि कू शीश नवौंला।।

उत्तराखंड पौंछण से पैलि, रामपुर तिराया मा जौंला। जौं कि ज्यान से मीली राज,बवूं भै भैण्यूं याद ल्योंला।।
हिटो हो भैजी चलो रै भुला..........

घार बूण राजि रखी,भौन देवी मा घांडि बजौंला।
कुलदेवों का थान मा छ्वारो द्यू धुपणु कैरि औंला।।
हिटो हो भैजी चलो रै भुला..........

चकबंदी कू जोर चलणू, गणेशु काका थैं सारु द्यूंला।
नै क्यारि सजीं काका की, क्यार्यूं मा पाणी चारि औंला
हिटो हो भैजी चलो रै भुला..........

क्यार्यूं मा हर्यालि आली, फुंगडी सबि अवाद ह्वैली।
ग्वीणि बांदर सुगंर भाजला, सैरि सारि खैंदि ह्वैली।
हिटो हो भैजी चलो रै भुला.........

बांजि फुंगडि यख वख, वाडा मींडा देखि औंला।
सरक्यां वाडा सै कैरिक, रळक्यां भीड़ा धैरि औंला।।
हिटो हो भैजी चलो रै भुला......

तिबरी डंडेळि कूड़ि तेरी,छनुडी बांजि समाळि औंला
हे भैजी! ब्वाडा का टैम जनि,वूं थै ई सजैक औंला।।
हिटो हो भैजी चलो रै भुला.........

वगत कु क्य बुन रै भुला, वां से पैलि समळि जौंला।
आणु जाणु लग्यूं रालु, गौं गळ्या पछ्याणि ल्योंला।
हिटो हो भैजी चलो रै भुला..........
नै क्यारि -नई पौध, new generation.
सर्वाधिकार सुरक्षित @दर्शनसिंह रावत "पडखंडाई "
दिनांक 20/11/2015

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


Dwarika Chamoli Intolerant
November 23 at 1:38pm · New Delhi
आजकल अक्सर देखा है कि बच्चे फेस बुक पर अपडेट रहते है ! और किसी लड़के ने कोई खूबसूरत लड़की देख ली तो उसे फ्रेंड रिक्वेस्ट भेज कर मन में ख्यालाती पलाऊ पकाने लग जाते है और पता नही क्या क्या सोचने लगते है उन्ही में से एक ख्याल को मैंने इस कविता के माध्यम से दर्शाने का प्रयास किया है। ......................
फेस बुक पर भेजी मिल एक रिक्वेस्ट
वैन भी चट करी मी एडजेस्ट
फोटो मा दिखनी च व् स्वाणी
म्योरो भी एगी वें पर प्राण
मी त चली अब वें खुज्याण वें खुज्याण
कख च त्योरो गांव देश
मिल भी बदल्यां फेस बुक पर कई भेष
तू भी बनी च बस छुयाल
दयोंदी न क्वे क्लू न सवाल
समझा अब कुछ म्यारा दिलो गो हाल
त्यै दगडी अब च मिल अपनी जिंदगी सजौण
मी त चली अब वें खुज्याण वें खुज्याण
अब रात दिन आंख्युं मा च व् रिटनी
स्योणी खाणी अब हर्ची
चिफली गिच्ची आँख च बादामी
घुंगरयाला बाल अर वूं से टपकणु च पाणी
मी त चली अब वें खुज्याण वें खुज्याण
ए भैजी ए भुला तेन भी देखि
जू लगदी फूल बुरांस
दिखदी जन हिसोले की दाणी
ग्युंगी बालड़ा जन द्योन्दी झसक
कंडाली सी दयोंदी झपाक
मेरी अटकी च अब वें पर जान
मी त चली अब वें खुज्याण वें खुज्याण
DWARIKA CHAMOLI

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


Darshan Singh
September 16
उदास घिंडुडु
ए घिंडुडी, इनै सूणिदी।
क्या स्वचणी छै मी बि बतादी।

जणणू छौं मि, जु मि स्वचणू छौं,
तुबी वी स्वचणी छै,
तबी त म्यारु छोड़ नि द्यखणी छै।

हालत देखिक ए गौं का,
त्यारा आंख्यू मा पाणि भ्वर्यूंच।
इनै देखिदी मेरी प्यारी,
म्यारु सरैल बि उदास हुयूंच।।

अहा, कना छज्जा, कनि उरख्यळी।
वूं डंडळ्यूं मा खूब मनखी।
पिसण कु रैंदु छाई, कुटण कु रैंदु छाई,
वूं थाडौं मा खूब बिसगुणा रैंद छाई।
दगड्यो का दगडि हम बि जांदा छाई,
वूं बिसगुणौं मा, वूं उरख्यळौं मा, खूब ख्यल्दा छाई।

अर हाँ, तु बि क्य, फर फर उडांदि छाई,
ड्वलणौं थै नाचिकि कनि बजांदि छाई।
वू डूंडु घिंडुडु, अब त भाजि ग्याई,
पर त्वैफर वु कनु छडेंदु छाई।
मिल बि एक दिन वु कनु भतगै द्याई,
वैदन बटि वैकि टक टुटि ग्याई।

सुणणी छै न,
म्यारु छोड़ द्यखणी छै न।

एक दिन कनु तु,फर फर भितर चलि गै।
भात कु एक टींडु, टप टीपिक ली ऐ।
वैबत मिल स्वाच, बस तु त गाई,
हाँ पर तुबि तब खूब ज्वान छाई।
जनि सर सर भितर गैई, उनि फर फर तू भैर ऐ गेई।

जब तु फत्यलौं का छोप रैंदि छाई,
मि बि चट चट ग्वाळु ल्यांदु छाई।
सैरि सार्यूं मा खेति हूंदि छाई,
हम जुगा त उरख्यळौं मा ई रैंदु छाई।
खाण पीणकी क्वी कमि नि छाई।

झणि कख अब वू मनखी गैं, झणि किलै गौं छोडिकि गैं।
हमरा दगड्या बी लापता ह्वै गैं,
स्वचणू छौं सबि कख चलि गैं।

मेरि प्यारी,सुणणी छै ई-
स्यूं बुज्यूं हम जाइ नि सकदा,
वूं बांजि कूड्यूं देखि नि सकदा।
हम त मनख्यूं का दगड्या छाई,
मनख्यूं का दगडी रैंदा छाई।

चल अब हम बी चलि जौंला,
मेरी घिंडुडी -
कैकि नि रै या दुन्या सदनी,
इथगि राओल यख अंजल पाणी।

छोड अब जनि खाइ प्याइ पिछनै,
चलि जौंला चल हिट अब अगनै।
वूं मनख्यूं कू सार लग्यां रौंला,
बौडि जाला त हम बि ऐ जौंला।
सर्वाधिकार सुरक्षित @दर्शनसिंह रावत "पडखंडाई "
दिनांक 16/09/2015