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Kumauni & Garhwali Poems by Various Poet-कुमाऊंनी-गढ़वाली कविताएं

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 05, 2011, 12:00:34 AM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

कल्‍पना मा देखणु छौं,
तीन सौ चौसठ दिन का बाद,
लाल दा बिष्‍ट जी बण्‍यां छन,
जन बोल्‍दन बाग,
पूजा होलि आज बिचारौं की,
खुलिग्‍यन तौंका भाग.....
जुन्‍याळि रात की जोन भी हैंस्‍लि,
खित खित हैंस्‍ला खूब बिचारा,
हंसमुख छन यी दगड़या हमारा,
हास्‍य की गंगा बगौन्‍दा,
जू मनखि कब्‍बि ना हैंसि हो,
वेकु तैं हैंसौन्‍दा.......
-जगमोनह सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
कविमन की कल्‍पना छ, नाराज नि होयां
दिनांक 30.10.2015

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

कविमन की कुतग्‍याळि छन यी.....कवि जिज्ञासु
एक दरोळु.....
हमारा पहाड़ मा,
बोतळ खोलि,
भेळ मा बैठ्युं थौ,
भट्यौण लग्‍युं थौ,
हे दिदा भुलौं,
झटट पटट आवा,
जथ्‍गा तुमारा भाग मा छ,
अपणा बांठा की पी जावा....
बैर नि रख्‍दा,
हम दरोळा,
प्रेम की गंगा बगाैन्‍दा छौं,
जाति धर्म कू भेद नि रख्‍दा,
फर्ज अपणु निभौन्‍दा छौं.......
-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
नौसा बागी, चंद्रवदनी, टिहरी गढ़वाळ।
दिनांक 29.10.2015

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
October 29 · New Delhi ·
कविमन की कुतग्‍याळि छन यी.....कवि जिज्ञासु
कनि छ कटेणि जिंदगी,
या जियेणि ठाट मा,
सड़क्‍यौं कू हिटणु भलु नि लगणु,
ढुंगा मा बैठणु भलु लगदु,
बैठ्यां छन क्‍या बाटा मा.....
-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
नौसा बागी, चंद्रवदनी, टिहरी गढ़वाळ।
दिनांक 29.10.2015

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
October 17 · New Delhi ·
मेरु शरील नखरू हो,
त कवी बात निछ,
मोबाइल मेरु राजि ख़ुशी चैंदु,
यु मेरु ज्यु पराण छ,
येका बिना नि रयेंदु अब मैसि,
चौक मा नि रखि भैंसी____
-तुमारू भैजि कवि जिज्ञासु
सर्वाधिकार सुरक्षित
17.१०.2015

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
October 7 · New Delhi · Edited ·
चिफळि ढुंगी मा.....
जिंदगी यनि लगणि,
बैठ्युं छौं जन मैं,
कब रड़ि जौ,
जन चिफळि ढुंगी मा.....हिंट आप सब्‍यौं का खातिर।
मेरा प्‍यारा उत्‍तराखण्‍डी भै बंधो जरा अपणा मन की बात बतावा कुछ लैन कविता की बणैक। गढ़वाळि भाषा का प्रति आपकु प्रेम भी झलकलु अनुभूति का माध्‍यम सी।
-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
दिनांक 7.10.2015

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

कांधी मा काखड़ि,
मुंड मा अमेर्थ,
कख होलु जाणु भुला,
प्‍यारा पहाड़ मा.......
मन मा ऊलार छ,
पहाड़ सी प्‍यार छ,
खाणु वख की सब्‍बि धाणि,
पेणु छोया ढुंग्‍यौं कू पाणी,
किलैकि पहाड़ सी प्‍यार छ......
-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
दिनांक 29.9.2015

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

चला हे दगड़्यौ........
आज बग्‍त यनु ऐगि,
हमारु पहाड़ भारी ऊदास,
घौ हमारा हि दिन्‍यां छन,
तौ भी वेका मन मा आस......
http://jagmohansinghjayarajigyansu.blogspot.in/

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

मेरो मेरो नि रैगे
मेरो मेरो नि रैगे
अब कुच बी यख मेरो
अरे ये कैल पैल ब्वाली हुली
हट चल छड़ वैथे फुंड सैरु
मेरो मेरो नि रैगे ......
हिट हिट दी हिटदा रैगयुं
अब मि बणीग्युं रे छेडू
कैल हिट वै बाटा मा पैल
खोजी थे दा वै थे मेर पास लिव
मेरो मेरो नि रैगे ......
इन चढ़ी च ये दारू में पै
घर बार -बोई बच्चा सा भुल्यो
कैल बनै व्हैली कैल पैल पि व्हैले
वै थे पैल मेर समण कैरू
मेरो मेरो नि रैगे ......
अरे कुछ नि हुलु
अब सब यख झांजी छन पोड्यां
कै कु गत मोरी हुली कैल पैल ये बात
अपरी खत्याँ मुख बोलि वैथे ना छोडो
मेरो मेरो नि रैगे ......
बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

मेर मन दशा
कैल नि जाणि
कैल नि बिंगी मि थे
मेर बात मै मा ही राई
ऊ में भ्तेक कैमा नि ग्याई
ना कैर घै मेर बोई
मेर बात मै मा ही राई .... २
बोल्दु नि आन्दु मिथे
नि आन्दु मिथे रे बचाणु
जिभ मेरी लप-लपेटी सी
कैथे जी मि छों समझाणु
ना कैर चिंता मेर बोई
मेर बात मै मा ही राई .... २
मेरो दोष कते नि छे
देब्तों ना बाळपणा भ्तेक दी छे
अब तक बी मि छों लबड़लणु
अपरी से अप छों अब घबराणु
ना धैर ध्यान मेर बोई
मेर बात मै मा ही राई .... २
बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

फिर बी फैशन हो ऐसा जी
खानु कू नि पैंसा
फिर बी जमानु चैणु ऐसा जी
फिर बी फैशन हो ऐसा जी
छोरी जनि लट्लु
ब्याल च की बैठूल नि समझने हो
फिर बी फैशन हो ऐसा जी
बोबा व्हैगे बोई जी
बोई व्हैगे अब बोबा हो
फिर बी फैशन हो ऐसा जी
कन बदली हुणि च
वो कख जाने की सोचणी हो
फिर बी फैशन हो ऐसा जी
बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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