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Kumauni & Garhwali Poems by Various Poet-कुमाऊंनी-गढ़वाली कविताएं

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 05, 2011, 12:00:34 AM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


Dinesh Dhyani
September 1
घंघतोळ
घंघतोळ म छौं
कै ख्वाळ जि जौं?
द्वी ख्वाळ छन
अपणि हि मौ
तौं कु आपस म
नि हूंदु निभौ।
सालौं बिटे
तौंकु पणसरू
पैलि कैका घौर जौं
क्य जि करू?
दिन रातौ
तौं कु घपर~वळु
ये असमंजस से
मि कनक्वै कि बचु।
एक बाबु ददा कि औलाद
क्यांल योंकि मति म्वार
कै कि सला यि नि मन्दा
अपणि अकड़
जम्म नि छ~वडदा।
तुमी बथावा
अब क्य करू
थैला से बिड~या
यु असमंजस होणु
मीम घरू।।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


Darshan Singh
August 25
रखडी (राखी) कु त्योहार नजदीक च। जौं कि भैणि या भाई नि ह्वाला, वूं थैं कनु लगदु होलु। --------------------------------------------------
कनू छै विधाता तू त निरदयी रैई।
रखडी त्यौहार द्याई भैणी नि देई।।
कनु छै विधाता तू त निरदयी रैई।
रखडी त्यौहार द्याई भाई नि द्याई।।
एक भैणी मीकू दिंदु क्या बिगड़ी जांदू।
ए त्यौहार मि भि त्वैकु भेट पिठै ल्यांदु।।
एक भाई मीकू दिंदु क्या बिगड़ी जांदू।
ए त्यौहार मि भि त्वैकु भेट पिठै ल्यांदु।।
जौं भयों कि भैणि ह्वैलि रखडी पैराला।
बिना भैणि वळा छ्वारा प्यटा प्यटि र्वाला।।
जौं भैण्यू का भाई ह्वाला रखडी पैराली।
बिना भायों वळी छे्वरी प्यटा प्यटी र्वेली।।
त्योहार का बान सुदी दंतुडी द्यखाला।
आंख्यू का कूणू मा छ्वारा आंसू लुकाला।।
त्योहार का बान सुदी दंतुडी द्यखाली।
आंख्यू का कूणू मा छ्वेरी आंसू लुकाली।।
दगड्या भग्यान म्यारा रखडी पैराला।
अपणी भैण्यू का हथौं खटी मीठि खाला।।
दगड्या भग्यान मेरी रखडी पैराली।
अपणा भयों थै टीका पिठैई लगाली।।
त्योहार कू भैणी नि दे त्यारु च कसूर।
खुशि कनकै मनौलु नि दे घार पूरू।।
त्योहार कू भाई नि दे त्यारु च कसूर।
खुशि कनकै मनौलु नि दे घार पूरू।।
निठुर समिझि मिल, क्याच तेरी माया।
धर्म्यालि भैणि, त्वैन मीकू दे ही द्याया।।
निठुर समिझि मिल, क्याच तेरी माया।
धर्म्यालु भाई, त्वैन मीकू दे ही द्याया।।
ऐंसु की रखडी,देवी तु ह्वै जैई दैणी।
भैण्यू थै तु भाई देई,भायों थैई भैणी।।
ऐंसु की रखडी, देवी................
सर्वाधिकार
सुरक्षित @दर्शनसिंह रावत "पडखंडाई
दिनांक 25/08/2015

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


Darshan Singh
August 22
पदनु कु थाड़ मा कछडी लगीं छाई।
जनि मि पौंछु त एकल पूछ,
भाई आज पंद्रा अगस्त छाई।।
मिल ब्वाल -छाई क्या छैंच।
रात तकि चलणी लग्यूं च।।
इथगा मा एक भै कुर्सि लि आई,
ब्वाल -सरकार यखम बैठो।
जरा एक बात बताओ।।
आज त कुछ मिलुणु छाई।
ब्वलद ई कुर्सि मा बिठै द्याई।।
कुर्सि मा बैठदी मेरि गैत बर्र बर्रा ग्याई।
सरकारकु सर्या भा मिफर ऐ ग्याई।।
मिल ब्वाल बोलो -क्या चैणू छाई।
बल पोरु बिटि अकौंट ख्वल्यूं छाई।।
रुप्या मीलला इनु सारु लग्यां छाई।
जु पल्ला मा छाई वूंल अकौंट खोलि द्याई।।
मिल ब्वाल आला, जरूर आला।
ऐंसु ना त भ्वाळ त जरूर आला।।
बलकन रुप्या तआ ही ग्या छाई।
तबरि त स्यु बसगाल लगि ग्याई।।
काळु बसगाळ मा बड़ि बड़ि गाड़ी
मोटर बोगि गैं।
रुप्या भि जख बिटि आणां छाई,
उनै खुणी उडै गैं।।
खुशि से पंद्रा अगस्त मनाओ।
तीन दा जोर से नारू लगाओ।।
भा ss र sssssत माता की।
इन्कला sssssssssssब।।
लोग नारू लगाणा छाई,
मि प्याट ही प्याट स्वचणू छाई।
मि भि कथगा मजबूर छाई,
किलैकि वैबत मि सरकार छाई।।
सर्वाधिक सुरक्षित @दर्शनसिंह रावत पडखंडाई : दिनांक :-22/08/2015

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Dinesh Dhyani
August 20
. सीख
ब्यटा मि त्वैम कुछ बुन्न चांदु छाई
पण क्य ब्वन, छन्द हि नि आई
कबि त्वै थैं किताबौं म
कबि कम्प्यूटर परै व्यस्त पाई
म्यर मन को उमाळ
मन मा हि रैग्याई।
ब्यटा तु ता जण्दु छै
हम गरीब घरौं का मनखि छां
बाळपन म हमुन अक्वै कि पैरणु अर
छक्वै कि गफ~फा तक नि पाई।
वो त पितरौं कि कृपा से
अमणि हम्हरू बगत एै ग्याई
पण या ब्यटा बित्यां दिनौं थैं
कनक्वै बिसरणाई?
वनु बि बुल्दन कि जो
अपणु टैम बिसरि ग्याई
वो मनखि कि क्य ह~वाई?
ब्यटा इनै सूण
तु परिवारौ सौब से ठुल्लु छै
त्वै पैथर सैर परिवारौं जिम्मेदारि चा
अरे हम्हरू क्य भर~वसु
अमणि छां भौळ क्य ह~वा
अछांदु घाम क्य भर~वसु चा
कब अछै जा।
इलै बुनौं छौं
भै, बैंणा, घर परिवार
अपण्य पर~यो कि जिम्मेदारि
हूण खाण कि हो"िायारी
सीखि ल्हेदि अपणि जिम्मेदारि।
ब्यटा अब वन्नु बगत रि रैग्या
जब लाटा-कालौं न बि
अपणु टैम निकाळि द~या
अरे ये जमन म ता
सपन अर चालाक मनखि बि
नि खै सकणां त ब्यटा
हम्हरि क्या बिसात चा?
ब्यटा बुल्दन
अळग खुटौं कि हिटै भलि नि होंदि
अपणु परिवे"ा अर बिस्तार से
भैनै जैकि टपोस क्य काई
वै मनखि कि क्वी गत नि ह~वाई।
ब्यटा हम ता भंया का मनखि छां
इलै बुनौं छौं डाळौं मा छ~वीं नि लगा
अरे हवा म कबि बणां छन कैका महल?
अपणु विस्तार देखि छ~वीं लगा
अरे~ थामि ल्हेकि सरकारौं टंगडु
नौकरि छ~वटि चा ता क्या ह~वाई
जरा-जरा कै कि हि मनख्योंन
उन्नति काई।
ब्यटा पैलि अक्वै कि
अपणु खुटु त जमादि
मेरि बात मानि जादि
यनु गिच्चु नि मड़कादि
अरै पैलि त त्यारू बुबा छौं
नथर उमरौ लिहाज त खादि
जरसि थौ खा दि
भंया देखि हिटदि
असमानई असमान
नजर नि लगा
ब्यटा म्यरू ब्वल्यूं मानि जादि
जमनु अर अपणु विस्तार देखि
स्वीणा देखिदि
जैन यों बथौं का संज्ञान ल्याई
वै न हि दुन्य म अपणु
मुकाम बणाई।।
मेरी औण वळि गढवळि कविता संगzह धारवोर-धारपोर म बिटे एक कविता।
20/8/15.
aabhar.

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

मेरो मेरो नि रैगे
मेरो मेरो नि रैगे
अब कुच बी यख मेरो
अरे ये कैल पैल ब्वाली हुली
हट चल छड़ वैथे फुंड सैरु
मेरो मेरो नि रैगे ......
हिट हिट दी हिटदा रैगयुं
अब मि बणीग्युं रे छेडू
कैल हिट वै बाटा मा पैल
खोजी थे दा वै थे मेर पास लिव
मेरो मेरो नि रैगे ......
इन चढ़ी च ये दारू में पै
घर बार -बोई बच्चा सा भुल्यो
कैल बनै व्हैली कैल पैल पि व्हैले
वै थे पैल मेर समण कैरू
मेरो मेरो नि रैगे ......
अरे कुछ नि हुलु
अब सब यख झांजी छन पोड्यां
कै कु गत मोरी हुली कैल पैल ये बात
अपरी खत्याँ मुख बोलि वैथे ना छोडो
मेरो मेरो नि रैगे ......
बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
http://balkrishna-dhyani.blogspot.in/search/
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में पूर्व प्रकाशित -सर्वाधिकार

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
November 26 at 1:51pm · New Delhi · Edited ·
देखा देखि पेट पिड़ा....
बल भलि नि होन्‍दि,
अक्‍ल काम नि करदि,
फजीतू भी करौन्‍दि.....
-कवि जिज्ञासु
26.11.2015

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

डूबिगी पुराणि टीरी.....
यीं पत्रिका तैं पढ़िक,
पुराणि टिरी की,
भौत याद आई,
धुनारु की बस्‍ती थै,
पैलि पुराणि टिरी,
गोरख्‍यौं कू राज नि होन्‍दु,
हमारा गढ़वाळ मा,
पुराणि टिरी कू,
25 दिसंबर,1815 कू,
राजधानी का रुप मा,
जल्‍म नि होन्‍दु......
-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
दिनांक 20.11.2015

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

मेरा ब्‍लाग फर आप मेरी या कविता पढ़ि सकदा छन।
घड्याळु .....
लगण लग्‍युं छ घर मा,
घड्याळा आैण लग्‍युं छ,
एक बड़ु सी लगोठ्या मेरु,
देव्‍ता का नौं कू ल्‍हयुं छ......

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

क्‍या यू सच छ,
आपकु क्‍या विचार छ,
आपकु अहसास,
मेरा गौळा कू हार छ......
कामना कविमन की मेरा,
हरेक तैं खुशी द्यौं,
जीवन रुपी पथ फर चल्‍दु,
दुआ सब्‍यौं की ल्‍यौं......
-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
दिनांक 17.11.2015

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

रैबार.....
कवि तैं भौत कसक छ मन मा,
अपणु गढ़देश अर देश छोड़िक,
जयां छन सात समोदर पार,
रैबार कविता संग्रह का माध्‍यम सी,
बतौणा छन अपणा विचार......
बतौणा छन बांज की डाळ्यौं मा,
बासणि छन ऊदास घुघति हिल्‍वांस,
डांड्यौं मा खुदेणा छन बुरांस,
अब कैका लौटिक औण की,
कुंद पड़िगी मन की आस,
टूटि जांदि बल ये मन की आस.......
कविवर सात समोदर पार छन आप,
राजि रयन या छ मेरी आस,
बौड़ि औन्‍दु रैल्‍या आप गढ़देश,
कतै नि होणु मन सी ऊदास........
-जगमोहन सिंह जयाड़ा 'जिज्ञासु'
दिनांक 12.11.2015