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Kumauni & Garhwali Poems by Various Poet-कुमाऊंनी-गढ़वाली कविताएं

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 05, 2011, 12:00:34 AM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

"मैं"
अपणा दगड़्यौं तैं यू ही बतौलु,
जब मैं यीं धरती मा नि रौलु,
मिटि जालु अस्तित्व मेरु,
बसलु कखि मन पंछी कू डेरु,
चाहत रलि मेरा कवि मन मा,
घुमौं बांज-बुरांश का बण मा,
जख पुनर्जन्म हो मेरु.

सृजन करौं गढ़वाली कविताओं कू,
छ्मोट भरि प्यौं पाणी धौळ्यौं कू,
दर्शन होन पर्वतराज हिमालय का,
बद्री-केदार, चन्द्रबदनी देवालय का,
कुल देवता अर ग्राम देवता का,
माँ-बाप फिर दुबारा मिल्वन,
जन्म हो फिर ऊँका घर मा,
जौन जन्म दिनि, पाळी-पोषि,
प्यारू रयौं ऊँकू, यीं धरती मा.

कर्यन अवलोकन दगड़्यौं,
मेरी रचना,कविताओं कू,
जौंकु सृंगार करि मैन,
मन अर प्यारी कलम सी,
भलि लगलि तुमारा मन तैं,
जौंमा बस्युं रलु मेरु मन,
क्या ह्वै?
जब मैं यीं धरती नि रौलु.

रचना: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
२३.११.२०१० (प्रकाशित, सर्वाधिकार सुरक्षित)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

"जिंदगी अजीब होती है"
ऐसा कहते हैं लोग,
लेकिन! अपनी जिंदगी में,
दूसरों की जिंदगी को,
कुछ इस तरह देखा...


किसी की खास और,
किसी की आस होती है,
जिसे होता है अहसास,
जिंदगी में ख़ुशी का,
उसे जिंदगी बहुत प्यारी,
संग उसका सुखद,
स्वर्ग जैसा लगता है.

किसी को आस थी इसमें,
ख़ुशी के लिए जी रहा था,
कोई अभागा बन करके,
अपने ग़मों को पी रहा था,
लेकिन जिंदगी कैसे जियें?

कोई कठिन राह चलकर,
आराम से जी रहा था,
अंदाज सबके अपने थे,
किसी के लिए "आस जिंदगी",
हारे हुए के लिए "निराश जिंदगी",
जो जी लिया जिंदगी को,
उसकी जिंदगी खास होती है,
जो हार गया उससे,
उसकी "जिंदगी अजीब होती है"

कालचक्र घूमता है,
जिंदगी भी उसके साथ,
चलती है सभी की,
कितनी अजीब होती है,
सवाल होती है,
कितनी खूबसूरत होती है,
जीते और हारे की,
किस्मत के मारे की,
जरूरत नहीं सहारे की,
जिंदगी बनाना और बिगाड़ना,
हमारे ही हाथ है,
प्राप्त की जिसने खुशियाँ,
समझो,जैसे बरसात है,
कहते हैं लोग,
"जिंदगी अजीब होती है".


रचना: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
(पहाड़ी फोरम, यंग उत्तराखंड और मेरा पहाड़ पर प्रकाशित)
ग्राम: बागी-नौसा, पट्टी. चन्द्रबदनी, टेहरी गढ़वाल.
दिल्ली प्रवास से...........१९.११.२०१०
("ये जिंदगी भी कितनी अजीब होती है
बिना जबाब के ही सवाल होती है
आज अगर जी लिए खुशी से तो
फिर भी नहीं समझ सकते है
यह जिंदगी कितनी खूबसूरत होती है"
श्रीमती मंजरी कैल्खुरा की रचना पर मेरी अनुभूति)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

"बग्वाळ"
जै दिन बानी बानी का,
पकवान बणदा छन,
वे दिन कु बोल्दा छन,
रे छोरों आज पड़िगी,
बल तुमारी "बग्वाळ".

पर साल भर मा,
एक त्यौहार यनु औन्दु छ,
जै दिन की करदा छन,
सब्बि भै बन्ध "जग्वाळ",
हमारा प्यारा मुल्क उत्तराखंड,
कुमाऊँ अर गढ़वाळ.

"बग्वाळ" त्यौहार का दिन,
मनाला खुश ह्वैक,
हमारा मुल्क लोग बग्वाळी,
बणाला दाळ की पकोड़ी,
अर भरीं स्वाळी.

जग्वाळ मा होलि,
कैकी प्यारी ब्वे बाटु हेन्नि,
कब आला नौना, नौनी,
नजिक छ बग्वाळ,
हमारा कुमाऊँ अर गढ़वाळ.

रचना: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
(पहाड़ी फोरम, यंग उत्तराखंड और मेरा पहाड़ पर प्रकाशित)
ग्राम: बागी-नौसा, पट्टी. चन्द्रबदनी, टेहरी गढ़वाल.
दिल्ली प्रवास से...........२८.१०.२०१०
http://www.pahariforum.net/forum/index.php/topic,37.0.html

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

भौत अछि छे वैकि बनैई ये दुनिया
कखी मा धर्युं च सबुन यख
मुंड नि रेगे च बाकी अब ये दुनिया
मांगी नि छे ना ही चुरै छे
नानी ही छे अप्डी ही जो बनै ये दुनिया
इन ना लुकवा देखण द्याव अब तुम मिथे
आंदी च नजर मिथे मिसे लुकैई ये दुनिया
सब कुछ थिक थक च अधमुख मा हमरौ
लिपोड़ी सौंसार से बचै ये दुनिया
लाज नि ओंदी तुम थे ऐथे अपरा बातोंदि
गैरों का घाम दगडी कमै ये दुनिया
आज इं गैल्यों परी भौत नाज करदा ना तुम
भौल तुम ही बोव्लला ईं बिराणी हैगे ये दुनिया
रोजी हिट दूँ मि अपरो द्वि हाथ झटकादि
कबै भ्तेक मेर बाटा मा ऐ जांदी छे ये दुनिया
झणि किलै औझी ऐ जांदी ऊ हाक लगैकि
सौ बारी मेर देलि से भागे ई मिल ये दुनिया
माशाण मा अपड़ा इशार नचैल वा मिथे अब
लट्टू की जनि अपरी से नचैई ये दुनिया
तुम त भौत खुश छं सैर कु मौल्यार दगडी
प्रवासियों खुश रयां तुमरि ही सजैई ये दुनिया
दुनिया थे बुरो हमुन बनै दे भैजी
भौत अछि छे वैकि बनैई ये दुनिया
भौत अछि छे वैकि बनैई ये दुनिया
बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


Gyan Pant
10 hrs
जिम कार्बेट पार्काक् शेर .......
पत्त न
के बात भै
दूध जस्
उमांव ऐ पड़ौ
कल्ज में ....
हिकुरि - हिकुरि (हिकुरि - हिकुरि माने सिंसक सिंसक कर )
डाढ़ ऐ पड़ी
आँखन् बटी
छो फुटि पड़ौ छो - पानी का सोता
हिसालु त्वाप् जास्
भौतै भल् लागीं
आज मैं कैं
त्यार्
कनमड़ खैयी गिज् ... गिज -- होंठ
एक स्वैंण छी सब स्वैंण -- सपना
जो मैलि ले देखीं !

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


Bhishma Kukreti
2 hrs ·
Like करने वाले शुभेच्छियों से प्रार्थना
जी ! जुगराज रयां
हाइ -हैलो से रिस्तेदारी नि हूंदी
खाणक देखिक पेट नि भरेंदी
बगैर चख्यां स्वाद पता नि चलदो
बगैर पाणीम जयां गहराई को पता नि चलदो
बगैर पढ़िक Like से भाषा विकास नि हूंदो
Like देखिक लेखकौ ज्यु नि भरेंदो
Comments से रचनाकारौ उत्साह बढ़द
Share से भाषा कु मान सम्मान बढ़द
हमको Comments मंगता !!!!!!!!!!!!
हमेको Share मंगता !!!!!!!!!
आपके ----गढ़वाली -कुमाउनी साहित्यकार

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

ऐ बी जा
(ऐ बी जा ऐ बी जा ऐ गैल्या ऐ बी जा - २
सैर थे कैर अलबिदा अपरो पहाड़े मा ऐ बी जा ) -२
ऐ बी जा ऐ बी जा ऐ गैल्या ऐ बी जा
कद्ग समझैई ते थे ना कैर इन सिकैसेरी
ना ऐ लोको बोल्यूं मा बात मेरी तू समझी जैई
ये मेरो तेरो पहाड़ ये ढुंगों गारों को संसार छोड़ी ना जैई
सैर थे कैर अलबिदा अपरो पहाड़े मा ऐ बी जा
ऐ बी जा ऐ बी जा ऐ गैल्या ऐ बी जा - २
जों बी लूंण रोटा खोंला मिलिकी ही हम खोंला
रूखा सुखा खैकी हैंसी रुवैकि दगडी यख दिस बिंतोला
अब त बात मेरी मानले ऐ गैल्या मेरा हाक सुणी ले
सैर थे कैर अलबिदा अपरो पहाड़े मा ऐ बी जा
ऐ बी जा ऐ बी जा ऐ गैल्या ऐ बी जा - २
बालकृष्ण डी ध्यानी
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

भौत अछि छे वैकि बनैई ये दुनिया
कखी मा धर्युं च सबुन यख
मुंड नि रेगे च बाकी अब ये दुनिया
मांगी नि छे ना ही चुरै छे
नानी ही छे अप्डी ही जो बनै ये दुनिया
इन ना लुकवा देखण द्याव अब तुम मिथे
आंदी च नजर मिथे मिसे लुकैई ये दुनिया
सब कुछ थिक थक च अधमुख मा हमरौ
लिपोड़ी सौंसार से बचै ये दुनिया
लाज नि ओंदी तुम थे ऐथे अपरा बातोंदि
गैरों का घाम दगडी कमै ये दुनिया
आज इं गैल्यों परी भौत नाज करदा ना तुम
भौल तुम ही बोव्लला ईं बिराणी हैगे ये दुनिया
रोजी हिट दूँ मि अपरो द्वि हाथ झटकादि
कबै भ्तेक मेर बाटा मा ऐ जांदी छे ये दुनिया
झणि किलै औझी ऐ जांदी ऊ हाक लगैकि
सौ बारी मेर देलि से भागे ई मिल ये दुनिया
माशाण मा अपड़ा इशार नचैल वा मिथे अब
लट्टू की जनि अपरी से नचैई ये दुनिया
तुम त भौत खुश छं सैर कु मौल्यार दगडी
प्रवासियों खुश रयां तुमरि ही सजैई ये दुनिया
दुनिया थे बुरो हमुन बनै दे भैजी
भौत अछि छे वैकि बनैई ये दुनिया
भौत अछि छे वैकि बनैई ये दुनिया
बालकृष्ण डी ध्यानी
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

हैंस्दा हैंस्दा अब मेरी आंखि किैलै रुंदी जांदी
हैंस्दा हैंस्दा अब मेरी आंखि किैलै रुंदी जांदी
मिथे अब लजलू कै जांदू दुख मेरो अपड़ो ही जी
बात जबै पत्ते लगै जांदी घरै बिपदा ऐने कि
पैल अपरा ही अब अपरा घार आनू जानू कम कै देंदा जी
अब पेटणु च पाणी बी आग दगडी दगडी रे
और्री कबी आग बी अब किैलै पाणी व्है जांदी जी
अबी त ये दुनि की बथौं देख बदलणी च
और्री बाकि अपरो मन को काम ये बहम कै जांदी जी
ठुलि ठुलि बात कैकि कुछ समजा का हल्का लोक
अपरा लोकों का गैरु जिबन अब किैलै कै दिंदा जी
आख़िर कै संस्कृति मा ऐकि रुकी गै छन हम लोक
अपड़ा ही लोक अपडा लोक थे सियु जमा कै दे दिंदा जी
अपड़ो सैलु बी अब अपड़ा से क्द्गा दूर चली जांदू
समझ नि आन्दु वै दगडि कया हम इनि कैर दिनि जी
बालकृष्ण डी ध्यानी
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

आज झम झम
आज झम झम
तेर खुद फिर बौडी ऐगे
कोयेड़ी सी तू ऐकि
यक्ली मा मि फिर रुवैगे
रूडी का ये दिन झम झम
कख तू इने तू चुलगै
रूडी का रति थे
तू किलै इत्गा भंड्या कैगै
मेरो नि राई जियु झम झम
तेरो ही कबैर को अब हैगे
ह्युंद जमण लगै बोई
भारी जदू ऐ बारी पौडेगै
आज झम झम
तेर खुद फिर बौडी ऐगे ....
बालकृष्ण डी ध्यानी
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