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Kumauni & Garhwali Poems by Various Poet-कुमाऊंनी-गढ़वाली कविताएं

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 05, 2011, 12:00:34 AM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


Khyali Ram Joshi
November 19 at 6:35pm
रंग झन बदइ लिया दोस्तो, कें दुनियाक रंग देखि बेर
हाथ झन खैंचि लिया दोस्तो, हाथ म्यर तंग देखि बेर

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बाबा उत्तराखंड बणगे (ललित केशवान रचित कविता )
रचना -- ललित केशवान ( जन्म - 1940, सिरोली , इडवालस्यूं , पौड़ी गढ़वाल )
Poetry by - Lalit Keshwan
( विभिन्न युग की गढ़वाली कविताएँ श्रृंखला )
-
इंटरनेट प्रस्तुति और व्याख्या - भीष्म कुकरेती
-
बाबा उत्तराखंड बणगे ब्वेई उत्तराखंड बणगे।
बेटा उत्तराखंड बणगे बेटी उत्तराखंड बणगे।।
ल्हेण को छौ नौं रयुं स्यो वो भि चलगे।
म्यारा कुल को दीप छायो वो भि बुझगे ।।
स्युंदी को सिंदूर तो उत्तराखंड बणगे।
दाज्यू उत्तराखंड बणगे बाज्यू उत्तराखंड बणगे।।
जो बुरांशा फूल झड़ने ज्वान ह्वेकी।
जौन दे बळि अपणा अपणा प्राण ख्वेकी ।।
उंकी चिंता की राख उत्तराखंड बणगे।
भैजि उत्तराखंड बणगे भुला उत्तराखंड बणगे।।
वूं कुकर्मयों घाम लगीना।
माळु की घुघती जॉन तड़फडैना ।।
वूंकी वा किल्क्वार उत्तराखंड बणगे।
दीदी उत्तराखंड बणगे भूली उत्तराखंड बणगे।।
रात ही जख कत्ल ह्वेगे रात माँ।
खून की जख गाड़ बगने बाँठ माँ ।।
ऊंको अमर बलिदान उत्तराखंड बणगे।
बाबा उत्तराखंड बणगे बेटा उत्तराखंड बणगे। ।।
गंगा गौरी गैतरी न धै लगैनी।
हंसुळि धगुलि झगुलि ट्वपलि बचै रखनी।।
वूंकी फिटकार उत्तराखंड बणगे।
चेली उत्तराखंड बणगे ब्योलि उत्तराखंड बणगे।।
Copyright @ Lalit Keshwan , Delhi , India 2015

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

डूबिगी पुराणि टीरी.....
यीं पत्रिका तैं पढ़िक,
पुराणि टिरी की,
भौत याद आई,
धुनारु की बस्‍ती थै,
पैलि पुराणि टिरी,
गोरख्‍यौं कू राज नि होन्‍दु,
हमारा गढ़वाळ मा,
पुराणि टिरी कू,
25 दिसंबर,1815 कू,
राजधानी का रुप मा,
जल्‍म नि होन्‍दु......
-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
दिनांक 20.11.2015

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

मेरा गांव....

जहां तक सड़क है,
छा रहा है सूनापन,
अतीत और आज,
जब तुलना करता हूं,
व्‍यथित होता ,
मेरा जिज्ञासु कविमन...

नहीं दिखते आज,
वो कौंताळ करते बच्‍चे,
घसेरी, पनेरी, बैख,
चौक मा बळ्दु की जोड़ी,
रामदि गौड़ी भैंसी,
लगते थे बहुत अच्‍छे....

आज के स्‍कूली बच्‍चे,
और अतीत के स्‍कूल्‍या,
पीठ पर पाटी लटकाए,
हाथ में कमेड़ा का बोदग्‍या,
लिखते थे लकड़ी की कलम से,
बराखड़ी पाटी पर,
कहते थे गुरु जी,
पाटी पर घोटा लगाकर,
साफ लिखकर लाना,
आज ऐसा नहीं है,
बदल गया जमाना....

भौत रौनक रहती थी,
तब मेरे गांव में,
चप्‍पल जूते नहीं होते थे,
सबके पांव में,
मांगते थे सुलार,
मैं गांव जा रहा हूं,
टल्‍ले लगाए कपड़े,
पहनते थे लोग तब,
उस समय की बात,
सृजन कर बता रहा हूं....


चर्चा होती है आज,
सूने गांव बंजर हैं खेत,
स्‍कूल्‍या लड़के लगाते थे,
अपने खेतों में हल,
आज चले गए है,
उच्‍च शिक्षा की चाह में,
शहरों की तरफ,
सपिरवार सभी,
बैल गांव में आज,
ढ़ूंढ कर भी नहीं मिलते,
सोचो कौन लगाएगा हल,
एक दो जाेड़ी और हळ्या,
लगा रहे हैं पूरे गांव का,
रस्‍म अदायगी रुपी हल.....


आज जमाना अच्‍छा है,
बता रही थी बोडी,
अखोड़ी से ऋषिकेश आती हुई,
बस में जब मैंने पूछा,
बेटा विदेश मेूं,
मैं अब रहती हूं ऋषिकेश में,
रज्‍जा राणी को भी देखा था,
बचपन में मैंने.....

जो भी हो,
गांव जीवित रहने चाहिए,
जहां हमारा मन बसता है,
उत्‍तराखण्‍ड मांगा था हमनें,
अपने गांवों की खुशहाली,
और विकास के लिए,
कब हो सपना पूरा,
इंतजार में है मेरा गांव.....

-कवि जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
की मन और कलम की बात
दिनांक 26.2.2015

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

यीं जिंदगी मा....

पैंसा पद पैक मनखि,
भ्‍वीं नि देखणा छन,
मन मा मनख्‍वात निछ,
बणौटि बण्‍यां मन....

यनु किलै ह्वै होलु,
ऊ जमानु याद औणु छ,
मनख्‍वात उबरि भारी थै,
यनु बतौणु छ.....

सच मा सोचा दौं चुचौं,
मनखि माटु छ,
जिंदगी हमारी या,
ऊकाळि कू बाटु छ....

लग्‍द बग्‍द सब्‍बि लग्‍यां,
भै बंधी तैं निभावा,
भला बुरा बग्‍त मा,
एक हैक्‍का काम आवा....

एक दिन चलि जाण,
सब कुछ सच निछ,
यीं जिदगी मा भलु करा,
जिंदगी कू सच छ....

-जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
कविमन का ऊमाळ मन कलम सी
सर्वाधिकार सुरक्षित, 5.2.2015
12.40 दोपहर, संपर्क.09654972366

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बांजी कुडी धै लगांणी
बुये हुंयी च कांणी
लीडक बण्युं च साब दिल्ली
ब्वारी बंणी च राणी
बांजी कुडी धै लगांणी
नाती नतंणो बिना ददी
खुद्यांणी च डयार मा
दादा जी की टोफी धरीं च
नाती कुन किसा मा
बांजी कुडी धै लगांणी
स्याली कु आंदु फोन
छुंयुं मा चिपक्युं रांदु
बुये बाबु तै फोन पर
आफिस मा बिजी बतांदु
छैंद बुये बाबु क तु
अनाथ हुयुं छे रे
सासु कुन मम्मी
ससुर कुन डैड भुना छै
आज भी बुये तेरी
सार लगीं च घर मा
अपुंण ज्यु मारीक त्वैकु
ककडी जुगयीं च म्वाल मा
बांजी कुडी धै लगांणी
बुये हुयीं च कांणी
लीडक बण्युं साब दिल्ली
ब्वारी बणी.....
सर्वाधिकार सुरक्षित@लेखक सुदेश भटट(दगडया)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बिंडी तो नही पर
जरा जरा बिंग जाता हुं
हिंदी क दगडी मै
गडवली भी बच्याता हुं
गांव जादु छौं मै अपने
साल अर द्वी साल मे
काका बाडा अपुणु तै
सबको पछांण जाता हुं
ददी ददा मेरे मुझको
गांव लेके जाते हैं
पापा जी की पाटी बुखल्या
मुझको उबर्युं मे दिखाते है
शहरों मे रहता हुं
बासी तिबासी खाता हुं
गांव मे लोंफे लोंफे की
नारंगी की ताजी दांणी खाता हुं
गांव से आने का मेरा
कथै मन नही करता है
पर मम्मी ने बताया यहां
छज्जा से लमडणे का डर होता है
काका बाडों की मै दगडी
गोरु मे भी जाता हुं
अयीं लेले करके मै
चीनकी को बुलाता हुं
बिंडी तो नही पर
जरा जरा बिंग जाता हुं
ददी मेरी गांव मे मुझको
बाडी पल्यो सब खलाती है
मम्मी तो बस चौमीन टीक्की
कभी कभी मोमो खलाती है
गांव से आंणे का मेरा
कथै ज्यु नही करता है
ट्युसन अर स्कुल बताके
मेरा हिंगरडु हो जाता है
अब तो चिता गया मै भी
गांव की बोली भाषा को
बिंडी तो नही जरा जरा.....
सर्वाधिकार सुरक्षित@सुदेश भटट(दगडया)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बांजी कुडी धै लगांणी
बुये हुंयी च कांणी
लीडक बण्युं च साब दिल्ली
ब्वारी बंणी च राणी
बांजी कुडी धै लगांणी
नाती नतंणो बिना ददी
खुद्यांणी च डयार मा
दादा जी की टोफी धरीं च
नाती कुन किसा मा
बांजी कुडी धै लगांणी
स्याली कु आंदु फोन
छुंयुं मा चिपक्युं रांदु
बुये बाबु तै फोन पर
आफिस मा बिजी बतांदु
छैंद बुये बाबु क तु
अनाथ हुयुं छे रे
सासु कुन मम्मी
ससुर कुन डैड भुना छै
आज भी बुये तेरी
सार लगीं च घर मा
अपुंण ज्यु मारीक त्वैकु
ककडी जुगयीं च म्वाल मा
बांजी कुडी धै लगांणी
बुये हुयीं च कांणी
लीडक बण्युं साब दिल्ली
ब्वारी बणी.....
सर्वाधिकार सुरक्षित@लेखक सुदेश भटट(दगडया)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

तै देख्द ही
तै देख्द ही
मि मि ना राई
देख ईं म्यळी मुखडी थे
ईं जिकोड़ी मा जादू व्हैग्याई
कया तेरो रूप च
कैल हुलु येथे इन बणाई
सरया सरीर मा मेरो
वैल अब कंप कपि कैग्याई
सुदी नि बुल्दु मि
ऐ गिच इनि नि खोल्दो मि
कैथे भी बिचार दे तू अब
मिल त झूठ ना सच ब्वाली
लिखणा कुण मिल
ना खुद कुछ इनि मिस्ल द्याई
तू ही कलम व्हैगै अब मेरी
तू ही अब वो गीत बणग्याई
तै देख्द ही .....
बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

अब मेरो पहाड़ा मा
अब मेरो पहाड़ा मा
कन चलो इन फैशण
स्कर्ट छोटू व्हैग्या
जिंस व्हैग्या टाइट टनाटन
अब मेरो मुल्का
छोरों का काना का कुंडला
बाल व्हैग्या रंग बिरंगा
दुरुल्या व्हैकि टनाटन
शरम लाज बेचिकि
सरया बजारा घूमना छना छन
ऊंचा सैंडिल गलोड़ी लाला
नौनी व्हैगे अब टनाटन
रोज रोज कैरी कि न्यू फैशण
पहाड़ी हरेगे आपरी पछाण
बुढ्या खोलो रैगै अब
जवानु कु देखि कि ये चल चलण
बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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