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Kumauni & Garhwali Poems by Various Poet-कुमाऊंनी-गढ़वाली कविताएं

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 05, 2011, 12:00:34 AM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

गुमनाम पिथौरागढ़ी
September 29

सोरयाली में एक मतला व शेर ---------------

हुक्का तमाक पानी बहुते याद ऊछी
नानि रात ठुली कहानी बहुते याद ऊछी

राते छाकाला ब्याल जतारा में पीसी रूथी
हमरी भूख इजा की परानी बहुते याद ऊछी

गुमनाम पिथौरागढ़ी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Uttrakhand Ekta Parishad
September 24

हम उत्तराखंडी भी क्या गजब डाटे है |
उत्तराखंड में उत्तराखण्ड ज़िंदा नही !
और शहरो में कौथिग मनाते है |
पहाड़ हमने कभी देखा नही और पहाड़ की बात सुनाते है |
खुद चल बसे दिल्ली मुम्बई और पहाड बचाने के गीत लगाते है |
कोसते है हम सुख सुविधाओ को पहाड़ में |
कर्म को कोसना कभी आया नही |
दुःख है पहाड़ के हाल पर सबको जमीन पर काम करना भाया नही |
रोजगार को पलायन का कारण कहते है |
पर पहाड़ के प्रति अपनी निष्ठा को न कभी दोष दिया |
जब कभी मौका मिला जन्म भूमि बेचने का खूब पैसा खूब रूपये लिया |
नेता रोते हम पहाड़ी पहाड़ी पर काम को देखकर कभी लगा नही|
पहाड़ी जवानी और पहाड़ का पानी शहरो में बहता इनको दिखा नही |
हाल ये दासता किसे सुनाऊ नेता सुने न सरकार सुने |
जनता समझती हाल नही और युवा बिदेशो में सपने बुने
सीख क्यों नही लेते हम हिमांचल से कुछ |
जो हर हाल में हमारे जैसा है
हिमाचल आज एक सम्रद्ध राज्य है फिर उत्तराखंड क्यों ऐसा है |
आश यही है अब सुधरेंगे आत्मा हमारी जागेगी |
खत्म होती एक समाज संस्कृति फिर से संवर जायेगी
Uttrakhand Jodo Abhiyan
Mission Uttrakhand ki Rajdhani Gairsain ho
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Uttrakhand Ekta Parishad
Mission Rashtriya Adyax
Jagjeet Singh Bisht
09873389798

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

आज टक मेरी फिर
गांव अपंणी लैगे
खुशियों कु त्योहार दीदों
लेकी बग्वाल यैगे
आज टक मेरी फिर
ढौल दमौ की रस्यांण
घ्यु की गुंदकी याद यैगे
पुरी पक्वड गरम श्वाल
दीदों याद यैगे
आज फिर टक मेरी
सजे धजे की बाडी झंग्वरु
गौरु ते खलौंण की याग यैगे
सिंगीयुं पर तेल लगांण
गल्यों की जोडी याद यैगे
आज टक मेरी फिर
बन बन की मिठायुं की
कन याद यैगे
हाथी घ्वाडा शेर मशीन
सौब याद यैगे
आज टक मेरी फिर
दीदी भूली मेरी सौब
मैत अयीं जयीं होली
मुडी ख्वाल मथी ख्वाल
काकी बडीयुं पन भिट्यांणा होली
आज टक मेरी फिर
दगडया भग्यान भी म्यार
छुट्टी अयां ह्वाल
बग्वली की रस्यांण मा रंगमत
ढौल दमों मा नचंणा ह्वाल
आज टक मेरी.......

सर्वाधिकार सहित @सुदेश भटट(दगडया) की बग्वली की शुभकामनाओं की दगड (फोटो साभार सत्येश्वर प्रसाद जोशी जी)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

मुझे मेरे गांव का
त्योहार याद आ गया
तुम्हारी दीपावली
हमारा बग्वाल आ गया
मुझे मेरे गांव का
त्योहार याद आ गया
तुम्हारे लिये मिलावटी बर्फी
मिठाईयों का त्योहार आ गया
हमारे पहाडों मे घी की गुंदकी
अर सुवाल पक्वडीयुं की रस्यांण लेके आ गया
मुझे मेरे गांव का
त्योहार याद आ गया
शहरों मे अमीरों के लिये
पीने का बहाना लेके आ गया
मेरे पहाडों मे अमीर गरीब
सबको मिलाने बग्वाल आ गया
मुझे मेरे गांव का
त्योहार याद आ गया
तुम्हारे शहरों मे डींजे
ध्वनी प्रदुषंण लेके आ गया
वायु मंडल को दुषित करने
पटाखों का धुंवा छा गया
मुझे मेरे गांव का
त्योहार याद आ गया
तुम्हारी तो लडियां जलाने गुल होती
बिजली का सहारा आ गया
हमारे पहाडों मे सदाबहार
मुछ्यल.दीवाछलों का बगत आ गया
मुझे मेरे गांव का
त्योहार याद आ गया

सर्वाधिकार@सुदेश भटट(दगडया)की देशी दगडयों कुन समर्पित पंक्ति

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

थग्ल्या लग्यां जिंदगी मा

थग्ल्या लग्यां जिंदगी मा.... २
कन और्री कब
बैठ्युं रैग्युं
बैठ्युं रैग्युं लिखणु इन सिलाणु थे
जबेर जबेर लगि तब
थग्ल्या लग्यां जिंदगी मा
थग्ल्या लग्यां थग्ल्या लग्यां

कबै जामा मेरी मोरिगे छे
कबै आपा मेरी ख्वैगे छे
खोजी खोजी यख वख वैथे मिल
तबैर और्री थग्ल्या पौड़ीगे छे
थग्ल्या लग्यां जिंदगी मा
थग्ल्या लग्यां थग्ल्या लग्यां

भाग मेरा ये करमा का छन
काप्ला इन रेघया कैल रेट्या छन
जमै नि थे ना गमै मि थे
किले लगलूँ का इन थग्ल्या पौड्या छन
थग्ल्या लग्यां जिंदगी मा
थग्ल्या लग्यां थग्ल्या लग्यां

जद्गा सिल्दु वद्ग चिरड्या छन
अपरा अपरी मा धागा लग्या छन
हर्ची गै कै सुख अब कै दुःख मा
थग्ल्या आपरी गिनती गीणा छन
थग्ल्या लग्यां जिंदगी मा
थग्ल्या लग्यां थग्ल्या लग्यां

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
http://balkrishna-dhyani.blogspot.in/search/
http://www.merapahadforum.com/
में पूर्व प्रकाशित -सर्वाधिकार

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

आओ राज्य गठन के शहीदों का सपनों का उत्तराखंड बनायें

आओ राज्य गठन के शहीदों का सपनों का उत्तराखंड बनायें
ना टिहरी ना अल्मोड़ा ना पौड़ी इन्हे चलो मिलाकर एक बनायें
आओ राज्य गठन के शहीदों का सपनों का उत्तराखंड बनायें

पंद्रह बरस भागे अपने से एक जोर से आवाज देके उसे बुलायें
नवंबर की इस पावन बेला को मिलकर चलो आज साथ मनायें
आओ राज्य गठन के शहीदों का सपनों का उत्तराखंड बनायें

कोदो मंडवा खायेंगे क्यों ना हम अब अपना उत्तराखंड सजायेंगे
चलो मिलकर एक सुर में गायेंगे और भी अपने भाई बहन आयेंगे
आओ राज्य गठन के शहीदों का सपनों का उत्तराखंड बनायें

देहरादून गैरसैण में हम पहाड़ी तनिक भी फर्क ना आने देंगे
शहीदों के सपनों की राजधानी लेकिन हम पहाड़ पे ही बनायेंगे
आओ राज्य गठन के शहीदों का सपनों का उत्तराखंड बनायें

पलायन की इस बहती गंगा में हम रोजगार का बांध लगायेंगे
स्वरोजगार बीज से हम खंडहर घरों बांज खेतों को लहलहायेंगे
आओ राज्य गठन के शहीदों का सपनों का उत्तराखंड बनायें

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
http://balkrishna-dhyani.blogspot.in/search/
http://www.merapahadforum.com/
में पूर्व प्रकाशित -सर्वाधिकार

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

आज मैकु डाक का माध्‍यम सी कविमित्र श्री प्रभात सेमवाळ 'अजाण' जी कू कविता संग्रह 'रैबार' प्राप्‍त ह्वै। मैं मान्‍यवर सेमवाळ जी कू हृदय सी आभार व्‍यक्‍त करदु।

रैबार.....

कवि तैं भौत कसक छ मन मा,
अपणु गढ़देश अर देश छोड़िक,
जयां छन सात समोदर पार,
रैबार कविता संग्रह का माध्‍यम सी,
बतौणा छन अपणा विचार......

बतौणा छन बांज की डाळ्यौं मा,
बासणि छन ऊदास घुघति हिल्‍वांस,
डांड्यौं मा खुदेणा छन बुरांस,
अब कैका लौटिक औण की,
कुंद पड़िगी मन की आस,
टूटि जांदि बल ये मन की आस.......

कविवर सात समोदर पार छन आप,
राजि रयन या छ मेरी आस,
बौड़ि औन्‍दु रैल्‍या आप गढ़देश,
कतै नि होणु मन सी ऊदास........

-जगमोहन सिंह जयाड़ा 'जिज्ञासु'
दिनांक 12.11.2015

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

 "पहाड़ की पोथली"
जू करदि छन चुंच्याट,
दिन भर डाळ्यौं मा बैठिक,
फुर्र यथैं वथैं उड़ी उड़िक,
जान्दी छन झपन्याळि डाळ्यौं मा,
जन भीमळ, खड़ीक, बांज, बुरांश की,
अर पैदा करदि छन,
चुंच्याट मचैक मनभावन,
कर्ण प्रिय गीत संगीत.......

पहाड़ की की प्यारी घुघती,
जब घुरान्दी छ,
तब खुदेड़ भौत खुदेन्दा छन,
पोथली अर इंसान कू रिश्ता,
कथगा मार्मिक छ,
पोथल्यौं का प्रति प्रेम करा,
दगड़्या छन हमारी,
"पहाड़ की पोथली"......
रचनाकार: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
ग्राम: बागी-नौसा, पट्टी-चन्द्रबदनी, टिहरी गढ़वाल, उत्तराखण्ड
(सर्वाधिकार सुरक्षित एवं प्रकाशित २८.१२.२०११

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

 "सोच्युं"
सच नि होन्दु,
फिर भि सोच्दु छ इंसान,
पर अपणा मन की,
करदु छ भगवान.

एक दिन मैन सोचि,
भोळ छुट्टी का दिन,
२२.१.२०१० शनिवार कू,
आराम करलु मैं,
पर सुबेर ६.२० फर,
नौना कू फोन आई,
"पापा किसी ट्रक ने,
मूलचंद के सामने,
मुझे टक्कर मार दी है",
आप जथगा जल्दी हो,
झट-पट आवा,
यथगा सुणिक मेरु,
ह्वैगि मोळ माटु,
आँखौं मा ह्वै अँधेरू,
नि सूझि कुछ बाटु.

कुल देवतों की कृपा सी,
नौना का गौणा फर,
सिर्फ लगि भारी चोट,
अनर्थ होण सी बचि,
माँ चन्द्रबदनी की कृपा सी,
मेरा मित्रों, आपकी दुआ लगि,
देवभूमि उत्तराखंड की,
प्यारी जन्मभूमि की,
कर्दौं मन सी वंदना.

मेरा कविमन तैं,
सुख दुःख यथगा ही मिलु,
जथगा मैं सहन करि सकौं,
हे बद्रीविशाल,
सोच्युं आपकु प्रभु,
सदा सच हो,
पर अनर्थ न हो,
मेरु आपसी छ सवाल.
रचनाकार: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
(सर्वाधिकार सुरक्षित २६.१.२०११)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

 "आँखों से आंसू"
करूणा में निकलते हैं,
जब प्याज काटो,
तब भी निकलते हैं,
लेकिन!
आजकल निकल रहे हैं,
महंगाई के कारण.

महंगा हुआ प्याज,
खाने का अनाज,
घर का चूल्हा कैसे जले?
सोच रही गृहणियाँ आज.

कौन लगाएगा लगाम,
बढ़ रही है महंगाई,
बेदर्द हो गए,
लगाम लगाने वाले,
कर रहे बेरूखाई.

हास्य कवि शर्मा जी,
कह रहे हैं,
प्याज खरीदोगे ही नहीं,
तो कैसे निकलेंगे आंसू.
रचनाकार: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
स्वरचित(१५.१.२०११)
(सर्वाधिकार सुरक्षित, प्रकाश हेतु अनुमति लेना अनिवार्य है)