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Kumauni & Garhwali Poems by Various Poet-कुमाऊंनी-गढ़वाली कविताएं

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 05, 2011, 12:00:34 AM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

***कुड़ी उमाळ**** www.ranabalbir.blogspot.in
कैकि मि स्वाणी हवेली छै
कैखुणि मि झ्वपडि बणगे
मयाली सुहागिण रै मि कैकि
कैखुणि मि डंसिलि रांड बणगे
भग्यान लेन्दी-रुमाळी की पलोस करि कैन
क्वे अब निर्भगी डंगर बोळी छोड़ीगे
हंसे-हंसे लंपसार करदू छै क्वी
क्वे अब कंठ भरी उमाळ् दे ग्ये।

पूरी कविता पढ़ने हेतु ऊपर दिए ब्लॉग के लिंक को क्लिक करें।

@ बलबीर राणा 'अडिग'
© सर्वाधिकार सुरक्षित मेरे ब्लॉग 'उदंकार' में
फोटो साभार :- श्री Ratan Singh Aswal जी की वाल से

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

जय माँ दुर्गे शुभप्रभात मित्रो आपके अवलोकनार्थ यू ट्यूब पर भी
******मनखी गीत******
www.ranabalbir.blogspot.in
हाथों मा सिद्धि हो कर्मो मा ऋद्धि ह्वो
मनखियत की पीड़ा नसों मा, ल्वे फर उमाळ ह्वो
नयुं सल-साज ह्वो जोश तेरु ज्वान ह्वो
झुकी जावो खैर-खरण्यां तेरी, सोंग-सुफल तेरु बाटु ह्वो

मन मा सरस्वती कु वास अर वाणी मा हिलांस ह्वो
दुन्ये रीती,जग प्रीत ज्यु मा जगीं रैयी, अंतस मा तेरा भगवान् ह्वो
प्रचंड मन-मान, गात-बबड़ाट, सक्या-पराण तों हाथ ह्वो
राष्ट्र ध्वज-गीत ज्यान से ब्बी प्यारु हो,
इन स्व मान सम्मान तेरु स्वाभिमान हो
झुकी जावो खैर-खरण्यां तेरी, सोंग-सुफल तेरु बाटु ह्वो

हर फजल नयीं उमंग तेरी नयाँ जीवन गीतों कु तरंग-तान ह्वो
नव तौरण, लता-गता हाथ ल्हयेकि धार-धार तू बिराजमान ह्वो
जलम भूमी सदानी स्वर्ग बणि रावो, धरणी-धर तेरु बोल बचन सौं- करार ह्वो
बुग्यालों जन सुख-शांति छळकणु रे ललाट से तेरा,
माया तेरी निर्मल गंगा जनि छाळी हो
झुकी जावो खैर-खरण्यां तेरी, सोंग-सुफल तेरु बाटु ह्वो

बीर छै तू भड़ छै माधो सिंग, गबरू कु नौ- निशाँण छै
देवथान हिमालय कु वासी तू,
गढ़कुमौं की आशाओं को नौ-नवाण छै
खडग उठो रणसिंग गरजो,
थाती-माटी की लाज को तू तरणहार छै
त्वे घत्याणी बैरियों की ललकार
कसम त्वेखुणि तेरी ब्वे की
ते तिरंगा थें झुकण ना दियां ह्वो झुकण ना दियां ह्वो
झुकी जावो खैर-खरण्यां तेरी, सोंग-सुफल तेरु बाटु ह्वो

हर्ष ह्वो उल्लास ह्वो मनखियत तेरा धोर बटिन निराश न ह्वो
ग्लानि क्षोभ् आँखर तेरा किताब से समूल नाश ह्वो
इन दिवा जलो दगड्या ब्याखुनि हैंस जो
निर्बल बिचारी रात तें, तों गैणो का सारा न रोण पड़ो
अडिग करम परधान का ड़ाला रोप
मनखीयत् का गीत कंठ भोर,
भोंण मा अपणेस ल्यो भौण मा अपणेस ल्यो
झुकी जावो खैर-खरण्यां तेरी, सोंग-सुफल तेरु बाटु ह्वो
मनखियत की पीड़ा नशों मा, ल्वे फर उमाळ ह्वो
सोंग सुफल तेरु बाटू ह्वो।

रचना:- बलबीर राणा 'अडिग'
© सर्वाधिकार सुरक्षित मेरा ब्लॉग 'उदंकार' मा

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

मि त लिख द्यूलु लाख कविता

मि त लिख द्यूलु लाख कविता
वैल नि पैढ़ स्की त मिल कया कण
मि त लिख द्यूलु लाख कविता

पड़ी राई सदनी कुल्हणा भितर
भैरी नि ऐस्की त मिल कया कण
मि त लिख द्यूलु लाख कविता

लाख विपदा लाख पीड़ा सैई विल
आंसूं आखों मा राई त मिल कया कण
मि त लिख द्यूलु लाख कविता

ढुंगा गारा ही रे गैल्या अब मेरो
तिल ऐ समझी नि त मिल कया कण
मि त लिख द्यूलु लाख कविता

झम्प मारी की ये मेर कविता ग्याई
क्वी अपरो ना मिल त मिल कया कण
मि त लिख द्यूलु लाख कविता

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
http://balkrishna-dhyani.blogspot.in/search/
http://www.merapahadforum.com/
में पूर्व प्रकाशित -सर्वाधिकार

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
October 30 at 9:33am · New Delhi ·

कल्‍पना मा देखणु छौं,
तीन सौ चौसठ दिन का बाद,
लाल दा बिष्‍ट जी बण्‍यां छन,
जन बोल्‍दन बाग,
पूजा होलि आज बिचारौं की,
खुलिग्‍यन तौंका भाग.....

जुन्‍याळि रात की जोन भी हैंस्‍लि,
खित खित हैंस्‍ला खूब बिचारा,
हंसमुख छन यी दगड़या हमारा,
हास्‍य की गंगा बगौन्‍दा,
जू मनखि कब्‍बि ना हैंसि हो,
वेकु तैं हैंसौन्‍दा.......

-जगमोनह सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
कविमन की कल्‍पना छ, नाराज नि होयां
दिनांक 30.10.2015

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
October 29 at 2:18pm · New Delhi ·

कविमन की कुतग्‍याळि छन यी.....कवि जिज्ञासु

कनि छ कटेणि जिंदगी,
या जियेणि ठाट मा,
सड़क्‍यौं कू हिटणु भलु नि लगणु,
ढुंगा मा बैठणु भलु लगदु,
बैठ्यां छन क्‍या बाटा मा.....

-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
नौसा बागी, चंद्रवदनी, टिहरी गढ़वाळ।
दिनांक 29.10.2015

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
October 7 · New Delhi · Edited ·

चिफळि ढुंगी मा.....

जिंदगी यनि लगणि,
बैठ्युं छौं जन मैं,
कब रड़ि जौ,
जन चिफळि ढुंगी मा.....हिंट आप सब्‍यौं का खातिर।

मेरा प्‍यारा उत्‍तराखण्‍डी भै बंधो जरा अपणा मन की बात बतावा कुछ लैन कविता की बणैक। गढ़वाळि भाषा का प्रति आपकु प्रेम भी झलकलु अनुभूति का माध्‍यम सी।

-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
दिनांक 7.10.2015

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
October 29 at 2:42pm · New Delhi · Edited ·

कविमन की कुतग्‍याळि छन यी.....कवि जिज्ञासु

एक दरोळु.....

हमारा पहाड़ मा,
बोतळ खोलि,
भेळ मा बैठ्युं थौ,
भट्यौण लग्‍युं थौ,
हे दिदा भुलौं,
झटट पटट आवा,
जथ्‍गा तुमारा भाग मा छ,
अपणा बांठा की पी जावा....

बैर नि रख्‍दा,
हम दरोळा,
प्रेम की गंगा बगाैन्‍दा छौं,
जाति धर्म कू भेद नि रख्‍दा,
फर्ज अपणु निभौन्‍दा छौं.......

-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
नौसा बागी, चंद्रवदनी, टिहरी गढ़वाळ।
दिनांक 29.10.2015

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
September 29 · Edited ·

श्री भरत सिंह नेगी पहाड़ी मित्र.....

कांधी मा काखड़ि,
मुंड मा अमेर्थ,
कख होलु जाणु भुला,
प्‍यारा पहाड़ मा.......

मन मा ऊलार छ,
पहाड़ सी प्‍यार छ,
खाणु वख की सब्‍बि धाणि,
पेणु छोया ढुंग्‍यौं कू पाणी,
किलैकि पहाड़ सी प्‍यार छ......

-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
दिनांक 29.9.2015

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
September 18 ·

बचपन मा दगड़यौं दगड़ि हम,
बण फुंड बाखरा चराते थे,
डांग का ऐंच बैठिक हम,
काखड़ी मुंगरी खाते थे....

याद औणा छन ऊ दिन आज,
दिल्‍ली में भक्‍कु सताता है,
तन बदन मा बित्‍दि भारी,
प्‍यारा पहाड़ याद आता है......

-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
सर्वाधिकार सुरक्षित
दिनांक 18.9.2015

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

पंद्रह बरस व्हैगैनी पंद्रह बरस जी

पंद्रह बरस व्हैगैनी पंद्रह बरस जी
उत्तराखण्ड तै बनि कि ये ढुंगों गारों मा पंद्रह बरस जी

क्वी पोंछीगे लंदन त क्वी पोंछीगे अमेरिका जी
उत्तराखण्ड दिस मनिगे अब मेरा देश परदेशा मा जी

एक दिनों को सोर हुंयुँ ३६३ दिन सब बिसरी भूल जी
ये मेरो उत्तराखण्ड ते थे सब अपरा अब भूलि गयां जी

उत्तराखण्ड नाईट धरियुंच प्रवासी भै - बन्दों न अब सजी धजी जी
द्वि चार लस्का ढसक लगे की ऊँ पर दारू खूब अब चढ़ गै जी

कन इनि तुम थे अपरुँ की खुद लगनि मि अचरज मा पड़यूँ जी
उत्तराखण्ड शहीदों का सुप्निया किलै पड्यां अब भी अपुरा जी

पंद्रह बरस व्हैगैनी पंद्रह बरस जी
उत्तराखण्ड तै बनि कि ये ढुंगों गारों मा पंद्रह बरस जी

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ