• Welcome to MeraPahad Community Of Uttarakhand Lovers.
 

Kumauni & Garhwali Poems by Various Poet-कुमाऊंनी-गढ़वाली कविताएं

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 05, 2011, 12:00:34 AM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

कविता उत्तराखंड की बालकृष्ण डी ध्यानी 

आओ राज्य गठन के शहीदों का सपनों का उत्तराखंड बनायें

आओ राज्य गठन के शहीदों का सपनों का उत्तराखंड बनायें
ना टिहरी ना अल्मोड़ा ना पौड़ी इन्हे चलो मिलाकर एक बनायें
आओ राज्य गठन के शहीदों का सपनों का उत्तराखंड बनायें

पंद्रह बरस भागे अपने से एक जोर से आवाज देके उसे बुलायें
नवंबर की इस पावन बेला को मिलकर चलो आज साथ मनायें
आओ राज्य गठन के शहीदों का सपनों का उत्तराखंड बनायें

कोदो मंडवा खायेंगे क्यों ना हम अब अपना उत्तराखंड सजायेंगे
चलो मिलकर एक सुर में गायेंगे और भी अपने भाई बहन आयेंगे
आओ राज्य गठन के शहीदों का सपनों का उत्तराखंड बनायें

देहरादून गैरसैण में हम पहाड़ी तनिक भी फर्क ना आने देंगे
शहीदों के सपनों की राजधानी लेकिन हम पहाड़ पे ही बनायेंगे
आओ राज्य गठन के शहीदों का सपनों का उत्तराखंड बनायें

पलायन की इस बहती गंगा में हम रोजगार का बांध लगायेंगे
स्वरोजगार बीज से हम खंडहर घरों बांज खेतों को लहलहायेंगे
आओ राज्य गठन के शहीदों का सपनों का उत्तराखंड बनायें

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

श्री भरत सिंह नेगी पहाड़ी मित्र.....

कांधी मा काखड़ि,
मुंड मा अमेर्थ,
कख होलु जाणु भुला,
प्‍यारा पहाड़ मा.......

मन मा ऊलार छ,
पहाड़ सी प्‍यार छ,
खाणु वख की सब्‍बि धाणि,
पेणु छोया ढुंग्‍यौं कू पाणी,
किलैकि पहाड़ सी प्‍यार छ......

-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
दिनांक 29.9.2015

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Dagdya
November 7 at 10:34am ·

यैजा दगडयों दौडी दौडी की
कुडी बांजी हुयीं च
तुम्हरी ढबली की फांग्युं मा भयुं
सुंगरु की लंगार लगीं च
यैजा दगडयों दौडी दौडी की
कुडी क मुंडली मा गुंणी बैठयां छन
ढैपर खबडाट हुयुं च
मुसु बिरलु की कुटुमदारी
तुमरी उबर्युं मा बियंयी च
यैजा दगडयों दौडी दौडी की
तुमर जांण से गांव दीदों
ईकतरफा सुन्याल हुयुं च
आदीम त नी रैन डिंडल्युं मा
गुंणी बांदरु की कछेडी लगीं च
यैजा दीदों दौडी दौडी की
दीदी भूल्युं कु सारु मैत कु
तुम्हर जांण से बंद हुयुं च
कैम यैली मैत भग्यनी
भैजी बौ दगडी दिल्ली बंबई बस्युं च
यैजा दगडयों दौडी दौडी की
सर्वाधिकार सुरक्षित@सुदेश भटट(दगडया)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

आहा आज जिकुडी मा मेरी
फिर उमाल यैगे
गौं गलों की याद
त्योहार बग्वाल यैगे
बार त्योहारु मा दीदी भूली
मैत पैटीं होली
नौकरया भयुं की
अर्जी छुट्टी की जयीं होली
मीतै बी बौडी बौडी
याद गौं की यैगे
खुशीयों कु त्योहार दीदों
हपार बग्वाल यैगे
फुलझडी दिवाछलों की
मीतै याद यैगे
पुजा पिठै की बाडी
गोरु तै खलांण की याद यैगे
आहा आज जिकुडी मा मेरी
फिर उमाल यैगे
मेरी बुडडी बुये दीदों
सार लगीं होली
औलु बग्वाल्युं की छुट्टी
घीयु की गुंदकी धरीं होली
दुर परदेस्युं की घरम
हुंणी होली जग्वाल
दगडया बुल्दु भयुं तुमकुन
मुबारक ह्वा हैप्पी बग्वाल
आहा आज जिकुडी मा मेरी
फिर उमाल यैगे
गौं गलों की याद
त्योहार बग्वाल यैगे
सर्वाधिकार सुरक्षित@सुदेश भटट(दगडया)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

आओ राज्य गठन के शहीदों का सपनों का उत्तराखंड बनायें

आओ राज्य गठन के शहीदों का सपनों का उत्तराखंड बनायें
ना टिहरी ना अल्मोड़ा ना पौड़ी इन्हे चलो मिलाकर एक बनायें
आओ राज्य गठन के शहीदों का सपनों का उत्तराखंड बनायें

पंद्रह बरस भागे अपने से एक जोर से आवाज देके उसे बुलायें
नवंबर की इस पावन बेला को मिलकर चलो आज साथ मनायें
आओ राज्य गठन के शहीदों का सपनों का उत्तराखंड बनायें

कोदो मंडवा खायेंगे क्यों ना हम अब अपना उत्तराखंड सजायेंगे
चलो मिलकर एक सुर में गायेंगे और भी अपने भाई बहन आयेंगे
आओ राज्य गठन के शहीदों का सपनों का उत्तराखंड बनायें

देहरादून गैरसैण में हम पहाड़ी तनिक भी फर्क ना आने देंगे
शहीदों के सपनों की राजधानी लेकिन हम पहाड़ पे ही बनायेंगे
आओ राज्य गठन के शहीदों का सपनों का उत्तराखंड बनायें

पलायन की इस बहती गंगा में हम रोजगार का बांध लगायेंगे
स्वरोजगार बीज से हम खंडहर घरों बांज खेतों को लहलहायेंगे
आओ राज्य गठन के शहीदों का सपनों का उत्तराखंड बनायें

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
http://balkrishna-dhyani.blogspot.in/search/
http://www.merapahadforum.com/
में पूर्व प्रकाशित -सर्वाधिकार

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

पंद्रह बरस व्हैगैनी पंद्रह बरस जी

पंद्रह बरस व्हैगैनी पंद्रह बरस जी
उत्तराखण्ड तै बनि कि ये ढुंगों गारों मा पंद्रह बरस जी

क्वी पोंछीगे लंदन त क्वी पोंछीगे अमेरिका जी
उत्तराखण्ड दिस मनिगे अब मेरा देश परदेशा मा जी

एक दिनों को सोर हुंयुँ ३६३ दिन सब बिसरी भूल जी
ये मेरो उत्तराखण्ड ते थे सब अपरा अब भूलि गयां जी

उत्तराखण्ड नाईट धरियुंच प्रवासी भै - बन्दों न अब सजी धजी जी
द्वि चार लस्का ढसक लगे की ऊँ पर दारू खूब अब चढ़ गै जी

कन इनि तुम थे अपरुँ की खुद लगनि मि अचरज मा पड़यूँ जी
उत्तराखण्ड शहीदों का सुप्निया किलै पड्यां अब भी अपुरा जी

पंद्रह बरस व्हैगैनी पंद्रह बरस जी
उत्तराखण्ड तै बनि कि ये ढुंगों गारों मा पंद्रह बरस जी

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
http://balkrishna-dhyani.blogspot.in/search/
http://www.merapahadforum.com/
में पूर्व प्रकाशित -सर्वाधिकार

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

मि त लिख द्यूलु लाख कविता

मि त लिख द्यूलु लाख कविता
वैल नि पैढ़ स्की त मिल कया कण
मि त लिख द्यूलु लाख कविता

पड़ी राई सदनी कुल्हणा भितर
भैरी नि ऐस्की त मिल कया कण
मि त लिख द्यूलु लाख कविता

लाख विपदा लाख पीड़ा सैई विल
आंसूं आखों मा राई त मिल कया कण
मि त लिख द्यूलु लाख कविता

ढुंगा गारा ही रे गैल्या अब मेरो
तिल ऐ समझी नि त मिल कया कण
मि त लिख द्यूलु लाख कविता

झम्प मारी की ये मेर कविता ग्याई
क्वी अपरो ना मिल त मिल कया कण
मि त लिख द्यूलु लाख कविता

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
http://balkrishna-dhyani.blogspot.in/search/
http://www.merapahadforum.com/
में पूर्व प्रकाशित -सर्वाधिकार

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Harish Joshi
October 25 at 4:28am

*****यो बुड़याकाल*******
बिन चश्मा देखिन नै,
बिन एयरफोन सुणीन नै ,
बिन जाठी हिटिन नै ,
बैठी ग्यो फिरी उठीन नै ,
भूख आब लागनी नै ,
कै खानों अब पचनो नै ,
डबल न्हेगो दवाईन में ,
नानतिन अब अपना मन का हो गई ,
ब्वारी अपना फैसन में रै गई ,
कान में मोबाईल चिपकियो रै गई ,
ठुल सयाना कोई नै रै गई ,
चेली बेवाई ससुरालिक न्हेगे ,
च्याला कमुन हूपरदेस न्हेगे ,
उन्नके देखणी कोई नै रै गई ,
ससुर ज्यो आब डेडी है गई ,
सासु आब मम्मी हैगे '
ज्येठ ज्यू अब दाज्यू है गई ,
पति दगडा अब की रिस्ता रे ग्यो ,
घरवाली थे लेके की कुनू,
पेली चंद्रमुखी छी ,
आब ज्वालामुखी है गई |

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Gyan Pant
October 26 at 3:58pm · Edited

.... जिम कार्बेट पार्काक शेर

आब् तु जिंदगी 'की बात करी कर
ऊँण जाँण् त सब लाग्यै रुनेर भै ।

बोट भये त फल ले लगाल् जरुर
तुम नि खै सका ,यो भाग्यै बात छ ।

कसिक् कै दियूँ कि वां के~ न्हाँ कै
पाँणि त आजि ले मली बटी उनेर भै ।

खालि जि लागैं यो बाटुयि जऊँण ले बाटुयि -- हिचकी
साँचि छ कि पहाड़ ले मैं कैं याद करौं ।

तुम भुलि ले जाला त के बात न भै
मैं पहाड़ छूँ , बोट सुखण् नि दियूँ ।

यो तुमैरि देयि छ आब् तुमैं जांणौ हो
पोर्यून - पौर्यूनै मेरि ले की उमर है गे । पोर्यून - पौर्यूनै -- रखवाली करते करते

योयी सोचि बेरि आजि ले हरी है रयूँ
तुम न सही क्वे न क्वे त आलै सही ।

माया को जंजाल समझ ल्हियौ तुम ले
नाराज है ग्यो त पहाड़ ढुँङ ले घुर्याल । ढुँङ घुर्याल -- पत्थर लुढ़काना
ज्ञान पंत

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

हिंदी के जाने माने कवि और वरिष्ठ पत्रकार वीरेन डंगवाल जी को श्रद्धांजलि !
अलविदा श्री वीरेन दा !!
श्री वीरेन दा!द्वारा 'पत्रकार महोदय' शीर्षक से लिखी गई यह कविता उन्हीं को सपर्पित :-

पत्रकार महोदय !

'इतने मरे'
यह थी सबसे आम, सबसे ख़ास ख़बर
छापी भी जाती थी
सबसे चाव से
जितना खू़न सोखता था
उतना ही भारी होता था
अख़बार।
अब सम्पादक
चूंकि था प्रकाण्ड बुद्धिजीवी
लिहाज़ा अपरिहार्य था
ज़ाहिर करे वह भी अपनी राय।
एक हाथ दोशाले से छिपाता
झबरीली गरदन के बाल
दूसरा
रक्त-भरी चिलमची में
सधी हुई छ्प्प-छ्प।
जीवन
किन्तु बाहर था
मृत्यु की महानता की उस साठ प्वाइंट काली
चीख़ के बाहर था जीवन
वेगवान नदी सा लहराता
काटता तटबंध
तटबंध जो अगर चट्टान था
तब भी रेत ही था
अगर समझ सको तो, महोदय पत्रकार!

-वीरेन डंगवाल
(भड़ास 4 मीडिया से साभार)