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Kumauni & Garhwali Poems by Various Poet-कुमाऊंनी-गढ़वाली कविताएं

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 05, 2011, 12:00:34 AM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

सुबेर....

आगास मा रतब्‍येणु आई,
अहसास ह्वै रात ब्‍येंगि,
रात की कोखि बिटि,
सुबेर कू जल्‍म ह्वैगि.....
तब दूर खिर्शु की डांड्यौं मा,
झळ झळ सूरज भगवान ऐगि,
उठ्यन मेरा मुल्‍क का मनखि,
खासपट्टी ऊदंकार ह्वैगि......
मेरा गौं बागी नौसा मा,
खूब चैल पैल ह्वैगि,
क्‍वी चार बंठा पाणी ल्‍हेगि,
क्‍वी अपणि भैंसी नह्वैगि....
गौं का बीच चंद्रवदनी मंदिर मा,
क्‍वी द्यू जगौणु घंटी बजौणु,
बोडा कांधि मा हळसुंगि धरि,
अपणा माळ्या बळ्दु हक्‍यौणु.....
कवि जिज्ञासु का गौं मा,
'सुबेर'कू यनु दृश्‍य होन्‍दु,
दर्द भरि दिल्‍ली की 'सुबेर'देखि,
यनु भाव कविमन मा औन्‍दु......


15.11.2015

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

दर्द्याळु पाड़.....

सब्‍बि धाणि देन्‍दु,
देन्‍दु हि देन्‍दु छ,
कुछ नि लेन्‍दु......
पहाड़ कू ठण्‍डु पाणी,
बारानाज की दाणी,
कैल्‍सियम कू भण्‍डार कोदु,
हाडगि मजबूत बणौन्‍दु,
रोग भी दूर भगौन्‍दु,
गेंठी, बेबर, बेर, तड़ल,
काखड़ि, मुंगरि,गोदड़ि, चचेन्‍डि,
कुजाणि क्‍या क्‍या देन्‍दु,
देन्‍दु हि देन्‍दु कुछ नि लेन्‍दु.....

अपणा मनोहारी रुप सी,
हमारा मन मा ऊलार जगौन्‍दु,
चुंच्‍यान्‍दा पोथ्‍लौं कू चुंच्‍याट,
फर फर बग्‍दु बथौं,
रौला पाखौं बग्‍दु पाणी,
बांज बुरांस देवदारु,
मुल मुल हैंस्‍दु बुरांस,
मनख्‍यौं का मयाळु मन मा,
कुतग्‍याळि सी लगौन्‍दु....
सोचा दौं, दर्द हि देणा छौं,
कथ्‍गा मयाळु रौंत्‍याळु छ,
हमारु 'दर्द्याळु पाड़'......

14.11.2015

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

घड्याळु .....

लगण लग्‍युं छ घर मा,
घड्याळा औण लग्‍युं छ,
एक बड़ु सी लगोठ्या  मेरु,
देव्‍ता का नौं कू ल्‍हयुं छ......


दगड़्यौं मेरा बतौण लग्‍युं छौं,
घड्याळा मा जरुर ऐन,
जथ्‍गा भाग मा होलु तुमारा,
लगोठ्या की लोतगि खैन......

सिरी फट्टी कू मोह हो मन मा,
घड्याळा सी मिलि जैन,
घड्याळा का खातिर रमेश्‍वरी,
झोळा पेट लुकैक ल्‍हेन.....

लगोठ्या आंक नि लेलु त,
मन मा कतै नि घबरैन,
ल्‍वठ्यन पाणी का  बूंद कुछ,
कंदूड़ फर वेका तरकैन......

अंके जालु लगोठ्या जब,
थमाळि हात मा ल्‍हेन,
कैंधी खूब रख्‍यन सिरी फर,
घड्याळा सी मिलि जैन.....

ख्‍याल रख्‍यन हे दगड़्यौं मेरा,
बांठी तुम हि लगैन,
कार बार करदु करदु,
लोतगि मोतगि घळ्कैन.....

भितर्वांस की रस्‍सी होलि सवादि,
गिलास भरिक प्‍येन,
ख्‍याल रख्‍यन मन मा अपणा,
लत्‍ग पत्‍ग कतै न लगैन.....

दवै दारु कू बंदबस्‍त भिछ,
बेफिक्र तुम मन मा रैन,
कृपा करयन तुम मैं फर,
घड्याळा मा शामिल ह्वैन.....

देव्‍ता पुजै कू न्‍युतू मेरु,
घंघतोळ मा बिसरि न जैन,
जग्‍वाळ मा रौलु मैं तुमारी,
सनक्‍वाळि तुम ऐ जैन......


18.11.2015

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

दूधबोली भाषा....

कवि की कुटि मा रिटणि रन्‍दि,
कवि की दूधबोली भाषा,
बौळ लगौन्‍दि कवि का मन मा,
दूर भगौन्‍दि निरासा......

राज करदि कवि मा मन मा,
कवितौं कू जल्‍म करौन्‍दि,
रैबारु होन्‍दि छन वींकी,
भाषा प्रेम जगौन्‍दि.....

नौट कमैक मनखि बणि जांदा,
जिंदगी भर धन जग्‍वाळा,
श्रृंगार कर्ता दूधबोली का,
होन्‍दन भाषा प्रेम रखण वाळा....

कामना करदु मन कलम सी,
कवि की होन्‍दि अभिलाषा,
जीवन धन्‍य तब होलु मेरु,
फलु फूलू मेरी दूधबोली भाषा.......

7.11.2015

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

गढ़वाळि कवितौं मा...

सन् उन्‍नीस सौ पच्‍चीस तलक,
बामणूं कु एकाधिकार रै,
साख्‍यौं बिटि जारी कविता-जात्रा,
'अंग्‍वाळ' कविता संग्रह,
गढ़वाळि कविता पुराण मा,
यनु लिख्‍युं छ.....
यनु भि लिख्‍युं छ,
सरोळा बामण हि,
ज्‍यादातर कवि रैन,
1925 का बाद,
जजमान गढ़वाळि कवि ह्वैन....

बग्‍त बदलि आज यनु निछ,
उत्‍तराखण्‍डी समाज का लोग,
कवि अर लिख्‍वार छन,
कुछ त पाड़ का दर्द सी,
उच्‍च कोटि का कवि बणिग्‍यन,
क्‍वी भाषा प्रेम मा.......

कवि नजर का कारण,
'अंग्‍वाळ' कविता संग्रह पढ़िक,
कविमन मा ख्‍याल आई,
कविता रुप मा लिखिक,
प्रिय पाठक गण आपतैं बताई....

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

भाषा रुपी डाळि.....

भाषा रुपी डाळि का दगड़्यौं,

पुराणा पात झड़ि जाला,

फललि फूललि भाषा हमारी,

पात नयां चार चांद लगाला.......


पित्रुन रचि होलि भाषा हमारी,

गढ़वाळि, कुमाऊंनी, जौनसारी,

नयीं पीढ़ी तैं बोलणु सिखावा,

लिखण मा क्‍या छ लाचारी......

जब तक लिख्‍ला बोलला हम,

तब तक हि छौं उत्‍तराखण्‍डी,

ध्‍यान रखा बिना  भाषा कू,

मनखि जनु थौ शिखन्‍डी......


भाषा हमारी कथ्‍गा प्‍यारी,

कलम ऊठैक श्रृंगार करा,

मन सी सोचा हे लठ्याळौं,

जतन करि रसधार भरा.......
 

जल्‍म हमारु यीं धरती मा,

भाषा रुपी डाळि का,

श्रृंगार का खातिर होयुं छ,

भाषा अपणि त्‍यागि मनखि,

बिमुख ह्वै किलै खोयुं  छ........


                    13.10.2015

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

प्‍यारा पहाड़ सी प्‍यार करा.........



द्वार ढ़क्‍यां छन ताळा लग्‍यां,

धूर्पळा टूटिक भ्‍वीं मा ऐग्‍यन,

जौं कूड़ौं फर बचपन बिति,

बिन मनख्‍यौं का ऊदास ह्वैग्‍यन....


तिबारी डिंडाळ्यौं का खम्‍ब टूटिग्‍यन,

चौक मा फोळीं पठाळि,

बिन मनखि बिन गोरु का चौक,

रिटण लगिं छ बिराळि.......


अपणा बिकास खातिर छोड़़ी,

सब्‍यौंन अपणु प्‍यारु गौं,

कथ्‍गौंन कूड़ी पुंगड़ि बेच्‍यालि,

लेन्‍दा नि अब वख जाण कू नौं.....


लड़ि भिड़ि उत्‍तराखण्‍ड लिनि थौ,

हातु सी छुटदु जाणु छ,

मोळ माटु होण न देवा,

बग्‍त आज चेताणु छ..........


स्‍वर्ग सी सुन्‍दर मुल्‍क हमारु,

जख छन झप्‍पन्‍याळा बांज बुरांस,

हैस्‍दिं डांडी कांठी छन जख,

डाळ्यौं मा बास्‍दि घुघति हिल्‍वांस......



प्‍यारा पहाड़ तैं न त्‍यागा,

हमारा पहाड़ मा सब्‍बि धाणी,

कखन देखल्या रौंत्‍याळि डांडी,

चुकलु पहाड़ कू ठंडु पाणी......


पहाड़ जवा अर कूड़ी लिपिक,

घर कूड़ी कू श्रृंगार करा,

ताळा खोला घर कूड़यौं का,

प्‍यारा पहाड़ सी प्‍यार करा.........


               13.10.2015

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

प्‍यारा पहाड़ सी प्‍यार करा.........



द्वार ढ़क्‍यां छन ताळा लग्‍यां,

धूर्पळा टूटिक भ्‍वीं मा ऐग्‍यन,

जौं कूड़ौं फर बचपन बिति,

बिन मनख्‍यौं का ऊदास ह्वैग्‍यन....


तिबारी डिंडाळ्यौं का खम्‍ब टूटिग्‍यन,

चौक मा फोळीं पठाळि,

बिन मनखि बिन गोरु का चौक,

रिटण लगिं छ बिराळि.......


अपणा बिकास खातिर छोड़़ी,

सब्‍यौंन अपणु प्‍यारु गौं,

कथ्‍गौंन कूड़ी पुंगड़ि बेच्‍यालि,

लेन्‍दा नि अब वख जाण कू नौं.....


लड़ि भिड़ि उत्‍तराखण्‍ड लिनि थौ,

हातु सी छुटदु जाणु छ,

मोळ माटु होण न देवा,

बग्‍त आज चेताणु छ..........


स्‍वर्ग सी सुन्‍दर मुल्‍क हमारु,

जख छन झप्‍पन्‍याळा बांज बुरांस,

हैस्‍दिं डांडी कांठी छन जख,

डाळ्यौं मा बास्‍दि घुघति हिल्‍वांस......



प्‍यारा पहाड़ तैं न त्‍यागा,

हमारा पहाड़ मा सब्‍बि धाणी,

कखन देखल्या रौंत्‍याळि डांडी,

चुकलु पहाड़ कू ठंडु पाणी......


पहाड़ जवा अर कूड़ी लिपिक,

घर कूड़ी कू श्रृंगार करा,

ताळा खोला घर कूड़यौं का,

प्‍यारा पहाड़ सी प्‍यार करा.........


               13.10.2015

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

"हिटो हो भैजी चलो रै भुला "
हिटो हो भैजी चलो रै भुला, उत्तराखंड देखि औंला।
म्यारु पहाड़, देव भूमि, पित्र भूमि कू शीश नवौंला।।

उत्तराखंड पौंछण से पैलि, रामपुर तिराया मा जौंला। जौं कि ज्यान से मीली राज, वूं भै भैण्यूं याद ल्योंला।।
हिटो हो भैजी चलो रै भुला..........

घार बूण राजि रखी,भौन देवी मा घांडि बजौंला।
कुलदेवों का थान मा छ्वारो द्यू धुपणु कैरि औंला।।
हिटो हो भैजी चलो रै भुला..........

चकबंदी कू जोर चलणू, गणेशु काका थैं सारु द्यूंला।
नै क्यारि सजीं काका की, क्यार्यूं मा पाणी चारि औंला
हिटो हो भैजी चलो रै भुला..........

क्यार्यूं मा हर्यालि आली, फुंगडी सबि अवाद ह्वैली।
ग्वीणि बांदर सुगंर भाजला, सैरि सारि खैंदि ह्वैली।
हिटो हो भैजी चलो रै भुला.........

बांजि फुंगडि यख वख, वाडा मींडा देखि औंला।
सरक्यां वाडा सै कैरिक, रळक्यां भीड़ा धैरि औंला।।
हिटो हो भैजी चलो रै भुला......

तिबरी डंडेळि कूड़ि तेरी,छनुडी बांजि समाळि औंला
हे भैजी! ब्वाडा का टैम जनि,वूं थै ई सजैक औंला।।
हिटो हो भैजी चलो रै भुला.........

वगत कु क्य बुन रै भुला, वां से पैलि समळि जौंला।
आणु जाणु लग्यूं रालु, गौं गळ्या पछ्याणि ल्योंला।
हिटो हो भैजी चलो रै भुला..........
नै क्यारि -नई पौध, new generation.
सर्वाधिकार सुरक्षित @दर्शनसिंह रावत "पडखंडाई "
दिनांक 20/11/2015

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

लाचार बाघ ( वीणा पाणी जोशी की विचारोत्तेजक कविता )
रचना -- वीणा पाणी जोशी ( जन्म - 1937 देहरादून )
Poetry by - Veena Pani Joshi
( विभिन्न युग की गढ़वाली कविताएँ श्रृंखला )
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इंटरनेट प्रस्तुति और व्याख्या - भीष्म कुकरेती
बाघ लग्युं
बस्त्युं मा
ज्युंदा मनखी बूकौणू
मनखी मेस्युं जंगलूँ मा
बाघा बांस बूकौणू
स्यूं जंगलूँ
स्यूं जीव -जन्तुं
बुग्याळ तक घुळणू
बाघ लाचार
पापी पेटे खातिर
मनखी धिक्कार
अति लोभै खातिर
मुंड पर
मत्थी वळो कु
वरद हाथ पैकी
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( साभार --शैलवाणी , अंग्वाळ )
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