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Kumauni & Garhwali Poems by Various Poet-कुमाऊंनी-गढ़वाली कविताएं

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 05, 2011, 12:00:34 AM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

किराण ( रघुवीर सिंह रावत 'अयाळ' की कविता )
रचना -- रघुवीर सिंह रावत 'अयाळ' ( जन्म - 1938 -2011 , अयाळ , पैडळ स्यूं , पौड़ी गढ़वाल )
Poetry by - Raghuvir Singh Rawat 'Ayal'
( विभिन्न युग की गढ़वाली कविताएँ श्रृंखला )
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इंटरनेट प्रस्तुति और व्याख्या - भीष्म कुकरेती
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बण गैनी नियम
चल गेन रिवाज
ऐ गेन अगनै
सबी टिप्वा
बुगठया बाज
चौर्याँळु दगडि मिली
कछम्वळि गबंळै
भोरी पेट
अर बचीं खुचीं
बोट्यूँ तैं ली गैनी
अपड़ा हुणत्यळा
छौला कू
हमरा पल्ला पड़ी
सिरप किराण
ऐंस्या रैग्या हम
हमरी घिमसाण
लगी टपराँण
कि बाबा आलो
हडगी ल्वतगी
कुछ ट लालो
पळयाण ह्व्ला दांत
पैनाणा ह्व्ला हत्यार
ये गुठ्यार
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( साभार --शैलवाणी , अंग्वाळ )
Poetry Copyright@ Poet
Copyright @ Bhishma Kukreti interpretation if any

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बाबा उत्तराखंड बणगे (ललित केशवान रचित कविता )
रचना -- ललित केशवान ( जन्म - 1940, सिरोली , इडवालस्यूं , पौड़ी गढ़वाल )
Poetry by - Lalit Keshwan
( विभिन्न युग की गढ़वाली कविताएँ श्रृंखला )
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इंटरनेट प्रस्तुति और व्याख्या - भीष्म कुकरेती
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बाबा उत्तराखंड बणगे ब्वेई उत्तराखंड बणगे।
बेटा उत्तराखंड बणगे बेटी उत्तराखंड बणगे।।
ल्हेण को छौ नौं रयुं स्यो वो भि चलगे।
म्यारा कुल को दीप छायो वो भि बुझगे ।।
स्युंदी को सिंदूर तो उत्तराखंड बणगे।
दाज्यू उत्तराखंड बणगे बाज्यू उत्तराखंड बणगे।।
जो बुरांशा फूल झड़ने ज्वान ह्वेकी।
जौन दे बळि अपणा अपणा प्राण ख्वेकी ।।
उंकी चिंता की राख उत्तराखंड बणगे।
भैजि उत्तराखंड बणगे भुला उत्तराखंड बणगे।।
वूं कुकर्मयों घाम लगीना।
माळु की घुघती जॉन तड़फडैना ।।
वूंकी वा किल्क्वार उत्तराखंड बणगे।
दीदी उत्तराखंड बणगे भूली उत्तराखंड बणगे।।
रात ही जख कत्ल ह्वेगे रात माँ।
खून की जख गाड़ बगने बाँठ माँ ।।
ऊंको अमर बलिदान उत्तराखंड बणगे।
बाबा उत्तराखंड बणगे बेटा उत्तराखंड बणगे। ।।
गंगा गौरी गैतरी न धै लगैनी।
हंसुळि धगुलि झगुलि ट्वपलि बचै रखनी।।
वूंकी फिटकार उत्तराखंड बणगे।
चेली उत्तराखंड बणगे ब्योलि उत्तराखंड बणगे।।
Copyright @ Lalit Keshwan , Delhi , India 2015

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

गाँव बचौला (घनश्याम रतूड़ी 'शैलानी' की कविता )
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रचना -- स्व. घनश्याम रतूड़ी 'शैलानी ' ( जन्म - 1936 , चरीगाड , केमर , टिहरी गढ़वाल )
Poetry by - Ghanshyam Raturi 'Shailani'
( विभिन्न युग की गढ़वाली कविताएँ श्रृंखला )
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इंटरनेट प्रस्तुति और व्याख्या - भीष्म कुकरेती
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हिटा दिदी , हिटा भुल्यौं , चला गौं बचौला।
दारु को दैंत लग्यूं तै दैंत हटौला
टिंचरी को भूत लग्यूं , तै भूत भगौला।
घर हमारा उजड़ी गे छोरि छोरा बिगड़ि गे
रणचंडी बण जौला दिदी तै दैंत मिटौला
टिंचरी को भूत लग्यूं , तै भूत भगौला।
टिंचरी की भरमार च ग़ाफ़िल सरकार छ
क़ानून रिशवतखोरि की तौन सणि बतौला
टिंचरी को भूत लग्यूं , तै भूत भगौला।
गरीबी को पार नी क्वी भि रोजगार नी
दारु को व्यापार बड़्यूं क्या खौंला क्या लौंला
टिंचरी को भूत लग्यूं , तै भूत भगौला।
यख बदरी केदार छ गंगा जमुना द्वार छ
बिगड़ी गये पढ्याँ लिख्याँ तौं सणि बतौला
दारु को दैंत लग्यूं तै दैंत हटौला
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( साभार --शैलवाणी , अंग्वाळ )
Poetry Copyright@ Poet
Copyright @ Bhishma Kukreti interpretation if any

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

झंडारोहण ( डा पार्थसारथी डबराल की चोट करती कविता )
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रचना -- स्व . डा पार्थ सारथि डबराल ( जन्म - 1936, तिमली , डबरालस्यूं ,पौड़ी गढ़वाल )
Poetry by - Dr. Partha Sarthi Dabral
( विभिन्न युग की गढ़वाली कविताएँ श्रृंखला )
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इंटरनेट प्रस्तुति और व्याख्या - भीष्म कुकरेती
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फ्यफना अळगै अळ गै की
गांधी चौक की दांदण माँ
खड़ु ह्वे की
मीन राष्ट्रीय झंडा को डोर
लौंफ्याण चाई।
पर झंडा की डोर
लौंंफ्याँण मा नि आई।
कथगा कोशिस करे
तकणे तकणे को मोरी ग्यों
अस्यो ऐगे ,
पर झंडा की डोर
जखा कि तक्खि रैगे
झंडा मुक्त ह्वेकी ,
आकाश मा फफराणु छयो
मीन तिरंगा कु बोले
"चुचा मितै भी अपणी
डोर पकड़णी दे !
जनता माँ मितै भी
नेतौं की तरौं
अकड़ण दे। "
झंडा आकाश माँ
खित खितै की
हँसे अर बोले -
" तू क्य फफरैलो
मितै रे !
सन्नपति माँ सि
क्या बोलणु छे रै !
मुर्ख तू स्वछंद छै
स्वतंत्र नी छै !
स्वछँदता देखिकी
मी बितकुदो छौं
एक बार फिर मितै फफरैकी देख धौं
तू निक्कमू अर बुरु छै
तू निगुरु छै
गाड जैकी तुतै गाड नि अड़ाए
भ्याळ जैकी तुतै भ्याळ नि पढ़ाए
अपणी समस्यौं की फंची
तू मुंड माँ धरीक
कमर तै हिंगोड़ सी मोड़िक
तू क्वकड़ी क्वकड़ी चलणु छै !
त्वेन आकाश को विस्तार
कख देखि रे !
तब तेरु क्य काम मेर धोरा
तू मितै नि लौन्फ़े
सकदी रे छोरा।
तू दुसरु का वास्तs
भगवान क रच्यूं छै !
पर आज तू अफुकुणी ही
बच्युं छै !
इन बच्यूं से तs नि बच्यूं ठीक ,
तू ऐ तs सै मेरs नजदीक !
हे ग्वबडू बुकाण वाळो
मै तैं नि पै सकदो
तेरो छैलो
तू मितैं क्या लौंफ़ेलो !
इन्नो बचिकी क्या करिलो रे !
मौत देखीक कब तक डरीलो रे !
छोरा !
जै दिन तक मौत खुद नि मरदी !
वै दिन तक क्वी बच्यूं नी।
जै दिन मरघट ही मर जालो
वैदिन मनखी अमर ह्वै जालो !
पर ,
यु मरघट मरण वाळ नी
मरलो भी त
सब्बुं तैं मारिकी मरला
फिर
क्या पड़्यूं छै
सिल्ली ओबरी
......
तू क्या लौंफेलो मितैं रे बोनू!
तू क्या फफरैलो मितैं रे नौनू !

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( साभार --शैलवाणी , अंग्वाळ )
Poetry Copyright@ Poet
Copyright @ Bhishma Kukreti interpretation if any
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स्वच्छ भारत ! स्वच्छ भारत ! बुद्धिमान भारत !

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

रामदेई ( नित्यानंद मैठाणी की करूँ रस वळी कविता )
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रचना -- नित्यानंद मैठाणी ( जन्म - 1934 , श्रीनगर , गढ़वाल )
Poetry by - Nityanand Maithani
( विभिन्न युग की गढ़वाली कविताएँ श्रृंखला )
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इंटरनेट प्रस्तुति और व्याख्या - भीष्म कुकरेती
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छोट्या मा देखि छौ त्वै रामदे
अब नि छै कख छै बता हे रामदे।
धोती थेगळया चिर्रीं आंगड़ी टूटीं हंसुळी
थेंचीं बुजणी खोंसी मोसी छै रामदे।
कैरी आँखि तिरछा घुंडा बाळ फुबत्यां
बर्ड बरड़ करो लबरा जनी छै रामदे।
छतकोट का वे पौड़ मा पड़ीं रौ
कुछ न कुछ सुणावो रामदे।
वींन गाये तीलाधारु बम सरीला
तब चिड़ावन छोरा त्वे तैं रामदे।
सिन्नगर से पौड़ी जांदू उंद औंदू
क्वी न देखु पर तु देखि रामदे।
ठुल्ला छवाळा नौना बाळा हम क्य जाणां
तब तु छै अस्सी का धोरा रामदे।
हम गयाँ संगता रिट्या कख कख घुम्यां
तू पड़ीं रै डाळा निस्सा रामदे।
क्वी बि दे द्यो नी बि द्यो क्वी बात नी
कुछ नि छै पर छै मयाळदु रामदे
बरसूँ पैथर जब गयों वख खुद्यूं मैं
तब नि पाये हाय से गए रामदे।
याद औंद थोळळी गिच्ची काठगी गौळी
ओड्यार मा बी भौण भरद्यो रामदे।
कमर झुकड़ी लाथो टेकू सुट्ट ट सुट्ट
उंद आवो उब्ब जावो रामदे।
आज सब सुख मा दुखी च नित्यानंद
तू नि पाये कुछ नि पाये रामदे
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( साभार --शैलवाणी , अंग्वाळ )
Poetry Copyright@ Poet
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

तै देख्द ही
तै देख्द ही
मि मि ना राई
देख ईं म्यळी मुखडी थे
ईं जिकोड़ी मा जादू व्हैग्याई
कया तेरो रूप च
कैल हुलु येथे इन बणाई
सरया सरीर मा मेरो
वैल अब कंप कपि कैग्याई
सुदी नि बुल्दु मि
ऐ गिच इनि नि खोल्दो मि
कैथे भी बिचार दे तू अब
मिल त झूठ ना सच ब्वाली
लिखणा कुण मिल
ना खुद कुछ इनि मिस्ल द्याई
तू ही कलम व्हैगै अब मेरी
तू ही अब वो गीत बणग्याई
तै देख्द ही .....
बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
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में पूर्व प्रकाशित -सर्वाधिकार

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

अब मेरो पहाड़ा मा
अब मेरो पहाड़ा मा
कन चलो इन फैशण
स्कर्ट छोटू व्हैग्या
जिंस व्हैग्या टाइट टनाटन
अब मेरो मुल्का
छोरों का काना का कुंडला
बाल व्हैग्या रंग बिरंगा
दुरुल्या व्हैकि टनाटन
शरम लाज बेचिकि
सरया बजारा घूमना छना छन
ऊंचा सैंडिल गलोड़ी लाला
नौनी व्हैगे अब टनाटन
रोज रोज कैरी कि न्यू फैशण
पहाड़ी हरेगे आपरी पछाण
बुढ्या खोलो रैगै अब
जवानु कु देखि कि ये चल चलण
बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

अब की बार इनि मिलोंलू
अब की बार इनि मिलोंलू
ये सुख थे इन दुःख का दगडी
ऐ बार ऐजा ये निंदी इन आँखों मा
बिगेर आँसूं ढोलिकी
अब की बार मिलोंलू ......
तरसलु ये सरीर मेरो
किले हुन ये मेरो जियू थे तर्पणू
कन और्री कब बरखली ये बरखा
वो बीजाणु कैथे हुलु हाक देणु
अब की बार मिलोंलू ......
मि त अब यख इनि गिजि गियूं
बल अब रेगे रे बाकि तेरो गिज्याणू
तेरो आणु इनि आणु व्हाई सदनी कू
मि देखदी रेग्युं रे बस सदनी तेरो जाणू
अब की बार मिलोंलू ......
अपरी मा ही ग्याई रे
कैल विंथे अब तक देख ना पाई रे
सुकी सुकी डाली वा
द्वि चार ही हैरा पाता बस गिण पाई रे
अब की बार मिलोंलू ......
बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

डूबिगी पुराणि टीरी.....
यीं पत्रिका तैं पढ़िक,
पुराणि टिरी की,
भौत याद आई,
धुनारु की बस्‍ती थै,
पैलि पुराणि टिरी,
गोरख्‍यौं कू राज नि होन्‍दु,
हमारा गढ़वाळ मा,
पुराणि टिरी कू,
25 दिसंबर,1815 कू,
राजधानी का रुप मा,
जल्‍म नि होन्‍दु......
-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
दिनांक 20.11.2015

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

मेरा ब्‍लाग फर आप मेरी या कविता पढ़ि सकदा छन।
घड्याळु .....
लगण लग्‍युं छ घर मा,
घड्याळा आैण लग्‍युं छ,
एक बड़ु सी लगोठ्या मेरु,
देव्‍ता का नौं कू ल्‍हयुं छ....