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Kumauni & Garhwali Poems by Various Poet-कुमाऊंनी-गढ़वाली कविताएं

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 05, 2011, 12:00:34 AM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

पलायन और बग्वाल
बग्वाल की इस चकाचौंध मै
आज याद आ रही है मुझे बग्वाल मेरे गांव की
प्रवासी हुआ हूँ जब से
नहीं देखी मैने बग्वाल मेरे गांव की
यादों के इस झरोखे से
आँखों के प्रतिबिम्ब में दिख रही है बग्वाल मेरे गांव की
वो वीरान पड़ा मेरा मकान कह रहा है मुझसे
रोशन कर मुझे और देख फिर से बग्वाल मेरे गांव की
तिलक कर मेरे द्वार द्वार
तेरे शहर में कहाँ ये प्यार आ फिर देख बग्वाल मेरे गांव की
तेरी वाट जोह रहा है ये चौक
जहाँ कभी रंगोली सजा मनाई थी तूने बग्वाल मेरे गांव की
हल्दी, मिटटी, धूप अगरबत्ती की सुगंध के बीच
मुझमे समाई लक्ष्मी का पूजन कर देख फिर से बग्वाल मेरे गांव की
उम्मीद मै जी रहा हूँ होते रोशन घरों को देख रहा हूँ
कभी तो जगमग कर मनाऊ फिर से बग्वाल मेरे गांव की
क्या रंग है उस ईंट गारे व् धुएं की बग्वाल मै
रौशनी में चमकते पत्थरों के घरों संग देख फिर से बग्वाल मेरे गांव की
जगमग दीयों और चाँद सितारों से सजा है आँगन मेरा
स्वर्ग के इस आलौकिक आनन्द में देख फिर से बग्वाल मेरे गांव की
जब से गया है तू मेरी बग्वाल भी रूठी है मुझसे
आ खुशियों की फूलझड़ी जला देख फिर से बग्वाल मेरे गांव की
बग्वाल की इस चकाचौंध मै
आज याद आ रही है मुझे बग्वाल मेरे गांव की
वो वीरान पड़ा मेरा मकान कह रहा है मुझसे
रोशन कर मुझे और देख फिर से बग्वाल मेरे गांव की
@सर्वाधिकार
DWARIKA CHAMOLI
DELH

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Darshan Singh
October 16 at 8:34am

सरस्वती वंदना

सरस्वती माँ सरस्वती, दैणी ह्वै जै माँ भगवती।

जौं बाटा जौंलु माँ सै बाटा दे,

बाटौं थैं म्यारा सौंगा कैदे।

ऊँचा उकाळ्यूं नीसा कैदे,

बाटौं म छोया नवळा देदे।। सरस्वती माँ.......

अंध्यारों म छौं माँ उज्यळू दे दे,

मुख मीकु मीठू मयळू दे दे।

ल्यखण म रौंलु, घुमीण न दे,

कलमा की से मेरि सुखण न दे।।सरस्वती माँ.....

मान दे माता तू ग्यान दे,

ग्यान कु बान, तू ध्यान दे।

ध्यान म रैकी रिबडी जौंलु,

बीमा बजै क चितळू कैदे।। सरस्वती माँ.......

जब बी सुमरिलु माँ तू चम ऐ,

म्यारु मुंड मुख म झम बैठि जै।

नौ रंग दे माँ नौ रस दे,

म्यारा उत्तराखंड्युं थै तू जस दे।।

सरस्वती माँ सरस्वती, दैणी ह्वै जै माँ भगवती।।

सर्वाधिकार सुरक्षित @दर्शनसिंह रावत "पडखंडाई "
दिनांक -16/10/2015

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

इनी भलि लगे
देकी तेर मुखडी इनी भलि लगे मिथे
ना भलि लगे मिथे अब अब कै कि मुखडी
देकी तेर मुखडी हो हो अ
बिसरि गयूं मि मैसे कै गौं बाटू जाणु
हर्ची गयूं मि मैसे क्ख्क मेरु ठीकाणु
देकी तेर मुखडी हो हो अ
ह्यूंद पडि इनी पैलि बारि त्यु डांडीयूँ माथा
ऊ बि लगणु आयू छुईं तेर ग्लुड़ी दगड आजा
देकी तेर मुखडी हो हो अ
बिगरेली मुखड़ी मा सजे वा कनुडी कि झूमकि
हाथा मा फूल ले बैठी वा हँसेली दंतु कि पंक्ति
देकी तेर मुखडी हो हो अ
चूड़ी का गोल गोल नि सब करयुं च घोल
ब्याल आज भोल मा मेर ब्योली बल तेंन ही हुँण
देकी तेर मुखडी हो हो अ
देकी तेर मुखडी इनी भलि लगे मिथे
ना भलि लगे मिथे अब अब कै कि मुखडी
देकी तेर मुखडी हो हो अ
एक उत्तराखंडी
बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

गाँव बचौला (घनश्याम रतूड़ी 'शैलानी' की कविता )
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रचना -- स्व. घनश्याम रतूड़ी 'शैलानी ' ( जन्म - 1936 , चरीगाड , केमर , टिहरी गढ़वाल )
Poetry by - Ghanshyam Raturi 'Shailani'
( विभिन्न युग की गढ़वाली कविताएँ श्रृंखला )
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इंटरनेट प्रस्तुति और व्याख्या - भीष्म कुकरेती
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हिटा दिदी , हिटा भुल्यौं , चला गौं बचौला।
दारु को दैंत लग्यूं तै दैंत हटौला
टिंचरी को भूत लग्यूं , तै भूत भगौला।
घर हमारा उजड़ी गे छोरि छोरा बिगड़ि गे
रणचंडी बण जौला दिदी तै दैंत मिटौला
टिंचरी को भूत लग्यूं , तै भूत भगौला।
टिंचरी की भरमार च ग़ाफ़िल सरकार छ
क़ानून रिशवतखोरि की तौन सणि बतौला
टिंचरी को भूत लग्यूं , तै भूत भगौला।
गरीबी को पार नी क्वी भि रोजगार नी
दारु को व्यापार बड़्यूं क्या खौंला क्या लौंला
टिंचरी को भूत लग्यूं , तै भूत भगौला।
यख बदरी केदार छ गंगा जमुना द्वार छ
बिगड़ी गये पढ्याँ लिख्याँ तौं सणि बतौला
दारु को दैंत लग्यूं तै दैंत हटौला
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( साभार --शैलवाणी , अंग्वाळ )
Poetry Copyright@ Poet
Copyright @ Bhishma Kukreti interpretation if any

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

अब की बार इनि मिलोंलू
अब की बार इनि मिलोंलू
ये सुख थे इन दुःख का दगडी
ऐ बार ऐजा ये निंदी इन आँखों मा
बिगेर आँसूं ढोलिकी
अब की बार मिलोंलू ......
तरसलु ये सरीर मेरो
किले हुन ये मेरो जियू थे तर्पणू
कन और्री कब बरखली ये बरखा
वो बीजाणु कैथे हुलु हाक देणु
अब की बार मिलोंलू ......
मि त अब यख इनि गिजि गियूं
बल अब रेगे रे बाकि तेरो गिज्याणू
तेरो आणु इनि आणु व्हाई सदनी कू
मि देखदी रेग्युं रे बस सदनी तेरो जाणू
अब की बार मिलोंलू ......
अपरी मा ही ग्याई रे
कैल विंथे अब तक देख ना पाई रे
सुकी सुकी डाली वा
द्वि चार ही हैरा पाता बस गिण पाई रे
अब की बार मिलोंलू ......
बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

ऐ भुंदरा बौ
ऐ भुंदरा बौ
तू कख कख गौ
कख च तेरो गांऊं
मि थे बथे तू जौ
ऐ भुंदरा बौ ....... ये मेरी बौ
कनि तेरि छुई चा
थमेनि नि अब थमेनि
तेर बिगर ऐ बौ
ऐ मजलिस नि भरेनी
झट दौड़ी औ
ऐ भुंदरा बौ ....... ये मेरी बौ
कुच ना कुच
तू ऐमा जोड़ देंदी
अपरू छुई तू
सब मा थोप देंदी
जल्द लपोड़ी औ
ऐ भुंदरा बौ ....... ये मेरी बौ
तेर बक बाकि
सुन सुनेकी अब
कैकु जी नि भरौंदी
नींदि नि आंदी बौ
अब मुंड मलेसी जौ
ऐ भुंदरा बौ ....... ये मेरी बौ
बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

रगबग सी हुयुं छौं
दिल्ली की घिमसांण मा
धक्का मुल्कों मा रक्सां
हुयुं छौं ईं दिल्ली मा
फोन पर ही बात हुंदी
अपणु से यीं दिल्ली मा
मिलणा कु तो टैम ही नी
कैमा ईं दिल्ली मा
डबख डबख डबखंणु छौं
चकौर सी दिल्ली मा
कबेलदारी हुयीं घर
नौकरी खुज्यांणु छौं दिल्ली मा
गौं क तिबाट चौबटों की
याद आंणी दिल्ली मा
रगाबगी हुयीं दीदों
मैकु लाल बत्युं मा
कभी चांदनी चौक कभी
कनाट प्लैश फुटपाथों मा
कभी डोर टु डोर छौं जाणु
समान बिचंण कुन दिल्ली मा
रगबग सी हुयुं छौं
दिल्ली की घिमसांण ....
सर्वाधिकार सुरक्षित@सुदेश भटट(दगडया)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

कविता नं-36
खैरि खांण फर लग्युं छों
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खैरि कु ज्वाग च दिदौं खैरि खांण फर लग्युं छों,
मुल्क छोड़िकि परदेस मा टपरांण फर लग्युं छों..
अपिड़ि जल्मभूमि अपड़ा पहाड़ से मुख मोड़िकि,
स्यकुन्दा का बाना से मुख लुकांण फर लग्युं छों..
10x10 कु कमरा मा फरर्कणा की जगह नी च,
कूड़ि ह्वेकि भि मुसद्वव्लंणों लुकंण फर लग्यों छों..
छैन्दी डोखरि-पुंगड्योंओं, सारि-सगोंड्यों ह्वेकि,
यख 7-8 हज़ार मा टीका फोड़ण फर लग्युं छों..
कज्यांण बणींच अँगरेज़, कतै नि पैटणी च घौरा कु,
अर् मेरी हुयीं च कु-दशा, दिन रात डुट्याल बण्युं छों..
बल भै तुम जाणा छावो त जाओ अर् राओ वे घार,
मि तुम्हरु बौलु सराणाकु, खैरि खांणाकु नि बण्युं छों..
बस अब्त जन-तनकै दिन कटै छुंवी छि दिदौं,
सैंणी कि भि कुबाणि टुप्प सैंण फर लग्युं छों..
कुल झूठा सुपन्यां अर् सिकासैरियों का पैथर
जिंदगी का नौं फर घुंडा घिसंण फर लग्युं छों..
बस ख़ैरि खांण पर लग्युं छों.....
©® सर्वाधिकार: धर्मपाल रावत
ग्राम- सुन्दरखाल, ब्लॉक- बीरोंखाल
जिला- पौड़ी गढ़वाल-246169.
14.11.2015

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

आज कु शीर्षक हे दारु..
मरन म दारु बचंण म दारु
हैंसद ख्यल्द अर रुवांद मा दारु
ब्यौ मा दारु म्याल मा दारु
घाटम मड्यों तक चयैंणी दारु
हे दारु हे दारु हे दारु हे दारु
भैंसी बियायी त पैली दारु
बल्द लायी त पिलाई दारु
बेटी लखांण त लखनर कुन दारु
ब्वारी आयी त समधी कुन दारु
हुलेरु कुन त छैयी दारु
अब त डुलेरु कुन भी दारु
फड पकांण त पैली दारु
हल लगांण त तब भी दारु
हे दारु हे दारु हे दारु हे दारु
गुरज्युं कुन भी चयैंणी दारु
बामण जजमान सबकुन दारु
पुजा पिठै मा पैली दारु
हंत्या घड्यलु मा ह्वाई दारु
कौ कार्यों मा यैथर दारु
नामकरण मा जरुरी दारु
रामचंद्र नौ धर्यांणु
पेलम पेल कैकी दारु
हे दारु हे दारु हे दारु हे दारु
देबी दयबतों की जगाम
दारु ही अब द्वास लगली
थुल्युं न ही कीटी .कीटी...........
सर्वाधिकार @सुदेश भटट (दगडया) स्थान नाम चरित्र काल्पनिक मात्र है

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

कविता उत्तराखंड की बालकृष्ण डी ध्यानी
अब मेरो पहाड़ा मा

अब मेरो पहाड़ा मा
कन चलो इन फैशण
स्कर्ट छोटू व्हैग्या
जिंस व्हैग्या टाइट टनाटन

अब मेरो मुल्का
छोरों का काना का कुंडला
बाल व्हैग्या रंग बिरंगा
दुरुल्या व्हैकि टनाटन

शरम लाज बेचिकि
सरया बजारा घूमना छना छन
ऊंचा सैंडिल गलोड़ी लाला
नौनी व्हैगे अब टनाटन

रोज रोज कैरी कि न्यू फैशण
पहाड़ी हरेगे आपरी पछाण
बुढ्या खोलो रैगै अब
जवानु कु देखि कि ये चल चलण

बालकृष्ण डी ध्यानी
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