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Kumauni Holi - कुमाऊंनी होली: एक सांस्कृतिक विरासत

Started by पंकज सिंह महर, January 04, 2008, 02:44:23 PM

dayal pandey/ दयाल पाण्डे

सिद्धि को दाता, विघ्न विनाशन,
होली खेलें, गिरिजापति नन्दन ।२।
गौरी को नन्दन, मूषा को वाहन ।२।
होली खेलें, गिरिजापति नन्दन ।२। सिद्धि...
लाओ भवानी अक्षत चन्दन।२।
तिलक लगाओ गिरजापति नन्दन,
होली खेलें गिरजापति नन्दन ।२। सिद्धि....
लाओ भवानी पुष्प की माला ।२।
गले पहनाओ गिरजापति नन्दन,
होली खेलें गिरजापति नन्दन ।२। सिद्धि....
लाओ भवानी, लड्डू वन थाली ।२।
भोग लगाओ, गिरजापति नन्दन,
होली खेलें गिरजापति नन्दन ।२। सिद्धि....
गज मोतियन से चौक पुराऊं ।२।
होली खेलें गिरजापति नन्दन ।२। सिद्धि....
ताल बजाये अंचन-कंचन ।२।
डमरु बजावें शम्भु विभूषन,
होली खेलें गिरजापति नन्दन ।२। सिद्धि....

पंकज सिंह महर

एक होली-

नदी जमुना के तीर,
कदम्ब चढि कान्हा बजा रयो बांसुरिया
नदी जमुना----
काहे को यो बीन
कदम्ब चढि----
हरे बांस की बनी है बांसुरिया
सोने की यो बीन
कदम्ब चढि-----
कै सुर की तेरी बनी रे बांसुरिया,
कै सुर की यो बीन,
कदम्ब चढि-----
नौ सुर की ये बनी रे बांसुरिया,
द्वि सुर को यो बीन,
कदम्ब चढ़ि-----
कौन शहर की बनी रे बांसुरिया,
कौन शहर को बीन,
कदम्ब चढि-----
दिल्ली शहर से बनी रे बांसुरिया,
आगरा को यो बीन,
कदम्ब चढि------
कै मोल की तेरी बांसुरिया,
कै मोल की तेरी बीन,
कदम्ब चढि------
लाख टका की मेरी बांसुरिया,
अनमोल को यो बीन
कदम्ब चढि...........................।

पंकज सिंह महर

कीजै कौन उपाय भवन आये न कन्हाई,
कीजै कौन........
चैत मास गये त्यागि श्याम मोह, झूठी प्रीत लगाई,
रितु बैशाख अनल तन दाहे, जेठहू विरहा सताई,
रहूं कैसे प्रान बचाई,
छायो आषाढ मेघ और कोयल कुहू-कुहू शब्द सुनाई,
सावन रिम झिम बरसत बरसत निसदिन, भादों घटा रही छाईए,
चहुं दिशि जल समुदाई,
कीजै कौन............
कवार कृष्ण अगहन ना आये, कार्तिक हिमु रितु आई,
कवार न जगे दीप दिवाली, अगहन मोहे ना सुहाई,
रखूं कैसे प्रान बचाई,
कीजै कौन-------
पूस वियोग शीत अति दुःख माघ विरह अधिकाई,
फागुन लौटि जो श्याम घर आये, खेलूंगी फाग सुखदाई,
अबीर की झार उड़ाई,
कीजै कौन.........
सुर नर मुनि जाकी आस निहारत, बाहर मास बिताई,
लौट गये जब अंतर्याअमी, प्यारी को गले से लगाई,
बिरह की आग बुझाई,
कीजै कौन......................।

पंकज सिंह महर

हां, हां, हां मोहन गिरधारी,
ऐसो अनाड़ी चुनर गयो फाड़ी,
हां, हां, हां मोहन......
ओ हो, हंसी-हंसी दे गयो गारी,
मोहन गिरधारी,
हां, हां, हां, मोहन.......
चीर चुराय कदम्ब चढि बैठो,
पातन जाय छिपोई,
मोहन गिरधारी,
हां, हां, हां मोहन.......
बांह पकड़, मोरि अंगुली मरोड़ि,
नाहक राड़ मचाय,
मोहन गिरधारी,
हां, हां, हां मोहन.......
दधि मेरो खाय, मटकि मेरि तोड़ी,
हांसी-हंसी दे गयो गारी,
मोहन गिरधारी,
हां, हां, हां मोहन.......
हरी-हरी चूड़ियां पलंग पर तोड़ी,
नाजुक बइयां मरोड़ी,
मोहन गिरधारी,
हां, हां, हां मोहन.......
आवन कह गये, अजहूं न आये,
झूठी प्रीत लगाई,
मोहन गिरधारी,
हां, हां, हां मोहन.......
सांवल रुप, अहीर को छोरो,
नैनन की छवि न्यारी,
मोहन गिरधारी,
हां, हां, हां मोहन.......।

पंकज सिंह महर

तू बड़ि भाग सुहाग भरि,
बृजराज तेरे घर आवत हैं,
सनक सनंदन और जगबंदन,
शेष पार नहीं पायो है री,
तू बड़ि भाग..............
गुदकर पूल सुमन को गजरा,
हरषि-हरषि पहनाया है री,
तू बड़ि भाग.............
तू अपनो श्रृंगार करत जब,
हरि दर्शन को आयो है री,
तू बड़ि भाग.................
ब्रह्मा वेद पढ़े तेरे द्वारे,
शंकर ध्यान लगाया है री,
तू बड़ि भाग..............।

पंकज सिंह महर

हरे पंख मुख लाल सुवा, बोलिया झ्न, बोले बागा में,
बोलिया झन, बोले बागा में,
कहां से आये बादल रेखा, कहां भयो घनघोर सुवा,
बोलिया झन.............
पूरब से आये बादल रेखा, पश्चिम भयो घनघोर सुवा,
बोलिया झन...........
घन-घन गरजे बादल रेखा, रिमझिम बरसे मेघ सुवा,
बोलिया झन...........
इत झन बरसे, उत झन बरसे, पिया गये परदेश सुवा,
बोलिया झन...........
काहे की भीगे, सिर की चुनरिया, सइयां की मलमल पाग सुवा,
बोलिया झन...........
कहां सुखाऊं सिर की चुनरिया, कहां बलम की पाग सुवा,
बोलिया झन...........
धूप सुखाऊं सिर की चुनरिया, छाया पिया की पाग सुवा,
बोलिया झन...........
काहे के हाथ पतिया लिख भेजूं, काहे के हाथ संदेश सुवा,
बोलिया झन...........
कागा के हाथ पतिया लिख भेजूं, पंछी के हाथ संदेश सुवा,
बोलिया झन...........
काहे फाड़ि के कागज करिहौं, काहे पोंछि के स्याही सुवा,
बोलिया झन...........
अंचल फाड़ि के कागज बनाऊं, कजरा पोंछि के स्याही सुवा,
असुवन को स्याही सुवा, बोलिया झन बागा में,
बोलिया झन...........। 

पंकज सिंह महर

एक मोती दो हार, हीरा चमकी रह्यो,
चमकी रह्यो आधी रात, हीरा चमकी रह्यो,
एक मोती दो हार........
रोहणी के बुद्धवार, भादों की रात में,
कृष्ण भयो अवतार, हीरा चमकी रह्यो,
एक मोती दो हार........
बारी चौकी कंस राजा की,
चौंकी गये सब सोई, हीरा चमकी रह्यो,
एक मोती दो हार........
बसुदेव-देवकी की बनदी खुली गयो,
बजरा को केवाड़, हीरा चमकी रह्यो,
एक मोती दो हार........
लेकर बालक सिर पै धरो है,
चल जमुना के तीर, हीरा चमकी रह्यो,
एक मोती दो हार........
पीछे से बनराज गरजे,
आगे जमुना अथाह, हीरा चमकी रह्यो,
एक मोती दो हार........
आरों मेघ भादों बरसे,
नदियां चढ़ी असमान, हीरा चमकी रह्यो,
एक मोती दो हार........
कृष्ण जी ने चरण छूआये,
यमुना हो गई थाह, हीरा चमकी रह्यो,
एक मोती दो हार........
आगे जाबे पीछे के ठहरे,
यमुना पड़ गई रेख, हीरा चमकी रह्यो,
एक मोती दो हार........
जाबे तो आगे पार उतर गये,
हो गई जै-जै कार, हीरा चमकी रह्यो,
एक मोती दो हार........
देवकी के गोद में जन्म लियो है,
यशोदा गोद खिलाये, हीरा चमकी रह्यो,
एक मोती दो हार........।

पंकज सिंह महर

जल भरन चली दोनों बहिना,
कहां से आई देवकी बहना,
कहां से आई यशोदा,
जल भरने......
मथुरा से आई देवकी बहिना,
गोकुल से आई यशोदा,
जल भरने......
क्या दुःख लागो देवकी बहिना,
मुझको बता दे बहिना
जल भरने......
सात गरभ मेरे कंस ने मारे,
अब आयो भादो महिना,
जल भरने......
ये बालक तेरो जुग-जुग जीवैं,
अब आयो कंस का मरना,
जल भरने......।

पंकज सिंह महर

गुमानी पन्त जी द्वारा लिखित एक होली-

मोहन मन लीन्हों, बंसी नागिन सों, मुरली नागिन सों,
केहि विधि फाग रचायो, मोहन मन लीन्हों,
मुरली नागिन सों, बंशी नागिन सों,
ब्रज बांवरो मोसे, बांवरी कहत है,
अब हम जानी, बांवरो भयो नन्दलाल,
मोहन मन लीन्हों..........
मीरा के प्रभु गिरधर नागर, कहत गुमानी,
अन्त तेरो नहीं पायो, मोहन मन लीन्हों।

पंकज सिंह महर

दो छोटी खड़ी होलियां-

१- तू मत जा गोरी पनियां भरन को,
प्रेम को जाल लगाया है री,
तू मत जा गोरी.......
पनियां भरन को चली श्याम सुन्दर,
सोने का गड़ुवा गढ़ाया है री,
तू मत जा गोरी.........
ले गडुवा यमुना जी में डारो,
कॄष्ण तमासे को आयो है री,
तू मत जा गोरी............।

2- दइया मैंने कछू न करि,
मोरे सांवरे न गारी दई,
गारी पै गारी, ताने पे ताना,
एक न लाख कही,
दइया मैंने........
अबीर गुलाल के थाल भरे हैं,
केसर रंग बही,
दइया मैंने.......
आप सांवरिया पार उतर गये,
मैं तकति ही रही,
दइया मैंने..........।