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Poems Written by Shailendra Joshi- शैलेन्द्र जोशी की कवितायें

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, January 25, 2013, 10:21:23 PM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

प्रेम पत्र है प्रेम नहीं

गैरसैण विधान सभा सत्र है पर राजधानी नहीं

यार जब सब कुछ ही बन रा है वहा

विधान भवन विधायक आवाश का हो चुका शिलान्याश 

एक पत्थर राजधानी के नाम भी रख देते

हे पत्थर दिलो गैरसैण मे

जनता जैसे  से ही बिसर जाती इन मुददो को

और मान  बैठती है चलो देहरादून ही सही पर विकाश होना चाहिये

जले मे नमक छिडकना कोई सीखे तुम से

तुम को देगे भी नहीं गैरसैण सिर्फ ललचायेगे

राजनीती की रोट्टीया सेखनी है

कोई न कोई तवा चाहिये

सरकार के इरादे लगते है हवा

गैरसैण राजनीती करने का बन गया तवा

रचना शैलेन्द्र जोशी

   
प्रेम पत्र है प्रेम नहीं

गैरसैण विधान सभा सत्र है पर राजधानी नहीं

यार जब सब कुछ ही बन रा है वहा

विधान भवन विधायक आवाश का हो चुका शिलान्याश 

एक पत्थर राजधानी के नाम भी रख देते

हे पत्थर दिलो गैरसैण मे

जनता जैसे  से ही बिसर जाती इन मुददो को

और मान  बैठती है चलो देहरादून ही सही पर विकाश होना चाहिये

जले मे नमक छिडकना कोई सीखे तुम से

तुम को देगे भी नहीं गैरसैण सिर्फ ललचायेगे

राजनीती की रोट्टीया सेखनी है

कोई न कोई तवा चाहिये

सरकार के इरादे लगते है हवा

गैरसैण राजनीती करने का बन गया तवा

रचना शैलेन्द्र जोशी

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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Shailendra Joshi

आखिर कब तक और कब

य़ू ही होता रहेगा

द्रोपदी से लेकर दामिनी तक का चीरहरण होता रहेगा

और मानव का चरित्र हरण भी होता रहेगा

द्रोपदी की लाज बचाली कृष्ण ने

पर आज द्रोपदियो की लाज बचायेगा कौन सोचो जरा

कब तक हम गूंगे बैरे और तामसबीन बन ते राहे गे

मारो लाज के सौदागरो को अब ज़ुल्म हो गया बहुत

कविता शैलेन्द्र जोशी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

जब तू चले गोरी बसंत आ जा ये
रे चले गोरी मोसम गर्मियों का आ जा ये
जैसे हिले टैहैनी डाली यो की हवा मे
वैसी हिले तो रि पतली कमरिया
कमरिया हिले तो क़यामत धय जामने मे
जब तू चले गोरी मोसम बरसात का आ जा ये
जब तू चले गोरी मोसम जड़ो का आ जा ये बरफ गिर जा ये पहाड़ो मे
जब तू चले गोरी तो दुनिया रुक जा ये
जब तू चले गोरी तेरी चाल देखे जमाना
चांदनी की यामानी रातो मे गजगामिनी की चाल चले तू
तेरी चाल की सज मे तेरी नित्तबनिया देखे जमाना
अगर तेरी चाल का हो पर्दरसन तो हम रैम बन जा ये
तेरी कदमो कदमोट उस वक़्त इस रैम की धड़कन तेज कर
स्वापिन सुन्दरी पागल हो जा ये जमाना
कविता शैलेन्द्र जोशी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

तुम
का लेज
   मे आइ हो
                         नये   बसंत बुरांश  सि
तुम हो फ्रासेर  स्टुडेंट  फर्स्ट इयरकी
तुम  पे लियर  चड़ी है नय जवानी की
अरे नये नौजवान तो अजमाना चाते है  अपनी किस्मत
तुम से इश्क लड़ाने के ली ये नये नये  फोरुमुले  खोज राय है
  अरे बुढे अदैर   प्रोफसिर लाक्चेरार 
    अपनी  किस्मत को रो  रय है
बीमार कर ने के लिये अशिकको को जब हुसून की ये बीमारी पैदा हुई
अरे उस दउओर   काल  मे ये एक्स्पीरे  डेट हुवे
क्या जूनियर क्या  सीनियर सब
धयेक  रय है  इस  हुसून की जवानी की फिगर   .
                                                                 कविता  शैलेन्द्र जोशी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

कै की होली इनी स्वाणी रचना
मेरा सब्द मेरा बोल  मेरा आंखर
         सब ठगे  का ठगाया रै गिन
छोरी तेरा रूप का ऐथर
निथर मिन कानी कानी बांधो मा रचा छिन
                    गीत भला भला
कै की होली इनी स्वाणी रचना
      छंद आलंकर भी सोचाना
तेरा रूप देखी छंदो ते छंद नि आणू
कलम कंठ का सरोकार एक बार
  देखी देला  तेरा रूप ज्यूत
फूल चाँद सूरज की उपमा
    बिसरी की तेरी ही उपमा देला
कना कना फोरमेट मा धालिन मिन गीत कविता
    तेरा रूप देखी का ऐथर इ कवी वे गया रीता
                           कविता शैलेन्द्र जोशी

jagmohan singh jayara

युवा कवि जोशी जी आपकी  "मेरा पहाड़" पर उपस्थिति देखकर मेरा
कविमन बहुत खुश हुआ। 

कथ्गा  प्यारू पहाड़ हमारू, मन सी गुणगान करा,
कविवर अपणि कलम सी, जथगा हो बखान करा,

मेरु ज्यू करदु  छ

देवभूमि उत्तराखंड तैं देखौं, उड़िक अनंत आकाश सी,
नदी पर्वतों तैं निहारौं, जैक बिल्कुल पास सी

पुनर्जन्म अगर हो प्रभु, देवभूमि उत्तराखंड में हो,
तन भले ही बदल जाये, लेकिन मेरा कविमन हो

पुनर्जन्म में अगर बाघ बनु , उत्तराखंडियौं को नहीं खाऊँगा,
जाकर पहले देहरादून में, नेताओं को पहाड़ भगाऊँगा,

फिर आबाद होगा पहाड़, पलायन का पाप छूट जाएगा,
लौटेंगे मेरे पहाड़ के लोग, विकास का सैलाब आएगा,

पूछो हर प्रवासी उत्तराखंडी से, क्या अपने घर गाँव से दूर,
ख़ुशी का अहसास करते हो,
या जिन्दा रहते हुए,
जीते हो या मरते हो,
या दुखों को अपने दिल में,
जिंदगी जीने के लिए,
दिन रात दफ़न करते हो?
-जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु:
"मेरा पहाड़" बहुत दिनों के बाद 25.1.2013
सर्वाधिकार सुरक्षित 





 



एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

तुझे देख लगता है मुझे य़ू रचना - शैलेन्द्र जोशी


तुझे देख लगता है मुझे य़ू

बस देखता ही  रहू य़ू

जीवन मे न होते हुए भी तू ही तू

ओ मेरी रम्या रूह

तुझे देखा मैने जब

औरों को भी देखा जब

तुझे देखकर हुई चाहत कीऊ

बाहरी कपट नहीं आन्तरिक रूह से तेरे लिये प्रेम स्रोत हुआ

मुझ चिताकर्सक  तू लगी

ओ मेरी मधुर हिर्दयी

ओ मेरी स्वप्न सुंदरी

रचना शैलेन्द्र जोशी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


नया साल मे क्या नया
उमग़ ,रंग ,जंग ,ढंग बोलो क्या नया
या सिर्फ कैलेंडर है नया
हवा नयी लहर नयी
शहर की सुबह नयी शहर का सहर नया  क्या है नया
चलो ये सब तो नया  हो जायेगा
पर जनाब नये साल माय नज़र को भी नया किया जाये
जो धुंद लगी है आँखों मे उसे साफ किया जाये
नया साल मे कुछ तो नया किया जाये
कविता शैलेन्द्र जोशी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Poem by - Shailendra Joshi

चला दी पेटा दी हिटा दी हे जी
मेला लगियु चा जी सैणा श्रीनगर मा जी
मिते चौपड़ वा गोला बाज़ार की घुमादी
बतियों कु मेला चतुद्रशी वैकुंठ कु मेला जी
भक्तो की भीर जी
पुत्र आश मा औत सौजडियो कु खाडू दियू जी
चला वी कमलेस्वर मा जी
मिते फौंदी मुल्य्दी  चूड़ी बिंदी लादी
भली  क्रींम पाउडर बुरुंसी लिपस्टिक मेला की समूण मा ल्या दी
मिते जादू सर्कस बन बनी का खेल तमासा दिखा दी
मिते चर्खी मा बैठे की  घुमा दी
मिते चौपड़ वा गोला बाज़ार की घुमा दी
मिते  सैणा श्रीनगर ले जा दी
                                 कविता शैलेन्द्र जोशी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


कार्तिक की आमवासिया को हुवा था राम का अवध मे आगमन 
अवध वासी थे इस रात को गोरी पूर्णिमा बानाने मे तत्पर
दीप बती की परम्परा से चल आज दिवाली हुवी दामिनी दीपो की बाला
फूलो की माला
रंगीन रंगोली मिठाई की मिठाश
बच्चो के हाथ सजी फूलझड़ी से आग लग तड तड करती लालबती की लड़ी
अनार के बहुछार से
मेल जोल के प्यार सजी दिवाली
कविता शैलेन्द्र joshi