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Poems Written by Shailendra Joshi- शैलेन्द्र जोशी की कवितायें

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, January 25, 2013, 10:21:23 PM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720



       

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  • Shailendra Joshi
  • ऋतू बसंत छाया है
    धरती उगल रही है फूल
    कैसी सुंदर ऋतू बसंत
    मिटी धूल मे  भी सुगंद
    हिर्दय मे छाया है ऋतू बसंत
    धुप हो गयी कुछ अब गुनगुनी
    रंगों से रंगी है धरती
    खेल रही है होली रंग रही तन बदन
    छाया सारा जीवन ऋतू बसंत
    रचना शैलेन्द्र जोशी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बज रहे है शादी के ढ़ोल

चमक रहे वर वधू के कपोल

हाय कैसे माहौल

ये शादी के माहौल

बज रहा कही रॉक एंड रोल

कह सिंगार संग बैठी है नार

चल रहा ढोलक संग उनका नाच

सब के अलग अलग मिजाज

कही बज रहा है बैंड बाजो का साज

किसी को आती नहीं लाज

कोई आता नहीं शैतानियो से बाज

कही लग रहे बडे बूढो तक के किस्से

खुल रहे बातो ही बातो मे जीवन के बीते हिस्सै

कही दिखा रही औरते एक दुसरे को साड़ी

कही चल रही गीतो की अंताछरी

सजी है लडकिय ऐसी जय से आशमान से उतरी हो परि

सखिया चहका रही है सुन री सुन री के मीठे बोल से शोर मचा रही है

कोई राघनी किसी राघ को ढूंड रही है

कोई राघ किसी राघनी को ढूंड रहा है

नये संग संगनी बन रहे है

बरसो से ना मिले रिश्तेदार भी ऐसे माहौल मे मिल रहे है

पाक पकवान पक रहे है

बच्चे सिर्फ मीठी चीजों पर देखा राहे है

रच रही हाथो मे मेहन्दी

झुम रहे झाजी

कई जाम मे जाम

कोई लड़ रहा ख़ामोखाम

चल रहे फेरे

वर वधू के सिर पे सेहरे

चमक रहे सभी के चेहरे

चल रहा पंडित का मंत्र

कोई नाच गाना कर रहे धवनि यंत्र

हाय कई महौल तंत्र

हाय जीवन के ये कई से महौल

ये शादी कई महौल

रचना शैलेन्द्र जोशी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

हे इस्कुलिया बांधा रचना शैलेन्द्र जोशी
by Shailendra Joshi on Tuesday, February 19, 2013 
जख भी तू जांदी दग्दियो कु दगडा तुवैकू चैदू
हे इस्कुलिया बांधा
कुई बैख देखी झट खौली जांदी
मन मा कुछ नि रैंदु फैर मूल हैस जांदी
हे इस्कुलिया बांधा
बिराना पीठी का ठंगरा मा लगुली सी छाई तू
बथोउ मा हलंदी फौंगी रे तू
जैन जिथे ढलकै उथै ढलक जांदी तू
बिना मेकप का जुनी सी दमकणी छाई तू
फयोली सी मुखड़ी मा  रिबन का दुई फूल खिलिया दुई लटलियो मा
गर मीठी नींद मा
कचि उमर मा पकी उमर का सुपनिया देखती तू हज़ार
बिखरा लटुला जुनी मुखडा मा
कालू काजल पस्यु मा
गलोड़ी मा बादल सी घिरुयु
ना चदरी ओदणु कु सगोर
लाज से बैफीकर
फैर भी सर्म चा  भिन्डी तुवे मा इस्कुलिया बांधा
रुढ़ सी झौल तुवे मा
हुयुन्दी सी सैली चा शरारत चौमास तुवे मा
बसंत कु मौलियार छाई तू
खूबसूरती कु भण्डार
निर्मल चित कु कोठार
जवानी कु उदंकार छाई तू
है इस्कुलिया बांधा
रचना शैलेन्द्र जोशी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

जख भी तू जांदी दग्दियो कु दगडा तुवैकू चैदू

हे इस्कुलिया बांधा

कुई बैख देखी झट खौली जांदी

मन मा कुछ नि रैंदु फैर मूल हैस जांदी

हे इस्कुलिया बांधा

बिराना पीठी का ठंगरा मा लगुली सी छाई तू

बथोउ मा हलंदी फौंगी रे तू

जैन जिथे ढलकै उथै ढलक जांदी तू

बिना मेकप का जुनी सी दमकणी छाई तू

फयोली सी मुखड़ी मा  रिबन का दुई फूल खिलिया दुई लटलियो मा

गर मीठी नींद मा

कचि उमर मा पकी उमर का सुपनिया देखती तू हज़ार

बिखरा लटुला जुनी मुखडा मा

कालू काजल पस्यु मा

गलोड़ी मा बादल सी घिरुयु

ना चदरी ओदणु कु सगोर

लाज से बैफीकर

फैर भी सर्म चा  भिन्डी तुवे मा इस्कुलिया बांधा

रुढ़ सी झौल तुवे मा

हुयुन्दी सी सैली चा शरारत चौमास तुवे मा

बसंत कु मौलियार छाई तू

खूबसूरती कु भण्डार

निर्मल चित कु कोठार

जवानी कु उदंकार छाई तू

है इस्कुलिया बांधा

रचना शैलेन्द्र जोशी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

जब मै और तुम नहीं रह जाता हम हो जाता रंगों मे

तब रंग रंग नहीं लोकरंग हो जाता जीवन मे

अपनी धरती अपना आशमा लोकरंग मे

अपने फूल अपनी माटी लोकरंग मे

अपना गीत अपना संगीत लोकरंग मे

अपने शबद अपनी सम्पदा लोकरंग मे

अपनी संस्किर्ति अपनी सभ्यता लोकरंग मे

रंग जाता है हिया माटी के लोकरंग मे

                   रचना शैलेन्द्र जोशी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Shailendra Joshiposted to ना कुई संस्किर्ती संस्कार बच्णु रे

हिन्गलिस बच्याणा अब सब ओर

गढ़वाली कुमौनी कुई नि बोनू बच्याणु

थोडा थोडा गढ़वाली कुमौनी लोग बोलना बच्याणा छन

पर यूनिस्को वालो का कन्दुरो माथोडा थोडा भी नी सुनाई देनी हमरी बोली भाषा

यूनिस्को वाला बोलना मोरगी गढ़वाली कुमौनी बोली भाषा

हमन बोली नी मोरया अभी वैनटीलैटर मा छआ

गिनी चुनी साँस बंचि छन अभी दुई चार

ना ओबरा ना पांडा न धैपुरा ना चोक न डीण्ड्य़ीय़ाळा

ना पाठला ना धुर्पला जब हुवैगिन लैंटारा घर कूड़ा

हमरी माईंड वैकुलाबरी मा निछ यी सब्द सम्पदा

नोंण नि बंदी अब पौरोठा

कुटी पीसी धाण ना उर्ख्याला गंजेला

गंजेला बनी मुछीयाला हुवैगिन अब अंगार

यी अंगार सी बची चा हमरी संस्किरीती यी धार

रचना शैलेन्द्र जोशी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


From - Shailendra Joshi
नई पौध मे अधखिली कली को फूल बनते देखा है

तेरे बचकाने अंदाज मे जवानी का रंग चढ़ते देखा है

हम ने एक उम्र का अंत होते होते देखा है

और एक उम्र की शुरुवात होते होते देखी है

सब कुछ नहीं कह सकते पर कुछ देखा है

हमने तुझमे वो काल देखा है

बचपन का छुटना और जवानी का चढना

मेरी ये बाते साधरण लगे संसार को

पर हम ने तेरी तरुणायी मे सागर की गहराई को देखा है

उलझे उलझे बालो को बढाना उन को सहेजना

एक छोटी सी किशोरी मे  शोभनी नारी के गुणों का इजाफा देखा है

हम ने कुदरत की कला को तुझमे उतरते देखा है

जिस बदन के लिये उलझन थी ये आंचल

उस बदन कई हाथो को अजनबियों के सामने दुपट्टा सभालते सभालते देखा है

उभारो मे आंचल की शोभा को बड़ते देखा है

हम ने तुझे जो देखा जो स्वपनसुंदरी

जीवन के अनुभव का एक स्वाद चखा

तुझे जो  देखा आगन  मे तेरे  तो हिरदय से कविताये फुट पड़ी

रचना शैलेन्द्र जोशी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Shailendra Joshi आख्यु की बोली गात की भाषा तेरी छोरी

जुकुड़ी मा लुकाई तेरी माया का सैरा भैद खोनिच

तेरी मुखुड़ी की हैसिन नुयूतू दैयलि माया कू 

तेरु यन चीफलू मिज्याज छोरि जिंनो नि दैलू मैकू

बाली उमर मा तूवैकू माया कू यनु खेल कैन सीखे

भलु सौ सिंगार तेरु मिजयाजा मायादार

मुखुड़ी  का ऐथर लटलियो की रात

लटलियो का बीच तेरी चोर नज़र कुजणी कब लिगि दिल मेरु लुछी

माया का यनु सगोर यी बलि उमर क्या बुन भै

रचना शैलेन्द्र जोशी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

ना घार ना बौण की

लबार होंदी बस बाज़ार की

ना प्रेम की ना माया की

लबार होंदी बस मायाजाल की

जोग कू चक्रचाल मा फंसी जांदा भला लोग

हैका रुलै की मुल हैसदी लबार

ना पलिया पार की ना गंगा पार की

सिर्फ डमडमा क़िस्सों की होंदी लबार

तेरी नी हवे सकदी मेरी नी ह्वे सकदी लबार

कभि कैकी भि नी ह्वे सकदी लबार

राड़ादी चिफला बाटो मा

भला लोगो ते ठस लबार

रचना शैलेन्द्र जोशी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

तेरे इक गाल से गुलाल निकालू कोरे हाथ मे

दुसरे गाल को गुलाल करू

तोरा ही रंग तुझमे रंगू गोरी

बाज़ार मे रंग बेरंग है मिलावट का अलग डर है

बाज़ार के अंग अंग मे  छाई  महँगाई

    सस्ते मे खेलू होली तोरा रंग तुझ मे रंगु गोरी

  तेरे ही गालो से चोरु रंग

तुझ मे ही रंगु गोरी

रचना शैलेन्द्र जोशी