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Poems Written by Shailendra Joshi- शैलेन्द्र जोशी की कवितायें

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, January 25, 2013, 10:21:23 PM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बाज़ार हू  मै बाज़ार हू

हर सुबह सजता सवरता हू नवोढा दुल्हन सा

हर रात उतरती सजावट मेरी

वैसे ही जैसे नवोढ़ा दुल्हन गैहनो को उतार कर

साँभाले अलमारी मे मधुयामानी के दिन

सस्ता हू महँगा हू मै बाज़ार हू

नफा हू नुकसान हू फायदा हू इजाफा हू मै बाज़ार हू

तराजु मे तुलता हू तराजु मे टिकता हू मै बाज़ार हू

घुमने फिरने वालों चल ने फिरने वालों

मुझसे मस्ती  मौज कर ने वालो के लिए  शौक ए नज़ारा हू

आन से शान से आते जब रहीशजादे दर पर मेरे

बढ़ जाती है शान मेरी भी उन पैसे वालों से

रूप एक और भी दिखता बाज़ार का

जब अद्नगे बच्चो की टोली

कटोरा भिखरियो का पड़ता है किसी पैसे वालो के आगे

तब खाई पट जाती है यही से हिन्दुस्थान की हालत पता चल जाती है

अर्थ हू  व्यवस्था हू  मै बाज़ार हू

ज़िन्दगी का सार हू मै बाज़ार हू

रचना शैलेन्द्र जोशी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

नाटक हो चुका अब कुछ होगा   रचना शैलेन्द्र जोशी
by Shailendra Joshi (Notes) on Sunday, March 17, 2013 at 2:46pm
पर्दा उठ चुका है नाटक जरुर होगा
थियटर मे अंधेरा हो चुका है नाटक जरूर होगा
दर्शक आ चुका है नाटक जरूर होगा
ताली बज चुकी है नाटक जरूर होगा
डायरेक्टर ने आर्टिस्ट को मंच मे छोड़ दिया है नाटक जरूर होगा
तुम आज पर्दाफास होगे नाटक जरूर होगा
उजाला हो गया थियटर मे ये कैसा उजाला चीफ गेस्ट नेता ने कहा
ये नाटक असर है डायरेक्टर ने कहा
नाटक कब शुरु हुआ नेता बोला
डायरेक्टर ने कहा जब तुम अपनी सच्चाई मे सो रहे थे
जनता जाग रही थी
नाटक हो चुका अब कुछ होगा
रचना शैलेन्द्र जोशी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

सैरा फागुण बीती

तीन होरी नी खेली छोरी

छलड़ी मा त ना न कर

कना कना हुलियार तेरा चौक ऐनी

फागुण होरी मा कना कना गीत लै गैनी

तीन कैकी नी सुणि

द्वार मोर् ढकीक भीतर लुकी राइ

तेरी मुखड़ी की सौ छोरि

तेरी मुखड़ी बिना घौर नि ज़ोऊ

त्वे दगडी होरी खीलने की मेरा जूकुडा भारी आस

नि कर सुवा मै निरास

पिचकारी भरी लायू

अबीर गुलाल भरी हात

नि ऐली भार रंग जालु बेकार

रचना शैलेन्द्र जोशी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

From - Shailendra Joshi

बन बनी का फूलों का रस पियु तेरु रंगिलु भौर

मेरा मन नि हैरी छोरा  कभी तिन

सिर्फ मेरा तन बदन मा तेरी नज़र

लबार बोली तिन मैकू सब से बडू लफंडर तू

चोर नज़र तेरी गलियों कू लुंड तू

अफ्हू बनी भलु ये  कारण की तू मर्द मि औरत

रचना शैलेन्द्र जोशी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

जै बोला उत्तराखंड जै बोला इखा नेताओ की
राज बनया बारा बर्ष हुवे गिन
हैकि नंदा जात भी पैटन लैगे
जै बोला नंदा बोला हों लै गे
दुनिया बदली गी जेट विमान की रफतार जनि
हम भी बारा बर्ष मा इत्गा ही हिट सक्या
इत्गा पैट सक्या
इत्गा ही चल सक्या
गैरसैन गैरसैन बोल दा रया
आखिरी दा एक कैबनेट बैठक गैरसैण तय दे सक्या
नेताओ का मुख बीटी विकाश ही विकाश
कख इस्कूल कखी अस्पताल
पाणी बिजली सड़क
चहुमुखी चा विकाश
पर इस्कूल छन मास्टर नि
पर अस्पताल छन डोक्टर नि
नल छन पाणी नि
सांसद छन विधायक छन
पर कुई लोला कामो नि
जै उत्तराखंड जै इखा नेताओ
बारा बर्ष मा एक कैबनेट बैठक ही दे सक्या उत्तराखंड तय गैरसैण तय
कविता शैलेन्द्र जोशी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

कनी होली यी दुनिया हे कनी होली रचना शैलेन्द्र जोशी
by Shailendra Joshi (Notes) on Thursday, March 28, 2013 at 1:49pm
कनी होली यी दुनिया हे कनी होली
जलम लेंण से पैली ही ऐगी मेरु काल
दुनिया दैखाणु रैगी सुपिन्यु एक ख्याल
मी त्वे से पुछादू ब्वे किलै कैरी मेरु बुरु
माटी कंकर की धर्ती मा खुटू धरन से पैली ही मिते बैकुंठ कू बाट दिखेदे  किलै  ब्वे
रे किलै ब्वे मी त्वे पुछादू ब्वे
वखा पीड़ा आंनंद मा फर्क नीच क्वी
इनि भी क्या विपदा च ब्वे
ज्यू गर्भ का नोउ मास भी नि रखा सकी तू ब्वे
सर्ग कू पंथ दिखेकी कराली त्वेन ब्वे मेरु अंत
तू भी हे माँ रै होली कैका गर्भ
अगर तेरु भी ह्वे जांदू इनि अंत कनू देखदि तू भी दुनिया
जरूर तेरा ब्वे बाबू का नौना ही नौना रै होला जू त्वे तै जन्म देयाली
ये पापी या निठूर दुनिया केवल अपणु बुढापू सोचदा अपणा वंश सोचदा
पर जात वंश सोचण से पैली
यी बात जान ल्या की हमरु असल वंश यी चा
हम नीला आसमान तौल अर कंकर पत्थर की जमीन मा रैदा
धर्ती का बारा मा सोचा धरता का लाल बना
कूटम्ब दारी बडे की भलु नि ह्वे आज तक कै भी मनखी कू
पर देश का वास्ता भला कारिज करण वाला मनखी ही  समलौणया रैनी सदानी
ये मेरी नी आज हर जलम लेंण वाली कन्या की चा इनि दुर्दशा
निर्दियो अल्ट्रा साउंड करै की कन्या भुण हत्या त कर देदा
पर किलकारियों कू साउंड तुम नी सुण प़ादा
कन्या की वेदना तुम नी समझ प़ादा
पाप कू भाडू जरूर भरलू एक दिन
जब चूचो नौना ही नौना रैला त दुनिया बसली कनुक्वे
इन होन्दु रैलु त मनखी जात कू अंत चा जरूर एक दिन
रचना शैलेन्द्र जोशी


एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


From - Shailendra Joshi .


दोस्तों आज आपको अपनी बचपन की एक कविता आप शेयर कर रा हू अचानक आज अपनी एक पुरानी डायरी के कुछ फटे पुराने पन्नो मे ये कविता मिली तो सोचा ये कविता को आप लोगो तक पहुचायी जाये तो प्रस्तुत है कविता

निर्मल धरा बह रही है गंगा की

जग मग रहा सूर्या आकाश मे

टिम टिमा रहे तारे भी

चाँद अकेला मुस्कुरा रहा है

खेत और खलियान

फूल और बगान भी प्राकृतिक छटा बिखेर रहे है

कही हरी भरी पहाड़िया को

सफेद चादर रूपी बादल घेर रहे है

कही नीले आकाश मे बादल रुवा जैसा ढेर कर रहे है

जि करता इन मे कुदने उछलने को

कितनी सुन्दर है ये धरती

कितने ज्ञानी होंगे

इसके रचनाकार देव ब्रहम

हम धन्या है जीवन पाके इस देव भूमि मे इस ब्रहम भूमि मे

रचना शैलेन्द्र जोशी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

ये जो स्वामी दास प्रथा है दुनिया की मुझे मंजूर नहीं रचना शैलेन्द्र जोशी
by Shailendra Joshi (Notes) on Saturday, March 30, 2013 at 1:14pm
ये जो स्वामी दास प्रथा है दुनिया की मुझे मंजूर नहीं
तुझे कहू अपनी दासी
बनकर तेरा स्वामी  ये बात मुझे मंजूर नहीं
स्वामी दास प्रेम नहीं हो सकता जीवन साथ का
ये दुनिया के रीती रिवाज  मेरे लिये शूल
ये दुनिया के के रीती रिवाज  मेरे लिये फिजूल
तुझे  कहू दासी
बनकर तेरा स्वामी
अपने को स्वामी बनकर दू सम्मान
और तुझे दासी बनाकर दू अपमान
ये पाप मुझ से हो सकता नहीं
जिन्होने ये रीती चलायी
इन्होने स्त्रियो के साथ अन्याय की रीत अपनायी
ये रीती रिवाज शूल फिजूल मेरे लिये
जीवनसाथ संगत जीवन की
मै संग तू मेरी संगनी
मै तेरा राघ तू मेरी राघनी
मै तेरा साथ हम दोनों साथी
ये ही असल रीत जीवन साथ की
रचना शैलेन्द्र जोशी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

कविता----------------- शैलेन्द्र जोशी
भै नरु
हरु करू भारु करियु तू वेंन गढ़ गीतों तय भै नरु
हे तू वे जनि गितैर नि हु वे सक दू फेर
गढ़ कवी गढ़ रफ़ी गढ़ कविन्द्र हे नरेन्द्र सिंह नेगी
सब्दो कु कोठार चा गढ़वाली भासा खुनी मौलियार चा
भै नेगी महान छाया गढ़ गीतों की जान छ्या
गीतों की गंगा सदनी तयरा मुख बीटी बग दी
हैसदी हैसदी गा दी गीत मुड मा टोपला हाथ मा बाज़ा
बहुत स्वाणु लग दू जब गांदी जब कुई पहाड़ी गाना
जब तू ढौल मा ऐकी ढौलैर हुवीकी
यु गीतों की छालार बैकी डैरो डैरो पौंच जादी
उत्तराखंड की समस्या मा रचय बस्य तयारा गीत
तयार नया कैसीट जब बाज़ार मा अन्दु ता धरा धडी बिक जादू
तयरा नया गीतों की जग्वाल मा लूग रैदन
जनि गीत बाज़ार मा अदन ता समलोनिया हो जा दन
कालजय गीतों कु रचनाकार गढ़वाली गीतों कु सिंगार
मखमली भोंन कु जादूगर भै नेगी
हिवाले संसकिरती तय हिवाला ऊँचे देंन वाला अपणु तोर कु कलाकार
गढ़ गीतों कु हीरा भी तू छे नवरतन छे तू गढ़ कु गढ़ रतन छे तू
बात बोदू गढ़ की मन की गढ़ गौरव छे तू
नौसुरिया मुरली जनि सुरीली गौली छा तेरी
गंगा जनि शीतलता चा तेरा गीतों मा
मायालु गीत तेरा मायालु भोंन चा
गीतों कु बाट की लेंन पकड़ी की गीतों का बटोई बनी की
गीतों का बाट ही बनी गया
ये मुलुक का सुर सम्राट बनी गया
गीतों की पियूष जुगराज रया सदनी संसकिरती पुरुष

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

माना   मेरा   रकीब मुझसे दबंग है रचना शैलेन्द्र जोशी
by Shailendra Joshi (Notes) on Thursday, March 28, 2013 at 10:11pm
माना   मेरा   रकीब मुझसे दबंग है
पर क्या मेरी चाहत उससे कम है
वो आ भी चाहे कितना करीब तुम्हारे
पर मुझे दूर ना कर पायेगा
वो दिल देगा तुम्हे अपना
पर तुम क्या दोगी
क्योंकि तुम्हारा दिल तो है पास मेरे
रचना शैलेन्द्र जोशी