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Story Of Gweljyu/Golu Devta - ग्वेल्ज्यु या गोलू देवता की कथा

Started by Anubhav / अनुभव उपाध्याय, April 06, 2008, 10:31:36 AM


Anubhav / अनुभव उपाध्याय


पंकज सिंह महर

Quote from: Anubhav / अनुभव उपाध्याय on April 06, 2008, 04:55:15 PM
कुछ समय बाद यह सुअवसर भी आया जब रानी कलिंगा गर्भवती हुई. राजा की खुशी का कोई पारावार न था. वह एक-एक दिन गिनते हुए बालक के जन्म की प्रतीक्षा करने लगे. उत्साह और उमंग की एक लहर सी दौड़ने लगी. परन्तु वे इस बात से अनजान थे, की सातों सौतिया रानियाँ किस षड्यंत्र का ताना बाना बुन रही हैं. सातों सौतनों ने कलिंगा के गर्भ को समाप्त करने की योजना बना ली थी और कलिंगा के साथ झूठी प्रेम भावना प्रदर्शित करने लगीं. कलिंगा के मन मैं उन्होंने गर्भ के विषय मैं तरह - तरह की डरावनी बातें भर दी और यह भी कह दिया की हमने एक बहुत बड़े ज्योतिषी से तुम्हारे गर्भ के बारे मैं पूछा - उसके कथनानुसार रानी को अपने नवजात शिशु को देखना उसके तथा बच्चे के हित मैं नही होगा.
अनुभव दा के निर्देश पर इससे आगे का वृतान्त.......

जब रानी कलिंगा का प्रसव काल आया तो उन सातोम सौतों ने उसकी आंखों में पट्टी बांध दी और बालक को किसी भी तरह मारने का षडयंत्र सोचने लगी। जहां रानी कलिंगा का प्रसव हुआ, उसके नीचे वाले कक्ष में बड़ी-बड़ी गायें रहती थीं। सौतों ने बालक के पैदा होते ही उसे गायों के कक्ष में डाल दिया, ताकि गायों के पैरों के नीचे आकर बालक दब-कुचल्कर मर जाये। परन्तु बालक तो अवतारी था, सौतेली मांओं के इस कृत्य का उस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा और वह गायों का दूध पीकर प्रसन्न मुद्रा में किलकारियां मारने लगा। रानी कलिंगा की आंखों की पट्टियां खोली गईं और सौतों ने उनसे कहा कि "प्रसव के रुप में तुमने इस सिलबट्टे को जन्म दिया है", उस सिलबट्टे को सातों सौतों ने रक्त से सानकर पहले से ही तैयार कर रखा था। उसके बाद सातों सौतों ने उस बालक को कंटीले बिच्छू घास में डाल दिया, परन्तु यहां भी बालक को उन्होंने कुछ समय बाद हंसता-मुस्कुराता पाया। तदुपरांत एक और उपाय खोजा गया कि इस बालक को नमक के ढेर में डालकर दबा दिया जाय और यही प्रयत्न किया गया, परन्तु उस असाधारण बालक के लिये वह नमक का ढेर शक्कर में बदल दिया और वह बालक रानियों के इस प्रयास को भी निरर्थक कर गया।...........जारी


पंकज सिंह महर

आगे...........


अंत में जब सातों रानियों ने देखा कि बालक हमारे इतने प्रयासों के बावजूद जिंदा है तो उन्होंने एक लोहे का बक्सा मंगाया और उस संदूक में उस अवतारी बालक को लिटाकर, संदूक को बंदकर उसे काली नदी में बहा दिया, ताकि बालक  निश्चित रुप से मर जाये। यहां भी उस बालक ने अपने चमत्कार से उस संदूक को डूबने नहीं दिया और सात दिन, सात रात बहते-बहते वह संदूक आठवें दिन गोरीहाट में पहुंचा
      गौरीहाट पर उस दिन भाना नाम के मछुवारे के जाल में वह संदूक फंस गया। भाना ने सोचा कि आज बहुत बड़ी मछली जाल में फंस गई है, उसने जोर लगाकर जाल को खींचा तो उसमें एक लोहे के संदूक देखकर वह आश्चर्यचकित हो गया। संदूक को खोलकर जब उसने हाथ-पांव हिलाते बालक को देखा तो उसने अपनी पत्नी को आवाज देकर बुलाया। मछुआरा निःसंतान था, अतएव पुत्र को पाकर वह दम्पत्ति निहाल हो गया और भगवान के चमत्कार और प्रसाद के आगे नतमस्तक हो गया।

..........जारी

पंकज सिंह महर

..........निःसंतान मछुवारे को संतान क्या मिली मानि उसकी दुनिया ही बदल गयी। बालक के लालन-पालन में ही उसका दिन बीत जाता। दोनों पति-पत्नी बस उस बालक की मनोहारी बाल लीला में खोये रहते, वह बालक भी अद्भूत मेधावी था। एक दिन उस बालक ने पने असली मां-बाप को सपने में देखा। मां कलिंगा को रोते-बिलखते यह कहते देखा कि- तू ही मेरा बालक है- तू ही मेरा पुत्र है। धीरे-धीरे उसने सपने में अपने जन्म की एक-एक घटनायें देखीं, वह सोच-विचार में डूब गया कि आखिर मैं किसका पुत्र हूं? उसने सपने की बात की सच्चाई का पता लगाने का निश्चय कर लिया। एक दिन उस बालक ने अपने पालक पिता से कहा कि मुझे एक घोड़ा चाहिये, निर्धन मछुआरा कहां से घोड़ा ला पाता। उसने एक बढ़ई से कहकर अपने पुत्र का मन रखने के लिये काठ का एक घोड़ा बनवा दिया। बालक चमत्कारी तो था ही, उसने उस काठ के घोड़े में प्राण डाल दिये और फिर वह उस घोड़े में बैठ कर दूर-दूर तक घूमने निकल पड़ता। घूमते-घूमते एक दिन वह बालक राजा झालूराई की राजधानी धूमाकोट में पहुंचा और घोड़े को एक नौले (जलाशय) के पास बांधकर सुस्ताने लगा। वह जलाशय रानियों का स्नानागार भी था। सातों रानियां आपस में बात कर रहीं थीं और रानी कलिंगा के साथ किये अपने कुकृत्यों का बखान कर रहीं थी। बालक को मारने में किसने कितना सहयोग दिया और कलिंगा को सिलबट्टा दिखाने तक का पूरा हाल एक-दूसरे से बढ़-चढ़कर सुनाया। बालक उनकी बात सुनकर सोचने लगा कि वास्तव में उस सपने की एक-एक बात सच है, वह अपने काठ के घोड़े को लेकर नौले तक गया और रानियों से कहने लगा कि पीछे हटिये-पीछे हटिये, मेरे घोड़े को पानी पीना है। सातों रानियां उसकी वेवकूफी भरी बातों पर हसने लगी और बोली- कैसा बुद्धू है रे तू! कहीं काठ का घोड़ा भी पानी पी सकता है? बालक ने तुरन्त जबाव दिया कि क्या कोई स्त्री सिलबट्टे को जन्म दे सकती है? सभी रानियों के मुंह खुले के खुले रह गये, वे अपने बर्तन छोड़कर राजमहल की ओर भागी और राजा से उस बालक की अभ्रदता की झूठी शिकायतें करने लगी।             ........जारी

पंकज सिंह महर

.......राजा ने उस बालक को पकड़वा कर उससे पूछा "यह क्या पागलपन है,तुम एक काठ के घोड़े को कैसे पानी पिला सकते हो?" बालक ने कहा "महाराज जिस राजा के राज्य में स्त्री सिलबट्टा पैदा कर सकती है तो यह काठ का घोड़ा भी पानी पी सकता है" तब बालक ने अपने जन्म की घटनाओं का पूरा वर्णन राजा के सामने किया और कहा कि " न केवल मेरी मां कलिंगा के साथ गोर अन्याय हुआ है महाराज! बल्कि आप भी ठगे गये हैं" तब राजा ने सातों रानियों को बंदीगृह में डाल देने की आग्या दी। सातों रानियां रानी कलिंगा से अपने किये के लिये क्षमा मांगने लगी और आत्म्ग्लानि से लज्जित होकर रोने-गिड़गिडा़ने लगी। तब उस बालक ने अपने पिता को समझाकर उन्हें माफ कर देने का अनुरोध किया। राजा ने उन्हें दासियों की भांति जीवन यापन करने के लिये छोड़ दिया। यही बालक बड़ा होकर ग्वेल, गोलू, बाला गोरिया तथा गौर भैरव नाम से प्रसिद्ध हुआ। ग्वेल नाम इसलिये पड़ा कि इन्होंने अपने राज्य में जनता की एक रक्षक के रुप में रक्षा की और हर विपत्ति में ये जनता की प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रुप से रक्षा करते थे। गौरी हाट में ये मछुवारे को संदूक में मिले थे, इसलिये बाला गोरिया कहलाये। भैरव रुप में इन्हें शक्तियां प्राप्त थीं और इनका रंग अत्यन्त सफेद होने के कारण इन्हें गौर भैरव भी कहा जाता है। ....जारी

पंकज सिंह महर

.......ग्वेल जी को न्याय का देवता भी कहा जाता है। माना जाता है कि जिस किसी के भी साथ राज दरबार में गलत न्याय हुआ हो, न्याय में भेदभाव हो गया हो तो वह इनके दरबार में अपनी करुण पुकार कहकर या लिखकर इनके समक्ष करता है, इसी विश्वास के साथ कि ग्वेल देवता अवश्य ही मेरे साथ हुये अन्याय को देखते हुये, त्वरित न्याय करेंगे। यहां आकर उन्हें न्याय भी मिलता है। ऎसे कई उदाहरण हिअं ग्वेल जी के न्याय के, अन्यायी को दंड देने के तथा दुःखियों का दुःख दूर करने के लिये।
       माना जाता है कि ग्वेल जी जब राजा थे, तब वह राज्य में घूम-घूम कर जन अदालत लगाकर त्वरित न्याय दिया करते थे। आज भी लोक अदालतों के माध्यम से जनता को तुरंत न्याय दिलाने का प्रयास दिया जाता है। ग्वेल जी  इस आवश्यकता को समझते हुये लिक अदालतों द्वारा न्याय कार्य आरम्भ कर चुके थे।.........

पंकज सिंह महर

........चितई ग्राम स्थित इनका यह प्रसिद्ध मन्दिर लोक आस्थाओं का केन्द्र है। चम्पावत में इनका पुराना मंदिर है और एक मंदिर घोड़ाखाल में भी है। लेकिन चितई का ग्वेल मंदिर आस्था का अद्भुत केन्द्र है, इस मंदिर में भक्तजनों द्वारा चढ़ाई गई घंटियां इसी विश्वास का प्रतीक हैं कि ग्वेल जी लोगों की मनोकामनाओं को अवश्य पूरा करते हैं। इनके दरबार में सच्चे हृदय से आने वाले की ईच्छा अवश्य पूरी हुई है, पूरी होती है औए पूरी ही होगी। इसी विश्वास के साथ कथा-सार की समाप्ति होती है।

पंकज सिंह महर

ऊं श्री गौर भैरव की जय।
ऊं दूधाधारी देवता की जय।
ऊं कृष्णावतारी देवता की जय।
ऊं न्यायकारी देवता की जय।

गोलू देवता की जागर के कुछ अंश

गोरियाऽऽऽऽऽऽ दूदाधारी छै, कृष्ण अबतारी छै।
मामू को अगवानी छै, पंचनाम द्याप्तोंक भांणिज छै,
तै बखत का बीच में  गढी़ चंपावती में हालराई राज जो छन,
अहाऽऽऽऽ! रजा हालराई घर में संतान न्हेंतिन,
के धान करन कूनी राजा हालराई.......!
तै बखत में राजा हालराई सात ब्या करनी.....संताना नाम पर ढुंग लै पैद नि भै,
तै बखत में रजा हालराई अठुं ब्या जो करनु कुनी,
राजैल गंगा नाम पर गध्यार नै हाली, द्याप्ता नाम पर ढुंग जो पुजिहाली,......
अहा क्वे राणि बटिक लै पुत्र पैद नि भै.......
राज कै पुत्रक शोकै रैगो[/b][/color]

Anubhav / अनुभव उपाध्याय