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Today's Thought - पहाड़ के मुहावरों/कथाओं एवं लोक गीतों पर आधारित: आज का विचार

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, May 08, 2008, 02:02:13 PM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


कुकुर मुख लागो थोव चाटो
ज्वे मुख लगे, चुई चाटो !

कुत्ता मुह लगाया मुह चाटा, पत्नी मुह लगाई चुटिया काटी

यानी अनावश्यक प्रशन देना

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720



देंणा होंयाँ खोली का गणेसा ऐ, देंणा होंयाँ मोरी का नारेणा हे l
देंणा होंयाँ भूमी का भुम्याला ऐ, देंणा होंयाँ पंचनाम देवा हे l
देंणा होंयाँ नौखोली का नाग ऐ, देंणा होंयाँ नौखंडी नरसिंगा हे

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बद्री नाथ जी की आरती
पवन मंद सुगंध शीतल हेम मंदिर शोभितम |
निकट गंगा बहत निर्मल श्री बद्रीनाथ विश्व्म्भरम |
शेष सुमिरन करत निशदिन धरत ध्यान महेश्वरम |
शक्ति गौरी गणेश शारद नारद मुनि उच्चारणम |
जोग ध्यान अपार लीला श्री बद्रीनाथ विश्व्म्भरम |
इंद्र चंद्र कुबेर धुनि कर धूप दीप प्रकाशितम |
सिद्ध मुनिजन करत जै जै बद्रीनाथ विश्व्म्भरम |
यक्ष किन्नर करत कौतुक ज्ञान गंधर्व प्रकाशितम |
श्री लक्ष्मी कमला चंवरडोल श्री बद्रीनाथ विश्व्म्भरम |
कैलाश में एक देव निंरजन शैल शिखर महेश्वरम |
राजयुधिष्ठिर करतस्तुति श्री बद्रीनाथ विश्व्म्भरम |
श्री बद्री जी के पंच रत्न पढ्त पाप विनाशनम |
कोटि तीर्थ भवेत पुण्य प्राप्यते फलदायकम |

जय जय श्री बद्रीनाथ, जयति योग ध्यानी || टेक ||

निर्गुण सगुण स्वरूप, मेधवर्ण अति अनूप |
सेवत चरण स्वरूप, ज्ञानी विज्ञानी | जय...

झलकत है शीश छत्र, छवि अनूप अति विचित्र |
बरनत पावन चरित्र, स्कुचत बरबानी | जय...

तिलक भाल अति विशाल, गल में मणि मुक्त-माल |
प्रनत पल अति दयाल, सेवक सुखदानी | जय....

कानन कुण्डल ललाम, मूरति सुखमा की धाम |
सुमिरत हों सिद्धि काम, कहत गुण बखानी | जय...

गावत गुण शंभु शेष, इन्द्र चन्द्र अरु दिनेश |
विनवत श्यामा हमेश, जोरी जुगल पानी | जय.

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

नम: प्रणववाच्याय  नम: प्रणवलिंगने!
नम: सृष्टयादिकर्त्रे  च नम: पञ्चमुखाय ते !!
अम्बिकापतय उमापतये नम: नम:!!
नमो नीलग्रीवाय च शिति कंठाय च!!
ऋतं सत्यं परं ब्रह्म पुरुषं कृष्णपिंग्लम!


ऊर्ध्वरतं विरूपाक्षं विश्वरूपाय वै नम:!!

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम्‌ ।
तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः ॥

भावार्थ :  या तो तू युद्ध में मारा जाकर स्वर्ग को प्राप्त होगा अथवा संग्राम में जीतकर पृथ्वी का राज्य भोगेगा। इस कारण हे अर्जुन! तू युद्ध के लिए निश्चय करके खड़ा हो जा॥37॥




Himalayan Warrior /पहाड़ी योद्धा

Quote from: एम.एस. मेहता /M S Mehta on December 05, 2011, 11:57:04 PM
हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम्‌ ।
तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः ॥

भावार्थ :  या तो तू युद्ध में मारा जाकर स्वर्ग को प्राप्त होगा अथवा संग्राम में जीतकर पृथ्वी का राज्य भोगेगा। इस कारण हे अर्जुन! तू युद्ध के लिए निश्चय करके खड़ा हो जा॥37॥




Excellent.. thought.

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

हे घुघूती कु घोल, घुघूती कु घोल,
मनखी माटू ह्व़े जांद रई जांदा बोल..
हे गाडी च मक्खन, गाडी च मक्खन
दुनिया ला मरी जाण क्या लिजान यखन......

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


"जु नि धोला आपुन मुख, उ क्या देलो हिका सुख !"

जो न धोये अपना ही मुख, वह क्या दे औरो को को सुख !

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

छोडी अपडा गौ गल्याउ छोडी अपणु देश
बिसरी अपणी बोली भाषा बसी गेयाँ परदेश""

भैजि बौडी जा
झोही ,,कफुलू धे लागोनी तुम सिन

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


Composed by Hem Bahuguna.

माँगा था जो उत्तराखंड,वो कहा से लाऊँ?

सूखने लगी गंगा, पिघलने लगा हिमालय!
उत्तरकाशी है जख्मी, पिथोरागढ़ है घायल!
बागेश्वर को है बेचेनी, पौडी मे है बगावत!
कितना है दिल मे दर्द, किस-किस को मैं दिखाऊ!
माँगा था जो उत्तराखंड,वो कहा से लाऊँ?

मडुवा, झंगोरे की फसले भूल!खेतो मे जीरेनीयम के फूल!
गांव की धार मे रीसोर्ट बने!गांव के बीच मे स्वीमिंग पूल!
कैसा विकास? क्यों घमंड?क्या ऐसा मागा था उत्तराखण्ड?
विकाश के नाम पर ऐसी लूट,जो था वो भी लुटाऊँ,
माँगा था जो उत्तराखंड,वो कहा से लाऊँ?

मुद्दतों से विकास की बातें,प्यासे दिन अँधेरी रातें,
जातीवाद का जहर यहाँ,ठेकेदारी का कहर यहाँ,
घुटन सी होती है अब तो,आखिर अब कहा जाऊँ?
माँगा था जो उत्तराखंड,वो कहा से लाऊँ?

वन कानूनों ने छीनी छाह,वन आबाद और बंजर गांव,
खेतो की मेडे टूट गयी,अपनी ही संस्कृती छुट गयी,
क्या गडवाल? क्या कुमाऊँ?
माँगा था जो उत्तराखंड,वो कहा से लाऊँ?

लुप्त हुए स्वालंबी गांव,कहा गयी आफर की छाव?
हथोडे की ठक-ठक का साज,धोकनी की गरमी का राज,
रीगाल के डाले और सूप,सैम्यो से बनती थी धुप,
कहा गया ग्राम्य उधोग? क्यों लगा पलायन का रोग?
यही था क्या "म्यर उत्तराखण्ड"?अब मांग के पछताऊँ,
माँगा था जो उत्तराखंड,वो कहा से लाऊँ?