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Harela Festival Of Uttarakhand - हरेला(हरयाव)

Started by Risky Pathak, July 12, 2008, 09:18:39 PM

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पंकज सिंह महर

साथियो, आज उत्तराखण्ड का लोकपर्व हरेला है, इस अवसर पर पहाड़ों में वृक्षारोपण किया जाता है और ऐसी मान्यता है कि आज के दिन लगाया हुआ पौधा कभी नष्ट नहीं होता।

जैसा कि आप सभी को विदित है कि इस वर्ष आई प्राकृतिक-मानव जनित आपदा ने हमारे सैकड़ों लोगों को लील लिया। इसलिये इस अवसर पर क्रियेटिव उत्तराखण्ड-म्यर पहाड़ आप सभी से अनुरोध करता है कि आज के दिन दिवंगत आत्माओं की शांति एवं श्रद्धांजलि हेतु एक-एक पेड़ या पौधा अवश्य रोपित करें।

साथी लोकेश डसीला की एक कविता के साथ आपको हरेला पर्व की शुभकामनायें

भीगे कथील दिनोँ मेँ
चौमासी हौल के बीच
बेलोँ-पिरपालोँ का मौसम
सीँचता है थात को
और देता है पोषण
आस की उपज को
उम्मीद की बेल को
ककड़ी का एक पीला फूल
खीँच ले जाता है
किसान की उम्मीद को
सुनहरे असौज तक
और इसी बीच
डालोँ-छपारोँ मेँ
सिमट आता है
जीवन का सजीव नमूना
और उग आती हैँ कोपलेँ
जीवट समाज की
संसाधनोँ के साज की
पंचनाज सतनाज की
रीति और रिवाज की ।


खीमसिंह रावत

JI RYA, JAG RYA, DUB JAS FAI JYAA, .........

Harela ki hardik Shubh Kamanaa

kHIM SINGH RAWAT
09013748575

खीमसिंह रावत

हरेला त्यौहार को आज के संदर्भ में देखें तो शहरीकरण में हरेला के अवसर पर वृक्षा रोपण करना बड़ा ही मुश्किल है गगनचुम्बी महलों में रहने वालों के लिए अश्म्भव सा है /
मेरा मानना है की हमारे पहाड़ के लोग हरेला के शुभावसर पर पौधा लगाने के बजाय एक पौधा युक्त गमला खरीदें / इसके हमें दो फायदे होंगे १- हम अपने बच्चों को बता सकेगें की हरेला के त्यौहार पर पेड़ लगाने की परम्परा है / २- धीरे  धीरे इस त्यौहार को बाजार मिलेगा , गमलों की बिक्री होगी तो बाजारों में तरह तरह के गमले ओ पौधे आने लगेगें / जैसे जैसे बाजारवाद  बढ़ेगा निश्चित ही हमारा हरेला का त्यौहार पूरी दुनिया में प्रसिद्ध होगा /

आने वाले १७ जुलाई २०१४ को त्यौहार है उत्तराखंड के प्रवासियों से निवेदन है की समूह में पौधे सहित गमले खरीदें / 


आपका
खीमसिंह रावत

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

कृपया जानकारी पूरी पढ़ें
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हरेला उत्तराखण्ड के परिवेश और खेती के साथ जुड़ा हुआ पर्व है। हरेला पर्व वैसे तो वर्ष में तीन बार आता है

सावन लगने से नौ दिन पहले आषाढ़ में हरेला बोने के लिए किसी थालीनुमा पात्र या टोकरी का चयन किया जाता है। इसमें मिट्टी डालकर गेहूँ, जौ, धान, गहत, भट्ट, उड़द, सरसों आदि 5 या 7 प्रकार के बीजों को बो दिया जाता है। नौ दिनों तक इस पात्र में रोज सुबह को पानी छिड़कते रहते हैं। दसवें दिन इसे काटा जाता है। 4 से 6 इंच लम्बे इन पौधों को ही हरेला कहा जाता है। घर के सदस्य इन्हें बहुत आदर के साथ अपने शीश पर रखते हैं। घर में सुख-समृद्धि के प्रतीक के रूप में हरेला बोया व काटा जाता है! इसके मूल में यह मान्यता निहित है कि हरेला जितना बड़ा होगा उतनी ही फसल बढ़िया होगी! साथ ही प्रभू से फसल अच्छी होने की कामना भी की जाती है!

जी रया जागि रया
आकाश जस उच्च, धरती जस चाकव है जया
स्यावै क जस बुद्धि, सूरज जस तराण है जौ
सिल पिसी भात खाया जाँठि टेकि भैर जया
दूब जस फैलि जया...

दीर्घायु, बुद्धिमान और शक्तिमान होने का आशीर्वाद और शुभकामना से ओतप्रोत इस गीत का अर्थ है- जीते रहो जागृत रहो। आकाश जैसी ऊँचाई, धरती जैसा विस्तार, सियार की सी बुद्धि, सूर्य जैसी शक्ति प्राप्त करो। आयु इतनी दीर्घ हो कि चावल भी सिल में पीस के खाएँ और बाहर जाने को लाठी का सहारा लेना पड़े। दूब की तरह सब जगह आसानी से फैल जाएँ (यशस्वी हों)।
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Devbhoomi,Uttarakhand

म्यारा सभी उत्तराखंडी भै-बैणु तैं नमस्कार,प्रणाम,पैलाग दगड़ियों खूब होला आप लोग ,अच्गालु बरखा खूब होणी छ,और गौं म बरखा दिनों खूब मजा औंदी दगड़ियों आप सौण का मैना कु आनंद लेवा और अफडू ध्यान रखा,भैजियों-भुलाऊँ आप सभी लोगों तैं का लोकपर्व हरेला की ढेरों शुभकामनायें
जी रया जागि रया
आकाश जस उच्च, धरती जस चाकव है जया
स्यावै क जस बुद्धि, सूरज जस तराण है जौ
सिल पिसी भात खाया जाँठि टेकि भैर जया

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

"हरेला" लोकपर्व इस बात का परिचायक है कि हमारे पूर्वज वन संरक्षण और पर्यावरण को अत्यधिक महत्व देते थे. बरसात के इस मौसम में धरती की नमी के नये वृक्षों के उगने के लिये उपयुक्त होती है.
सभी लोगों से निवेदन है कि अधिक से अधिक वृक्षारोपण करें और इस महत्वपूर्ण त्यौहार का सन्देश अगली पीढी तक पहुंचाने की कोशिश करें...
आप सभी साथियों को "हरेला पर्व" की सपरिवार बधाई

Raje Singh Karakoti

Happy Harela to all my brother and sister.

With Best Wishes,
Raje

विनोद सिंह गढ़िया



#HARELA

आप सभी को #हरेला पर्व की हार्दिक बधाई और शुभकामना.

Pawan Pathak

जी रये, जागि रया, हरयाव भेटने रया

अमर उजाला ब्यूरो

हल्द्वानी। हरेले का पर्व हमें नई ऋतु के शुरू होने की सूचना देता है। यह त्योहार हिंदी सौर पंचांग की तिथियों के अनुसार तीन बार मनाया जाता है। शीत ऋतु की शुरुआत अश्विन मास से होती है। इसलिए अश्विन मास की दशमी को हरेला मनाया जाता है। गर्मी की शुरुआत चैत्र मास से होती है। इसलिए चैत्र मास की नवमी को हरेला मनाया जाता है। इसी प्रकार वर्षा ऋतु की शुरुआत सावन माह से होती है, इसलिए एक गते श्रावण को हरेला मनाया जाता है। किसी भी ऋतु की सूचना को आसान बनाने और कृषि प्रधान क्षेत्र होने के कारण ऋतुओं का स्वागत करने की परंपरा बनी होगी। श्रावण मास के हरेले के दिन शिव-पार्वती की मूर्तिया भी गढ़ी जाती हैं, जिन्हे डिकारे कहा जाता है। शुद्ध मिट्टी की आकृतियों को प्राकृतिक रंगों से शिव परिवार की प्रतिमाओं का आकार दिया जाता है और इस दिनपूजा की जाती है।
हरेला शब्द का स्रोत हरियाली से है। हरेले के पर्व में नौ दिन पहले घर के भीतर स्थित मंदिर या गांव के मंदिर के अंदर सात प्रकार के अन्न (गेहूं, जौ, मक्का, गहत, सरसों, उड़द और भट्ट) को रिंगाल की टोकरी में बोया जाता है। इसके लिए एक विशेष प्रकार की प्रक्रिया अपनायी जाती है। पहल टोकरी में एक परत मिट्टी की बिछायी जाती है, फिर इसमें बीज डाले जाते हैं। इसके बाद फिर से मिट्टी डाली जाती है। फिर से बीज डाले जाते हैं। यही प्रक्रिया पांच से छह बार अपनायी जाती है। इसे सूर्य की सीधी रोशनी से बचाया जाता है। नौंवे दिन इसकी पाती(एक स्थानीय वृक्ष) की टहनी से गुड़ाई की जाती है और दसवें दिन हरेले की दिन इसे काटा जाता है। काटने के बाद गृह स्वामी के द्वारा इसे तिलक चंदन और अक्षत से मंत्रित (रोग शोक निवारणार्थ, प्राण भक्षक वनस्पते, इदा गच्छा नमस्तेस्तु हर देव नमोस्तुते) किया जाता है, जिसे हरेला पसीतना कहा जाता है। इसके बाद इसे देवता को अर्पित किया जाता है। इसके बाद घर की बुजुर्ग महिला सभी सदस्यों को हरेला लगाती है। लगाने का अर्थ यह है कि हरेला सबसे पहले पैर, फिर घुटने, फिर कंधे और अंत में सिर में रखा जाता है और आशीर्वाद के रूप में यह पंक्तियां कही जाती हैं।
जी रये, जागि रये
धरती जस आगव, आकाश जस
चाकव है जये
सूर्य जस तारण, स्यावे जसि बुद्धि हो
दूब जस फलिये
सिल पिसि भात खाये, जांठि टेकि
झाड़ जाये
(अर्थात हरियाली तुझे मिले, जीते रहो जागरूक रहो, पृथ्वी के समान धैर्यवान आकाश के समान प्रशस्त, उदार बनो, सूर्य के समान त्राण, सियार के समान बुद्धि हो, दूर्वा के तृणों के समान पनपो, इतने दीर्घायु हो कि (दंतहीन) तुम्हें भात भी पीस कर खाने पड़े और शौच जाने के लिए भी लाठी का उपयोग करना पड़ा।
इसके बाद परिवार के सभी लोग साथ में बैठकर पकवानों का आनंद उठाते हैं। इस दिन विशेष रूप से उड़द के दाल के बड़े, पुवे और खीर बनाई जाती है। हरेला अच्छी कृषि का सूचक है। हरेला इस कामना के साथ बोया जाता है कि इस साल फसलों को नुकसान न हो। हरेले के साथ जुड़ी ये मान्यता भी है कि जिसका हरेला जितना बड़ा होगा, उसे खेती में उतना ही फायदा होगा। यह भी परंपरा है कि यदि हरेले के दिन किसी परिवार में किसी की मृत्यु हो जाए तो जब तक हरेले के दिन उस घर में किसी का जन्म न हो जाय, तब तक हरेला बोया नहीं जाता है। यदि परिवार में किसी की गाय ने इस दिन बच्चा दे दिया तो भी हरेला बोया जाता है।


Sourcce-http://epaper.amarujala.com/svww_zoomart.php?Artname=20150629a_005115005&ileft=-5&itop=82&zoomRatio=130&AN=20150629a_005115005

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

हरियाली पर्व (हरेला) की सभी को हार्दिक शुभकामनाएं
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"जी रया जागि रया
आकाश जस उच्च, धरती जस चाकव है जया
स्यावै क जस बुद्धि, सूरज जस तराण है जौ
सिल पिसी भात खाया जाँठि टेकि भैर जया
दूब जस फैलि जया..."