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उत्तराखंड पर कवितायें : POEMS ON UTTARAKHAND ~!!!

Started by Dinesh Bijalwan, August 05, 2008, 02:18:42 PM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Dinesh Dhyani
February 4 at 12:12pm
राज्य गीत
राज्य गीत बन गया,
नेताओं के सर ताज सज गया।
अब क्या कमी रहेगी
विकास की राज्य में
बस सत्ता का गुलशन खिल गया।
बोली भाषा और साहित्य
की सुध लेता नहीं कोई
लोक कला और लोक जीवन की
गति भी बस यूं ही।
सत्ता के गलियारों में
पहुंच है जिसकी
विकास भी उसी का और
चमक भी उसी की।
बाकी तो सारा पहाड़
ज्यों का त्यों ही रह गया
लोक पर भारी ये गीत पड़ गया
लो जी राज्य गीत बन गया।
शिक्षा, स्वास्थ्य अरु रोजगार
अब नहीं रहेगा इंतजार
सब दुखों की एक दवा
राज्य गीत बन गया।
पलायन नहीं करेगा कोई
ना कोई रहेगा बेरोजगार
सुना है उजास का दीप जल गया
राज्य गीत बन गया। ... दिनेश ध्यानी। ४/२/१६.

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Dinesh Dhyani
January 25 at 10:41am
पलायन एक चिंतन!
पलायन पहाड़ो से
होना नहीं चाहिए
लोगों को अपने पुस्तैनी
गाऊँ में ही रहना चाहिए।
क्यों भाग रहे हैं लोग
पहाड़ छोड़कर देश बिदेश
क्यों हो रहा है पलायन?
सरकारों को कुछ करना चाहिए।
रोजगार, स्वास्थ्य, शिक्षा पर
ध्यान देना चाहिए
घर गावं की सुध भी लेनी चाहिए।
कभी न कभी हमें भी अपने
गावं जाना चाहिए।
चलो अगली बार
गर्मियों में छुट्टी मानाने
कुछ दिनों पहाड़ चलते हैं
और फिर वहां से आकर
शहर में शामियाने तले
वातानुकूलित कमरो में
बैठकर पहाड़ की बात करंगे
पलायन, बेरोजगारी, स्वास्थ्य
आदि बिषयों पर गंभीर चिंता
और चिंतन करेंगे
पहाड़ के बहाने, चलो पहाड़ की बात करेंगे। दिनेश ध्यानी. २५/१/१६

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

राज्य गीत
राज्य गीत बन गया,
नेताओं के सर ताज सज गया।
अब क्या कमी रहेगी
विकास की राज्य में
बस सत्ता का गुलशन खिल गया।
बोली भाषा और साहित्य
की सुध लेता नहीं कोई
लोक कला और लोक जीवन की
गति भी बस यूं ही।
सत्ता के गलियारों में
पहुंच है जिसकी
विकास भी उसी का और
चमक भी उसी की।
बाकी तो सारा पहाड़
ज्यों का त्यों ही रह गया
लोक पर भारी ये गीत पड़ गया
लो जी राज्य गीत बन गया।
शिक्षा, स्वास्थ्य अरु रोजगार
अब नहीं रहेगा इंतजार
सब दुखों की एक दवा
राज्य गीत बन गया।
पलायन नहीं करेगा कोई
ना कोई रहेगा बेरोजगार
सुना है उजास का दीप जल गया
राज्य गीत बन गया। ... दिनेश ध्यानी। ४/२/१६.

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

आज भी मीतै गौं की
याद भौत आंणी च
बल्दु की जोडी अपडी
लैंदी गौडी याद आंणी च
आज बी मीतै गौं की
जंदर्युं क घुंघ्याट
गदन्युं कु सुंस्याट
बसकल्या हरच्यां गोरु की
घंडुल्युं की याद आंणी च
आज मीतै गौं की
म्वाल लगयीं जुगयीं लोखु की
चुरयीं ककडी याद आंणी च
दिल्ली छौं फ्लैटु मा पड्युं
बुये की धै सुंण्यांणी च
आज मीतै गौं की
याद भौत आंणी च
खल्यांणु मा बल्द रिटांण की
दां ल्यांण की याद आणी च
कांधा मा जु धरीक
गल्यों तै पैटांण की याद आंणी च
आज मीतै दीदों गौं की
भौत याद आंणी च
सर्वाधिकार सुरक्षित@लेख..सुदेश भट्ट(दगडया)फोटो साभार सत्येस्वर प्रसाद जोशी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

हे पर्वतराज हिमालय तुझको
कोटी नमन मै करता हुं
शीर्ष मुकुट है तु दुनिया का
कोटी नमन मै करता हुं
तेरे दर्शन मात्र से ही
मै गौरव महसुस करता हुं
हे दुनिया के शीर्ष मुकुट
कोटी नमन मै करता हुं
गिरीराज तु पर्वतराज
कई नामों से बिभुषित है
अभिलाषा है मेरे मन की
करुं तिरंगे से तेरा ताज सुशोभित
तेरी गोद मे मां जैसा ही
प्यार की छांव पाता हुं
हे पर्वतराज हिमालय तुझको
कोटी नमन में करता हुं ..... सर्वाधिकार सुरक्षित @लेखक सुदेश भट्ट (दगडया)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

नचण वळा खुट्टा,
बजौंण वळा हत
अर गितांगौ गिच्चू खज्यांद।
पर लेख्ण वळै त हति बि
खज्यांद अर ख्वपडि़ बि।
कयि बार कपाळ खज्योंद-खज्योंद
सब्द हर्चि जंदन।
पकड़ण मा एक बि सब्द नि औंद।
कयि बार जनि दुयूं कु घत
औंद त कपाळ दुबारा
खज्योंण लग जांद।
लेख्ण वळै हत्यूं पर सदानि खज्जी
अर कपाळ मा सब्द्वी नचा-नचि मचीं रौंदि।
इना मौका भौत कम औंदन
जब कपाळ पर छपछुपी प्वड़दि। नरेंद्र कठैत

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

ये कविता लिखे काफी समय हो गया मित्रो आप भी पढे ये भीना स्याली कविता
हे दिल्ली वाली स्याली चल बाज़ार
त्वे खुणि मुल्य्लू घागरी
घागरी घुरि नी पैन दू भीना
अगर मुल्य्न्दी कैपरी तो चल बाज़ार
हे निहोणिया स्याली हे निर्भाग्य स्याली
कुछ कर सरम ल्याज़
हे बेक वार्ड जीजा अपनी सोच विचार आफी दगडी लिजा
घागरी नी सिला दी नी सिला मेरी मन मोहणिया स्याली
चल कुरता सुलार ही सीली लै
जमानु मिनी स्कर्ट और टॉप कु और तू भीना चल नू चा कुर्ता सुलार
चल स्याली त्वे खुणि मुल्य्लू धोती साडी
भीना मेरी भी एक बात सुन लै
कैपरी स्कर्ट टॉप मुल्य्न्दी चा तो मुलिया
नी तो भूली जा आज बीती अपणी स्याली
कविता शैलेन्द्र जोशी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

कन्न्न लगनु मुछ लगैकि
जुंगा सजैकि
बतौ माँजी क्या लगणु अपणु बुबा जी
लगणी छे च भै का सौ अपणा बुबा सी
मूंछ हुँदा मरदों की शान
क्या मेरी मूंछ माजी
छन क्या मोटि कटीली
अपणा प्यारा बुबा जनु
छे च लाटी छे च भै का सौ
छे च मेरी बेटी तेरी अन्वार
बिलकुल रे अपणा बुबा जनु
जौकी नि हुन्दी मूंछ
वू क्वी मर्दा बच्चा छन
वू चिफ्ला हुँदा जनानो जन
मर्द की शान अभिमान पहचान
माँजी मूंछ ही हुँदा
ठीक बोली छोरी तिन
बिना मूंछ कख भला
हुँदा ज्वान ठीक बोली
माजी आज मि भौत खुस छौ
आज मुछ लगैकि मि बिलकुल
लगणु अपणु बुबा जनु ।.... शैलेन्द्र जोशी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

 मजबूरी
मैं आपण् जिन्दगी में
भौतै खुशि छूँ ...
म्योर सैप भल् आदिम छ
मैं कैं खाँणैकि चिन्ता न्हाँ
मैं सितणैंकि चिन्ता न्हाँ सितण् -- सोना ( नींद )
मैं " पोर्टिको " में सितौं
पोर्टिको में सितणौंक् इंतजाम छ
म्योर् सैप भल् आदिम छ ....
तेरि न्याँत पद्यिया नि कून पद्यिया -- पद्मादत्त का उप नाम
" डैमफूल " कूँछ डैमफूल !
नान् - ठुल सब
मैं थैं डैमफूल कूँनीं
और खित्त पाड़ि हँसनीं ... खित्त पाड़ि -- खिलखिला कर
हँसण् मैं ले भल् लागौं , पर
मैं हँस नि सकन्यूँ
मैं हँस नि सकन्यूँ
म्योर् सैप भल् आदिम छ
जां ले जाँछ् - दगाड़ै ल्हि जाँछ्
झिट घड़ि ले छाड़न् न्हाँ झिट घड़ि -- पल भर
मैलि दुन्नीं घुमि हाली
हवै जहाज बटि
दुन्नियाँ पहाड़ देखि हालीं ...
मैं कैं पहाड़ भौतै भल् लागनीं ईजा !
पर , मैं पहाड़ नि ऐ सकन्यूँ
मैं पहाड़ ऐ नि सकन्यूँ
... म्योर् सैप भल् आदिम छ
मैं आपणि जिन्दगी में
भौतै खुशि छूँ - भौतै खुशि छूँ ! ....... ज्ञान पंत

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

( राग भैरवी ) ,,,,( शास्त्रीय-संगीत पर आधारित ) विशेषत: कुमाऊनी बैठी होली हेतु |
जगाय दीन्हो रे मोहे निंदिया में आ के ||
अँखियाँ गुलाबी क्यों भई सजना,
इस पल तक थे काहू के अंगना
आये कहाँ से तुम यों छुपके छुपाके,
जगाय दीन्हो रे............................||
किस बैरन संग काटी रे रतियाँ,
मोसे करत काहे झूठी रे बतियाँ,
साँची कहो रे तुम कसम मोरि खा के,
जगाय दीन्हो रे............................||
हमारो जोवनवा फूलों की बगिया,
गोरा बदन देखो महकी उमारिया,
जानूँ हँसत काहे, तुम ओंठवा दबा के,
जगाय दीन्हो रे ..........................||
रंग दीन्ही अंगिया रंग दीन्ही सारी,
देखो प्यारी सूरतिया हमारी बिगारी,
खेलो रे सजन अब कहीं और जा के,
जगाय दीन्हो रे..........................||
रचयिता-- म०न० गौड़*चंद्रा* )