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उत्तराखंड पर कवितायें : POEMS ON UTTARAKHAND ~!!!

Started by Dinesh Bijalwan, August 05, 2008, 02:18:42 PM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

भुंदरा बौ उवाच (जोक्स, हंसुड़ी , हँसिकाएँ ) -भाग 13
संकलन - भीष्म कुकरेती -
कजे (पति ) - मेरी कज्याणिन मि तै धार्मिक मनिख बणै
दुसर -सच्ची ?
कजे - हाँ जब तक ब्यौ नि ह्वे छौ मि नरक पर क्त्तै बि विश्वास नि करदो छौ।
XXX
कज्याणि -
यदि भारत जैल्या तो साड़ी लै जयाँ जी
यदि दुबई जैल्या तो गहणा लै जयां जी
यदि फ्रांस जैल्या तो इतर लै जयां जी
कजे चिरड़ेक - यदि मि नरक जौलु तो ?
कज्याणि - अपण वीडिओ MMS भेजी दियां जी
XXX
कज्याणि -मि जू बि बुल्दु तुम एक कंदूड़न सूणिक हैंक कंदूड़न भैर गाडि दींदा।
कजे - अर मि जू बि बुल्दु तू द्वी कंदूड़न सूणिक गिच्च बिटेन भैर गाड़ि दींदी।
XXX
कज्याणि - द्याखदी ! तुम कथगा म्वाट ह्वे गेवां धौं
कजे - त्वी बि त मोटी हूंदी जाणि छे ?
कज्याणि - ह्यां मि त ब्वे बणन वाळ छौं
कजे - मी बि त बुबा बणन वाळ छौं।
2 /11 /2015 Copyright ? चुरायुं माल च तो म्यार क्वी अधिकार नी च

By Bhishma Kukreti

Bhishma Kukreti

Modern Garhwali Folk Songs, Poems


         नसबंदी  (धर्मानंद उनियाल की  नसीहत देती कविता )
-
रचना --   धर्मानंद उनियाल    ( जन्म  - 1936 , कफना, कड़ाकोट , टिहरी गढ़वाल  )
Poetry  by - Dharmanand Uniyal

( विभिन्न युग की गढ़वाली कविताएँ श्रृंखला )
-
इंटरनेट प्रस्तुति और व्याख्या - भीष्म कुकरेती

-
नस बंदी का सुख भौत छन , जल्दी करौ जब क्वी
स्वस्थ सुखी परिवार रलो , जब बच्चा होवन द्वी
जब बच्चा होवन द्वी , तभी नस बंदी करावा
लोण तेल का वास्ता , रुपया तुम सौ पावा
कह धर्मा नन्द कविराय , अब ईं अक्ल बंदी
धाणी धंधा छोड़िकी , पैली करा नसबन्दी


-
( साभार --शैलवाणी , अंग्वाळ )
Poetry Copyright@ Poet
Copyright @ Bhishma Kukreti  interpretation if any

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पौड़ी गढ़वाल, उत्तराखंड  से गढ़वाली लोकगीत , कविता ; चमोली गढ़वाल, उत्तराखंड  से गढ़वाली लोकगीत , कविता ; रुद्रप्रयाग गढ़वाल, उत्तराखंड  से गढ़वाली लोकगीत , कविता ;टिहरी गढ़वाल, उत्तराखंड  से गढ़वाली लोकगीत , कविता ;उत्तरकाशी गढ़वाल, उत्तराखंड  से गढ़वाली लोकगीत , कविता ; देहरादून गढ़वाल, उत्तराखंड  से गढ़वाली लोकगीत , कविता ; 

Bhishma Kukreti

Modern Garhwali Folk Songs, Poems opposing Alcohol consumption  शराब विरुद्ध

गाँव बचौला  (घनश्याम रतूड़ी  'शैलानी' की कविता )

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रचना --  स्व. घनश्याम रतूड़ी  'शैलानी '  ( जन्म  - 1936 , चरीगाड , केमर , टिहरी गढ़वाल  )
Poetry  by - Ghanshyam Raturi 'Shailani'

( विभिन्न युग की गढ़वाली कविताएँ श्रृंखला )
-
इंटरनेट प्रस्तुति और व्याख्या - भीष्म कुकरेती

-
हिटा दिदी , हिटा भुल्यौं , चला गौं बचौला।
दारु    को    दैंत     लग्यूं  तै   दैंत  हटौला
टिंचरी को भूत लग्यूं , तै भूत भगौला।
घर हमारा उजड़ी गे छोरि छोरा बिगड़ि गे
रणचंडी बण जौला दिदी तै दैंत मिटौला
टिंचरी को भूत लग्यूं , तै भूत भगौला।
टिंचरी की भरमार च ग़ाफ़िल सरकार छ
क़ानून रिशवतखोरि की तौन सणि बतौला
टिंचरी को भूत लग्यूं , तै भूत भगौला।
गरीबी को पार नी क्वी भि रोजगार नी
दारु को व्यापार बड़्यूं क्या खौंला  क्या लौंला
टिंचरी को भूत लग्यूं , तै भूत भगौला।
यख बदरी केदार छ गंगा जमुना द्वार छ
बिगड़ी गये पढ्याँ लिख्याँ तौं सणि बतौला
दारु    को    दैंत     लग्यूं  तै   दैंत  हटौला


-
( साभार --शैलवाणी , अंग्वाळ )
Poetry Copyright@ Poet
Copyright @ Bhishma Kukreti  interpretation if any

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शराब विरुद्ध , पौड़ी गढ़वाल, उत्तराखंड  से गढ़वाली शराब विरुद्ध लोकगीत , शराब विरुद्धकविता ; चमोली गढ़वाल, उत्तराखंड  से गढ़वाली शराब विरुद्ध लोकगीत , शराब विरुद्ध कविता ; रुद्रप्रयाग गढ़वाल, उत्तराखंड  से गढ़वाली शराब विरुद्ध लोकगीत , शराब विरुद्ध कविता ;टिहरी गढ़वाल, उत्तराखंड  से गढ़वाली शराब विरुद्ध  लोकगीत , शराब विरुद्ध  कविता ;उत्तरकाशी गढ़वाल, उत्तराखंड  से गढ़वाली लोकगीत , कविता ; देहरादून गढ़वाल, उत्तराखंड  से गढ़वाली लोकगीत , कविता ;

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  स्वच्छ भारत ! स्वच्छ भारत ! बुद्धिमान भारत !


Bhishma Kukreti

Modern Garhwali Folk Songs, Poems on Tehri Sinking


  अब मेरी टीरी डुबणु च !  (स्व. डा उमाशंकर 'सतीश '  की कविता )
-
रचना --   स्व. डा उमाशंकर 'सतीश '     ( जन्म  - 1937 नागपुर , चमोली   )
Poetry  by : Dr. Uma Shankar Satish '

( विभिन्न युग की गढ़वाली कविताएँ श्रृंखला )
-
इंटरनेट प्रस्तुति और व्याख्या - भीष्म कुकरेती
s =आधी अ
-
यो पापी पराणि उबणु च
अब मेरी टीरी डुबणु च !
भिलंगना तू गाडs बाचs
जिकुड़ी मा गरुड़ रिटुणु च
अब मेरी टीरी डुबणु च !
मनसा क्या होण मेरी
द्यखलु तुमारी दिलेरी
फजलै मा घाम बूडणु च
अब मेरी टीरी डुबणु च !
माई का लाल को मातम
मातमी मरदू को जनम
पितरु को परसाद रूठणु च
अब मेरी टीरी डुबणु च !
मुखड़ी को पाणि  सुखणु च
अब मेरी टीरी डुबणु च !


-
( साभार --शैलवाणी , अंग्वाळ )
Poetry Copyright@ Poet
Copyright @ Bhishma Kukreti  interpretation if any

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Bhishma Kukreti

 बकी बातों ह्यूं - (जग्गू नौडियाल की कविता )
रचना --   जग्गू नौडियाल   ( जन्म  - 1940 . भीमली तल्ली , पैडळ स्यूं , पौड़ी गढ़वाल    )
Poetry  by - Jaggu Naudiyal

( विभिन्न युग की गढ़वाली कविताएँ श्रृंखला )

इंटरनेट प्रस्तुति और व्याख्या - भीष्म कुकरेती -

           
कवितौ रचना समौ :खैडा, गाँव  २४ जनवरी १९६०
  ये दिन याद राला ,
ह्यूं पड़ी अबा साला .
                        सात गती मौ का मैना ,
                        ह्यूं का पाड़ बंदे गेना ,
                        भवरेगैनी छाला . ह्यूं पड़ी अबा साला
आंदा जांदा लोक बन्द ,
म्वरणो कू आया छंद
गोरु क्या जी खाला . ह्यूं पड़ी अबा साला
              ह्यूं को पाणी तातु कैक
               गौड़ी भैंसी वे पिलैक
            लगै द्यावा ताल़ा . ह्यूं पड़ी अबा साला
गाजी मोरि हम बि मोरा
क्वी नि आन्दु  धोरा 
अब ऐगे काल़ा , ह्यूं पड़ी अबा साला
                    पाणी अब कन लाण 
                   बेटी ब्वारी बांदा ताण
                  हाथ खुटा लाल , ह्यूं पड़ी अबा साला
बूड बुड्यों ठड ह्व़ेगी 
ओजू धारु लगण लेगी
कन यूँ बचौला , ह्यूं पड़ी अबा साला
                मोटर सी आणि जाणि
                बन्द ह्वेन सब्बी धाणी
                 येई गढवाळ .ह्यूं पड़ी अबा साला
छुट्टी ल्हेकी क्वी बि आलू
बाठा बटी बौडि जालू
सब्बी सास राला . ह्यूं पड़ी अबा साला
              देसु वाला भैजी ऐना
               कोटद्वार खौंल़े गेना
              कानू कैकी राला , ह्यूं पड़ी अबा साला
उनकू को छ वख क्वी भी
छुट्टी आला जु भी
बैठी बैठी र्वाला (रवाला ) .ह्यूं पड़ी अबा साला
             दगडा ल्हाला चाणs गुड़
                 आंसू आला तड़ बुड
             सौडि  जाला माला . ह्यूं पड़ी अबा साला
आध बाठा भैजी छया
ऊन चिट्ठी लिखी द्याया
नौं कनअ ह्वाला .  ह्यूं पड़ी अबा साला
            इस्कूल बन्द रैनि 
           मास्टर क्वी बि नि गैनी
           ह्व़े गे ढंग चाळ  .ह्यूं पड़ी अबा साला
डाळी बूटी टूटी गैन
छ्वटि बड़ी सुकी गेन
फौंका टुट डाला , ह्यूं पड़ी अबा साला
           ब्योका हाल सुणा अब
           इनु दुःख आया तब
            पिसीं  रेगी दाला , ह्यूं पड़ी अबा साला
रस्ता पौणु भूलि गेन
ह्यूं की रात मौ क मैना
तै मंडा का छाला . ह्यूं पड़ी अबा साला
              कैकु घुण्ड कैकु मुंड
             रस्ता खुज्याओ तख फुंड
            क्वी पडू याँ भ्याला .ह्यूं पड़ी अबा साला
पौंछणे कि कख पूछ
कैक ठनडे गेन मूछ
कैकु आया ल्वाला .ह्यूं पड़ी अबा साला
            दूसरा तिसरा दिन पौणा 
             ऐड़ी ह्वेगी कैकी धौणा
            पक्या रै गेनी स्वाला   .ह्यूं पड़ी अबा साला
बार बजी रात क्वी
डांड मग हाय ब्वेई
कख मन्न फाळ  .ह्यूं पड़ी अबा साला
               ब्योली का ब्व़े बाब बल,
              पेट मची खळ बळ
              कख जौल़ू भ्वाला . ह्यूं पड़ी अबा साला
जौंकू ब्यौ होण छायो
बयोउ ऊन कायो कायो
ह्यूं का गीत गाला . ह्यूं पड़ी अबा साला
            कैकी भग गे गाया फंड
           क्वी बुड्डी ह्वेन रांड
           येई बुड्या धवाळआ  , ह्यूं पड़ी अबा साला
बाजा बाजा ज्वान ज्वान
ह्वेगी ऊँ थैं अभिमान
सड़म रौडी वै  छाला . ह्यूं पड़ी अबा साला
           बाजा बुड्या धंस तौळ
          ह्यूं मा प्वड़याँ उडी खौळ
          उठाणा कि हाला .ह्यूं पड़ी अबा साला
कैका ड़्यार लखड़  नीन
कख जाण ब्वेई तीन
फंक्या झंगरयाल .ह्यूं पड़ी अबा साला 
       कैकु साग नी च भात
       हेरी बटोळी  ल्यखद बात
  जग्गू नौडियाला  .ह्यूं पड़ी अबा साला



( साभार --शैलवाणी , अंग्वाळ )
Poetry Copyright@ Poet
Copyright @ Bhishma Kukreti  interpretation if any

Bhishma Kukreti

Modern Garhwali Folk Songs, Poems



बाबा उत्तराखंड बणगे (ललित केशवान रचित कविता   )
रचना --   ललित केशवान   ( जन्म  - 1940, सिरोली , इडवालस्यूं , पौड़ी गढ़वाल )
Poetry  by - Lalit  Keshwan

( विभिन्न युग की गढ़वाली कविताएँ श्रृंखला )
-
इंटरनेट प्रस्तुति और व्याख्या - भीष्म कुकरेती

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बाबा उत्तराखंड बणगे  ब्वेई उत्तराखंड बणगे।

बेटा उत्तराखंड बणगे बेटी उत्तराखंड बणगे।। 

ल्हेण को छौ नौं रयुं स्यो वो भि चलगे।

म्यारा कुल को दीप छायो वो भि बुझगे ।।

स्युंदी को सिंदूर तो उत्तराखंड बणगे।

दाज्यू उत्तराखंड बणगे बाज्यू उत्तराखंड बणगे।।

जो बुरांशा फूल झड़ने ज्वान ह्वेकी।

जौन दे बळि अपणा अपणा प्राण ख्वेकी ।।

उंकी चिंता की राख उत्तराखंड बणगे।

भैजि उत्तराखंड बणगे भुला उत्तराखंड बणगे।।

वूं कुकर्मयों  घाम लगीना।

माळु की घुघती जॉन तड़फडैना ।।

वूंकी वा किल्क्वार उत्तराखंड बणगे।

दीदी उत्तराखंड बणगे भूली उत्तराखंड बणगे।।

रात ही जख कत्ल ह्वेगे रात माँ।

खून की जख गाड़ बगने बाँठ माँ ।।

ऊंको अमर बलिदान उत्तराखंड बणगे।

बाबा उत्तराखंड बणगे  बेटा  उत्तराखंड बणगे। ।।

गंगा गौरी गैतरी न धै लगैनी।

हंसुळि धगुलि झगुलि ट्वपलि बचै रखनी।।

वूंकी फिटकार उत्तराखंड बणगे।

चेली उत्तराखंड बणगे ब्योलि उत्तराखंड बणगे।।
Copyright @ Lalit Keshwan , Delhi , India 2015

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( साभार --शैलवाणी , अंग्वाळ )
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Bhishma Kukreti

Modern Garhwali Folk Songs, Poems



किराण  ( रघुवीर सिंह रावत 'अयाळ' की कविता )
रचना --  रघुवीर सिंह रावत 'अयाळ'    ( जन्म  - 1938 -2011 , अयाळ , पैडळ स्यूं     , पौड़ी गढ़वाल  )
Poetry  by - Raghuvir Singh Rawat 'Ayal'

( विभिन्न युग की गढ़वाली कविताएँ श्रृंखला )
-
इंटरनेट प्रस्तुति और व्याख्या - भीष्म कुकरेती

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बण  गैनी नियम 
चल गेन रिवाज
ऐ गेन अगनै
सबी टिप्वा
बुगठया बाज
चौर्याँळु  दगडि मिली
कछम्वळि गबंळै
भोरी पेट
अर बचीं खुचीं
बोट्यूँ  तैं ली गैनी
अपड़ा हुणत्यळा 
छौला कू
हमरा पल्ला पड़ी
सिरप किराण 
ऐंस्या रैग्या हम
हमरी घिमसाण
लगी टपराँण
कि बाबा आलो
हडगी  ल्वतगी
कुछ ट लालो
पळयाण ह्व्ला दांत
पैनाणा ह्व्ला हत्यार
ये गुठ्यार



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( साभार --शैलवाणी , अंग्वाळ )
Poetry Copyright@ Poet
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  स्वच्छ भारत ! स्वच्छ भारत ! बुद्धिमान भारत !

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

टूटे टूटे से जोड़े
टूटे टूटे से जोड़े
वो सारे रिश्ते नजर आते हैं
हम तो अब उन रिश्तों में
खुद से बिके नजर आते हैं
टूटे टूटे से जोड़े .....
लालच ने ओढ़ा मुझे
अहम ने कुछ ऐसा निचोड़ा है
दिख रहा साफ़ पतन का रास्ता
फिर भी कदम मैंने वहीँ पर मोड़ा है
टूटे टूटे से जोड़े .....
दिल ने समझया था मुझे
क़दमों ने आगे बढ़ने से रोका भी था
एक आवाज आयी थी ना जाने कहाँ से
पर अनसुना कर मै आगे बढ़ ही गया
टूटे टूटे से जोड़े .....
सोचा मैंने बस अपने ही बारे में
ना फ़िक्र की किसी की किसी बहने से
जीवन का अंत समीप है अब सब याद आ रहा है
क्या खोया मैंने साफ़ सा अब मुझे नजर आ रहा है
टूटे टूटे से जोड़े .....
एक उत्तराखंडी
बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
http:// balkrishna_dhyani.blogspot.com
में पूर्व प्रकाशित -सर्वाधिकार सुरक्षित

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

छम छम शराब छम
छम छम शराब छम
मेरा पहाड़ों में शराब छम छम
ब्यो बारातों मा
मसाणों को कामकाजों मा छम छम
बरखण लगि झर झर
देस बिदेस हारे मेरो पहाड़ी बाज मारी
तुण्ड फुंड मा
पोड़ि हर पहाड़ी करम मा छम छम
देक ना देकि हुली तिल कख कख
मिल जै बी पी ले तू जख तख
नि हुनि थम थम
कन बगनी नि थमनि छम छम
आन्दु दिस शराब छम छम
ब्योखून दोपहरी मा शराब छम छम
रति सुबेर कु देक शराब छम छम
बोतलों पोतलों को धिंगतालो छम छम
छम छम शराब छम
बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

क्द्गा सौली दगडी
क्द्गा सौली दगडी
वि अप्डी कथा लगे देंदी
नानू सु जियू मेरो
कैकि बी छूईयों मा झट ऐजांदू
क्द्गा सौली दगडी ......
बल इत्गा ई सीख मिल
बल इत्गा मिथे समझ मा आई
फिर बी विंकी मुखडी
मेरा सुप्निया मा किलै की ऐ जांदी
क्द्गा सौली दगडी ......
झट रुसै झट मने मि जांदू
चट विंकी बगलि मा जा की बैस बी जांदू
फिर बी बालपण परित वा किले बिसरी जांद
ज्वानि का बाटा मा वा किले हीटे नि आंदु
क्द्गा सौली दगडी ......
सब थे पता चल जांदी
वींकी ठौर कख और्री क्या च
परी नानू जियू सी जियू मेरो
फ़िक्र कैकि तू इनि उड़दी रैंदु
क्द्गा सौली दगडी ...... २
बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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