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उत्तराखंड पर कवितायें : POEMS ON UTTARAKHAND ~!!!

Started by Dinesh Bijalwan, August 05, 2008, 02:18:42 PM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

वरिष्‍ठ गढ़वाळि कवि अर साहित्‍यकार, व्‍यंगकार श्री नरेन्‍द्र कठैत जी की रचना:-

कमीनौं पर चार पंग्ति....

द्वी मनख्यूं कि छ्वीं-बत्वा बीच जै तिसरा मनखी बात होंदि, वू वूंकि नजर मा कमीना होंदू। यां सि यि पता चल्दू कि दुन्या मा हरेक तिसरु मनखी कमीना होंदू। ये हिसाब से त दुन्या मा भला मनखी जादा अर कमीना कम होण चहेणा छा। पर बात स्या नी। दरसल वू तिसरु जु हमारि नजर मा भलू मनखी गिण्ये जांदू , वू बि चुप नी रौंदू। वू वूंकि बुरै, कै हैंका कन्दूड़ू मा भ्वनू रोंदू।

कविवर प्रणाम,

कमीनौं कू ख्‍याल किलै,
आपका मन मा आई,
क्‍या कै कमीनान आपकु मन दुखाई,
कमीनौं की मार सी सबक सिखिक,
हम्‍न सदानि कदम अग्‍नै बढ़ाई,
कमीना त कमीना होन्‍दन,
जौनं सदानि मनख्‍यौं की मवासी,
धार लगाई गाड बगाई.....

-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
मेरा कविमन कू कबलाट
5.10.2015

Bhishma Kukreti

Modern Garhwali Folk Songs, Poems

रूप कैको  (डा चातक की स्मरणीय कविता )

-
रचना --    स्वर्गीय डा गोविन्द चातक    ( जन्म  - 1933,-  लोस्तु , बडियार गढ़ , टिहरी गढ़वाल  )
Poetry by - Dr Govind Chatak

( विभिन्न युग की गढ़वाली कविताएँ श्रृंखला )
-
इंटरनेट प्रस्तुति और व्याख्या - भीष्म कुकरेती

-
आज अंख्यों मा रूप कैको जोन्याळी सी छाये ,
फेर बाडळी बणीक कुई आज मैं मू -सी आये।
ऐंन आँसुन भीजीं कैकी द्वी आंखी वो गीली ,
फ्यूंळी की पाँखुड़ी सी , मुखड़ी स्या कैकी पीली।
फफरांदा होंठ ऐन वो लाज से जना झुक्यां ,
प्यार का वो बोल ऐन मुख मा ही रुक्यां।
सुखी गाड -सी मेरी जळी जिकुड़ी ऐंच ,
सौंण की रोंदेड़ कुयेड़ी या कैन बुलाये ?
डूबी गैन अँध्यारा मा डांडी-काँठी भरेण लैगे उदासी ,
मेरी ही तरौं लटकिगे पीठ फेरीक सूरज सो प्रवासी।
फूलूं की पंखुड्यों की सेज मा देख बथौं यो ओंगण लैगे ,
निराशेक कैकी जाग मा थकीक विचारी जोन स्यैगे।
सुपिनों मा खोयेगी जिकुड़ी स्यां स्यां कर्दी गाड की ,
अगास की अंग्वाळ मा सर्किगे धरती ब्यौली सी लाड की।
जिंदगी छळेन्दी औणी छ जनो ओडार को -सी घाम।,
मैं कू तेरी याद लीक कनी या अँध्यारी रात आये।


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( साभार --शैलवाणी , अंग्वाळ )
Poetry Copyright@ Poet or poet's heirs
Copyright @ Bhishma Kukreti  interpretation if any

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पौड़ी गढ़वाल, उत्तराखंड  से गढ़वाली लोकगीत , कविता ; चमोली गढ़वाल, उत्तराखंड  से गढ़वाली लोकगीत , कविता ; रुद्रप्रयाग गढ़वाल, उत्तराखंड  से गढ़वाली लोकगीत , कविता ;टिहरी गढ़वाल, उत्तराखंड  से गढ़वाली लोकगीत , कविता ;उत्तरकाशी गढ़वाल, उत्तराखंड  से गढ़वाली लोकगीत , कविता ; देहरादून गढ़वाल, उत्तराखंड  से गढ़वाली लोकगीत , कविता ;

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  स्वच्छ भारत ! स्वच्छ भारत ! बुद्धिमान भारत !

Bhishma Kukreti

Modern Realistic Garhwali Folk Songs, Poems


कीडू कि ब्वै    ( स्व  कन्हैयालाल डंडरियाल की असलियतवादी  कविता )
-
रचना --    स्वर्गीय कन्हैयालाल डंडरियाल       ( जन्म  - 1933   , नैली , मवाळस्यूं , पौड़ी गढ़वाल  )
Poetry  by - Kanhaiyalal Dandriyal

( विभिन्न युग की गढ़वाली कविताएँ श्रृंखला )
-
इंटरनेट प्रस्तुति और व्याख्या - भीष्म कुकरेती

-
पोरु का साल /ये बसग्याळ/ आजै ब्याळि ,
रकर्याणी छै /ह्यरान्द कीडू कि ब्वै।
भूख अर नांग /मळसा कि मांग ,
काळो कुयेडी /तींदी गतूड़ी /भिजीं /रुझीं
कुछ बरखल /कुछ आँसुल
आंदि छै फजलै ब्यखुनि ह्यरां द  कीडू कि ब्वै
घुरप्वळी   पंद्यरि पांड /क्वलणो छवाया
उबर कमळी कत्तर /पट तिखंडा भितर
यखुल्या यखुली /बयाणी रैन्दि छै / ह्यरां द  कीडू कि ब्वै
डोर्यों कि भिंजकी /भांडों का खपटण
ढकीण डिसाणा अंदड़ा /द्वी चार झुल्ली की ल्वतगी
अर भितर फुंड /बक्कि बातै /हडगौं थुपड़ि
ह्यरां द  कीडू कि ब्वै  / उनि झंड /उनि तींदो खैड़ /चस्स ऐड़ो /टुट्यूं  दैड़ो
एक कूणी पर /जड्डल खुकटाणी
रुणि रैन्दि छै/ ह्यरां द  कीडू कि ब्वै।
पोस्टमैन भैजिम /यकनात कै चलि जान्दि छै
आंदो जान्दो मु पुछदि छै
लुखु करौंक देखीइ /प्राण सस्यांदि छै
ह्यरां ! कबि म्यारु बि ब्वारि ल्हेकी /खुचलि पर एकाध
इनि गैणा-गांठा गठ्याणी छै /ह्यरां द  कीडू कि ब्वै
दिल्ली का बीच /कीडू बड़ो आदिम चा
ब्वारी बि चीज प्वडीं च /निपल्टु समझा
लोक ब्वदीं /मिल बि सूण /गगळान्दि बाच /कीडू    .... कीड़   ...
धै लगांद /वै खंद्वार
बिचरी भलि अदमेण छै /ह्यरां द  कीडू कि ब्वै। 
-
( साभार --शैलवाणी , अंग्वाळ )

Poetry Copyright@ Poet
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पौड़ी गढ़वाल, उत्तराखंड  से गढ़वाली लोकगीत , कविता ; चमोली गढ़वाल, उत्तराखंड  से गढ़वाली लोकगीत , कविता ; रुद्रप्रयाग गढ़वाल, उत्तराखंड  से गढ़वाली लोकगीत , कविता ;टिहरी गढ़वाल, उत्तराखंड  से गढ़वाली लोकगीत , कविता ;उत्तरकाशी गढ़वाल, उत्तराखंड  से गढ़वाली लोकगीत , कविता ; देहरादून गढ़वाल, उत्तराखंड  से गढ़वाली लोकगीत , कविता ;


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Modern Garhwali Sad Folk Songs, Sad Poems


रामदेई  ( नित्यानंद मैठाणी की  करूँ रस वळी कविता )
-
रचना --    नित्यानंद मैठाणी     ( जन्म  - 1934 , श्रीनगर , गढ़वाल       )
Poetry  by - Nityanand Maithani

( विभिन्न युग की गढ़वाली कविताएँ श्रृंखला )
-
इंटरनेट प्रस्तुति और व्याख्या - भीष्म कुकरेती

-

  छोट्या मा देखि छौ त्वै रामदे
अब नि छै कख छै बता हे रामदे।
धोती थेगळया चिर्रीं आंगड़ी टूटीं हंसुळी
थेंचीं बुजणी खोंसी मोसी छै रामदे।
कैरी आँखि तिरछा   घुंडा बाळ फुबत्यां
बर्ड बरड़ करो लबरा जनी छै रामदे।
छतकोट का वे पौड़ मा पड़ीं रौ
कुछ न कुछ सुणावो रामदे।
वींन गाये तीलाधारु बम सरीला
तब चिड़ावन छोरा त्वे तैं रामदे।
सिन्नगर से पौड़ी जांदू उंद औंदू
क्वी न देखु पर तु देखि रामदे।
ठुल्ला छवाळा नौना बाळा हम क्य जाणां
तब तु छै अस्सी का धोरा रामदे।
हम गयाँ संगता रिट्या कख कख घुम्यां
तू पड़ीं रै डाळा निस्सा रामदे।
क्वी बि दे द्यो नी बि द्यो क्वी बात नी
कुछ नि छै पर छै मयाळदु रामदे
बरसूँ पैथर जब गयों वख खुद्यूं मैं
तब नि पाये हाय से गए रामदे।
याद औंद थोळळी गिच्ची काठगी गौळी
ओड्यार मा बी भौण भरद्यो रामदे।
कमर झुकड़ी लाथो टेकू सुट्ट ट सुट्ट
उंद आवो उब्ब जावो रामदे।
आज सब सुख मा दुखी च नित्यानंद
तू नि पाये कुछ नि पाये रामदे


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( साभार --शैलवाणी , अंग्वाळ )
Poetry Copyright@ Poet
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Modern Garhwali Sad  Folk Songs, Poems

फांस  (शेरसिंह गढ़देशी की करुणायुक्त कविता )

-
रचना --  शेर सिंह गढ़देशी ' ( जन्म  - 1934 , श्रीकोट , कटळस्यूं   )
Poetry  by - Sher  Singh Garhdeshi )

( विभिन्न युग की गढ़वाली कविताएँ श्रृंखला )
-
इंटरनेट प्रस्तुति और व्याख्या - भीष्म कुकरेती

-
काळो रंग रै ब्वै मेरो दुश्मन
बिंवाळी नी सौकि ब्वै स्वामी को मन
मेरा बाना रै ब्वै उंकू बारमास
परदेश बास ब्वै जिकुड़ी उदास
छोड़िक अपणी कळेजी टुकड़ी
खाणु छौं फांस ब्वै गळा बाँधि ज्यूड़ि
ज्यूंदि रैक मेरि मा अब्बि बटि मिन
कैको बुरो मेरि ब्वै क्यां कु जि कन्न
मेरो रैबार तुम मेरि डाळयूं
बोलि दियां मेरी गौं कि दीदि भुल्यूं
थुपथेक मेरा तुम छोप धार्यां
कोळयूँ मा अपणी अपणौ बैठान
  पर धोरा मेरा भी बैठण द्यान

... ....

स्वामी जी मेरा जब घर आला
बोलि दीयां उमा जु याद करला
कि नी देइ सौकि तुम सणि सुख
भूली जयां स्वामी मेरी दीयुं दुःख
समझि सकिल्यात मेरा ना भुलान
कि , अब पसंदौ ब्यौ करि ल्यान



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( साभार --शैलवाणी , अंग्वाळ )
Poetry Copyright@ Poet
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

मुझे मेरे गांव का
त्योहार याद आ गया
तुम्हारी दीपावली
हमारा बग्वाल आ गया
मुझे मेरे गांव का
त्योहार याद आ गया
तुम्हारे लिये मिलावटी बर्फी
मिठाईयों का त्योहार आ गया
हमारे पहाडों मे घी की गुंदकी
अर सुवाल पक्वडीयुं की रस्यांण लेके आ गया
मुझे मेरे गांव का
त्योहार याद आ गया
शहरों मे अमीरों के लिये
पीने का बहाना लेके आ गया
मेरे पहाडों मे अमीर गरीब
सबको मिलाने बग्वाल आ गया
मुझे मेरे गांव का
त्योहार याद आ गया
तुम्हारे शहरों मे डींजे
ध्वनी प्रदुषंण लेके आ गया
वायु मंडल को दुषित करने
पटाखों का धुंवा छा गया
मुझे मेरे गांव का
त्योहार याद आ गया
तुम्हारी तो लडियां जलाने गुल होती
बिजली का सहारा आ गया
हमारे पहाडों मे सदाबहार
मुछ्यल.दीवाछलों का बगत आ गया
मुझे मेरे गांव का
त्योहार याद आ गया

सर्वाधिकार@सुदेश भटट(दगडया)की देशी दगडयों कुन समर्पित पंक्ति

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

आज टक मेरी फिर
गांव अपंणी लैगे
खुशियों कु त्योहार दीदों
लेकी बग्वाल यैगे
आज टक मेरी फिर
ढौल दमौ की रस्यांण
घ्यु की गुंदकी याद यैगे
पुरी पक्वड गरम श्वाल
दीदों याद यैगे
आज फिर टक मेरी
सजे धजे की बाडी झंग्वरु
गौरु ते खलौंण की याग यैगे
सिंगीयुं पर तेल लगांण
गल्यों की जोडी याद यैगे
आज टक मेरी फिर
बन बन की मिठायुं की
कन याद यैगे
हाथी घ्वाडा शेर मशीन
सौब याद यैगे
आज टक मेरी फिर
दीदी भूली मेरी सौब
मैत अयीं जयीं होली
मुडी ख्वाल मथी ख्वाल
काकी बडीयुं पन भिट्यांणा होली
आज टक मेरी फिर
दगडया भग्यान भी म्यार
छुट्टी अयां ह्वाल
बग्वली की रस्यांण मा रंगमत
ढौल दमों मा नचंणा ह्वाल
आज टक मेरी.......

सर्वाधिकार सहित @सुदेश भटट(दगडया) की बग्वली की शुभकामनाओं की दगड (फोटो साभार सत्येश्वर प्रसाद जोशी जी)

Bhishma Kukreti

Modern Garhwali Folk Songs, Poems


झंडारोहण  ( डा पार्थसारथी डबराल की  चोट करती कविता )
-
रचना --  स्व . डा पार्थ सारथि डबराल   ( जन्म  - 1936, तिमली , डबरालस्यूं ,पौड़ी गढ़वाल   )
Poetry  by - Dr. Partha Sarthi Dabral

( विभिन्न युग की गढ़वाली कविताएँ श्रृंखला )
-
इंटरनेट प्रस्तुति और व्याख्या - भीष्म कुकरेती

-
फ्यफना अळगै अळ गै की
गांधी चौक की दांदण माँ
खड़ु ह्वे की
मीन राष्ट्रीय झंडा को डोर
लौंफ्याण चाई।
पर झंडा की डोर
लौंंफ्याँण मा नि   आई।
कथगा कोशिस करे
तकणे तकणे को मोरी ग्यों
अस्यो ऐगे ,
पर झंडा की डोर
जखा कि तक्खि रैगे
झंडा मुक्त ह्वेकी ,
आकाश मा फफराणु छयो
मीन तिरंगा कु बोले
"चुचा मितै भी अपणी
डोर पकड़णी दे !
जनता माँ मितै भी
नेतौं की तरौं
अकड़ण दे। "
झंडा आकाश माँ
खित खितै की
हँसे अर बोले -
" तू क्य फफरैलो
मितै रे !
सन्नपति माँ सि
क्या बोलणु छे रै !
मुर्ख तू स्वछंद छै
स्वतंत्र नी छै !
स्वछँदता देखिकी
मी बितकुदो छौं
एक बार फिर मितै फफरैकी देख धौं
तू निक्कमू अर बुरु छै
तू निगुरु छै
गाड जैकी तुतै गाड नि अड़ाए
भ्याळ जैकी तुतै भ्याळ नि पढ़ाए
अपणी समस्यौं की फंची
तू मुंड माँ धरीक
कमर तै हिंगोड़ सी मोड़िक
तू क्वकड़ी क्वकड़ी चलणु छै !
त्वेन आकाश को विस्तार
कख देखि रे !
तब तेरु क्य काम मेर धोरा
तू मितै नि लौन्फ़े
सकदी रे छोरा।
तू दुसरु का वास्तs
भगवान क रच्यूं छै !
पर आज तू अफुकुणी ही
बच्युं छै !
इन बच्यूं से तs नि बच्यूं ठीक ,
तू ऐ तs सै मेरs नजदीक !
हे ग्वबडू बुकाण वाळो
मै तैं नि पै सकदो
तेरो छैलो
तू मितैं क्या लौंफ़ेलो !
इन्नो बचिकी क्या करिलो रे !
मौत देखीक कब तक डरीलो रे !
छोरा !
जै दिन तक मौत खुद नि मरदी !
वै दिन तक क्वी बच्यूं नी।
जै दिन मरघट ही मर जालो
वैदिन मनखी अमर ह्वै जालो !
पर ,

यु मरघट मरण वाळ  नी
मरलो भी त
सब्बुं  तैं मारिकी मरला
फिर
क्या पड़्यूं छै
सिल्ली ओबरी
......
तू क्या लौंफेलो  मितैं रे बोनू!
तू क्या फफरैलो मितैं रे नौनू !



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( साभार --शैलवाणी , अंग्वाळ )
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झंडारोहण ( डा पार्थसारथी डबराल की चोट करती कविता )
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रचना -- स्व . डा पार्थ सारथि डबराल ( जन्म - 1936, तिमली , डबरालस्यूं ,पौड़ी गढ़वाल )
Poetry by - Dr. Partha Sarthi Dabral
( विभिन्न युग की गढ़वाली कविताएँ श्रृंखला )
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फ्यफना अळगै अळ गै की
गांधी चौक की दांदण माँ
खड़ु ह्वे की
मीन राष्ट्रीय झंडा को डोर
लौंफ्याण चाई।
पर झंडा की डोर
लौंंफ्याँण मा नि आई।
कथगा कोशिस करे
तकणे तकणे को मोरी ग्यों
अस्यो ऐगे ,
पर झंडा की डोर
जखा कि तक्खि रैगे
झंडा मुक्त ह्वेकी ,
आकाश मा फफराणु छयो
मीन तिरंगा कु बोले
"चुचा मितै भी अपणी
डोर पकड़णी दे !
जनता माँ मितै भी
नेतौं की तरौं
अकड़ण दे। "
झंडा आकाश माँ
खित खितै की
हँसे अर बोले -
" तू क्य फफरैलो
मितै रे !
सन्नपति माँ सि
क्या बोलणु छे रै !
मुर्ख तू स्वछंद छै
स्वतंत्र नी छै !
स्वछँदता देखिकी
मी बितकुदो छौं
एक बार फिर मितै फफरैकी देख धौं
तू निक्कमू अर बुरु छै
तू निगुरु छै
गाड जैकी तुतै गाड नि अड़ाए
भ्याळ जैकी तुतै भ्याळ नि पढ़ाए
अपणी समस्यौं की फंची
तू मुंड माँ धरीक
कमर तै हिंगोड़ सी मोड़िक
तू क्वकड़ी क्वकड़ी चलणु छै !
त्वेन आकाश को विस्तार
कख देखि रे !
तब तेरु क्य काम मेर धोरा
तू मितै नि लौन्फ़े
सकदी रे छोरा।
तू दुसरु का वास्तs
भगवान क रच्यूं छै !
पर आज तू अफुकुणी ही
बच्युं छै !
इन बच्यूं से तs नि बच्यूं ठीक ,
तू ऐ तs सै मेरs नजदीक !
हे ग्वबडू बुकाण वाळो
मै तैं नि पै सकदो
तेरो छैलो
तू मितैं क्या लौंफ़ेलो !
इन्नो बचिकी क्या करिलो रे !
मौत देखीक कब तक डरीलो रे !
छोरा !
जै दिन तक मौत खुद नि मरदी !
वै दिन तक क्वी बच्यूं नी।
जै दिन मरघट ही मर जालो
वैदिन मनखी अमर ह्वै जालो !
पर ,
यु मरघट मरण वाळ नी
मरलो भी त
सब्बुं तैं मारिकी मरला
फिर
क्या पड़्यूं छै
सिल्ली ओबरी
......
तू क्या लौंफेलो मितैं रे बोनू!
तू क्या फफरैलो मितैं रे नौनू !

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( साभार --शैलवाणी , अंग्वाळ )
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स्वच्छ भारत ! स्वच्छ भारत ! बुद्धिमान भारत !

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कीडू कि ब्वै ( स्व कन्हैयालाल डंडरियाल की असलियतवादी कविता )
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रचना -- स्वर्गीय कन्हैयालाल डंडरियाल ( जन्म - 1933 , नैली , मवाळस्यूं , पौड़ी गढ़वाल )
Poetry by - Kanhaiyalal Dandriyal
( विभिन्न युग की गढ़वाली कविताएँ श्रृंखला )
-
इंटरनेट प्रस्तुति और व्याख्या - भीष्म कुकरेती
-
पोरु का साल /ये बसग्याळ/ आजै ब्याळि ,
रकर्याणी छै /ह्यरान्द कीडू कि ब्वै।
भूख अर नांग /मळसा कि मांग ,
काळो कुयेडी /तींदी गतूड़ी /भिजीं /रुझीं
कुछ बरखल /कुछ आँसुल
आंदि छै फजलै ब्यखुनि ह्यरां द कीडू कि ब्वै
घुरप्वळी पंद्यरि पांड /क्वलणो छवाया
उबर कमळी कत्तर /पट तिखंडा भितर
यखुल्या यखुली /बयाणी रैन्दि छै / ह्यरां द कीडू कि ब्वै
डोर्यों कि भिंजकी /भांडों का खपटण
ढकीण डिसाणा अंदड़ा /द्वी चार झुल्ली की ल्वतगी
अर भितर फुंड /बक्कि बातै /हडगौं थुपड़ि
ह्यरां द कीडू कि ब्वै / उनि झंड /उनि तींदो खैड़ /चस्स ऐड़ो /टुट्यूं दैड़ो
एक कूणी पर /जड्डल खुकटाणी
रुणि रैन्दि छै/ ह्यरां द कीडू कि ब्वै।
पोस्टमैन भैजिम /यकनात कै चलि जान्दि छै
आंदो जान्दो मु पुछदि छै
लुखु करौंक देखीइ /प्राण सस्यांदि छै
ह्यरां ! कबि म्यारु बि ब्वारि ल्हेकी /खुचलि पर एकाध
इनि गैणा-गांठा गठ्याणी छै /ह्यरां द कीडू कि ब्वै
दिल्ली का बीच /कीडू बड़ो आदिम चा
ब्वारी बि चीज प्वडीं च /निपल्टु समझा
लोक ब्वदीं /मिल बि सूण /गगळान्दि बाच /कीडू .... कीड़ ...
धै लगांद /वै खंद्वार
बिचरी भलि अदमेण छै /ह्यरां द कीडू कि ब्वै।
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( साभार --शैलवाणी , अंग्वाळ )
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