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Tough Life of Women In Uttarakhand - पहाड़ की नारी का कष्ट भरा जीवन

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 17, 2007, 11:42:20 AM

पहाड़ी महिलाओ के दयनीय जीवन के लिए कौन जिम्मेवार ?

Conservative Rules of Society
4 (57.1%)
Geographical Condition
3 (42.9%)
Education
3 (42.9%)
Can't say
1 (14.3%)

Total Members Voted: 7

Voting closed: January 15, 2008, 11:42:20 AM

पंकज सिंह महर




हे पर्वत नारि, तेरा क्या कहना,
हरदम मुस्कुराना और हर दुःख सहना।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720



The main reason for women tough life is field work and then house hold works. She has to get-up early before sun rise and then look after many work. Some of the routine works :-

        -    Fetching of water from natrual resouces
       -     Sweeping of house and cattale living place
       -     Getting the children ready for school, preparing the breakfast
       -     Then starts the tough working in fields and carrying grass etc
       -     They have to cook the food
      -      The again going field to work whole day there
       
The becomes more tough in harvest time.

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


See this sad news.
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पहाड़ी से गिरकर महिला की मौत
Oct 27, 06:21 pm
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बागेश्वर: थाना झिरौली के अंतर्गत ग्राम भटखोला निवासी घास काटने जंगल गयी महिला की पहाड़ी से गिर जाने से दर्दनाक मौत हो गयी है। पुलिस ने शव कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के उपरांत परिजनों को सौंप दिया है। थानाध्यक्ष जीएल शाह ने बताया कि भटखोला निवासी तारा देवी (23)पत्नी प्रकाश पंत बुधवार की सुबह घास काटने उडेरखानी के समीप जंगल में गयी थी। वहां उसकी एडि़या गधेरे में गिर जाने से दर्दनाक मौत हो गयी। इस घटना की सूचना खांकर निवासी ईश्वरी दत्त जोशी ने पुलिस को दी। बताया जा रहा है कि मृतका तारा देवी की विगत 5 माह पूर्व ही शादी हुई थी।

(Source Dainik Jagran)

पंकज सिंह महर

  दैनिक जागरण के लिये देहरादून से दिनेश कुकरेती,      करीब बीस साल बाद अपने गांव जाने का मौका मिला। एक छोटे से कस्बाई बाजार में हमारा बस स्टाप पड़ता है, जहां से करीब तीन मील की उंदार (उतराई) में हमारा गांव है। बस से उतरते ही कुछ देर सुस्ताने के बाद गांव की पगडंडी पकड़ ली। मन में तरह-तरह के खयाल आ रहे थे। सालों बाद गांव को देखने की उत्कंठा भी हिलौरें ले रही थी। खैर, इसी उधेड़बुन में मैं तीन मील का सफर आराम से कट गया। अब गांव नजर आने लगा था। पास ही धारे (जलस्रोत) में बर्तनों की खनक सुनाई दे रही थी। दो बुजुर्ग महिलाएं वहां पानी भर रही थीं। मैं जैसे ही धारे के पास पहुंचा, एक महिला बोली- कै गौंकु छै भुल्ला (किस गांव का है भुला)। वह महिला पहचानने की कोशिश भी कर रही थी। खैर, मैं उन्हें पहचान गया। मेरे ही गांव की बचुली काकी थी वह। परिचय देने पर काकी की आंखें डबडबा गई। अब बिसनी काकी भी मुझे पहचान गई थी। बरसों बाद किसी अपने से मिलने की खुशी क्या होती है, मैंने तब जाना। खैर मैं उनकी सुनते, अपनी सुनाते गांव की ओर डग भरने लगा। साथ ही सोचता भी जा रहा था, झूठ बोलते हैं वो, जो कहते हैं राज्य बनने के बाद पहाड़ की महिलाओं के हालात बदल गए। बीस साल पहले भी बचुली व बिसनी काकी इसी धारे से पानी ले जाती थीं और आज भी। गांव पहुंचा तो लगा जैसे कल ही गांव छोड़ा है। मित्रों यह सिर्फ मेरे गांव की ही तस्वीर नहीं है। पहाड़ के अधिकांश गांव अब भी ऐसे ही हैं। तब गांव में मर्द नजर आ भी जाते थे, लेकिन अब तो कुछ बूढ़े ही रह गए हैं। बस, कुछ बुजुर्ग महिलाएं ही रह गई हैं पहाड़ सरीखी जिंदगी को ढोने के लिए। गरीबी के कारण गांव में रहना मजबूरी है। जो आर्थिक रूप से ठीकठीक लोग थे, उन्होंने कस्बों में घर बना लिए। वहीं छोटा-मोटा कारोबार भी शुरू कर दिया। पर, जिसके पास कुछ नहीं है उसकी तो मजबूरी है इस कूपमंडूक में पड़े रहना। यह ठीक है कि इन विषम हालात में भी पहाड़ की बेटियां विभिन्न क्षेत्रों में सफलता के सोपान गढ़ रही हैं, लेकिन इनकी संख्या है ही कितनी। अंगुलियों में गिने जाने लायक। बीसियों गांवों में अब भी लड़कियां आठवीं-दसवीं से आगे नहीं पढ़ पा रहीं। फिर कैसे तुलना की जा सकती है दून, हल्द्वानी या ऐसे ही चंद शहरों की बेटियों से इन पहाड़ की बेटियों की। उनके लिए क्या नौ नवंबर, क्या पंद्रह अगस्त और क्या छब्बीस जनवरी। सुबह से शाम तक काम ही काम है। आप शहर में बैठे हैं, इसलिए कह सकते हैं कि अपने हक के लिए उन्हें जागना होगा, तभी पहाड़ के हालात बदलेंगे। काश! आप यह जान पाते कि पहाड़ की नारी यदि जाग नहीं रही होती तो पहाड़ कब के दरक चुके होते। यह ठीक है कि पंचायतों में 50 फीसदी भागीदारी मिलने से पहाड़ की फिजां बदली-बदली सी नजर आ रही है, लेकिन यह आधा सच है। पंचायतों में भागीदारी के बावजूद विकास में भागीदार अब भी नारी नहीं है। वह पहले घर में मूकदर्शक थी और अब पंचायतों में। इसीलिए अमूमन होता वही है, जो पति प्रधान चाहते हैं। ठंडे दिमाग से सोचें तो दोषी पति प्रधान भी नहीं हैं। वह तो अपने संस्कारों को ढो रहे हैं। यही वजह हैं कि पंचायतें योजनाएं बनाने का मंच कम और कॉस्मेटिक आइटम की दुकान ज्यादा नजर आती हैं। हम यह नहीं कह रहे कि सब जगह तस्वीर ऐसी ही धुंधली है। कई जगह तो महिला प्रतिनिधियों की सोच ने विकास का नए आयाम दिए हैं। उन्होंने अहसास कराया कि समाज की दशा और दिशा बदलने की कुव्वत उनमें है, लेकिन मित्रों यह भी सच है कि ऐसी पंचायत प्रतिनिधियों की तादाद अंगुलियों में गिने जाने लायक है। असल में महिलाओं के पंचायतों में आ जाने से उनके हालात नहीं सुधरने वाले। इसके लिए तो नीति-नियंताओं को बुनियाद से पहल करनी होगी और बुनियाद तभी मजबूत हो सकती है जब वह शिक्षा, स्वास्थ्य व रोजगार की ईटों पर टिकी हो।   

हेम पन्त


Devbhoomi,Uttarakhand


50 प्रतिशत आरक्षण के बाद भी नही सुधरी महिलाओं की दशा
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अल्मोड़ा: विकासखण्ड भैंसियाछाना के मुख्यालय में महिला जनप्रतिनिधियों की एक दिवसीय मीडिया कार्यशाला आयोजित की गई। कार्यशाला में महिला जनप्रतिनिधियों ने अपने ढाई वर्ष के कार्यकाल के अनुभवों को मीडिया के सामने रखा।

इस दौरान आयी परेशानी, असुविधाओं व काम कराने के दौरान ब्लाक के चक्कर लगाने को लेकर महिलाओं ने विस्तार से बताया। इस बात को लेकर महिला पंचायत प्रतिनिधियों में नाराजगी थी कि ब्लाक प्रमुख उन्हें कम ही मिलती है। कभी भी प्रमुख ने चुनाव जीतने के बाद ग्रामीण क्षेत्रों का भ्रमण नहीं किया। बल्कि इतनी बड़ी आपदा के बाद महिला ब्लाक प्रमुख होने के बाद भी महिलाओं की सुध नहीं ली। उनका कहना था कि पंचायतों में 50 प्रतिशत महिलाओं के आरक्षण व ब्लाक प्रमुख महिला होने के बाद भी पिछले ढाई वर्षो में ब्लाक मुख्यालय में अभी तक महिलाओं के लिए प्रसाधन का कोई जरिया नहीं है। उन्हें कई बार पूरे दिन ब्लाक में रहना पड़ता है। प्रसाधन की सुविधा न होने के कारण भारी असुविधाओं का सामना करना पड़ता है।

महिला जनप्रतिनिधियों ने गांव में राशन की आपूर्ति न होने, पानी की असुविधा, विद्युत अव्यवस्था, धौलछीना में शिक्षकों की कमी की भी दिक्कतों को मीडिया के सम्मुख रखा। इसके अतिरिक्त ग्रामीण क्षेत्रों में जंगली सूअरों, बंदरों व अन्य जानवरों द्वारा खेती के नुकसान को लेकर भी गहरी चिंता जताई। इस मौके पर महिला हाट की सचिव कृष्णा बिष्ट ने कार्यशाला के उद्देश्यों की चर्चा करते हुए आपदा राहत की धीमी गति पर नाराजगी जताई। इस कार्यक्रम में राधिका सुयाल, मुन्नी रावत, हेमा भंडारी, गंगा देवी, राजू कांडपाल, गीता पांडे, पुष्पा टम्टा, दीपा कोरंगा, केशर सिंह बिष्ट, हीरा बल्लभ गहतोड़ी, रमेश पंत सहित अनेक लोग मौजूद थे।

http://in.jagran.yahoo.com

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


During my recent visit to native place, i found that there was no much improvement in working style of womens in hill areas specially in field and day today house hold chores.

This is leading to migration from hills rapidly.




विनोद सिंह गढ़िया



पहाड़ की "चेली-ब्वारी" सर्दियों के मौसम में अपने मवेशियों के बिछौने के लिए जंगल से सूखी पत्तियां लाती हुई | जहाँ से ये इन पत्तियों को लाती हैं यह जंगल काफी घना होता है जिसे कुमाऊंनी भाषा में "पातल" कहते हैं |

Anil Arya / अनिल आर्य

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Anil Arya / अनिल आर्य