Author Topic: Some Ideal Village of Uttarakhand - उत्तराखंड राज्य के आदर्श गाव!  (Read 20544 times)

Bhishma Kukreti

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 नैल , मल्ला ढांगू की लोक कलाएं व लोक कलाकार

ढांगू  गढ़वाल संदर्भ में हिमालय  की  लोक कलाएं व भूले बिसरे कलाकार श्रृंखला  -  18
(चूँकि आलेख अन्य पुरुष में है तो श्रीमती , श्री व जी शब्द नहीं जोड़े गए है )
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संकलन - भीष्म कुकरेती

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नैल पूर्वी मल्ला ढांगू का जाना माना नाम है।  जब भी  बात की जाती है तो नैल रैंस नाम साथ साथ एते हैं और आज भी दोनो गाँवों की ग्राम सभा एक ही है।  नैल मुख्यतया बिंजौलाओं का गाँव है।  कहा जाता है कि बिंजोली (लैंसडाउन तहसील ) से दो भाई बिंजोला 10 साखी पहले (याने 200 वर्ष पहले करीब ) नैल में बसे थे।  आस पास के ठाकुर /राजपूतों ने पंडिताई व वैद्यगिरि हेतु बिंजालाओं को  यहाँ बसाया था।  बिंजोलाओं की विशेषता है कि बिंजोलाओं के पंडित बिंजोला ही होते हैं।  प्राचीन काल याने 1960 तक बिंजोला जसपुर के बहुगुणाओं से  कर्मकांड पंडिताई करवाते थे किंतु अमाल्डू के उनियालों से नहीं।  नैल रैंस  से बिंजोला जाति के लोग अन्य गाँवों जैसे पाली ,  हड्यथ , क्वाटा , शीला गाँवों में बसे। 
 नैल के निकटवर्ती गाँव हैं -कख्वन , परसुली , कलसी कुठार , मळ दबड़ा हैं व नैल की सीमा कड़ती से भी मिलती है।  कहा जा सकता है कि नैल रैंस  ढांगू डबरालस्यूं की सीमा पर है।
नैल (मल्ला ढांगू ) में भी लगभग सभी लोक कलाएं मिलती हैं जो ढांगू के अन्य गाँवों में मिलती हैं। 
कुछ लोक कलाएं व लोक कलाकारों  की सूचना निम्न प्रकार से मिली हैं  -
टाट पल्ल , निवार, ब्वान /झाड़ू  आदि निर्माण - चूंकि नैल एक कृषि प्रधान गाँव रहा है तो यहाँ के प्रत्येक परिवार टाट,  पल्ल , निसुड़ , निवार (स्योळ से रस्सी आदि ) , म्वाळ , मुणुक (छाता का विकल्प ) , टोकरियां , पगार चिणायी , आदि स्वयं करते थे।
लोहार - परसुली के सतुर परिवार
ओड(मकान निर्माण )  -कख्वन गाँव के सगुर , आनंदी परिवार
सुनार - स्वर्णकारिता हेतु जसपुर व पाली गाँव पर निर्भर
बढ़ई - कख्वन के जगबीर सिंह
टमटागिरी (गैर लौह धातु कला ) - जब तक पीतल , कांसा , ताम्बे के बर्तन मुरादाबाद /नजीबाबाद से  उपलब्ध न थे तब तक गैर लौह धातु बर्तन निर्माण हेतु जसपुर पर निर्भरता ।  घांडी , हुक्का हेतु 1970 तक जसपुर पर निर्भर व जसपुर मल्ला  ढांगू के गैणू राम प्रसिद्ध घांडी , हुक्का निर्माता थे। 
जागरी - राम प्रसाद बिंजोला
तांत्रिक - छोटे कार्य हेतु राम प्रसाद बिंजोला किन्तु बड़े कर्मकांड हेतु नैरुळ पर निर्भर
हंत्या जागरी - कख्वन के कुशला
औजी /ढोल बादक - परसुली के बच्ची दास , श्याम दास परिवार
बादी - बिजनी तल्ला ढांगू  के तूंगी बादी
डळया गुरु - रणेथ के परमा  नाथ परिवार
पंडित - रैंस के मायाराम बिंजोला व नैल के राम प्रसाद बिंजोला
मकान छत पत्थर (सिलेटी पत्थर ) खान व कलाकार - कुठार में व पत्थर निकासी , कटाई कलाकार - कुठार के ही कुतुर सिंह , प्रल्हाद सिंह।
नैल में कभी 7 तिबारियां थीं अब लगभग उजड़ ही गयीं हैं आनंद मणि  , गिरिजा दत्त , गौरी दत्त , राम प्रसाद बिंजोला की तिबारी प्रसिद्ध तिबारी थीं
मंदिर - कहा जाता है कि नैल में बिंजोलाओं से बसने से पहले ही नागराजा मंदिर था जो आम मकानों जैसे चिणा गया था याने छोटा किंतु पहाड़ी मकान जैसे।  अब परिवर्तन आ गया है।

सूचना  आभार - बेळमा नंद बिंजोला ,
Copyright @ Bhishma Kukreti , 2020
Folk Arts of Dhangu Garhwal ,Folk  Artisans of Dhangu Garhwal ;   ढांगू गढ़वाल की लोक कलायें , ढांगू गढ़वाल के लोक कलाकार 


Bhishma Kukreti

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मित्रग्राम के कृपा राम जखमोला की निमदारी में काष्ठ कला

मित्रग्राम ढांगू की  लोक कलाएं - 4
ढांगू गढ़वाल , हिमालय की तिबारियों /निमदारियों पर अंकन कला -12 
ढांगू  गढ़वाल संदर्भ में हिमालय  की  लोक कलाएं व भूले बिसरे कलाकार श्रृंखला  -  19
  Traditional House Wood Carving Art (Tibari, Nimdari) of Uttarakhand , Himalaya -19   
(चूँकि आलेख अन्य पुरुष में है तो श्रीमती , श्री व जी शब्द नहीं जोड़े गए है ) -
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संकलन - भीष्म कुकरेती

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 पिछले अध्यायों में मल्ला ढांगू  के  मित्रग्राम गाँव की लोक कलाएं , नारायण दत्त जखमोला की तिबारी , शेखरा नंद जखमोला की निमदारी का वर्णन हो चुका  है।  निमदारी  का प्रचलन 1950 के पश्चात् ही आया है।  निमदारी में व तिबारी में मुख्य अंतर् है कि तिबारी में पहली मंजिल के बरामदे के द्वार में काष्ठ कला मुखर कर आती है किन्तु निमदारी में पहली मंजिल के सभी कमरों के आगे भाग में लकड़ी के स्तंभ व जंगल होते हैं (अधिक्तर सामने ) .
 कृपा राम जखमोला (मथि ख्वाळ ) की निमदारी भी आम मकान जैसे ही है याने एक मंजिला मकान की छत पर उंधार की ओर सिलेटी पत्थर लगे होते हैं।  पत्थरीली छत का अगला भाग लकड़ी की प्लेटों /पटलाओं पर टिके  होते हैं व यह पटले लकड़ी के दास पर टिके होते हैं ।  पहली मंजिल पर सामने छज्जा पत्थर का या लकड़ी का होता है व लकड़ी या पत्थर के दासों  (टोड़ी ) पर टिके होते हैं। आज स्व कृपाराम जखमोला की निमदारी  को स्व रूप चंद्र जखमोला (पुत्र कृपाराम ) की निमदारी कहा जाता है। 
    कृपाराम के मकान पर  तल मंजिल में तीन कमरे व ऊपर पहली मंजिल पर दो बरामदे लग रहे हैं।  पहली मंजिल पर सामने की ओर काष्ट छज्जा हैं।  छज्जा मिटटी पत्थर के दो स्तम्भों व दासों पर  टिके   है।  दोनों मिट्टी पत्थर के स्तम्भ मकान के दोनों किनारों पर हैं।     इन स्तम्भों के ऊपर आयताकार लम्बी कड़ी है और इस कड़ी के नीचे काष्ठ दास  दिख रहे हैं।  इस कड़ी से आठ  स्तम्भ वर्टिकली ऊपर जाते हैं जो ऊपर छत के पटलाओं के आधार कड़ी से मिलते हैं।  छत के पटलों के नीचे भी भूमि के समानांतर कड़ी है व इस कड़ी से ही लकड़ी के संतभ मिलते है। 
ये काष्ठ स्तम्भ सीधे सपाट है व केवल ज्यामितीय कला दर्शन होते हैं कहीं भी परालरीतिक , मानवीय कला के दर्शन इन स्तम्भों या कड़ियों में मिलते हैं
तल मंजिल में तीन कमरों में से दो कमरों के द्वार सपाट कला युक्त हैं।  तीसरे कमरे के द्वार में ज्यामितीय कला मुखर कर आया है।  पहली मंजिल पर भी कमरों के द्वारों व खड़कियों में केवल ज्यामितीय कला मिलती है।
कृपाराम जखमोला की निमदारी में पहली मंजिल पर धातु की प्राकृतिक कला लिये हुआ जंगले  हैं। 
कहा जा सकता है कि कृपाराम जखमोला की निमदारी भी आम सामन्य निमदारी जैसे ही है जिसमे काष्ठ कला केवल ज्यामितीय कला दर्शित होती है और किसी भी प्रकार की प्राकृतिक अथवा मानवीय कला के दर्शन नहीं होते हैं जैसे मित्रग्राम में ही स्व शेखरानन्द की निमदारी है। 
   

सूचना व छायाचित्र आभार : आशीष जखमोला मित्रग्राम
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Copyright @ Bhishma Kukreti , 2020
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Bhishma Kukreti

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मसोगी  में जोगेश्वर प्रसाद व चैतराम डबराल की  की तिबारी में भवन काष्ठ कला

डबरालस्यूं  संदर्भ में गढ़वाल , हिमालय की भवन काष्ठ कष्ट कला -1
  उत्तराखंड , हिमालय की भवन की तिबारी में  काष्ठ अंकन की लोक कला ( तिबारी अंकन )  -  20
Traditional House Wood Carving Art (Ornaments ) in   Tibari of Masogi, Dabralsyun Uttarakhand , Himalaya -  20

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 संकलन - भीष्म कुकरेती


मुख्यतया डबरालों का गाँव मसोगी डबरालस्यूं -उदयपुर पट्टी के सीमावर्ती गाँव है।  मसोगी के उत्तर पूर्व में कूंतणी व दक्षिण पश्चिम में हिंवल नदी है व पश्चिम में खमण (बगुड्या ) की सीमा भी है।
 मसोगी में लगभग वही सभी लोक कलाएं प्रचलित हैं जो डबरालस्यूं , ढांगू , उदयपुर , अजमेर पट्टियों में प्रचलित हैं। 
 मसोगी में तिबारी संदर्भ में अभी तक जोगेश्वर प्रसाद -चैतराम डबराल की तिबारी की सूचना मिली है।  तिबारी पहली मंजिल पर स्थापित है व दुभित्या कमरों (एक कमरा आगे व एक पीछे वाला प्रकार )  की तिबारी है।  मसोगी की यह तिबारी सामन्य किस्म की तिबारी में सुमार होती है।
  जोगेश्वर -चैतराम डबराल की इस तिबारी में चार स्तम्भ (columns  ) हैं , और चारों स्तंभ तीन खोली /द्वार /द्वार बनाते हैं।  दो काष्ठ स्तम्भ मकान के दीवार को कड़ी (शाफ़्ट ) से जोड़ते हैं। 
प्रत्येक स्तम्भ उप छज्जे के उप्पर एक चौकोर पाषाण आधार पर आधारित है।  पाषाण आधार पर स्तम्भ का घटनुमा या पथ्वड़  नुमा आधार है जिसपर कलाकृति (संभवतया उलटा कमलाकृति ) अंकित है।  फिर इस घट्नुमा आकृति के बाद सीधी कड़ी  ऊपर चलकर  स्तम्भ शीर्ष जो एक समांतर पट्टी है से जुड़ता है।  यह समानंतर पट्टी /कड़ी  छत के आधार जो काष्ठ दास पर टिके हैं से मिलते हैं।  कहीं भी चाप नहीं है  याने स्तंभ , स्तम्भ शीर्ष की पट्टी में ज्यामितीय  कला ही मिलती है।  कहीं भी प्राकृतिक या मानवीय कला के दर्शन नहीं होते हैं। 
    जोगेश्वर प्रसाद -चैतराम डबराल के मकान की एक विशेषता उजागर होता है कि तल मंजिल पर कमरे के बाहर द्वार /खोळी शीर्ष (मुण्डीर ) में पाषाण चाप दर्शनीय है।  आंतरिक चाप (intrados ) ट्यूडर (Tudor ) नुमा चाप है। ट्यूडर से बाहर आकृति सुडौल है। 
 कहा जा सकता हो कि  जोगेश्वर प्रसाद -चैतराम डबराल के मकान की तिबारी में कला केवल जायमितीय कला ही दर्शित होती है एक स्थान में प्राकृतिक कला दर्शनीय है।  मकान के तल मंजिल के एक कमरे  के द्वार  (खोली ) में  पाषाण चाप  (मेहराब ) बिलकुल अलग विशेषता लिए है। 
मकान लगभग 1925 के बाद का ही लगता है। 
अब यह जीर्ण शीर्ण तिबारी आखरी सांस ले रही है।  ऐसी तिबारियों को बचाना आवश्यक है किन्तु कौन बचाएगा ?
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सूचना , फोटो आभार  - हर्ष डबराल
Copyright @ Bhishma Kukreti , 2020
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Bhishma Kukreti

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रिख्यड (उदयपुर ) के पधानुं तिबारी और खोळी  में काष्ठ कला अंकन

   रिख्यड में तल मंजिल की खोळी में भव्य कला अंकन  नक्कासी 
रिख्यड  संदर्भ में उदयपुर गढ़वाल , हिमालय  की तिबारियों पर अंकन कला -
 उदयपुर संदर्भ में गढ़वाल हिमालय की तिबारियों में पारम्परिक काष्ठ अंकन कला -2 
  Traditional House wood Carving Art of Yamkeshwar , Udayapur Patti, , Garhwal, Himalaya   -2
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  उत्तराखंड , हिमालय की भवन  (तिबारी ) काष्ठ अंकन लोक कला ( तिबारी अंकन )  -  21
Traditional House Wood Carving Art (Tibari) of Udayapur Uttarakhand , Himalaya -  21

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 संकलन - भीष्म कुकरेती
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 रिख्यड  उदयपुर पट्टी में यमकेश्वर ब्लॉक का मुख्य गाँव है और साथ ढांगू , डबरालस्यूं  वालों हेतु भी महत्वपूर्ण गाँव माना  जाता है।   रिख्यड  को प्राचीन काल में ऋषि अड्डा  भी कहा जाता था।  महाभारत में कनखल के निकटवर्ती स्थल भृगु श्रृंखल व निकटवर्ती स्थ्लों में ऋषियों के आश्रमों की चर्चा है तो लगता है तब    रिख्यड का स्तित्व  था।  वैसे भी   रिख्यड एक खस नाम है जो संकेत देता है महभारत रचना  कला (2500 साल पहले ) के समय इस स्थल का नामकरण अवश्य ही हो गया था। 
   रिख्यड  हिंवल नदी तट का गाँव है और हिंवल  होने से  गाँव  ढांगू  और डबराल स्यूं की सीमाओं से जुड़ा गाँव है ,  रिख्यड  के सीमाओं पर निकटवर्ती गाँवों में बणचुरि , सौर , ढांगळ  प्रमुख गाँव हैं।    रिख्यड में मुख्यतया  लखेड़ा जाति परिवार रहते थे। 
       रिख्यड  से अभी तक इस लेखक को पधानुं  तिबारी व एक तल मंजिल पर भव्य खोली की ही सूचना  मिल सकी है।
जैसे कि डबरालस्यूं , ढांगू , उदयपुर , अजमे व लंगूर का आम दस्तूर रहा है ,   रिख्यड के पधानुं तिबारी भी पहली मंजिल पर है व तिभित्या कूड़ के तल मजिल में आगे (front ) के दो कमरों के ऊपर बरामदा जैसा है और बरामदा बाहर की ओर कलयुक्त काष्ठ स्तंभों से घिरा है।   रिख्यड  के पधानुं तिबारी दो कमरों से बनी  एक सामन्य प्रकार की तिबारी है (Normal Type of Tibari ) .
तिबारी में चार स्तम्भ हैं जो पहली मंजिल पर छज्जे (balcony ) हैं और स्तम्भ आधार उप छज्जे पर टिके हैं।  किनारे के दो स्तम्भ दीवार से एक काष्ठ कड़ी के सहारे  जुड़े हैं।  सभी स्तम्भों पर कला अंकन ज्यामितीय ही दिख रही है व तिबारी  में  कोइ मेहराब (arch ) नहीं है। चार स्तम्भ तीन खोली /द्वार / मोरी बनाते हैं।  स्तम्भ के सभी शीर्ष ऊपर छत के नीचे की एक पट्टी से जुड़ जाते हैं।  स्तम्भों के ऊपर शीर्ष पट्टी में भी अभी कोई विशेष कला अंकन के छाप तो नहीं दिखाई दिए हैं।  किन्तु अनुभव से कहा जा सकता है कि स्तम्भों व स्तम्भ शीर्ष में भू समानंतर पट्टी में ज्यामितीय कला अंकन ही है।  भवन के तल मंजिल व पहली मंजिल के सभी कमरों के द्वारों पर भी ज्यामितीय नक्कासी के दर्शन होते हैं।  भवन में काष्ठ पर प्राकृतिक , या मानवीय कला के दर्शन नहीं होते हैं।
   - रिख्यड में तल मंजिल में खोली पर  भव्य  काष्ठ कला अंकन -
 रिख्यड के प्रशांत लखेड़ा पधानुं ख्वाळ के हैं व उन्होंने तल मंजिल पर एक भव्य खोळी  की सूचना दी है।  तल मंजिल पर खोळी का अर्थ  है तल मंजिल से पहले मजिल तक जाने का अंदर से रास्ते  का द्वार। इस द्वार को अधिकतर खोळी  कहा जाता है।  बोली में क्षेत्रीय भेद हो सकते हैं  .
    रिख्यड की इस भव्य खोळी में द्वार से सीढ़ियां खुलती हैं।  द्वार पर दोनों किनारे काष्ठ स्तम्भ हैं व पत्थर की दीवार  से जुड़े हैं।  देहरी भी पाषाण की हैं व देहरी के बगल  में ऊँची चौकी (बैठवाक ) भी हैं याने कुल दो पशन की चौकियां हैं। द्वार के चारों  काष्ठ स्तम्भ ऊपर छज्जे के नीचे की काष्ठ पट्टी से मिलती हैं व स्तम्भ के शीर्ष पर भू समांतर कड़ी पर कुछ  प्राकृतिक (फूल ) कला के दर्शन होते हैं। 
 इस खोळी  की विशेषता है कि पाषाण दीवार पर छत के निकट विशेष काष्ठ कला दर्शन होते हैं।  दोनों दीवारों के मध्य भाग से स्तम्भों के समांतर  (bracket on Stone  Wall ) ही दो दो काष्ठ आकृति निकलकर छज्जे की पट्टी से मिलते हैं याने इस तरह चार आकृतियां हैं। प्रत्येक आकृति bracket पर कमल फूल व घट (पथ्वड़ आकृति ) आकृति साफ़ दिखती हैं, बीच में गुटके भी हैं ।  वास्तव में ये चार आकृतियां वैसी ही हैं जैसे अन्य गाँवों की तिबारियों के स्तम्भ पर नक्कासी है याने यह आकृति दूसरी तिबारियों के  मिनिएचर स्तम्भ दीखते हैं ।  छज्जे के काष्ठ पट्टी से शंकुनुमा काष्ठ आकृतियाँ ऊपर से नीचे की और लटकी हैं।  छज्जे की पट्टी से ही नीचे शगुन हेतु कुछ आकृति भी लटकती हैं
निष्कर्ष में कहा जा सकता है कि पधानुं  तिबारी सामन्य प्रकार की कलायुक्त (केवल ज्यामितीय ) तिबारी है किन्तु तल मंजिल पर खोळी में भव्य कला (ज्यामितीय , प्राकृतिक व प्रतीकात्मक  ) अंकन हुआ है हाँ मानवीय या पशु पक्षी अंकन नहीं दिखा है । 

सूचना व फोटो आभार - प्रशांत लखेड़ा (  रिख्यड)
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Bhishma Kukreti

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जसपुर (ढांगू ) गढ़वाल में सौकारुं की काष्ठ तिबारी में भवन काष्ठ कला अंकन

ढांगू, गढ़वाल , हिमालय  की तिबारियों पर अंकन कला -13
  Traditional House wood Carving Art of Dhangu , Garhwal, Uttarakhand Himalaya   13
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  उत्तराखंड , हिमालय की भवन  (तिबारी ) काष्ठ अंकन लोक कला ( तिबारी अंकन )  - 22
Traditional House Wood Carving Art (Tibari) of Uttarakhand , Himalaya -  22
   
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 संकलन - भीष्म कुकरेती

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  जसपुर ढांगू पट्टी , द्वारीखाल ब्लॉक का पुराने गाँवों में से एक गाँव है।  कहा जाता है कि जसपुर 14 वीं सदी में कुकरेतीयों ने बसाया था या इस काल में कुकरेती बसे थे।  गढ़वाल में सभी कुकरेती गाँवों में कुकरेती जसपुर से ही गए हैं।  जसपुर के पूर्व में बड़ेथ , दक्षिण में ग्वील , पश्चिम उत्तर में सौड़ , छतिंड व पश्चिम में बाड्यों, रणेथ ,  ठंठोली आदि गाँव हैं।  सदियों से जसपुर शिल्पकारों के लिए प्रसद्ध रहा है।  आज भी 300 की जनसंख्या में 250 जनसंख्या शिल्पकारों की जनसंख्या है।
  जसपुर में शिल्पकार कुकरेती , जखमोला व बहुगुणा  जाति के परिवार रहते हैं। 
    भूतकाल में बहुगुणाओं ,  दयानन्द कुकरेती 'तहसीलदार' की तिबारी व  घना नंद कुकरेती निंदारी व जखमोला  में सौकार परिवार की तिबारी थीं।  दो जखमोलाओं की ही डंड्यळ नुमा तीन पाषाण तिबारियां थीं अब एक भी तिबारी नहीं बचीं हैं.
   सन 2012 तक सौकारों की तिबारी विद्यमान थीं।  जब यह तिबारी बनी थी तो इस तिबारी के दो साझा  मालिक थे स्व गोविन्द राम जखमोला के पिता व स्व रेवत राम व स्व मलुकराम जखमोला के पिता (दोनों  भाई थे ) . इस परिवार के सौकार  (धनी )  बनने के पीछे भी एक लोक कथा प्रचलित है।  कहते हैं कि गोविंदराम , रेवत राम व   मलुकराम जखमोला के दादा जी झंगोरा की दायीं ले रहे थे और बथौं लगा रहे थे।  जैसे कि आज भी रिवाज  है जो सूप से बथौं लगाए वह व्यक्ति जब तक बथौं कार्य समाप्त न हो जगह नहीं बदल सकता है।  तो वे जखमोला झंगोरा की बथौं  लगाते लगाते झंगोरा में डूब गए याने इतना झंगोरा हुआ था कि इन्हे सौकार की पदवी मिल गयी।
    सौकारों की तिबारी भी आम तिबारियों की तरह दुभित्या  मकान में है (एक कमरा आगे व एक कमरा अंदर ) .पहली मंजिल पर बाहर के  दो कमरों के मध्य दिवार नहीं थी  व बरामदा है जिसके द्वारों पर काष्ठ कला अंकित थी ।  ढांगू की  अन्य आम तिबारियों जैसे ही  चार स्तम्भों व तीन मोरियाँ , द्वारों या खिड़की थीं । 
  किनारे के स्तम्भ दीवार से लकड़ी की कड़ी द्वारा जुड़ी थीं और इस कड़ी या शाफ़्ट पर प्राकृतिक या लहरनुमा कला अंकन था।  सभी चार  स्तम्भ उप छज्जे के ऊपर पत्थर आधार पर टिके थे।  प्रत्येक स्तम्भ का आधार या कुम्भी  /पथ्वड़ नुमा आकृति वास्तव में उलटा कमल दल की आकृति का था ,  जहां से कमल दल (petals ) शुरू होते थे वहां एक गुटका नुमा (wooden plate या इनघौंट  ) थी ।  फिर  इस गुटके से स्तम्भ कुछ कम गोलाई  की  आकृति लेते हुए ऊपर छत की काष्ठ पट्टी  (भू समांतर ) से मिल जाते हैं।  इस तिबारी में मंडल नुमा (arch )  या मेहराब नहीं थी। तिबारी के  द्वार /मोरी चौकोर थीं।  स्तम्भ पर बेल बूटे याने प्रकृति आधारित कला अंकित थी। 
   कहा जा सकता है कि  जसपुर के सौकारों की तिबारी में प्रकृति , व ज्यामितीय कला अंकन था और मानवीय (figurative , पशु , पक्षी , मनुष्य ) आकृति अंकन नहीं था।  अपने समय में तिबारी की शान थी।   
मेहराब व ब्रैकेट न होने से साफ़ है कि इस तिबारी के निर्माण कलाकार  स्थानीय ही रहे होंगे (शायद सौड़ के ) . तिबारी का निर्माण  काल 1924 के बाद का ही होगा। 

सूचना व फोटो आभार :  रुप चंद जखमोला व खुशहाल  मणि  जखमोला

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गुदुड़ में आदित्यराम जखमोला की निमदारी में काष्ठ कला अंकन

Traditional House Wood Carving of Gudur (Malla Dhangu) , Uttarakhand
 गढ़वाल , हिमालय  की तिबारियों पर अंकन कला -14
  Traditional House wood Carving Art of Dhangu , Garhwal, Himalaya   -14
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  उत्तराखंड , हिमालय की भवन  (तिबारी ) काष्ठ अंकन लोक कला ( तिबारी अंकन )  -  23
Traditional House Wood Carving Art (Tibari) of Garhwal , Uttarakhand , Himalaya -  23
   
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 संकलन - भीष्म कुकरेती

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        गुदुड़ गाँव यद्यपि भौगोलिक रूप से डबरालस्यूं याने हिंवल नदी पार है किन्तु प्रशाशनिक हिसाब से मल्ला ढांगू का भाग है।  कारण है कि जब डबरालस्यूं को ढांगू पट्टी से विभक्त किया गया तो खमण , गुदुड़ व डळयण तीनो गैर डबराल गाँवों को ढांगू में ही रहने दिया गया।  दूसरा मत है कि डबरालों लों ने खमण जसपुर के (बाद में ग्वील )  कुकरेतियों  को दहेज़ में दिया था तो खमण की धरती को ढांगू में ही रहने दिया गया। 
 वास्तव में गुदुड़ गाँव गटकोट  (मल्ला ढांगू ) का ही हिस्सा है और वहां गटकोट के जखमोला परिवार बसा था व अब कुछ बड़ा गांव है।  गढ़वाली से  हिंदी - अंग्रेजी शब्दकोश के सम्पादक डा . अचला नंद जखमोला गुदुड़  गाँव के ही हैं।   
     इस लेखक को गुदुड़ से एक निमदारी याने उपरिमंजील पर जंगलेदार मंजिल की सूचना मिली  जो आदित्यराम जखमोला की निमदारी कहलायी जाती है।  ढाई मंजिला (तिपुर )  मकान भव्य दीखता है।  तल मंजिल व पहली मंजिल पर प्रत्येक मंजिल में दस स्तम्भ या खम्बे दिखाई देते हैं।  ऊपर भी व तल मंजिल में  इन स्तम्भों से बने नौ नौ  मोरी दिखाई देते हैं
तल मंजिल के स्तम्भों /खम्भों में पहली मंजिल का काष्ठ छज्जा कड़ी में टिका है. फिर छज्जे की कड़ी ऊपर पहली मंजिल के दस काष्ठ स्तम्भ या खम्भे खड़े हैं।  पहली मंजिल के स्तम्भ क्रिकेट बैट नुमा है व नीची की और बैट का प्लेट है व ऊपर जैसे हत्था (shaft ) हो।  ऊपर शाफ्ट का कड़ी तीसरी/ढाई  मंजिल की छत की छज्जा पट्टी से मिल जाते हैं व तीसरी मंजिल या ढाईवीं मंजिल की छत को टेक देने हेतु इन स्तम्भों पर  ब्रैकेट या टिक्वा लगे हैं।  पहली मंजिल के स्तम्भों के निचले भाग में जंगले /रेलिंग  फिट हैं.
तिमंजल /तिपुर का छज्जा तीन से ढका है याने यह छज्जा प्रयोग में नहीं आता  है। 
 सभी स्तम्भों , ब्रैकेटों /टिक्वाओं , स्तम्भ  कड़ियों (Shaft of Column ) , दासों (टोढ़ी ) , पट्टियों , खिड़कियों दरवाजों के व अन्य द्वारों में केवल ज्यामितीय (Geometrical ) कला के दर्शन होते हैं , कहीं भी प्राकृतिक या मानवीय (figurative ) कला के दर्शन नहीं होते हैं। 
 कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि गुदुड़ में आदित्यराम जखमोला की निमदारी ज्यामितीय कला की दृष्टि से शोभायुक्त निमदारी है और जिसमे कोई प्राकृतिक या मानवीय कला अंकन नहीं है।  यहां तक कि शगुन हेतु कोई प्रतीकात्मक  कला वस्तु भी नहीं लगे हैं या ऐसा कुछ अंकन हुआ है । 
तिबारी की शक्ल , संरचना , संघटन , सजावट, सलीका  से लगता है कि गुदुड़  के आदित्यराम जखमोला की  निमदरी  की सृष्टि  सन साठ के पश्चात ही हुयी होगी।  चूँकि इस निमदारी में कोई विशेष कला उपयोग नहीं हुआ है तो साफ़ है कि स्थानीय ओड व बढ़इयों ने निमदारी निर्मित की है।   
सूचना व फोटो आभार : सारथी जखमोला
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  Traditional House Wood Carving Art of, Gudur , Dhangu, Garhwal, Uttarakhand  , Himalaya; Traditional House Wood Carving Art of  Gudur Malla Dhangu, Garhwal , Uttarakhand , Himalaya; House Wood Carving Art of  Bichhala Dhangu, Garhwal  , Uttarakhand , Himalaya; House Wood Carving Art of  Talla Dhangu, Garhwal , Uttarakhand , Himalaya; House Wood Carving Art of  Dhangu, Garhwal, Uttarakhand , Himalaya; गुदुड़  ढांगू गढ़वाल (हिमालय ) की भवन काष्ठ कला , गुदुड़  गढ़वाल हिमालय की  भवन काष्ठ कला , गुदुड़ , गढ़वाल उत्तर भारत की भवन काष्ठ कला


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 क्यार (बिछला ढांगू ) के मोहन लाल बड़थ्वाल की चौकोर  तिबारी में काष्ठ कला उत्कीर्ण

Traditional House Wood Carving Art in Tibari of Mohan Lal Barthwal from  Kyar, Bichhla Dhangu Garhwal, Himalaya

ढांगू गढ़वाल , हिमालय  की तिबारियों पर अंकन कला -15
  Traditional House Wood Carving Art of Dhangu , Garhwal, Himalaya   -15-
  उत्तराखंड , हिमालय की भवन  (तिबारी ) काष्ठ अंकन लोक कला ( तिबारी अंकन )  -  24
Traditional House Wood Carving Art (Tibari) of Garhwal , Uttarakhand , Himalaya -  24

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 संकलन - भीष्म कुकरेती

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 क्यार बिछला ढांगू में बड़थ्वालों  व अन्य जातियों का गाँव  है।   अगर  भौगोलिक दृष्टि से अध्ययन करें तो साफ़  पता चलता है कि कभी क्यार   बड़ेथ (मल्ला ढांगू ) का ही भाग रहा होगा।  भूस्खलन या अन्य भौगोलिक कारणों से क्यार आज बड़ेथ से  बिलकुल अलग गाँव दिखता है।  क्यार के आस पास के गाँव कौंदा , तैड़ी , हथनूड़ , कुठार व नैरुल -कैंडूळ  हैं।  वैसे सिलोगी (कड़ती ) की सीमा भी क्यार से लगती है। कोटद्वार में  प्रसिद्ध आयुर्वेद चिकित्स्क व लेखक डा. चंद्र मोहन बड़थ्वाल क्यार के ही हैं।
  क्यार के मोहन लाल बड़थ्वाल की तिबारी की सूचना व फोटो मिली है।  तिबारी कभी अपने भव्य रूप में रही होगी।  तिबारी में कई कलायुक्त उत्कीर्ण के दर्शन आज भी होते हैं। 
 क्यार के मोहन लाल बड़थ्वाल की तिबारी भी आम तिबारियों जैसे पहले मंजिल पर है व दुभित्या (अंदर के कमरा व बाहर दूसरा कमरा ) मकान पर स्थापित है।  तल मंजिल के ऊपर पाषाण छज्जे को टेक देने हेतु नक्कासीदार पत्थर के दास (टोड़ी ) लगे हैं।  पाषाण दासों पर नक्कासी  ' हय मुख:  '  की छवि  (perception ) प्रदान करती हैं।  ऊपर छत के आधार काष्ठ छज्जे के काष्ठ दास पर विशेष नक्कासी नहीं है। 
    तिबारी चौकोर आयताकर काष्ट तिबारी है।  अर्थात तिबारी में कोई मेहराब।  तोरण मोरी , चापाकार मुख /मोरी नहीं है।   तिबारी की कला उत्कृष्ट किस्म की है।  तिबारी में आम तिबारियों जैसे चार स्तम्भ , खम्भे, सिंगाड़  (columns ) हैं व प्रत्येक स्तम्भ उप छज्जे /दहलीज देळी के ऊपर पाषाण चौकोर आधार पर टिके हैं।  अन्य आम तिबारियोंजैसे मोहन लाल बड़थ्वाल की तिबारी के स्तम्भ आधार कुम्भी। तुमड़ी  (उलटे कमल दल से बना )  नहीं हैं। ना ही आम तिबारियों जैसे स्तम्भ पर कुम्भी के बाद वाला उभरा ,  वाला डीलु  (गुटका , इंढोणी या wood plate ) जैसे कोई आकृति है।  हाँ स्तम्भ के आधार के बाद वर्टिकली स्तम्भ पर क्षीण डीलु आकृति देने की कोशिस है पर यह डीलु  उभर कर सामने नहीं आये हैं। 
   प्रत्येक स्तम्भ अधोलंब रूप (vertically ) में तीन प्रकार  के कला भागों में विभक्त है।  एक किनारा वाले भाग में नीचे से लेकर ऊपर  तक लता व पुष्प आकृतियां उत्कीर्ण हुयी है।  मध्य भाग  उभार उत्कीर्ण है व दुसरे किनारे के ख्म्भों सिंगाड़   पर भी  नीचे से ऊपर तक वानस्पतिक /प्रकृति जन्य कृति उकेरी (उत्कीर्ण ) गयी है।  सभी चार सिंगाड़  ऊपर  एक  कलायुक्त  /नक्कासीदार पट्टी याने स्तम्भ शीर्ष से जुड़ जाते हैं। स्तम्भ शीर्ष पट्टिका पर ज्यामितीय व प्राकृतिक अंकरण उत्कीर्ण हुआ है।  स्तम्भ शीर्ष पट्टिका मुंडीर के ऊपर एक उभरी पट्टी है जिस पर अलंकरण हुआ है।  इस पट्टी के समांतर ऊपर एक और चौखट पत्ते है जिस पर कुछ पर्तीकात्मक  (आध्यात्मिक या अन्य ) वानस्पतिक  अलंकरण  हुआ ही है साथ ही ऊपर छत छज्जे के दासों (टोड़ी )  के तल भाग भी दिखाई देते हैं या कला हेतु जोड़े गए हैं।  इस पट्टिका  के ऊपर की कड़ी पर  छत के काष्ठ छज्जे के दास टिके हैं। प्रत्येक काष्ठ  दासों  के मध्य अलग अलग कलाकृतियों के दर्शन होते हैं व चक्षु आनंद देने में सक्षम  हैं। इन दासों के मध्य छह प्रकार की कलाकृतियां इस पट्टी पर उकेरी गई हैं।  दास मध्य स्थलों पर वानस्पतिक जैसे चक्राकार पुष्प  , कुछ कुछ कर्मकांड  कर्मकांड में  प्रयुक्त होने वाले प्र्तेकात्मक ज्यामितीय चित्र जैसे जन्मपत्री  आदि में गृह रेखाएं बनाने हेतु चित्र होते हैं अतः कहा जा सकता है कि शीर्षथ पट्टी जो छत की पट्टी से मिलती है उस शीर्षस्थ (   wooden  head plate )   पट्टी में आध्यात्मिक - धार्मिक (दार्शनिक spiritual symbolic  ornamentation )  व वानस्पतिक(nature ornamentation)   चित्र उत्कीर्ण हुए हैं। 
     तिबारी में कहीं भी मानवीय चित्रकारी (Figural , पशु , पक्षी , मानव अदि ) नहीं हुयी है।  तीन मुख्य कलाएं उभर कर सामने आयी है ज्यामितीय  , प्राकृतिक व दार्शनिक (आध्यात्मिक /धार्मिक ) कला पक्ष।
    बिन चाप (मेहराब Arch ) की तिबारी होते भी यह तिबारी  दर्शनीय है चक्षु आनंद दायक है जैसे साइकलवाड़ी में दिनेश कंडवाल , कठूड़ में विद्या दत्त कुकरेती की तिबारियां।  जबकि कठूड़ की टंखी राम की तिबारी भी बिन मेहराब की चौकोर तिबारी है किंतु शीर्ष में पट्टियों में कोई विशेष कला नहीं हुयी है। 
 तिबारी का  छाया चित्र  से साफ़ झलकता है कि मकान की छत गिर गयी है और मकान ध्वस्त होने ही वाला है फिर कोई पठळ ले जायेगा का कोई दारु (काष्ठ ) ले जायेंगे  और यह कलायुक्त तिबारी की कहानी भी ऐसे ही बिन सुने जाने  समाप्त हो जाएगा जैसे गढ़वाल में सदियों पहले  भव्य इतिहास भूस्खलन , भूकंप में समाप्त हुआ ।   आवश्यकता है कि इन तिबारियों का सर्वेक्षण हो , अध्ययन तो हो व इन्हे डिजिटल माध्यम में ही सही  सुरक्षित रखा जाय।     

 
सूचना व फोटो आधार - अभिलाष रियाल व कमल जखमोला
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कुठार (बिछला ढांगू ) में धीरेन्द्र भंडारी की चौखट तिबारी में काष्ठ कला उत्कीर्णन
ढांगू गढ़वाल , हिमालय  की तिबारियों पर अंकन कला -16
  Traditional House wood Carving Art of Kuthar,  Dhangu , Garhwal, Uttarakhand , Himalaya   -16
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  उत्तराखंड , हिमालय की भवन  (तिबारी ) काष्ठ अंकन लोक कला ( तिबारी अंकन )  -  25
Traditional House Wood Carving Art (Tibari) of Garhwal , Uttarakhand , Himalaya -  25
 
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 संकलन - भीष्म कुकरेती

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    कुठार  बिछला  ढांगू  का सम्पन , उर्बरायुक्त , समृद्ध गाँव  आज भी मन जाता है।  गंगा तट के निकट होने से भूमि उर्बर  थी व कर्मठ किसानों ने कुठार को नाम दिया।  निकटवर्ती गांव हैं हथनूड़ , तैड़ी , क्यार , दाबड़ आदि ,
    इस समृद्ध गाँव व कर्मठ किसानी गाँव से  इस लेखक को दो तिबारियों की  है।  कुठार में धीरेन्द्र भंडारी की तिबारी भी अब जीर्ण शीर्ण  अवस्था में है।  तिबारी दुभित्या मकान की पहली मंजिल पर है। 
तिबारी में चार स्तम्भ /खम्भे , सिंगाड़ /columns हैं व तीन मोरी /खुले द्वार  हैं।  तिबारी चौखट है व तिबारी /बैठक में कोई मेहराब /चाप / तोरण /वृत्तखंड /arch नहीं है।
किनारे दो स्तम्भ हैं जो प्राकृतिक कलायुक्त /नक्कासीदार कड़ी से दिवार सेजुड़े हैं।  प्रत्येक स्तम्भ उप छज्जे के ऊपर पाषाण आधार  पर टिके हैं।  अन्य तिबारियों जैसे इस तिबारी के स्तम्भ में आधार पर कुम्भी , उर्घ्वगामी पदम् पुष्प दल या डीला नहीं हैं।  अपितु सीधी हियँ व इन स्तम्भों पर  ज्यामितीय व प्र्रीति कला अंकन (natural  and geometrical motifs ) है।  कहीं भी मानवीय /पशु  /पक्षी (Figural motifs ) नहीं मिलते हैं यहाँ तक कि कोई शगुन प्रतीक  अलंकरण अंकन भी नहीं मिलता है। 
 स्तम्भ ऊपर स्तम्भ शीर्ष मुंडीर  कड़ी से मिलते हैं मुंडीर पर भी कोई विशेष अंकन आज नहीं दीखता है।  किन्तु प्राकृतिक अलंकरण अवश्य रहा होगा (natural motif ) . स्तम्भ शीर्ष कड़ी दास पट्टिका से मिल जाती है जो छत को आधार देती है।
   धीरेन्द्र भंडारी की तिबारी साधारण कला की तिबारी है।  मध्य हिमालय वास्तु कला ज्ञाता  मनोज इष्टवाल व पुरातन गढ़वाली शब्द ज्ञाता महेशा नंद इस स्ट्रक्चर को निमदारी  की श्रेणी में रखना पसंद करते हैं 
सूचना व फोटो आभार - अभिलाष रियाल व कमल जखमोला
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गैंड -सौड़ (तल्ला ढांगू ) में लोक कला व भूले बिसरे कलाकार


 ढांगू गढ़वाल संदर्भ में हिमालय , उत्तराखंड  गढ़वाल की  लोक कलाएं व भूले बिसरे कलाकार श्रृंखला  -27
  Folk Arts  and Artisans of Dhangu Garhwal ,Folk  Artisans of Dhangu Garhwal  , Himalaya 27
(आलेख अन्य पुरुष में हैं )
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संकलन - भीष्म कुकरेती

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 गैंड -सौड़ तल्ला ढांगू में दूसरा ब्राह्मण बहुल गाँव है जहां गौड़ जाती के ब्राह्मण निवासी है तथा बिष्ट व नेगी जाति भी निवास करते हैं।  गैंड (तल्ला ढांगू ) के निकटस्थ गाँव कुंटी , उच्चाकोट , सिरकोट , जुंकळ , माळा बिजनी  आदि हैं। 
कृषि प्रधान गाँव होने के नाते कृषि संबंधी काष्ठ।  रेशा , पाषाण कला में प्रत्येक व्यक्ति पारंगत (स्व -जीवकोपार्जन ) ही था जैसे सेळु बटना, न्यार आदि बटना  , हौळ -जोळ -निसुड़  जुआ निर्माण , पगार लगाना , टाट पल्ल  , मुणुक निर्माण फौड़ में भोजन बनाना अदि कलाएं विकसित थीं।
   कुछ अन्य कलाएं व कलाकारों का ब्यौरा इस प्रकार है।
 दास या ढोल वादकव दर्जी  - झिरणखाळ के  शीतल दास , भरोसा दास
लोहार - गैंड के ही भद्वा , सतर्वा , टं खु , कीड़ू
ओड , मकाननिर्माण  मिस्त्री - सिरकोट के दौलत सिंह नेगी
टमटा - नए बर्तन हेतु ऋषिकेश पर निर्भरता  किन्तु घांडी व हुक्का निर्माण हेतु जसपुर पर निर्भरता
सुनार - उच्चा कोट के शिल्पकार परिवार या पाली गाँव पर निर्भर
पंडित - झैड़ (तल्ला ढांगू ) के मैठाणी परिवार जैस जनार्दन  प्रसाद मैठाणी
वैद्य - गैंड के भैरव दत्त गौड़ , महीधर प्रसाद गौड़
जागरी - झैड़ के मैठाणी या ढौंर से
बादी - -बिजनी के तूंगी बादी
रामलीला कलाकार - एक ही बार रामलीला खेली गयी थी।
1980 तक गाँव में चार पांच तिबारियां थीं अब सम्भवतया ध्वस्त हो चुकी हैं या अभी पूरी सूचना आनी बाकी  है


सूचना आभार -  रमेश गुड़ ( गैंड )
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Folk Arts of Dhangu Garhwal ,Folk  Artisans of Dhangu Garhwal, Uttarakhand , Himalaya  ;  Uttarakhand , Himalayan Folk  Art ढांगू गढ़वाल हिमालय की लोक कलायें , ढांगू गढ़वाल , हिमालय की  लोककलाएं व लोक  कलाकार  will be continued


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भंवासी बागी (अजमेर )  गढ़वाल , उत्तराखंड की  लोक कलाएं व भूले बिसरे कलाकार   

 अजमेर , उदयपुर , डबरालस्यूं , ढांगू , लंगूर शीला पट्टी ,  गढ़वाल संदर्भ में हिमालय , उत्तराखंड  गढ़वाल की  लोक कलाएं व भूले बिसरे कलाकार श्रृंखला  28
  Folk Arts  and Artisans of Dhangu, Ajmer, Dabralsyun , Langur,Shila, Udaypur (Gangasalan )  Garhwal ,Folk  Artisans of Dhangu Garhwal  , Himalaya -28
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संकलन - भीष्म कुकरेती
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 भंवासी बागी  अजमेर पट्टी का एक नामी गाँव है।  मूनी बागी (छोटा बागी ) , जैं गाँव , भट्ट गां , गौळा , भसूळी निकटवर्ती  गाँव है और नदी हिंवल तटीय गांव हैं , सभी उर्बरक व समृद्ध गाँव थे।  आज सभी गाँव पलायन की मार झेल रहे हैं।  अजमेर पट्टी मालनी नदी की जन्मदात्री पट्टी है व शकुंतला दुष्यंत पुत्र भरत से संबंधित क्षेत्र है।  पौखाल निकटस्थ बजार है व हिंवल नदी डबरालस्यूं व् अजमेर की सीमा रेखा भी है।
   कृषक बहुल गाँव होने के कारण गृह व कृषि उपयोगी सभी कलाएं व शिल्प सभी परिवार पारंगत थे जैसे ब्वान निर्माण ; टाट -पल्ल , नकपलुणी , म्वाळ , स्योळबटाई ,  बटाई ,  , हौळ ज्यू ,   जोळ , नाड़ निसुड़ निर्माण आदि , पगार चिणायी।  जंदर छेदन आदि , यहां तक कि छत हेतु सिलेटी पत्थर (बड़ेथ के निकट - गयड़ गदन से ) निकालने में भी कईयों को सिद्ध हस्त थी।
     कुछ भूले बिसरे लोक कलाकारों के नाम इस प्रकार हैं।

ढोल वादक - बागी के ही भाग दास ; गुल्ली दास /प्रेमदास , मंगती बैसाखू आदि
बादी -बादण - द्यू ळा  की बालकुंवारी बादण
ओड /कूड़/मकान  चिणायी कलाकार - भाना मिस्त्री व परिवार -डक्खू , कृपाल , रैजा आदि
बढ़ई - उपरोक्त ही
लोहार - गाँव से ही हुस्यारू , पूर्णा
सुनार - मोहन बाग़ी पर निर्भर यहथा महेशुर , गंगा , महिपाल
टमटा - गड़सर कठूड़ के बादुर टमटा
पंडित - गौळा के बहुखंडी व द्यूळा के देवलियाल
जागरी।  तंत्र मंत्र - भरोसा आर्य
गणत - भाना आर्य
तिबारियां  - चार से अधिक तिबारीं थीं जिनमे थोकदार लाल सिंह , सौकार जीत सिंह  , बहुखंडी पंडित , सर्वाल नेगी की तिबारी ख़ास थीं।  अब एक भी नहीं बचीं हैं
घराट , घट्ट , पनचक्की - कभी हिंवल व वशिष्ठा नदी पर चार घराट थे।  हेवल नदी पर स्थित चमस्यूळ  के  कुंदू  गुसाईं का घट्ट सबसे अधिक चलता था। हिंवल नदी पर ही गअळी के रेवतराम का था व वशिष्ठा नदी के दो घराट में एक मास्टर चन्दर सिंह रव्वत व एक बागी के एक शिल्पकार का था। 

सूचना आभार -  धीरज नेगी (भंवासी -बागी )

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