Author Topic: Some Ideal Village of Uttarakhand - उत्तराखंड राज्य के आदर्श गाव!  (Read 21563 times)

Bhishma Kukreti

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गटकोट में रैजा सिंह की डंड्याळी में काष्ठ उत्कीर्ण कला व अलंकरण

गटकोट (ढांगू ) गांव की लोक  कलाएं  काष्ठ उत्कीर्र्ण कलाएं - 5
 Folk and House Wood   Carving Art of Gatkot (Dhangu) Garhwal - 5
ढांगू संदर्भ में गढ़वाल , हिमालय  की तिबारियों/ निमदारियों / जंगलों  पर काष्ठ अंकन कला -31
  Traditional House wood Carving Art of West Lansdowne Tahsil  (Dhangu, Udaypur, Ajmer, Dabralsyun,Langur , Shila ), Garhwal, Uttarakhand , Himalaya   31
  दक्षिण पश्चिम  गढ़वाल (ढांगू , उदयपुर ,  डबराल स्यूं  अजमेर ,  लंगूर , शीला पट्टियां )   तिबारियों , निमदारियों , डंड्यळियों   में काष्ठ उत्कीर्णन कला /अलंकरण   31
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  गढ़वाल, उत्तराखंड , हिमालय की भवन  (तिबारी, निमदारी , जंगलादार   ) काष्ठ अंकन लोक कला ( तिबारी अंकन )  -  57
Traditional House Wood Carving Art (Tibari) of Garhwal , Uttarakhand , Himalaya -    57
(लेख में जी श्री नहीं प्रयोग जिए गए  हैं )
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 संकलन - भीष्म कुकरेती
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   गटकोट  (गढ़ कोट या गढ़ी में किला ) खस समय अथवा गढ़ी शब्द प्रचलन काल का एक प्राचीन स्थल है व गोरखा काल में निकटवर्ती गाँव घनशा ली में गोरखा छवनी होने से भी प्रसिद्ध रहा है।  यहां के गोर्ला रावत डबराल स्यूं व ढांगू के कमीण /सयाणा /थोकदार भी थे।
  आज का विवेचना विषय है गटकोट में रैजा सिंह की डंड्यळी  में काष्ठ उत्कीर्ण अलंकरण या कला दर्शन।  गटकोट के विवेका नंद जखमोला ने सूचना भेजते समय इस मकान भाग को डड्यळी  नाम दिया जबकि जसपुर -ग्वील - सौड़ (गटकोट से तीन मील दूर ) डंड्यळी  लघु आकार की पहली मंजिल की बैठक (कम  आयात  /लघु आकार में स्त्रीलिंग होना )  को डंड्यळी कहते हैं   व दो कमरों  से बने बरामदे (ढके या अनढके ) को डंड्यळ  कहते हैं।  मैं विचारक अध्यापक विवेका नंद जखमोला का सम्मान करते हुए इस मकान भाग को डंड्यळी ही लिख रहा हूँ।
  डंड्यळ  व तिबारी     में मानकीकृत शब्दावली में भी मतभेद है।  साइकलवाड़ी -किमसार के दिनेश कंडवाल ने इसी तरह के अपने भवन भाग को तिबारी नाम दिया और पहाड़ी भवन काष्ठ कला विशेषज्ञ मनोज इष्टवाल ने कोई विरोध नहीं जताया जबकि अन्य  मकान भागों में वे विरोध जताते दीखते भी हैं (तिबारी , निमदारी , डंड्यळ भेद )  कला विवेचक महेशा नंद ने भी कई बार इस विषय पर मुझे आगाह किया भी किन्तु फिर उन्होंने भी पूरा खुलासा नहीं किया कि वास्तव में   मानकीकृत परिभाषा  क्या हो (शायद उनके आने वाले शब्दभंडार शब्द कोष में खुलासा अवश्य होगा किन्तु तब तक मुंगरी पाकली पाकली पर तब तक म्यार संधि भूख चल जालो वाली  स्थिति भी रहेगी ) मेरी महेशा नंद , मनोज  इष्टवाल , डा डी  आर पुरोहित , रमाकांत बेंजवाल आदि भाषा विद विशेषज्ञों से अनुरोध है कि यदि हो सके तो शीघ्र ही इन शब्दों की परिभाषाएं निश्चित कर दें।  जिस तरह से मुझे गंगासलाण  (सामन्य नाम ढांगू उदयपुर  पर असलियत में लंगूर , ढांगू ,श्लीला , डबरालःस्यूं  , अजमेर व उदयपुर पट्टियां ) व अन्य क्षेत्रों से सूचनाएं व फोटो मिल रहे हैं 100 से अधिक तिबारियों व  उत्तराखंड से कम से कम 500 तिबारियों के फोटो आदि आने की पूरी आशा है।  पाठकों व मेरे लिए भी सही है कि सुनिश्चित परभाषिक शब्दों का प्रयोग हो। 
     आज गटकोट के जिस डंड्यळ  का जिक्र हो रहा है वः एक समय के धनी रैजा सिंह परिवार की है।  आज भवन ध्वस्त  होने के कगार पर है किन्तु कभी इस भवन से गटकोट व रैजा सिंह परिवार को इलाके में पहचान मिलती थी व अन्य लोग ऐसी तिबारी   निर्माण के सपने भी देखते थे।  मकान तिभित्या याने तीन भीत (एक कमरा आगे व एक कमरा पीछे ) का है व पहली मंजिल पर आगे के दो कमरों के मध्य दीवाल न रख तिबारी या डड्यळ या बरामदा या बैठक या सभागृह (?) में बदल दिया गया है। 
 डंड्यळ में चार स्तम्भ /सिंगाड़ हैं व चौखट रूप में हैं याने कोई मेहराब , तोरण /चाप /मंडल /arch न होने से स्तम्भ शीर्ष /मुण्डीर /मुरिन्ड भू समांतर ही में हैं व मुरिन्ड छत आधार से पट्टिका  के बल पर से मिलता है। 
    स्तम्भ /सिंगाड़ चौकोर हैं , पाषाण देहरी /देळी पर ठीके हैं।  प्रत्येक सिंगाड़ /स्तम्भ में वानस्पतिक व ज्यामितीय अलंकरण हुआ है जो नयनाभिरामी था।  शीर्ष /मुरिन्ड /मुण्डीर में कोई कला अलंकरण दृष्टिगोचर हो हो रहा है।
 भले ही आज व तब भी कला व अलंकरण दृष्टि से डंड्यळ  वह अलंकरण न रहा हो जितनी आकांशा होती है किन्तु जब संसाधन अलप से अल्पमत हों तो इस तरह की डड्यळ /डड्यळयूं  का निर्माण करवाना भी जिगर का काम था।
प्रश्न तो सदाबहार /यक्ष प्रश्न  ही है कि   किन्ही भौगोलोइक , राजनातिक कारणों से पहाड़ों का इतिहास गर्त हुआ किन्तु अब  जब इस तरह के डंड्यळ /तिबारियों , निमदारियों का संरक्षण न होगा (ध्यान योग्य बात है कि मकान स्थल की भयंकर समस्या पहाड़ों में होती है ) व इस तरह की कलाओं का डौक्युमेंटेसन  /प्रलेखन भी नहीं हो रहा है।  आज कुछ नहीं तो एक जगह प्रलेखित साहित्य तो रखा जाय। 
सूचना व फोटो आभार :  विवेका नंद  जखमोला , गटकोट
Copyright @ Bhishma Kukreti, 2020
  Traditional House Wood Carving  (Tibari ) Art of, Dhangu, Garhwal, Uttarakhand ,  Himalaya; Traditional House Wood Carving (Tibari) Art of  Udaipur , Garhwal , Uttarakhand ,  Himalaya; House Wood Carving (Tibari ) Art of  Ajmer , Garhwal  Himalaya; House Wood Carving Art of  Dabralsyun , Garhwal , Uttarakhand  , Himalaya; House Wood Carving Art of  Langur , Garhwal, Himalaya; House wood carving from Shila Garhwal  गढ़वाल (हिमालय ) की भवन काष्ठ कला , हिमालय की  भवन काष्ठ कला , उत्तर भारत की भवन काष्ठ कला

Bhishma Kukreti

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डाबर  में रघुनाथ डबराल की तिबारी . खोळी में भवन काष्ठ  कला (अलंकरण )
डबराल स्यूं संदर्भ में गढ़वाल , हिमालय  की तिबारियों/ निमदारियों / जंगलों  पर काष्ठ अंकन कला /लोक कला -3
House Wood Carving  Art (ornamentation ) in Dabralsyun  Garhwal , Uttarakhand  -3 
  Traditional House wood Carving Art of West Lansdowne Tahsil  (Dhangu, Udaypur, Ajmer, Dabralsyun,Langur , Shila ), Garhwal, Uttarakhand , Himalaya   -32
  दक्षिण पश्चिम  गढ़वाल (ढांगू , उदयपुर ,  डबराल स्यूं  अजमेर ,  लंगूर , शीला पट्टियां )   तिबारियों , निमदारियों , डंड्यळियों   में काष्ठ उत्कीर्णन कला /अलंकरण   32
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  गढ़वाल, उत्तराखंड , हिमालय की भवन  (तिबारी, निमदारी , जंगलादार   ) काष्ठ अंकन लोक कला ( तिबारी अंकन )  -  58
Traditional House Wood Carving Art (Tibari) of Garhwal , Uttarakhand , Himalaya -   58
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 संकलन - भीष्म कुकरेती
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   डाबर शब्द तो खस शब्द है किन्तु डाबर गाँव डबरालों  से जुड़ा है।  कहते हैं चौदहवीं सदी में यहां एक ब्राह्मण परिवार बसा था तो वह परिवार डबराल कहलाया गया।  डबराल मुख्यतया डबराल स्यूं पट्टी में बसे हैं (डबराल स्यूं पहले करुड़  पट्टी थी और उससे पहले ढांगू , इसीलिए डबरालस्यूं हेतु भी ढांगू उदयपुर  आज भी पुकारा जाता है ) . किन्तु कुछ डबराल फलदा कल्जीखाल ब्लॉक , देवरयाग , व टिहरी गढ़वाल में भी बसे हैं।  सभी डबराल डाबर से ही पलायन किये ।
   आज इस श्रृंखला में डबराल स्यूं की दूसरी तिबारी की काष्ठ कला /अलंकरण पर चर्चा होगी।  पंडित रघुनाथ डबराल की तिबारी अपने समय में डाबर व रघुनाथ डबराल परिवार हेतु विशेष पहचान थी व एक लैंडमार्क भी थे।  एक आकलन अनुसार तिबारी 1925 के बाद या लगभग आस पास ही निर्मित हुयी होगी
   तिबारी अपने समय की शानदार तिबारियों में गिनी जाती थी और ढांगू क्षेत्र में भी रघुनाथ डबराल की चर्चा होती थी। 
चार स्तम्भों की तिबारी भी दुखंड मकान की पहली मंजिल पर स्थापित की गयी है।   मकान के छज्जे पाषाण के हैं व दास या टोड़ी  भी पत्थर के हैं।  छज्जे के ऊपर पाषाण देहरी / देळी है जिसपर पत्थर के चौकोर डॉळ के ऊपर प्रत्येक स्तम्भ आधारित है।  किनारे के स्तम्भ डीआर से काष्ठ कड़ी से जुड़े हैं , कड़ी पर वानस्पतिक अलंकरण हुआ है।
चारों स्तम्भ के शीर्ष /मुरिन्ड /मुण्डीर  में कोई तोरण /मेहराब // arch नहीं है अपितु आयताकार पत्तियां शीर्ष बनाती है और ये पत्तियां छत के आधार पट्टिका से मिलते हैं , जैसा कि उस समय रिवाज था मुरिन्ड पट्टिका पर प्राकृतिक कला अलंकृत होती थी तो इस तिबारी के शीर्ष पट्टिका में भी अवश्य वानस्पतिक ालकरण हुआ होगा आज फोटो में धूमिल है। चारों स्तम्भ तीन मोरी/खोळी / द्वार बनाते हैं
 प्रत्येक काष्ठ स्तम्भ का आधार कुम्भीनुमा या पथ्वड़ नुमा है व यह अकार अधोगामी पदम् पुष्प दल (Descending  Lotus Petals ) आकार कलाकृति उत्कीरणन  के कारण है।  कमल दल के बाद काष्ठ डीला है फिर उर्घ्वगामी कमल दल की आकृति निर्मित हुयी है जहां से स्तम्भ की मोटाई गोलाई में कम होती जाती है व इस शाफ़्ट में बारीक ज्यामितीय कला दृष्टिगोचरहोती है।  जहां पर स्तम्भ की गोलाई सबसे कम है वहां पर डीला /धगुल  है व वहीं से    उर्घ्वगामी पद्म दल शुरू होता है जो ऊपर शीर्ष /मुण्डीर  . मुरिन्ड  में मिल जाता है। 
 तिबारी में मानवीय या पशु आकृति या नजर उतरने वाला कोई प्रतीक दृष्टि में नहीं आया। 
तल मंजिल से ऊपर मंजिल आने हेतु आंतरिक पथ ही जो मोरी /खोळी  /प्रवेश द्वार से खुलता है किन्तु प्रवेश द्वार या खोळी /मोरी पर   काष्ठ कला अलंकरण दृष्टिगोचर नहीं होते हैं।  किन्तु खोळी  पर ornamentation    अलंकरण विशेषकर आध्यात्मिक प्रतीक उत्कीरण हुआ ही होगा।
 इतना निश्चित है कि जब संसधन मुश्किल से  जुटते थे, तकनीक व तकनीशियन दुर्लभ थे  तब इस तिबारी का निर्माण परिवार हेतु ऐतिहासिक  निर्णय ही रहा होगा

सूचना व फोटो आभार : नरेश उनियाल , जल्ठ
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Bhishma Kukreti

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अमाल्डू  (डबरालस्यूं ) के ललिता प्रसाद उनियाल ' ललाम जी '  के भव्य  तिपुर भवन  में काष्ठ कला व अलंकरण
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अमाल्डू  (डबरालस्यूं  में भवन काष्ठ अलंकरण कला/अलंकरण  -1
डबरालस्यूं , गढ़वाल , हिमालय  की तिबारियों/ निमदारियों / जंगलों  पर काष्ठ अंकन कला - 4
House Wood  Carving  ornamentation art    of  Dabralsyun  -4
  Traditional House wood Carving Art of West Lansdowne Tahsil  (Dhangu, Udaypur, Ajmer, Dabralsyun,Langur , Shila ), Garhwal, Uttarakhand , Himalaya   33
  दक्षिण पश्चिम  गढ़वाल (ढांगू , उदयपुर ,  डबराल स्यूं  अजमेर ,  लंगूर , शीला पट्टियां )   तिबारियों , निमदारियों , डंड्यळियों   में काष्ठ उत्कीर्णन कला /अलंकरण   33
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  गढ़वाल, उत्तराखंड , हिमालय की भवन  (तिबारी, निमदारी , जंगलादार   ) काष्ठ अंकन लोक कला ( तिबारी अंकन )  -  59
Traditional House Wood Carving Art (Tibari) of Garhwal , Uttarakhand , Himalaya - 59   
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 संकलन - भीष्म कुकरेती
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 ढांगू , उदयपुर , डबरालस्यूं , अजमेर में  डबराल स्यूं में  125 -150 साल पूर्व लगभ बसे  अमाल्डू   गाँव का सामजिक व सांस्कृतिक  महत्व है।   ये चारों पट्टियां सामन्य से अधिक ब्राह्मण बहुल पट्टियां हैं , डबरालस्यूं व मल्ला ढांगू में तो गंगाड़ी ब्राह्मणो की जनसंख्या अधिक ही है।  इन चार  पट्टियों  ब्रिटिश शासन के कुछ दशाब्दी उपरान्त सर्यूळ  ब्राह्मणों की आवश्यकता महसूस हुयी तो जसपुर ढांगू  में बहुगुणा , अमाल्डू  में उनियाल का डिबरण  उदयपुर  में  रतूड़ी, जल्तह में ममगाईं  सर्यूळ  ब्राह्मण बसाये गए।  इन्हे  इन पट्टियों  में बामण , पंडित नहीं 'गुरु ' शब्द से भट्याया  जाता था।  देखा जाय तो कुछ  समय पहले भी  इन जातियों को बामण , पंडित नाम से भट्याने का अर्थ है इनकी बेज्जती करना। 
 अमाल्डू  डबराल स्यूं में डवोली के दक्षिण सट कर , कूंतणी के पूर्व व कख्वळ - जल्ठ , दिख्यत  के पश्चिम में बसा है।  ऊणी   (उत्तर गढ़वाल , उनियालों  का मूलस्थान)  से उनियाल यहां अमाल्डू  में तिमली- डाबर - डवो ली के डबरालों ने बसाया।  अमाल्डू  से ही उनियाल 'कख्वळ , जल्ठ  बसे।  या हो सकता है प्राचीन समय में जल्ठ  भी डवोली  या अमाल्डू  का ही भाग रहा हो।  यह तो निश्चित है कि  अमाल्डू  पहले डवोली  का ही हिस्सा था।
    अमाल्डू  के उनियाल  शाक्त हैं और आज भी अपने समय आने पर राज राजेश्वरी मंदिर में पूजा( इनका पूजा विधान में हिस्सा बनता है ) करने जाते हैं व इनको दक्षिणा भाग मिलता है।  प्रवासी रतुड़ियों , बहुगुणाओं , मँगाईयों , या थपलियालों का अपने मूल गाँव से सम्पर्क लाइन सर्वथा टूट चुकी है  किन्तु ु अमाल्डू  के उनियालों  का राजराजेश्वरी दक्षिणा पर बराबर का हिस्सा होने से आज भी इनका सम्पर्क सूत्र ऊणी  से है ही। इस बराबर सम्पर्क के कारण राजराजेश्वरी वास्तु कला का प्रभाव अमाल्डू  की वास्तु कला पर पूरा है।  अमाल्डू  गाँव में तिपुर/ तिमंजिला मकान   सामन्य  अनुपात से अधिक हैं और उसका श्रेय राजराजेश्वरी वास्तु कला प्रभाव को ही जाता है। अमाल्डू  में  तिपुर  राजराजेश्वरी दरबार की बरबस नकल भी कहलायी जाती हैं। 
      आज का विवेचत तिपुर   है स्व ललिता प्रसाद उनियाल  याने 'ललाम जी ' की  भव्य तिबारी /तिपुर  का।  ललाम जी ' नाम से प्रसिद्ध ललिता प्रसाद उनियाल गढ़वाली के प्रसिद्ध कवि हुए हैं और अबोध बंधू बहुगुणा ने ; ललाम जी '  की  रचनाओं विनोद काव्य व सासु ब्वारी की भूरी भूरी भूरी प्रशंसा  की है। 
 'ललाम जी  के 'तिपुर  को कभी डबरालस्यूं  की शान कहा जाता था।   तिपुर देवलगढ़ की राजराजेश्वरी तर्ज पर ही निर्मित हुआ  है । तिपुर /तिबारी का निर्माण काल 1935 के लगभग का है तब  ' ललाम जी ' लाहौर थे।
   तिपुर मकान 24 कमरों वाला है याने दुखंड , तिभित्या।  हर मंजिल पर आठ कमरे।  अमाल्डू  हे के अशोक उनियाल प्रत्यक्षदर्शी ने  'ललिता प्रसाद उनियाल के तिपुर /तिबारी  का वर्णन इस प्रकार किया है -
  तिपुर  में तल मंजिल , पहला मंजिल व दूसरा मंजिल है।  बाहर चौक दांदण  है।  ऊपर जाने हेतु जो डिंड्याळी  या खोळी  में आती है।  पहली मंजिल व दूसरी मंजिल में  कुल 36 काष्ठ स्तम्भ है व साल तूण  से निर्मित स्तम्भों के मध्य दूरी ढाई फिट है।  दूसरी मंजिल के स्तम्भों पर अष्टदल पदम् पुष्प उत्कीर्णित हुआ है। 
प्रवेश द्वार याने तल मंजिल की खोली का काष्ठ सिंगाड़ /स्तम्भ  साल की लकड़ी के बने हैं व चौकोर पाषाण आधार पर टिके हैं।  पाषाण आधार के बाद सिंगाड़  का कुम्भी रूप वैसे ही है जैसा तिबारी स्तम्भों में होता है।  स्तम्भ के इस कुम्भी आकार के बाद डीला /धगुल  या  round  wood  plate  है फिर शफ्ट /कड़ी पर वानस्पतिक /प्राकृतिक अलंकरण हुआ है।  खोली के सिंगाड़  पर प्राकृतिक याने फूल , पत्तियों का अलंकरण हुआ है।  बाकी जगह ज्यामितीय कला के दर्शन होते हैं। मुरिन्ड /मुण्डीर / शीर्ष पट्टिका के मध्य अष्ट दल कमल अंकित है।
   ललिता प्रसाद उनियाल की इस तिबारी का निर्माण अमाल्डू  के ही मृदा -पाषाण व काष्ठ शिल्पी  भानाराम  आर्य ने व उनके शिष्यों ने किया था।  भानाराम आर्य का आज भी नाम बड़े आदर से लिया जाता है।
 ललिता प्रसाद उनियाल का तिपुर /तिबारी आज भी  भव्य स्थति में तो  कारण उनके पुत्र द्वारा समय समय पर मरोम्मत व देखरेख।
निष्कर्ष निकलता है कि  ललिता प्रसाद उनियाल का भव्य तिपुर देवलगढ़ में राजराजेश्वरी दरबार की तर्ज पर है व इस भवन में प्राकृतिक , ज्यामितीय कला, अलंकरण  हुआ है  . कंही भी मानवीय (मानव , पशु या चिड़िया ) नही हुआ है
  ललिता प्रसाद उनियाल के तिपुर भवन के दरवाजों व खड़कियों में काष्ठ कला ज्यामितीय शैली में ही उत्कीर्ण हुयी है।
 अपने समय में डबरालस्यूं के शान नाम से प्रसिद्ध यह तिपुर  आज भी डबराल स्यूं मी शान ही है।  ललिता प्रसाद उनियाल की नई पीढ़ी सदस्यों का धन्यवाद जिन्होंने  इस भव्य भवन का नष्ट होने से बचाये रखा।   
   
      
सूचना व फोटो आभार : अशोक उनियाल , अमाल्डू
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Bhishma Kukreti

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किमसार में राजेंद्र कंडवाल  के जंगलादार मकान में काष्ठ उत्कीर्णन  /अंकन कला व अलकरण

किमसार में   भवन काष्ठ कला अलंकरण भाग - 3
उदयपुर /यमकेश्वर ब्लॉक गढ़वाल , हिमालय  की तिबारियों/ निमदारियों / जंगलों  पर काष्ठ अंकन कला -11
House wood Carving Art /ornamentation of Udayapur Patti , Garhwal -11
  Traditional House wood Carving Art of West Lansdowne Tahsil  (Dhangu, Udaypur, Ajmer, Dabralsyun,Langur , Shila ), Garhwal, Uttarakhand , Himalaya   34
  दक्षिण पश्चिम  गढ़वाल (ढांगू , उदयपुर ,  डबराल स्यूं  अजमेर ,  लंगूर , शीला पट्टियां )   तिबारियों , निमदारियों , डंड्यळियों   में काष्ठ उत्कीर्णन कला /अलंकरण   34
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  गढ़वाल, उत्तराखंड , हिमालय की भवन  (तिबारी, निमदारी , जंगलादार   ) काष्ठ अंकन लोक कला ( तिबारी अंकन )  -  60
Traditional House Wood Carving Art (Tibari) of Garhwal , Uttarakhand , Himalaya -   60 
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 संकलन - भीष्म कुकरेती 

जैसे कि  पहले ही लिखा गया बल किमसार  यमकेश्वर क्षेत्र का प्रसिद्ध गाँव है व प्राचीन गाँव भी माना जाता है।  यहां तिबारियां  व जंगल दार कूड़ मकान होना कोई आश्र्चय नहीं है।
  राजेंद्र कंडवाल का जंगलेदार कूड़ /मकान भी किमसार  को एक छवि वृद्धिकारक रहा है।  15 स्तम्भों /खम्भों /खामों वाले जंगल दार मकान तिभित्या /तीन दीवार याने दुखंड मकान है (एक कमरा बहार व एक अंदर ) किन्तु राजेंद्र कंडवाल के जंगलेदार मकान में तल मंजिल /ground flour  के आगे के कमरे खुले हैं और बरामदे में तब्दील किये गए हैं।  ऊपरी मंजिल में १२ वस तल मंजिल में ६ कमरे हैं। छजजा अमूनन लकड़ी  ही होगा
  जंगल के सम्भों  में स्तम्भ आधार पट्टिका , स्तम्भ मध्य पट्टिका व शीर्ष बनती पट्टिका (जो छत से जुडी है ) में कोई विशेष प्राकृतिक अथवा मानवीय अलंकरण (motifs ) नहीं दीखते है केवल ज्यामितीय अलंकरण से ही सजावट आयी है , दरवाजों व  भी कोई विशेष  अलंकरण दृष्टिगोचर नहीं होता है।  स्तम्भ शीर्ष में भी थांत पट्टिका आकर के हैं।  स्तम्भ आधार इलाका के अन्य जंगलों जैसे ही थांत पट्टिका  (bat blade ) जैसे हैं व  स्तम्भ थांत पर भी   ज्यामितीय कला छोड़ विशेष प्राकृतिक , मानवीय नहीं हुआ है।
 बड़ी खड़की होने  से  लगाना सरल है कि मकान 1960  के बाद ही निर्मित हुआ होगा और कलाकार स्थानीय ही रहे होंगे
  एक समय दक्षिण गढ़वाल में जंगलेदार कूड़ों /मकानों का बड़ा प्रचलन रहा है व इन कूड़ों में मालिकों की छवि  ही नहीं गाँव की छवि भी वृद्धि की है और राजेंद्र कंडवाल के जंगलदार मकान ने राजेंद्र कंडवाल व किमसार गाँव की छवि वृद्धि में योगदान दिया है।


सूचना व फोटो आभार :   दिनेश कंडवाल , साइकलवाड़ी
Copyright @ Bhishma Kukreti, 2020
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   खमण में जनार्दन कुकरेती के डंड्यळ  में काष्ठ कला /अलंकरण

खमण में तिबारियों , निमदारियों , डंड्यळियों   में काष्ठ उत्कीर्णन कला /अलंकरण  -2
House Wood  Carving art in Khaman , Dhangu (Garhwal )  - 2
ढांगू गढ़वाल , हिमालय  की तिबारियों/ निमदारियों / जंगलों  पर काष्ठ अंकन कला
  Traditional House wood Carving Art of West Lansdowne Tahsil  (Dhangu, Udaypur, Ajmer, Dabralsyun,Langur , Shila ), Garhwal, Uttarakhand , Himalaya   35
  दक्षिण पश्चिम  गढ़वाल (ढांगू , उदयपुर ,  डबराल स्यूं  अजमेर ,  लंगूर , शीला पट्टियां )   तिबारियों , निमदारियों , डंड्यळियों   में काष्ठ उत्कीर्णन कला /अलंकरण   -35
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  गढ़वाल, उत्तराखंड , हिमालय की भवन  (तिबारी, निमदारी , जंगलादार   ) काष्ठ अंकन लोक कला ( तिबारी अंकन )  -  61
Traditional House Wood Carving Art (Tibari) of Garhwal , Uttarakhand , Himalaya -    61
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 संकलन - भीष्म कुकरेती
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  खमण एक विशेष गाँव है जो भौगोलिक हिसाब से डबरालस्यूं में है किन्तु राजनैतिक सीमारेखा अनुसार मल्ला ढांगू में है।  चक्रधर कुकरेती (कुकरेती वंशावली प्रसिद्ध ) खमण डाबरालों द्वारा दान में कुकरेतियों  को दिया गया था तो खमण को मल्ला ढांगू याने कुकरेती गाँव माना जाता रहा है। गुरु राम राय दरबार , देहरादून के  महंत  स्व इंदिरेश चरण दास (श्रीधर कुकरेती ) की जन्म स्थली भी खमण ही है। 
सूचना व फोटो आभार :  बिमल कुकरेती व राजेश कुकरेती  खमण
सम्प्रति जांदरदन कुकरेती के डंड्यळ  पर चर्चा हो रही है।  खमण में कुछ इस मकान को 'तिबारी' कह कर भट्याते हैं तो कुछ  डंड्यळ '.  जनार्दन कुकरेती  का यह  तिबारी / डंड्यळ वाला मकान तिभित्या मकान याने दुखंड (एक कमरा अंदर व एक बहार की और ) मकान है व पहली मंजिल पर  दो कमरों के मध्य दीवार न रख बाहर काष्ठ स्तम्भ लगाकर तिबारी रूप दे दिया गया है।
चार सम्भव वाले इस तिबारी में केवल ज्यामितीय काष्ठ  कला दृष्टिगोचर होते हैं।  यहाँ तक की स्तम्भ शीर्ष पट्टिका भी आयताकार व अलकंरण विहीन है।  निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि पहली मंजिल पर बरामदा /डंड्यळ  निर्माण हेतु ही काष्ठ स्तम्भ प्रयोग हुए हैं और स्थानीय काष्ठ कलाकारों ने ही स्तम्भ बिठाये होंगे। 
ढांगू , उदयपुर , डबराल स्यूं में कला या अलंकरण बिहीन तिबारियों का होना सामन्य बात थी क्योंकि बरामदा को आकार देने हेतु स्तम्भ बिठाये जाते थे व पहली मंजिल का बरामदा बैठक /conferences / या शादी वविवाह में पौणो /मेहमानों  को ठहराने हेतु काम आता था।  जनार्दन कुकरेती की यह तिबारी /डंड्यळ  भी बैठक   थी  विशेषतः जब जनार्दन कुकरेती ग्राम प्रधान थे।   
   
सूचना फोटो आभार - बिमल कुकरेती , राजेश कुकरेती, खमण
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  Traditional House Wood Carving  (Tibari ) Art of, Dhangu, Garhwal, Uttarakhand ,  Himalaya; Traditional House Wood Carving (Tibari) Art of  Udaipur , Garhwal , Uttarakhand ,  Himalaya; House Wood Carving (Tibari ) Art of  Ajmer , Garhwal  Himalaya; House Wood Carving Art of  Dabralsyun , Garhwal , Uttarakhand  , Himalaya; House Wood Carving Art of  Langur , Garhwal, Himalaya; House wood carving from Shila Garhwal  गढ़वाल (हिमालय ) की भवन काष्ठ कला , हिमालय की  भवन काष्ठ कला , उत्तर भारत की भवन काष्ठ कला


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अमाल्डू  में जगदीश प्रसाद  उनियाल की तिबारी में विशेष काष्ठ कला /अलंकरण

  House Wood carving art/Ornamentation in Tibari of Jagdish Uniyal , Amaldu 
 अमाल्डू  (डबरालस्यूं  में भवन काष्ठ अलंकरण कला/अलंकरण  -2
House Wood Carving art/ornamentation, Amaldu -2
डबरालस्यूं , गढ़वाल , हिमालय  की तिबारियों/ निमदारियों / जंगलों  पर काष्ठ अंकन कला - 5
House Wood  Carving  ornamentation art    of  Dabralsyun  -5
गढ़वाल , हिमालय  की तिबारियों/ निमदारियों / जंगलों  पर काष्ठ अंकन कला -
  Traditional House wood Carving Art of West Lansdowne Tahsil  (Dhangu, Udaypur, Ajmer, Dabralsyun,Langur , Shila ), Garhwal, Uttarakhand , Himalaya   -36
  दक्षिण पश्चिम  गढ़वाल (ढांगू , उदयपुर ,  डबराल स्यूं  अजमेर ,  लंगूर , शीला पट्टियां )   तिबारियों , निमदारियों , डंड्यळियों   में काष्ठ उत्कीर्णन कला /अलंकरण   -36
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  गढ़वाल, उत्तराखंड , हिमालय की भवन  (तिबारी, निमदारी , जंगलादार   ) काष्ठ अंकन लोक कला ( तिबारी अंकन )  -  62
Traditional House Wood Carving Art (Tibari) of Garhwal , Uttarakhand , Himalaya -    612
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 संकलन - भीष्म कुकरेती
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उनियालों की बसाहत  कारण अमाल्डू  डबरालस्यूं  का  महत्वपूर्ण गांव है।  अशोक उनियाल ने सूचना दी कि अमाल्डू में तिपुर/दो मंजिला  मकानों का रिवाज रहा है और वह  भी राजराजेश्वरी देवलगढ़ दरबार की तर्ज पर।  सम्प्रति भी एक तिपुर  के पहली मंजिल पर बिठी तिबारी की विवेचना ही है।  अमाल्डू  डबरालस्यूं  में   जगदीश प्रसाद  उनियाल की यह तिबारी  कई मायनों में विशेष तिबारी कहलायी जायेगी। सबसे  पहलि  विशषता है कि दक्षिण गढ़वाल में    तिपुर  (दो मंजिला ) मकान में बहुत कम तिबारी देखने को मिलती हैं , अब तक के  सर्वेक्षण में तो नहीं मिली है।   जगदीश प्रसाद  उनियाल की तिबारी की अहम विशेषता तिबारी कटान  व तोरण (मंडल , arch , मेहराब  अर्ध गोल मुरिन्ड )  तिपत्ती   रूप।  स्तम्भ व मेहराब मिलन के थांत पर कहीं भी छिलपट्टी /ब्रैकेट  नहीं है।
  चार स्तम्भों वाली तिबारी भी आम तिबारियों जैसे ही तीन मोरी /द्वार , खोळी  वाली तिबारी है। तिबारी पहली मंजिल के  पाषाण छज्जे  पर ही आधारित है।   दक्षिण गढ़वाल या गढ़वाल की अन्य तिबारियों भांति इस तिबारी के स्तम्भ में  आधार पर कुम्भी , फिर  डीला /round wooden  bracket , फिर उर्घ्वगामी पदम् दल , फिर शाफ़्ट  की मोटाई कम होना व  फिर डीला , उर्घ्वगामी कमल दल व फिर तोरण का अर्ध मंडल जो दूसरे  स्तम्भ के अर्ध तोरण से मिल पूरा तोरण बनता है।  दक्षिण गढ़वाल की अधिकतर तिबारियों में उर्घ्वगामी कमल दल के बाद जब शाफ़्ट कम मोटा जाता होता है तो स्तम्भ गोलाई लिए होता है किन्तु  जगदीश प्रसाद  उनियाल की तिबारी में स्तम्भ के शाफ़्ट गोलाई में न हो चौकोर हैं जो एक विशेषता है। शाफ़्ट के ऊपर डीले भी गोल नहीं अपितु चौकोर ही हैं।  यद्यपि तोरण तिपत्ती  आयकर का है किन्तु दीखनेमे कच अलग ही लगता है। 
 तोरण के बाम व दायं  पट्टिकाओं में में अष्टदल पुष्प अंकित है व वानस्पतिक अलंकरण है।  टॉर्न के ऊपर शीर्ष (मुरिन्ड ) आयताकार पट्टिका की है।  ज्यामितीय व प्राकृतिक कला /अलंकरण का नयनाभिरामी नमूना है।  मानवीय अलंकरण इस तिबारी में नहीं हुए हैं।
  निष्कर्ष में कहा जा सकता है कि अमाल्डू  म ेजगदीश प्रसाद  उनियाल के  तिपुर मकान की तिबारी कई दृष्टि से दक्षिण गढ़वाल की तिबारियों से भिन्न भी है व विशेष विशेष्ता लिए है।   

सूचना व फोटो आभार  :  अशोक उनियाल , अमाल्डू
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  Traditional House Wood Carving  (Tibari ) Art of, Dhangu, Garhwal, Uttarakhand ,  Himalaya; Traditional House Wood Carving (Tibari) Art of  Udaipur , Garhwal , Uttarakhand ,  Himalaya; House Wood Carving (Tibari ) Art of  Ajmer , Garhwal  Himalaya; House Wood Carving Art of  Dabralsyun , Garhwal , Uttarakhand  , Himalaya; House Wood Carving Art of  Langur , Garhwal, Himalaya; House wood carving from Shila Garhwal  गढ़वाल (हिमालय ) की भवन काष्ठ कला , हिमालय की  भवन काष्ठ कला , उत्तर भारत की भवन काष्ठ कला


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ठंठोली (मल्ला ढांगू ) में कालिका प्रसाद  बडोला   के  जंगले दार मकान में काष्ठ कला व लौह कला,  अलंकरण

ठंठोली (मल्ला ढांगू ) में लोक कला (तिबारी , निमदारी , जंगला ) कला -4

ढांगू गढ़वाल , हिमालय  की तिबारियों/ निमदारियों / जंगलों  पर काष्ठ अंकन कला -
  Traditional House wood Carving Art of West Lansdowne Tahsil  (Dhangu, Udaypur, Ajmer, Dabralsyun,Langur , Shila ), Garhwal, Uttarakhand , Himalaya   37
  दक्षिण पश्चिम  गढ़वाल (ढांगू , उदयपुर ,  डबराल स्यूं  अजमेर ,  लंगूर , शीला पट्टियां )   तिबारियों , निमदारियों , डंड्यळियों   में काष्ठ उत्कीर्णन कला /अलंकरण   37
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  गढ़वाल, उत्तराखंड , हिमालय की भवन  (तिबारी, निमदारी , जंगलादार   ) काष्ठ अंकन लोक कला ( तिबारी अंकन )  -  63
Traditional House Wood Carving Art (Tibari) of Garhwal , Uttarakhand , Himalaya -   63 
(  लेख में श्री , जी नहीं लगे हैं )
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 संकलन - भीष्म कुकरेती   
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 मकान निर्माण मनुष्य की समस्या आदिकाल याने गुफा काल से ही रही है।  मकान निर्माण हेतु संसाधन , निरंतर आय व तकनीक सुलभता की आवश्यकता गुफा काल में भी थी और आज भी। 
गढ़वाल में सन 1890 तक लगभग तल मंजिल मकान या झोपड़े (उबर ) ही थे।  बिरलों के सिलेटी पत्थर की छतदार मकान होते थे या रहे होंगे (जौनसार में कुछ     अपवाद छोडकर  ) .  गोरखा या उससे पहले गढ़वाली राजाओं के समय मकान पर बहुत अधिक कर लगने के कारण मकान ऊपर मंजिल की और न बढाकर भू समांतर बढ़ाये जाते थे।  आधे से अधिक परिवार तब गोठ  में ही सोते थे।  जैसे जसपुर के कुछ परिवार  पल्ल के नीचे ग्वील  में सोते थे व जाड़ों में ऊपर जसपुर आ जाते थे। 
   एक मंजिला मकान की परम्परा ब्रिटिश काल में तब शुरू हुआ जब संसाधन बढ़े व तकनीक- तकनीशियन  व उपकरण (पत्थर तोड़ने , मिटटी खोदने ) सुलभ होते गए। 
    तिबारी निर्माण  लगभग 1910 के पश्चात ही शुरू हुआ होगा।  जंगलेदार मकान को प्राचीन शैली नहीं कहा जा सकता अपितु आधुनिक ही कहा जायेगा (लगभग 1940 के बाद ) ।  वास्तव में जंगलेदार मकान वे ही निर्माण करते थे जिन्हे पाषाण छज्जे की समस्य हेलनि पड़ती थी अथवा नौकरी की वजह से जो मैदान व ब्रिटिश शैली से कुछ प्रभावित होते थे।
 जैसा कि   पहले भी चर्चा की गयी थी कि ठंठोली  में सब प्रकार के मकान  थे जैसे तिबारियां , निमदारियां , काष्ठ युक्त जंगलेदार मकान , लौह के जंगलेदार मकान (जैसे शेखरा नंद , सुदंर लाल कंडवाल का पैतृक मकान ) . काष्ठ जंगलेदार  मकानों की शृंखला में आज ठंठोली के कालिका प्रसाद बडोला के काष्ठ जंगले   में कला विवेचना होगी।
 कलिका प्रसाद बडोला वर्तमान में मुंबई में निवास करते हैं।  कलिका प्रसाद बडोला का चार कमरों वाले जंगलेदार मकान में पहली मंजिल पर लकड़ी का छज्जा , लकड़ी के दासों पर टिका है  और  जंगले  में लकड़ी के छज्जे पर T आकृति के स्तम्भ है।  T आकर के स्तम्भ ही इस भवन के जंगले  को ढांगू के अन्य जंगलेदार  मकान से अलग कर देते हैं।  स्तम्भ के ऊपरी भाग याने ऊपर टी T  अकार आकृति छत आधार की कड़ी से जोड़े गए हैं ।  स्तम्भों  के ऊपरी भाग में T आकृति जंगके को तोरण नुमा छवि प्रदान करती है और यही है ठंठोली में कलिका प्रसाद बडोला क ेजंगले की विशेष्ता।
   जंगल के स्तम्भों को  भू समांनांतर  लौह पट्टिकाओं या सरियाओं   से जोड़ा गया है जो  मकान  की छवि वृद्धि में कामयाब है।    ठंठोली के कालिका प्रसाद बडोला के जंगलेदार मकान में काष्ठ कला में केवल ज्यामितीय अलंकरण के दर्शन होते हैं कहीं  भी प्राकृतिक व मानवीय अलंकरण के दर्शन नहीं होते हैं। 
कालिका प्रसाद बडोला का जंगलादार मकान में काष्ठ  कला , अलंकरण दृष्टि से  दक्षिण गढ़वाल में  अन्य  जंगलेदार कला युक्त जंगला जैसा ही ही किन्तु स्तम्भ के शीर्ष में  T अकार ने इस जंगल को अलग दर्जा दे दिया है।  टी आकर कम ही मिलता है .
मकान सन  1958 में  निर्मित हुआ था । 
सूचना व फोटो आभार : सतीश कुकरेती कठूड़    व मुकेश बडोला 
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  Traditional House Wood Carving  (Tibari ) Art of, Dhangu, Garhwal, Uttarakhand ,  Himalaya; Traditional House Wood Carving (Tibari) Art of  Udaipur , Garhwal , Uttarakhand ,  Himalaya; House Wood Carving (Tibari ) Art of  Ajmer , Garhwal  Himalaya; House Wood Carving Art of  Dabralsyun , Garhwal , Uttarakhand  , Himalaya; House Wood Carving Art of  Langur , Garhwal, Himalaya; House wood carving from Shila Garhwal  गढ़वाल (हिमालय ) की भवन काष्ठ कला , हिमालय की  भवन काष्ठ कला , उत्तर भारत की भवन काष्ठ कला

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गटकोट  में पंडित महानंद जखमोला के जंगलेदार तिपुर मकान में  काष्ठ कला

गटकोट में /तिबारी जंगलेदार मकान में काष्ठ कला - 5
House Wood Carving art in a Railing or Jngaledar  House of Mhanand Jakhmola of Gatkot
ढांगू गढ़वाल , हिमालय  की तिबारियों/ निमदारियों / जंगलों  पर काष्ठ अंकन कला -
  Traditional House wood Carving Art of West Lansdowne Tahsil  (Dhangu, Udaypur, Ajmer, Dabralsyun,Langur , Shila ), Garhwal, Uttarakhand , Himalaya   -38
  दक्षिण पश्चिम  गढ़वाल (ढांगू , उदयपुर ,  डबराल स्यूं  अजमेर ,  लंगूर , शीला पट्टियां )   तिबारियों , निमदारियों , डंड्यळियों   में काष्ठ उत्कीर्णन कला /अलंकरण   -38
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  गढ़वाल, उत्तराखंड , हिमालय की भवन  (तिबारी, निमदारी , जंगलादार   ) काष्ठ अंकन लोक कला ( तिबारी अंकन )  -  64
Traditional House Wood Carving Art (Tibari) of Garhwal , Uttarakhand , Himalaya -    64
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 संकलन - भीष्म कुकरेती
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    टिहरी गढ़वाल ,  चमोली गढ़वाल  हो या हो ढांगू गढ़वाली , सभी जगह यह पाया गया है कि जंगलेदार (railing ) मकानों  में काष्ठ  कला अलंकरण    कम ही पाया गया  व ज्यामितीय कला  ही अधिक हावी हुयी है। 
     प्रलेखीकरण या दस्तावेजीकरण हेतु आवश्यक है कि प्रत्येक गाँव  की तिबारियों ,   निमदारिओं , डंड्यळ -डंड्यळियोन व  जंगलेदार मकानों का विवेचन हो व डिजिटल मीडिया या इंटरनेट माध्यम में  जाय।
दस्तावेजीकरण में आज   गटकोट  में प्रसिद्ध कर्मकांडी पंडित महानंद जखमोला के जंगलेदार मकान में काष्ठ कला की    विवेचना होगी।  गटकोट में महानंद जखमोला  का जंगलेदार तिपुर मकान क्षेत्र में गटकोट छवि वृद्धि कारक ही न था अपितु गटकोट  में कई सामाजिक का सामूहिक कार्यों के लिए भी  कारक था जैसे रामलीला मंचन का सामन रखना , रामलीला रिहर्सल , सामूहिक भांड कूंड रखना , बरात  ठहराना  आदि हेतु महा नंद जखमोला की तिबारी कई वर्षों तक  उपयोग  रही है।  अब पलायन के कारण उपजे विभिन्न समस्याओं  से यह तिपुर जूझ रहा है  जीर्णोद्धार की प्रतीक्षारत है।
   जैसा कि   तिपुर नाम से ही पता चलता कि मकान पहाड़ी शैली में दो मजिला   उबर /तल मंजिल    के उपर  डेढ़ या दो मंजिल  और हैं. मुख्य जंगला railing ) पहली मंजिल पर है  , जंगले या स्तम्भ  तल मंजिल व पहली मंजिल दोनों में हैं। 
 मकान का छज्जा  पाषाण का है किन्तु उस बढ़ाने  हेतु  लकड़ी का छज्जा भी लगाया गया  . पहले मंजिल का छज्जा दो मिटटी पत्थर  के स्तम्भों /columns पर टिका है।  पहली मंजिल में 30 ज्यामितीय शैली में कटे स्तम्भ हैं जिन पर कोई  प्राकृतिक या मानवीय कला अलंकृत नहीं हुयी है किन्तु ठंठोली के कालिका प्रसाद बडोला के जंगले की भाँति   ही इस जंगले  स्तम्भों के ऊपरी भाग अंग्रेजी टी T  आकर हैं जो जंगले  को एक विशेष छवि प्रदान करने में सक्षम  हैं व दूर से ऐसा लगता है  स्तम्भों के मध्य शीर्ष में तोरण बंधा हो। स्तम्भों के मध्य दो फिट का फासला है व दो फिट ऊपर तक छोटा जंगले  हैं जो मकान को विष छवि प्रदान करते हैं।
     निष्कर्ष  निकलता है कि  गटकोट में  महा नंद जखमोला के  जंगलेदार मकान अपने वृहद रूप ही नहीं अपितु तिपुर  (जिस मकान पर तीन मंजिल भूतल के ऊपर दो और मंजिल ) में जंगले , जंगले में ज्यामितीय कला , जंगले के काष्ठ स्तम्भों के ऊपर अंग्रेजी टी T आकर के लिए याद की जाएगी।   जंगले दार निमदारियों निर्माण का प्रचलन सन 1940 के पश्चात ही प्रचारित हुआ तो महा नंद जखमोला का काष्ठ युक्त स्तम्भों से सजा जंगलेदार मकान भी सन  1950 के बाद का ही होगा व स्थानीय मिस्त्रियों ने ही जंगलेदार मकान का निर्माण किया होगा। 

सूचना व फोटो आभार : विवेका नंद जखमोला 
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ग्वील में  तारा दत्त कुकरेती की तिबारी  में भवन काष्ठ कला अलंकरण

ग्वील (ढांगू , द्वारीखाल ब्लॉक ) गढ़वाल में तिबारी , निमदारी , जंगले  में काष्ठ  कला अलंकरण  -4
Wood carving Art on Tibari of Gweel (Dhangu) Garhwal - 4

ढांगू संदर्भ में गढ़वाल , हिमालय  की तिबारियों/ निमदारियों / जंगलों  पर काष्ठ अंकन कला -
  Traditional House wood Carving Art of West Lansdowne Tahsil  (Dhangu, Udaypur, Ajmer, Dabralsyun,Langur , Shila ), Garhwal, Uttarakhand , Himalaya   -39
  दक्षिण पश्चिम  गढ़वाल (ढांगू , उदयपुर ,  डबराल स्यूं  अजमेर ,  लंगूर , शीला पट्टियां )   तिबारियों , निमदारियों , डंड्यळियों   में काष्ठ उत्कीर्णन कला /अलंकरण  -39 
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  गढ़वाल, उत्तराखंड , हिमालय की भवन  (तिबारी, निमदारी , जंगलादार   ) काष्ठ अंकन लोक कला ( तिबारी अंकन )  -  65
Traditional House Wood Carving Art (Tibari) of Garhwal , Uttarakhand , Himalaya -    65
(लेख अन्य पुरुष में है तो श्री , जी शब्द नहीं जोड़े गए है )
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 संकलन - भीष्म कुकरेती
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 तारा दत्त कुकरेती की तिबारी भी ग्वील की समृद्धि का एक साक्ष्य है।
आम गढ़वाली तिबारियों जैसे ही तारा दत्त कुकरेती की तिबारी भी है। प्रथम मंजिल पर चार स्तम्भों से तीन मोरी . खोली य ाद्वार बनते हैं व खोली में  तीन पत्ती जैसे तोरण किन्तु केंद्र में तीखा तोरण है।  किनारे के दो स्तम्भ दिवार से कड़ी मार्फत जुड़े है , कड़ी में वनस्पति या प्रकृती व ज्यामितीय कला दर्शन होते है।  प्रत्येक स्तम्भ में आधार पर व ऊपर   तोरण शुरू होने से पहले अधोगामी पदम् पुष्प दल ( 2 x 4 = कुल आठ ) मिलते है व इसी तरह कुल 8 उर्घ्वगामी  पद्म  पुष्प दल हैं।  ऊपरी कमल दल से तोरण  शुरू होता है।  इसके अतिरिक्त प्रत्येक स्तम्भ में दो दो डीले (round wood plate ) है (कुल 8 डीले ) हैं। तोरण की बगल वाली पट्टिकाओं में अस्टदल पुष्प है (कुल 6 अस्टदल पुष्प ) मिलते हैं।  तोरण ढैपर  की दिवाल   की काष्ठ पट्टिका से मिल जाते हैं व इस जोडू  काष्ठ पट्टिका में भी प्राकृतिक अलंकरण हुआ है। 
तिबारी सम्भवतया 1930 के आस पास ही निर्मित हुयी होगी।  यह तय है कि मकान तो सौड़  के शेर सिंह नेगी परिवार व बणव सिंह नेगी परिवार ने ही निर्मित  किया होगा किन्तु तिबारी बाहर के कलाकारों ने ही निर्मित की  होगी। 
निष्कर्ष  में कहा जा सकता है कि तारा दत्त कुकरेती की  आकर्षक तिबारी    में प्राकृतिक व ज्यामितीय कला अलंकरण मिलता है व कहीं भी मानवीय अलंकरण व आध्यात्मिक प्रतीक अलंकरण नहीं मिलते हैं। 

सूचना व फोटो आभार : राकेश कुकरेती , ग्वील
Copyright @ Bhishma Kukreti, 2020
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  ढुंगा सकरा में बडोला बंधुओं की भव्यतम तिबारी में उत्कृष्टतम कला  अलंकरण दर्शन   

House wood Carving Art of Udaypur Patti (Yamkeshwar) -12
गढ़वाल , हिमालय  की तिबारियों/ निमदारियों / जंगलों  पर काष्ठ अंकन कला -
  Traditional House wood Carving Art of West Lansdowne Tahsil  (Dhangu, Udaypur, Ajmer, Dabralsyun,Langur , Shila ), Garhwal, Uttarakhand , Himalaya 40 
  दक्षिण पश्चिम  गढ़वाल (ढांगू , उदयपुर ,  डबराल स्यूं  अजमेर ,  लंगूर , शीला पट्टियां )   तिबारियों , निमदारियों , डंड्यळियों   में काष्ठ उत्कीर्णन कला /अलंकरण  40
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  गढ़वाल, उत्तराखंड , हिमालय की भवन  (तिबारी, निमदारी , जंगलादार   ) काष्ठ अंकन लोक कला ( तिबारी अंकन )  -  66
Traditional House Wood Carving Art (Tibari) of Garhwal , Uttarakhand , Himalaya - 66   
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 संकलन - भीष्म कुकरेती
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अब तक समीक्षित  तिबारियों में ढुंगा  सकरा गांव में ब्रह्मा नंद , परमानंद , सोहन लाल बडोला बंधुओं  की तिबारी काष्ठ कला अलंकरण दृष्टि से सबसे उत्कृष्ट तिबारी है।  भव्य है बड़ी है और कई तरह की कलाएं /अलंकरण बडोला बंधुओं की तिबारी में हैं।  अब यह भव्य तिबारी हर्ष मोहन बडोला की तिबारी कहलायी जाती है।
    ढुंगा उदयपुर /यमकेश्वर क्षेत्र का एक महत्वपूर्ण गाँव है जहां बडोला जाती का  संख्या अधिक है , ढुंगा  तीन हैं  अकरा , ढुंगा पल्ला सकरा ढुंगा , वल्ली सकरा ढुंगा।  ढांगू , डबराल स्यूं  लिए ढुंगा  का अर्थ  था रिस्तेदारी हो गयी तो उच्च गुणवत्ता के उड़द , काले सफेद लुब्या /किंडनी बीन्स की दाल बीज व ढुंगा गए तो दाल के संग कटोरी भर घी।  याने अन्य  क्षेत्रवासियों की दृष्टि में ढुंगा याने कृषि व  पशु पालन में समृद्ध गाँव। 
   कहा जाता है कि बड़ोली एकेश्वर से बडोला ढुंगा में बसे व यहाँ से उदयपुर के अन्य क्षेत्रों में ठांगर , पण चूर, जड़सारी  आदि ही नहीं बेस अपितु ढांगू  में ठंठोली में भी बेस।
   सम्प्रति   तिभित्या म, दुखंड मकान में छह कम तल मंजिल व  पहली मंजिल में है (याने  तीन बंद कमरे व बाहर  कमरों का मकान किन्तु तिबारी हेतु तीन कमरों को बरामदा में बदल दिया गया है।  आम  तिबारी चार स्तम्भों व तीन मोरियों की तिबारी देखि गयीं किन्तु  ब्रह्मा नंद , परमानंद , सोहन लाल बडोला बंधुओं  (वर्तमान हर्ष मोहन बडोला ) की तिबारी  में  छह स्तम्भ हैं व पांच द्वार /मोरियां /खोळियां हैं।  अब तक समीक्ष्य तिबारियों से विलक्षण तिबारी हुयी   ढुंगा  सकरा में ब्रह्मा नंद , परमानंद , सोहन लाल बडोला बंधुओं   की तिबारी।
   मकान पत्थर के छज्जों वाला है , दास भी पत्थर के ही हैं।  पत्थर की देळी /देहरी   ऊपर छह के छह स्तम्भ हैं , ब्रह्मा नंद , परमानंद , सोहन लाल बडोला बंधुओं  की तिबारी में स्तम्भ ालकरण भी क्षत्र की  तिबारियों से भिन्न है।  क्षेत्र की अन्य  स्तम्भ आधार कुम्भी अधोगामी पदम् दल  (descending lotus flower petals ) से अलंकृत होता है किन्तु   बडोला की तिबारी में स्तम्भ कुम्भी में भिन्न प्रकार का पत्ती अलंकरण  हुआ हो इस तिबारी को अन्य तिबारियों से  ही देता है। 
  स्तम्भ में दोनों डीले  (round wood plate ) भी अन्य तिबारियों जैसे ही हैं , आधार में कुम्भी के बाद डीला  व फिर उर्घ्वगामी पदम्  दल की शैली भी क्षेत्रीय शैली से मिलती जुलती है।   किन्तु स्तम्भ के ऊपरी  सिरे याने डीले के ऊपर कुम्भी/पथोड़ा आकृति  कमल दल से नहीं अपितु फूल व पत्ती मिश्रित चित्रकारी से अलंकृत है जो  ढुंगा  सकरा में ब्रह्मा नंद , परमानंद , सोहन लाल बडोला बंधुओं   की तिबारी को दक्षिण गढ़वाल की अभी तक विवेच्य  तिबारियों से अलग कर देने में सक्षम है। 
 ऊपर प्रत्येक स्तम्भ शीर्ष  में  थांत/ bat blade  नुमा काष्ठ आकृति  शुरू होती  है जो छत की आधार पट्टिकाओं के नीचे की पट्टिका से मिल जाता है. थांत पट्टिका से काष्ठ छिप्पटी /ब्रैकेट /bracket निकले हैं जिनमे उत्कृष्ट कला उत्कीर्ण हुयी है।   व यहीं से स्तम्भ से तोरण /मंडन अर्ध चाप /arch बनाने की पट्टिका भी शुरू होती है जो दुसरे स्तम्भ की पट्टिका से मिल सम्पूर्ण अर्ध चाप या तोरण बनाती है। 
 थांत पट्टिका से निकले छिप्पटी में पक्षी व पुष्प /पात /flowers leaves की प्राकृतिक कला अलंकरण हुआ है याने इस  छिपट्टी /ब्रैकेट /wood bracket में प्राकृतिक , ज्यामितीय व मानवीय या पशु पक्षी युक्त  कलाओं /अलंकरणों का सम्मिश्रण हुआ है जो कला दृष्टि से अभिनव माना जाता है।  पक्षी तोता या मोर की छवि प्रदान करता है व पंख में फूल पत्तियों का अलंकरण है। 
प्रत्येक ब्रैकेट /छिपट्टी ऊपर छत के आधार पट्टिका से मिलते हैं व छत की आधार काष्ठ पट्टिका से लटकते शंकु नुमा आकृतियां तिबारी को भव्य छवि perception प्रदान करने में सफल सिद्ध हुए हैं। तोरण शीर्ष व छत  आधार पट्टिकाके मध्य पट्टिका में भी प्राकृतिक ज्यामितीय अलंकरण हुआ है। ऐसे ही शंकु सौड़  ढांगू में शेर सिंह नेगी की तिबारी में भी मिले हैं। 
 कला विदों की स्पष्ट राय है कि  ढांगू , उदयपुर , डबराल स्यूं , अजमेर , लंगूर व शिला पट्टियों  में ज्यामितीय , प्राकृतिक व मानवीय (पक्षी) का सम्मिश्रित अलंकरण  की दृष्टि से  ब्रह्मा नंद , परमानंद , सोहन लाल बडोला बंधुओं   की तिबारी भव्यतम व उत्कृष्टतम  तिबारियों में से एक है व यह तिबारी कई विशेषता लिए भी है जो क्षेत्र की अन्य तिबारियों में नहीं मिलते हैं ua utne haavi nhi hai ।
तिबारी का निर्माण सम्भवतया 1930 के लगभग  हुआ होगा व कलाकार तो आयतित ही रहे होंगे।  कहा जाता  है कि   कलाकार श्रीनगर या मथि गढ़वाल से ही आये थे।   

सूचना व फोटो आभार : शिव प्रसाद बडोला , ढुंगा , सकरा

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