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Garhwali Poems by Balkrishan D Dhyani-बालकृष्ण डी ध्यानी की कवितायें

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 03, 2011, 12:06:15 AM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी
November 4 · Edited
दिल की धड़कन

धक धक करता रहा वो दिल
ना जाने वो किसके लिये
चुप चाप अकेले मरता रहा दिल
ना जाने वो किसके लिये

किसके लिए उसने सपने सजाये
किसके लिये उसने अपने बनाये
अपना बनाकर उन सपनो को
वो फिर भी पराये ही नजर आये

कभी सांस चली तेज कभी मध्यम
जोड़ती रही उसे वो दिल की धड़कन
शरीर को मेरे वो हलचल कराती रही
रिश्ते बनते रहे उसे वो निभाती रही

ऐसा ही चला उसका वो नित कर्म
भांति भांति मिले उसे वो हर कदम
अब तक था अकेला ना जान पाया
आना जाना है यंहा क्या उसने पाया

अकेले आया था अकेले जायेगा वो
गीता के सार को अनसुना कर गया वो
धड़कती रही फिजूल ही उम्र भर वो
धड़कना था उसे किस के लिए
किस के लिए धड़कती रही वो
किस के लिए धड़कती रही वो
किस के लिए धड़कती रही वो

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
http:// balkrishna_dhyani.blogspot.com
में पूर्व प्रकाशित -सर्वाधिकार सुरक्षित

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

मैं अधूरा हुआ

एक एक कर के मै उससे जब अधूरा हुआ
चला मेरा था ,मेरा मुझसे वो जब होके जुदा
आँखें भरा आयी थी या वो नमकीन था समा
खारा खारा मेरा तन-बदन जाने क्यों होने लगा ... २

गाँव मेरा मुझसे अब था दूर होने लगा
आँखों का पानी खुद ब खुद अब रोने लगा
कोशिश कि थी मैंने उसे रोकने कि मगर
हालात ने उसके उसको ना ऐसा करने दिया ... २

चला पड़ा अपनी रहा वो उसकी वो मंजिल नयी
बंजारा मन बनकर उसका वो कारवां ले चल पड़ा
यादों के समंदर में वो खोया जब इस तरह
रूठा गाँव उसका एक एक करके उससे अधूरा होने लगा... २

माँ बाप मेरे वो पगडंडी वो मेरे गाँव की
वो मुझसे टूटी नदी उस बूढ़े पेड़ के छाँव की
रस्सी से मैंने उसे अपने हाथों से बांधा था कभी
दो पैंसे के मोह ने मुझसे वो बांधा झूला खोल ही दिया ... २

अब मैं बैठा हूँ दूर उससे हजारों मील दूर कंहीं
अब भी लगता है मुझे वो आस पास है मेरे यंही कंहीं
खोजता हूँ अंधेरों और उस सपनो में अक्सर मैं उसे
हाथ में कुछ ना आता मेरे बस, आते हैं वो चंद सिक्के मेरे ... २

इतनी दूर जाकर अब मै सोचता हूँ मैंने क्या पाया
क्यों अपना देश वो मेरा प्यारे गाँव को मैंने बिसराया
अब भी आना चाहों मैं पर मै ना वापस आ पाऊँ
मोह ने मेरे ऐसा जकड़ा हुआ,गाँव मेरा मुझसे रूठा हुआ है ... २

एक एक कर के मै उससे जब अधूरा हुआ
चला मेरा था ,मेरा मुझसे वो जब होके जुदा
आँखें भरा आयी थी या वो नमकीन था समा
खारा खारा मेरा तन-बदन जाने क्यों होने लगा ... २

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

अंधेरों का सफर है

अंधेरों का सफर है उजालों की तरफ है
बह जाती है जिंदगी रह जाता बस असर है
अंधेरों का सफर है.....

दिल के आईने में किस ने दी दस्तक है
टूटे किनारों पे लहरों की बस हलचल है
अंधेरों का सफर है.....

स्पर्श हुआ कुछ ऐसे अनछुआ सा जैसे
कभी सुख कभी दुःख का मन समंदर है
अंधेरों का सफर है.....

लड़ता जाता अकेले , जाना किधर है
बह रही पहाड़ों से सागर में मिलन है
अंधेरों का सफर है.....

अँधेरे और उजाले ये तो आते जाते रहेंगे
सफर चलता रहेगा तेरे जाने के बाद भी
अंधेरों का सफर है.....

अंधेरा ही तेरी आज असली पहचान है
निकल सका तो तब तेरा ही सन्मान है
अंधेरों का सफर है.....

अंधेरों का सफर है उजालों की तरफ है
बह जाती है जिंदगी रह जाता बस असर है
अंधेरों का सफर है.....

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

दिल की धड़कन

धक धक करता रहा वो दिल
ना जाने वो किसके लिये
चुप चाप अकेले मरता रहा दिल
ना जाने वो किसके लिये

किसके लिए उसने सपने सजाये
किसके लिये उसने अपने बनाये
अपना बनाकर उन सपनो को
वो फिर भी पराये ही नजर आये

कभी सांस चली तेज कभी मध्यम
जोड़ती रही उसे वो दिल की धड़कन
शरीर को मेरे वो हलचल कराती रही
रिश्ते बनते रहे उसे वो निभाती रही

ऐसा ही चला उसका वो नित कर्म
भांति भांति मिले उसे वो हर कदम
अब तक था अकेला ना जान पाया
आना जाना है यंहा क्या उसने पाया

अकेले आया था अकेले जायेगा वो
गीता के सार को अनसुना कर गया वो
धड़कती रही फिजूल ही उम्र भर वो
धड़कना था उसे किस के लिए
किस के लिए धड़कती रही वो
किस के लिए धड़कती रही वो
किस के लिए धड़कती रही वो

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बस वो चेहरा

झिलमिल झिलमिल
वो झलकता ही रहा
नूर बनकर  वो
टिप-टिप टपकता ही रहा

छल-छल
वो छलकता ही रहा
वो चेहरा कुछ
मुझसे कहता ही रहा

मदहोशी
छायी ऐसे मुझको
ऋतू प्रेम की
आयी हो जैसे

पतझड़ का अब
दमन सरकने लगा 
मौसम जवानी का
अब महकने लगा

गुल खिला मेरे 
उस दिल बाग़ में
भौंरा बन दिल
अब मचलने लगा

नजरों का खेल
आँखों आँखों द्वारा चलने लगा   
अब तक ये दिल था मेरा
किसी और का अब होने लगा

क्या हुआ था मुझे
और क्या होने लगा
गर्महाट हुयी तन में और
इश्क बुखार चढ़ने लगा

झिलमिल झिलमिल
वो झलकता ही रहा
नूर बनकर  वो
टिप-टिप टपकता ही रहा

छल-छल
वो छलकता ही रहा
वो चेहरा कुछ
मुझसे कहता ही रहा

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी November 6मैं अधूरा हुआ

एक एक कर के मै उससे जब अधूरा हुआ
चला मेरा था ,मेरा मुझसे वो जब होके जुदा
आँखें भरा आयी थी या वो नमकीन था समा
खारा खारा मेरा तन-बदन जाने क्यों होने लगा ... २

गाँव मेरा मुझसे अब था दूर होने लगा
आँखों का पानी खुद ब खुद अब रोने लगा
कोशिश कि थी मैंने उसे रोकने कि मगर
हालात ने उसके उसको ना ऐसा करने दिया ... २

चला पड़ा अपनी रहा वो उसकी वो मंजिल नयी
बंजारा मन बनकर उसका वो कारवां ले चल पड़ा
यादों के समंदर में वो खोया जब इस तरह
रूठा गाँव उसका एक एक करके उससे अधूरा होने लगा... २

माँ बाप मेरे वो पगडंडी वो मेरे गाँव की
वो मुझसे टूटी नदी उस बूढ़े पेड़ के छाँव की
रस्सी से मैंने उसे अपने हाथों से बांधा था कभी
दो पैंसे के मोह ने मुझसे वो बांधा झूला खोल ही दिया ... २

अब मैं बैठा हूँ दूर उससे हजारों मील दूर कंहीं
अब भी लगता है मुझे वो आस पास है मेरे यंही कंहीं
खोजता हूँ अंधेरों और उस सपनो में अक्सर मैं उसे
हाथ में कुछ ना आता मेरे बस, आते हैं वो चंद सिक्के मेरे ... २

इतनी दूर जाकर अब मै सोचता हूँ मैंने क्या पाया
क्यों अपना देश वो मेरा प्यारे गाँव को मैंने बिसराया
अब भी आना चाहों मैं पर मै ना वापस आ पाऊँ
मोह ने मेरे ऐसा जकड़ा हुआ,गाँव मेरा मुझसे रूठा हुआ है ... २

एक एक कर के मै उससे जब अधूरा हुआ
चला मेरा था ,मेरा मुझसे वो जब होके जुदा
आँखें भरा आयी थी या वो नमकीन था समा
खारा खारा मेरा तन-बदन जाने क्यों होने लगा ... २

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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बालकृष्ण डी ध्यानी
November 5
अंधेरों का सफर है

अंधेरों का सफर है उजालों की तरफ है
बह जाती है जिंदगी रह जाता बस असर है
अंधेरों का सफर है.....

दिल के आईने में किस ने दी दस्तक है
टूटे किनारों पे लहरों की बस हलचल है
अंधेरों का सफर है.....

स्पर्श हुआ कुछ ऐसे अनछुआ सा जैसे
कभी सुख कभी दुःख का मन समंदर है
अंधेरों का सफर है.....

लड़ता जाता अकेले , जाना किधर है
बह रही पहाड़ों से सागर में मिलन है
अंधेरों का सफर है.....

अँधेरे और उजाले ये तो आते जाते रहेंगे
सफर चलता रहेगा तेरे जाने के बाद भी
अंधेरों का सफर है.....

अंधेरा ही तेरी आज असली पहचान है
निकल सका तो तब तेरा ही सन्मान है
अंधेरों का सफर है.....

अंधेरों का सफर है उजालों की तरफ है
बह जाती है जिंदगी रह जाता बस असर है
अंधेरों का सफर है.....

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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बालकृष्ण डी ध्यानी
November 4 · Edited
दिल की धड़कन

धक धक करता रहा वो दिल
ना जाने वो किसके लिये
चुप चाप अकेले मरता रहा दिल
ना जाने वो किसके लिये

किसके लिए उसने सपने सजाये
किसके लिये उसने अपने बनाये
अपना बनाकर उन सपनो को
वो फिर भी पराये ही नजर आये

कभी सांस चली तेज कभी मध्यम
जोड़ती रही उसे वो दिल की धड़कन
शरीर को मेरे वो हलचल कराती रही
रिश्ते बनते रहे उसे वो निभाती रही

ऐसा ही चला उसका वो नित कर्म
भांति भांति मिले उसे वो हर कदम
अब तक था अकेला ना जान पाया
आना जाना है यंहा क्या उसने पाया

अकेले आया था अकेले जायेगा वो
गीता के सार को अनसुना कर गया वो
धड़कती रही फिजूल ही उम्र भर वो
धड़कना था उसे किस के लिए
किस के लिए धड़कती रही वो
किस के लिए धड़कती रही वो
किस के लिए धड़कती रही वो

एक उत्तराखंडी

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कविता उत्तराखंड की बालकृष्ण डी ध्यानी
Yesterday · Edited
हे धुरा आ

चल मेरी ढंगी
हे धुरा आ हे हुरु हरुआ
स्यारा खोळ मा लुक्यां व्हालो
पाखी बांदर फुर फुरआ
चल मेरी ढंगी
हे धुरा आ हे हुरु हुरुआ

जंगलता कू डैर हे धुरा
रखक ना तू ख़ूठा भैर हे धुरा
बैठ्युं व्हालो वख हे धुरा
गुलदार निशाण सदिकि हे धुरा
चल मेरी ढंगी
हे धुरा आ हे हुरु हुरुआ

ऐगे तू उकाळु मा छुचि हे धुरा
खानु ना म्याळी ते थे उंदारूं हे धुरा
मनमा ना कैर चिंता हे धुरा
उठा तेरा खुटा सर सर हे धुरा
चल मेरी ढंगी
हे धुरा आ हे हुरु हुरुआ

अंधार पौड़ी जालू हे धुरा
ना चल लूट पुटा हे धुरा
डंडा कांडा सैई जाला हे धुरा
चल चल तू बी हिट अपरा घोरा हे धुरा
चल मेरी ढंगी
हे धुरा आ हे हुरु हुरुआ

चल मेरी ढंगी
हे धुरा आ हे हुरु हरुआ
स्यारा खोळ मा लुक्यां व्हालो
पाखी बांदर फुर फुरआ
चल मेरी ढंगी
हे धुरा आ हे हुरु हुरुआ


एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

१३ बरस

आच मेर पाली च
ब्याल तेर पाली
लूट ली बांदरों न
उजाड़ दी सारी स्यारी

बेटी ब्वारी लगी च
सजणा ते बाड़ी
आच बी उधारी चा
ब्य़ाल बी उधारी

कैल यक सुप्निया दिके
कैल वै थे निभै ?
गोल गोल गोल मा
गढ़ वासी ही थे नचै

जौना भैर देश मा
बच्चा यकुला रेस मा
बूढ़ों कि फौज यक
साथ कुकर बिरला ही चलै

कैल बोली दूँन च
कैल बोली चा गैरसैण
१३ बरस ये खंडा कू   
रीता रीता ही यक गैन.... ३ 

एक उत्तराखंडी

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