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Garhwali Poems by Balkrishan D Dhyani-बालकृष्ण डी ध्यानी की कवितायें

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 03, 2011, 12:06:15 AM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

मेर बुरांस

बुरांस खिल्यां 
ऊ डंडीयूँ-कंडियों मा.
हरी-भरी मेर धरती वा   
मौल्यार बथों मा
बुरांस खिल्यां
ऊ डंडीयूँ-कंडियों मा......2     

उकाळु का बाटों मा
बिखरयां पड्यां छन मेर बुरांस
लाल डाळ  भगा मा ऊ
पसरयाँ पड्यां छन मेर बुरांस

देकि कि बी अन देकि कैगे 
मेरा बुरंस फूलों थे छोड़ी कि  तू कखक चल्गे
बुरांस खिल्यां
ऊ डंडीयूँ-कंडियों मा......2

डंडा मा कबी घास-लकडू सरणी
छनी मा कबी मौल वा सरणी मेर बुरांस
चूल्हा का आगी जनी  वा जगणी
उंबरा मा बैठी कख व्हाली हेरणी मेर बुरांस

देकि कि बी अन देकि कैगे 
मेरा बुरंस फूलों थे छोड़ी कि  तू कखक चल्गे
बुरांस खिल्यां
ऊ डंडीयूँ-कंडियों मा......2   

विपदा पीड़ा कि मारी
खैरी से ना कबी हैर मेर बुरांस
तै थे च ये बिस्वास
आला बिता दिन ये पहाड़ मेर बुरांस 

बुरांस खिल्यां 
ऊ डंडीयूँ-कंडियों मा.
हरी-भरी मेर धरती वा   
मौल्यार बथों मा
बुरांस खिल्यां
ऊ डंडीयूँ-कंडियों मा......2

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

कविता  उत्तराखंड की बालकृष्ण डी  ध्यानी November 5चुप चाप निभै रै

डंडा धारा गौं गोठ्यार
चीमोड़ जी कु जीयु उड्यार
ऊंदरू उकालो का ऊ बाटा
सँघुला ताला खोल दादा

अल ग्धनी पल ग्धनी छला
बिस्यां सारा पुंगड़यां गारा
कमरी टूटगी खोली पौडगी
बेटी ब्वारी यख यकुली व्हैगी

अल डंडा पल्या डंडा
घासों कु छयों यख मौल्यार
रीता व्हैगेनी जंगलात डाला
चोर खैगैनी हमरु बांटा

अल सारी पल सारी
बौड़ा बॉडी कि लागी पाली
जौन नौना ऊँ का निछा घार
परदेश बस्याँ ऊ परिवार

याकलू रैगे बिराणो व्हैगे
म्यारु गढ़ा उत्तराखंड आच
नि रैगे वैं का सिपे सैलर
घार मा ऊँ का टक्क़ों ब्यापार

कैल धै लगाण कु आलो
कैल अपरा मुड़मा जूता खालो
चुप चाप निभै रै मेर दीदा
जबै मेर गढ़ मेरु ना रालो

तब परती ऐकी तू कया पालू ...३
एक उत्तराखंडी

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कै का

कै का खैल मा
खोई छो मी
वै कु ना कुई रंत च
ना क्वी च रैबार

किले जियूं मेरु क नू हुऌ
वै थे फिर बी याद
कै का खैल मा
खोई छो मी

क्ख्क बिरडी गै ऊ
क्ख्क हर्ची ग्याई ऊ
जै का नौऊ दगडी
मेरु नौऊ जुड़ी

जै बान सात फेर लगी
क्ख्क बौडी ग्याई ऊ
यकुली कै कि मी ये पाड़ा मा
क्ख्क छोड़ी ग्याई ऊ

कै का खैल मा
खोई छो मी
वै कु ना कुई रंत च
ना क्वी रैबार

एक उत्तराखंडी

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सार्थक भरद्वाज
हिंदुस्तान लिटिल चेफ

सार्थक
बस चला चल

मंजिल तेरी और कंही है
निशाना भेद दिया

सार्थक तूने
उसे साध दिया

मेरे खंड को
एक नया आयाम दिया

तेरी ख़ुशी में
मै  झूमा ऐसे

बग्वाल ख़ुशी
मेरी हुयी दूनी जैसे

छूटे छूटे हाथों ने
क्या किया कमाल

स्वाद ताज पहने
पहुंचा दून का महाराज

मेरी ऐ कविता
श्याद ही तुझ तक पहुंचे

पर तूने मेरे
दिल पर अब राज किया

इस उम्र में ही तूने
गजब का नाम किया

सार्थक तुझे मेरा सलाम
मेरा सलाम

बालकृष्ण डी. ध्यानी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

कविता  उत्तराखंड की बालकृष्ण डी  ध्यानी November 3ये मेरा

ये माटा मी
इन रच्युं छों
इन बस्यूं छों
जनी व्हालो यो जीयू मेरु

ये डंडा कांडा
मेरा बाजू छन
ये हिमाला मेरु
शीश मुखुट छन

ये भागा मी
इन दड़यूँ  छों
इन लग्युं चों
जनी व्हालो यो सरीर मेरु

ये बुरांस ये प्योंली
ये लया ये पंया
ये घुघती हे हिलांसा
मेरा साज श्रृंगार छन

ये अंग मा मी
यूँ  भिज्युं  छों
यूँ फुल्युं  छों
जनी व्हालो ऋतू कि बाहार

ये गौं ये पुंगडा
ये पंतेद्र  ये घाटा मेरा
अपरा ऊ परै मेरा
कन चलदी ऊ  माया ब्यार

ये बथों  मा
ऊ  म्यल्दी  बाटों  मा
उकलो उंदरुं मा गिजयूं मी     
जनी वाहलो यो मेरु

ये माटा मी
इन रच्युं छों
इन बस्यूं छों
जनी व्हालो यो जीयू मेरु

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी
एक नया घरोंदा

घरोंदा मेरे सपनों का
घरोंदा मेरे अपनों का
गोलकार घरोंदे के वो घेरे
मेरे घरोंदे के थे वो पहरे

यादों का सरमाया है
अपनों ने बस फरमाया है
चोंच डाल चुगया था कभी
अब वो चोंच मुझ पर गुराया है

तिनका तिनका जोड़ा था कभी
अब ताड़ ताड़ उसे पाया है
दूर अकेला करके मुझे उसने
फिर एक नया घरोंदा बनाया है

कल बारी थी मेरी
अब उसको मेरी जगह पाया है
देखा ना टूटे स्व्प्न उसके
कभी मैंने जो सजाया था

करनी थी उसकी
पीछे पीछे उसके आ खड़ी
जिस जगह मै कल था खड़ा
आज मैंने उसे वंहा खड़ा पाया है

घरोंदा मेरे सपनों का
घरोंदा मेरे अपनों का
गोलकार घरोंदे के वो घेरे
मेरे घरोंदे के थे वो पहरे

एक उत्तराखंडी

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निंदी औणी किलै ना

निंदी औणी किलै ना आच मिथै
अंधारी राति बोऴ दे तू आच मिथै
निंदी औणी किलै ना आच मिथै

कैका बाण लग्युं छों जगवऴ मा
आणी व्हाली वै थे बी खुद ,कया ये पहाड़ कि
छोड़ गै भैर देश यकुली मिथै
बैठ्युं व्हालो ऊ बी कया खुद मा म्यारु

निंदी औणी किलै ना आच मिथै
अंधारी राति  बोऴ दे तू आच मिथै
निंदी औणी किलै ना आच मिथै

बाति जल्दा-बल्दा ऐगे बुझणा कूंन 
राति सरेगै बस जी सबेर आणा कूंन 
अब दिन कटि जालू काम धाणि मा मेरु
तुम सै जवा जी राति परति आण कूंन 

निंदी औणी किलै ना आच मिथै
अंधारी राति  बोऴ दे तू आच मिथै
निंदी औणी किलै ना आच मिथै

एक उत्तराखंडी

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हे धुरा आ

चल मेरी ढंगी
हे धुरा आ हे हुरु हरुआ
स्यारा खोळ मा लुक्यां व्हालो
पाखी बांदर फुर फुरआ
चल मेरी ढंगी
हे धुरा आ हे हुरु हुरुआ

जंगलता कू डैर हे धुरा
रखक ना तू ख़ूठा भैर हे धुरा
बैठ्युं व्हालो वख हे धुरा
गुलदार निशाण सदिकि हे धुरा
चल मेरी ढंगी
हे धुरा आ हे हुरु हुरुआ

ऐगे तू उकाळु मा छुचि हे धुरा
खानु ना म्याळी ते थे उंदारूं हे धुरा
मनमा ना कैर चिंता हे धुरा
उठा तेरा खुटा सर सर हे धुरा
चल मेरी ढंगी
हे धुरा आ हे हुरु हुरुआ

अंधार पौड़ी जालू हे धुरा
ना चल लूट पुटा हे धुरा
डंडा कांडा सैई जाला हे धुरा
चल चल तू बी हिट अपरा घोरा हे धुरा
चल मेरी ढंगी
हे धुरा आ हे हुरु हुरुआ

चल मेरी ढंगी
हे धुरा आ हे हुरु हरुआ
स्यारा खोळ मा लुक्यां व्हालो
पाखी बांदर फुर फुरआ
चल मेरी ढंगी
हे धुरा आ हे हुरु हुरुआ


एक उत्तराखंडी

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तुम

जबैर बी जख बी
तुम मी थे दिके जौला
मी तुम थे तख बी
सुरुक भेंटी कू मी औलों

ऐ मेरा डंडा कंडा
ऐ मेरा उजाड़ा पहाड़ा
तुम दगड खुद लगाल
तुम थै वो धै लगाळा, बोळाला

सुणी,अनसुणी ना कियां
एक बारी छुछ ऐकी तुम
मेरे खैर खबर त लिंयां
इनी तुम ना मी बिसरी ज्ञ्याँ

एक उत्तराखंडी

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कविता  उत्तराखंड की बालकृष्ण डी  ध्यानी November 11 · Editedनिंदी औणी किलै ना

निंदी औणी किलै ना आच मिथै
अंधारी राति बोऴ दे तू आच मिथै
निंदी औणी किलै ना आच मिथै

कैका बाण लग्युं छों जगवऴ मा
आणी व्हाली वै थे बी खुद ,कया ये पहाड़ कि
छोड़ गै भैर देश यकुली मिथै
बैठ्युं व्हालो ऊ बी कया खुद मा म्यारु

निंदी औणी किलै ना आच मिथै
अंधारी राति  बोऴ दे तू आच मिथै
निंदी औणी किलै ना आच मिथै

बाति जल्दा-बल्दा ऐगे बुझणा कूंन 
राति सरेगै बस जी सबेर आणा कूंन 
अब दिन कटि जालू काम धाणि मा मेरु
तुम सै जवा जी राति परति आण कूंन 

निंदी औणी किलै ना आच मिथै
अंधारी राति  बोऴ दे तू आच मिथै
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