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Garhwali Poems by Balkrishan D Dhyani-बालकृष्ण डी ध्यानी की कवितायें

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 03, 2011, 12:06:15 AM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

कविता  उत्तराखंड की बालकृष्ण डी  ध्यानी November 23 · Editedऐजा तू बि खाणा कुन

उड़दा दाल-कुदु कि रूटलु स्पोडि
अपरु पोटगि भोरुलि
क्ख्क छे तू रे आच अटगी रै
ऐजा तू बि खाणा कुन

साग-भुजी आच पकी छन
आलू-प्याज-मुला कि थिचुनि मा वा थिंची छन
घियों कु मारि तड़का...आहाह
ऐजा तू  त खाणा कुन
 
ककड़ी टमाटर कु स्लाद कत्यूं च
पाड़ी मसालू मा वा मिसळयूँ च
तिखू हरु मिर्चा कु .... हरा रा र र
ऐजा तू  त खाणा कुन

माया यख मिळालि
ते खादा देक बोई पोटगि भरालि
कण माजा ऐगे आच मेरा पहाड़ो मा..आहाह
ऐजा तू  त खाणा कुन

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी  आम-ख़ास

आम ख़ास हुआ
झाड़ू ने दिल्ली को आज साफ़ किया
आस फिर जागी है
जंग हमारी जारी है

नये परीवर्तन कि
आज नयी रहा बनी है
दिल्ली में वो आज दिखी है
उस पथ पर तू अब आगे बढ़

ईमानदारी पर
अब भी मिलता है वोट
धर्म,भ्रस्ट,करप्ट नेता अब तो सोच
देख रही राहा सुनहरी सत्य कि भोर

देख रहा है मेरा भारत
सोच रहा है मेरा भारत
अब कदम से कदम बड़ा
अपनों को तू यूँ ही गले लगा   

आम ख़ास हुआ
झाड़ू ने दिल्ली को आज साफ़ किया
आस फिर जागी है
जंग हमारी जारी है

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी December 7आज मै

आज
मै क्या लिखूं
सोचों या उसे
अभिभूत करों
कल्पना या यथार्त
में
आज मै क्या चुनों

उठाया सवेरे ने
आँखों ने मुझे चेताया
रात ने अंधेरा को छोड़ा
सात अश्वों का रथ वो दौड़ा
थोड़ा मैंने वंह से
थोड़ा मैंने यंहा से

समाचार पत्र के
उस प्रथम पन्ने पर
दिनांक और शनिवार
का अब मुझे ज्ञान हुआ
महिलाओं से डर लगा
था ये लिखा था
अश्वेत गांधी
भूमि क़ो छोड़ चला था

खिड़की में लगे पौधे ने
दिल को  कुछ मेरे गुदगुदाया
हौले से धीरे से पास
उन्होंने मुझे अपने बुलाया
खिला था एक पुष्प
वंहा डाल पर तोड़ उसे मैंने
भगवान चरणों मे चढाया
जीना यही है ये उसने सिखाया

थोड़ा सुस्त हो
अपने विचारों से मै
दोपहर कि बाहों में
ले अंगड़ाई ली मेरी कलम
अब अपने उस खोल में
सोने को वो अब विवश
पन्नों का साथ छोड़ा मैंने
मन बिस्तर कि और दौड़ा   

आज मै........?
 
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बालकृष्ण डी ध्यानी December 5झूठ मेरा

झूठ मेरा वो आज कल   
बढ़ता अब वो प्रति पल पल

पथ पथ बिछी है चालबाज़ी
झूठापन बयानों कि वो बयान बाजी 

असत्य कि वो राहा खड़ी है
अभिसंधि से अब बात बड़ी है

मिथ्या का बड़ा व्यापार यंहा  है
मुख बन्धनी कि फौज अड़ी और लड़ी है   

ढकोसला मन का अब यंहा आचरण बना है
धोखा लड़ लड़  के हर आगन पड़ा-खड़ा है

कूट,छल कि वो कपट वंचना
हर संग हर अंग कि अब यही मन धारणा

प्रवंचना में धूर्तता कि वो लड़ी है
उन मोतियों के मनोविनोद से वो जुड़ी है

भिक्षावृति का वो नकलीपन
मिथ्याभाषण बना और पसरा वो बस जालीपन

तू भी फंसा है मै भी फंसा हूं
बस बढ़ता जा रहा वो झूठ का सम्राज्य

एक उत्तराखंडी

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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

देखा मैंने जब अब

देखा मैंने जब अब
अपने को अपनों में
ना था मै कंही....२
देखा मैंने जब अब
अपने को अपनों में

खोया था बस मै अपने से
अपनों के लिये
गुम था मै अपने ही नजरों से
ना था मै कंही....२
देखा मैंने जब अब
अपने को अपनों में

रहा मै सब में
अपने में मै कभी भी ना रहा
खोजा मैंने सब में मैं ही ना मिला
ना था मै कंही....२
देखा मैंने जब अब
अपने को अपनों में

देखा मैंने जब अब
अपने को अपनों में
ना था मै कंही....२
देखा मैंने जब अब
अपने को अपनों में

एक उत्तराखंडी

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बालकृष्ण डी ध्यानी
13 hours ago
आज लग मेरे दिल से

आज लग मेरे दिल से
बात कर इस पल से
ओ....आज लग मेरे दिल से
बात कर इस पल से
देख जाये ना देख जाये ना
ये कंही ये पल अब मुझसे
आज लग मेरे दिल से

खो जाऊं मै अब इन में
रह ना पाऊँ मै अब इन बिन मै
वो हंसी है वो ही ख़ुशी है
मंजिल मेरी अब वही है
देख जाये ना देख जाये ना
ये कंही ये पल अब मुझसे
आज लग मेरे दिल से

जब कभी तुम पास ना हो
उस पल में मेरे आस-पास है
उस में ही संजोया है तुम्हे
आँखों में बिठाया है तुम्हे
देख जाये ना देख जाये ना
ये कंही ये पल अब मुझसे
आज लग मेरे दिल से

एक उत्तराखंडी

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आम-ख़ास

आम ख़ास हुआ
झाड़ू ने दिल्ली को आज साफ़ किया
आस फिर जागी है
जंग हमारी जारी है

नये परीवर्तन कि
आज नयी रहा बनी है
दिल्ली में वो आज दिखी है
उस पथ पर तू अब आगे बढ़

ईमानदारी पर
अब भी मिलता है वोट
धर्म,भ्रस्ट,करप्ट नेता अब तो सोच
देख रही राहा सुनहरी सत्य कि भोर

देख रहा है मेरा भारत
सोच रहा है मेरा भारत
अब कदम से कदम बड़ा
अपनों को तू यूँ ही गले लगा

आम ख़ास हुआ
झाड़ू ने दिल्ली को आज साफ़ किया
आस फिर जागी है
जंग हमारी जारी है

एक उत्तराखंडी

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वो राह

दिल में बसा गम था तेरा
बाकी रहा उसमे मै ना रहा

आती रही सांस होने जुदा
धड़कता रहा वो गुमसुम खड़ा

सुस्त कदमों ने मुझसे कहा
कह दे उस राह को तू अलविदा

मोड़ के ना देख अब तो पीछे जरा
कोई ना अब उस मोड़ पर खड़ा

तू ही है रब अब तू ही है खुदा
अँधेरे कि और जब मै चला

होगा कोई वंहा मेरा खड़ा
आस का दीप मेरा जलाये हुये

एक उत्तराखंडी

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बालकृष्ण डी ध्यानी
December 9
आज लग मेरे दिल से

आज लग मेरे दिल से
बात कर इस पल से
ओ....आज लग मेरे दिल से
बात कर इस पल से
देख जाये ना देख जाये ना
ये कंही ये पल अब मुझसे
आज लग मेरे दिल से

खो जाऊं मै अब इन में
रह ना पाऊँ मै अब इन बिन मै
वो हंसी है वो ही ख़ुशी है
मंजिल मेरी अब वही है
देख जाये ना देख जाये ना
ये कंही ये पल अब मुझसे
आज लग मेरे दिल से

जब कभी तुम पास ना हो
उस पल में मेरे आस-पास है
उस में ही संजोया है तुम्हे
आँखों में बिठाया है तुम्हे
देख जाये ना देख जाये ना
ये कंही ये पल अब मुझसे
आज लग मेरे दिल से

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अब भी मिलता है वोट
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देख रहा है मेरा भारत
सोच रहा है मेरा भारत
अब कदम से कदम बड़ा
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