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Garhwali Poems by Balkrishan D Dhyani-बालकृष्ण डी ध्यानी की कवितायें

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 03, 2011, 12:06:15 AM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

श्रण-भंगुर

श्रण-भंगुर है
अहसास वो
बस तू ही तू है
श्रण भंगुर है

हवा लहर
धुंआ उठा जो
छाया मन है
श्रण भंगुर है

किंचित है वो
उलझा तन है
दूजे ठानी में
अब सर फुर है

देख ना दिखा
गुजरा कैसा वो
रोकना था चाहा
दौड़ा सरपट है

श्रण-भंगुर है
अहसास वो
बस तू ही तू है
श्रण भंगुर है

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
http:// balkrishna_dhyani.blogspot.com
में पूर्व प्रकाशित -सर्वाधिकार सुरक्षित

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी
November 28
मर जाना

किसी पल
चला जायेगा ये रैन बसेरा तेरा
नष्ट हो जायेगा
ये पल में खेल तेरा

ना मुहर लगाई
ना छाप छोड़ जायेगा
गुज़र जाना है उस पल को
उसमे तू क्या पायेगा

टूटना है उसमे तुझे
या फिर सो जाना तेरा
शिकायत करना वो तेरा
बस उस चेतनाशून्‍य खो जाना हुआ

किसी पल
चला जायेगा ये रैन बसेरा तेरा
नष्ट हो जायेगा
ये पल में खेल तेरा

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720



बालकृष्ण डी ध्यानी[/b]November 25



मैंने जो भी लिखा था

मैंने जो भी लिखा था
उसे अपने दिल से लिखा था
महसूस किया था मैंने ......२
मुझसे जो महरूम हुआ था
मैंने जो लिखा था ..................

दर्द है कि बहता ही रहा
जमाने ने जिसे अश्क कहा था ......२
आंखों से गिरता ही रहा वो जो मुझसे दूर हुआ था
मैंने जो भी लिखा था ..................

वो बेरुखी तेरी बनी बे-तकलिफ मेरी
महफ़िलों ने तेरी मेरे विरानो का समा बाँध रखा था ......२
पर शाहनाई रोती ही रही , शायद उसको मेरे गम का पता था
मैंने जो भी लिखा था ..................

पछतावा कुछ भी नही हुआ उसे
उसके हंसी चेहरे पर ये लिखा हुआ था ......२
वफ़ा मगर मैं करता ही रहा उससे जिसने मुझे बेवफा कहा था
मैंने जो भी लिखा था ..................

मैंने जो लिखा था
उसे अपने दिल से लिखा था
महसूस किया था मैंने ......२
मुझसे जो महरूम हुआ था
मैंने जो भी लिखा था ..................

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
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बालकृष्ण डी ध्यानी
19 hours ago
देखा मैंने जब अब

देखा मैंने जब अब
अपने को अपनों में
ना था मै कंही....२
देखा मैंने जब अब
अपने को अपनों में

खोया था बस मै अपने से
अपनों के लिये
गुम था मै अपने ही नजरों से
ना था मै कंही....२
देखा मैंने जब अब
अपने को अपनों में

रहा मै सब में
अपने में मै कभी भी ना रहा
खोजा मैंने सब में मैं ही ना मिला
ना था मै कंही....२
देखा मैंने जब अब
अपने को अपनों में

देखा मैंने जब अब
अपने को अपनों में
ना था मै कंही....२
देखा मैंने जब अब
अपने को अपनों में

एक उत्तराखंडी

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बालकृष्ण डी ध्यानी
November 28
मर जाना

किसी पल
चला जायेगा ये रैन बसेरा तेरा
नष्ट हो जायेगा
ये पल में खेल तेरा

ना मुहर लगाई
ना छाप छोड़ जायेगा
गुज़र जाना है उस पल को
उसमे तू क्या पायेगा

टूटना है उसमे तुझे
या फिर सो जाना तेरा
शिकायत करना वो तेरा
बस उस चेतनाशून्‍य खो जाना हुआ

किसी पल
चला जायेगा ये रैन बसेरा तेरा
नष्ट हो जायेगा
ये पल में खेल तेरा

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मैंने जो भी लिखा था

मैंने जो भी लिखा था
उसे अपने दिल से लिखा था
महसूस किया था मैंने ......२
मुझसे जो महरूम हुआ था
मैंने जो लिखा था ..................

दर्द है कि बहता ही रहा
जमाने ने जिसे अश्क कहा था ......२
आंखों से गिरता ही रहा वो जो मुझसे दूर हुआ था
मैंने जो भी लिखा था ..................

वो बेरुखी तेरी बनी बे-तकलिफ मेरी
महफ़िलों ने तेरी मेरे विरानो का समा बाँध रखा था ......२
पर शाहनाई रोती ही रही , शायद उसको मेरे गम का पता था
मैंने जो भी लिखा था ..................

पछतावा कुछ भी नही हुआ उसे
उसके हंसी चेहरे पर ये लिखा हुआ था ......२
वफ़ा मगर मैं करता ही रहा उससे जिसने मुझे बेवफा कहा था
मैंने जो भी लिखा था ..................

मैंने जो लिखा था
उसे अपने दिल से लिखा था
महसूस किया था मैंने ......२
मुझसे जो महरूम हुआ था
मैंने जो भी लिखा था ..................

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

कविता  उत्तराखंड की बालकृष्ण डी  ध्यानीपसरियुन चा समासुम

अल छाला मा पल छाला मा
म्यारा गौं घारा गोठ्यार ऊँ का बाटा मा
कन पसरियुन चा समासुम
कखक बीरडियुं म्यारा मुल्क कू कौम

हरची हरची म्यारा टक्का हरची
कैल कमाणि बल बस हमल गमाणि
रेल लगी च डिबा बाद डिबा जोड्यां छन
ई रेल बस बल उत्तराखंड से भैर गया छन

बिज खते कण उपजे म्यारा खंड मा
पुंगडू कू उजाड़ा दीकि डंडो थे बाँझ कैकि
हेरर्दी घेरदि पेरदि ऊ आँखि पाड़ा कि
टिप टिप रैगे यकुली मा ऊ कुचलि मेरी

अल छाला मा पल छाला मा
म्यारा गौं घारा गोठ्यार ऊँ का बाटा मा
कन पसरियुन चा समासुम
कखक बीरडियुं म्यारा मुल्क कू कौम

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कविता  उत्तराखंड की बालकृष्ण डी  ध्यानी December 5परेली मा

परेली मा लुकाई राखि ना
आंगळी मा बंधी राखि ना ------ x २

जाण द्यावा ना रोका ना रोका
उड़ण द्यावा
सरगा को पारि जाणा चढ़ी चस्का मिथै

बंधी राखि तुमरि जियु
मा
ई त तुमरि धड़कन हो

मन भित्र दमडी राखि ना
आँखा भित्र अल्झाई राखि मा

रम्न द्यावा ना तुमरि आँखा
मा
स्वास बस्न द्यावा, तुमरि
ह्रद्य को ढुकू-दुकिमा

बंधी राखि तुमरि जियु
मा
ई त तुमरि धड़कन हो

साँचि राखि तुमरि आँखि
मा
ई त तुमरि दगड़ हो

बंधी राखि तुमरि जियु
मा
ई त तुमरि धड़कन हो

मन भित्र दमडी राखि ना
आँखा भित्र अल्झाई राखि मा

परेली मा लुकाई राखि ना
आंगळी मा बंधी राखि ना ------ x २

एक उत्तराखंडी

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कविता  उत्तराखंड की बालकृष्ण डी  ध्यानी December 3 · Editedजियू मेरु

रैगे म्यारा मन मा
ये खैल म्यारा मन मा
बोलूं कि ना बोलूं मि
रैग्युं मि ये घंगतोल मा
रैगे म्यारा मन मा
ये खैल म्यारा मन मा..............


देकि ना देकि तिल
मेरु जियू नि  मैसे  बोलि बल
ऊ छलबलाहट मेरु ....जियू मेरु
रैगे पास मेरु सदनि कू
रैगे म्यारा मन मा
ये खैल  म्यारा मन मा..............

क्ख्क बि जांद तू
दगड़ी दगड़ी तेर दगड वो जंद बल
मेरु माया कू ऊ पैरु ....जियू मेरु
रैगे म्यारु पास सदनि कू
रैगे म्यारा मन मा
ये खैल म्यारा मन मा..............

अब नि च वा म्यार पास
विंकि खुद सदनि अब साथ मेरु
चलगे छोडीकि दूर दूर ऊ....जियू मेरु
रैगे बस सदनि कू रैगे बस
रैगे म्यारा मन मा
ये खैल  म्यारा मन मा..............

रैगे म्यारा मन मा
ये खैल म्यारा मन मा
बोलूं कि ना बोलूं मि
रैग्युं मि ये घंगतोल मा
रैगे म्यारा मन मा
ये खैल म्यारा मन मा..............

एक उत्तराखंडी

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कविता  उत्तराखंड की बालकृष्ण डी  ध्यानी November 29अच् मी थै

अच् मी थै
लागि खुद ... अ अ ...
म्यार पाड़ा... अ कि
रुंदी व्हाली आंखी दूर ... अ अ ...
मेरु ... आणू अ का सारु मा... अ
अच् मी थै
लागि खुद ... अ अ ...

दोई भैना बाबाजी म्यारा ... अ
छुटू भुला बोयी कु लाडा
लाटू रैगे मि लाटू हि राई
अपरा कुटमदारि छोड़ी छों जों बैठी मि दूर अ
अच् मी थै
लागि खुद ... अ अ ...

पाड़ा मेरा
वो गौं- गोठ्यार ... अ
डंडा-कांडा ऊकालू - ऊंदर
एक गुऊडी दोई बल्दा जोड़ि ई
छनि मां मेरु जियु उड्यार
अच् मी थै
लागि खुद ... अ अ ...

अच् मी थै
लागि खुद ... अ अ ...
म्यार पाड़ा... अ कि
रुंदी व्हाली आंखी दूर ... अ अ ...
मेरु ... आणू अ का सारु मा... अ
अच् मी थै
लागि खुद ... अ अ ...

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