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Garhwali Poems by Balkrishan D Dhyani-बालकृष्ण डी ध्यानी की कवितायें

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 03, 2011, 12:06:15 AM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी  बस खोना है

क्या पाना है
क्या पाया है
जीवन का रस्ता
बस वो खोता जायेगा ........

रहता है
ना कुछ यंहा
ना यंहा कुछ
रह पायेगा
जीवन का रस्ता
बस वो खोता जायेगा ........

चलता है तू
बंदे आज किस भ्रम में
अहम तेरा तौलता है वो
हर उठे तेरे उस कदम में
जीवन का रस्ता
बस वो खोता जायेगा ......

बैठा है तू
गठरी माया कि भर के
संगी और साथी तेरे
बस यंहा छूट जायेगा
जीवन का रस्ता
बस वो खोता जायेगा ......


एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी November 13 · Editedबस तुझको चाहा  मैंने

बस तुझको चाहा मैंने तू कर दे मुझ पे मेहरबानी
मुझे खुद में ढाल दे तू अब नाम तेरे मेरी जिंदगानी

ये जो मेरा दिल है तेरे नजरों से घायल है
जब से देखा तुझको मैने अब ना रहा वो मेरा दिल है

कैसे कंहूँ तुझ को क्या लगे अब तू मेरा
शुरू होने लगी है शायद मेरी अपनी भी प्रेम कहानी

हर लफ्ज मेरा अब है तू हर निगाह में तू है
आँखों ने ले निग़ाहों का सहारा इस दिल में बसा बस तू है

उड़ता ही फिर रहा हूँ मै प्रेम ने क्या छेड़ा गीत है
संगीत संगीत है तन मन में मेरे बस संचरित है

बस तुझको चाहा  मैंने तू कर दे मुझ पे मेहरबानी
मुझे खुद में ढाल दे तू अब नाम तेरे मेरी जिंदगानी

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी

मैंने जो भी लिखा था

मैंने जो भी लिखा था
उसे अपने दिल से लिखा था
महसूस किया था मैंने ......२
मुझसे जो महरूम हुआ था
मैंने जो लिखा था ..................

दर्द है कि बहता ही रहा
जमाने ने जिसे अश्क कहा था ......२
आंखों से गिरता ही रहा वो जो मुझसे दूर हुआ था
मैंने जो भी लिखा था ..................

वो बेरुखी तेरी बनी बे-तकलिफ मेरी
महफ़िलों ने तेरी मेरे विरानो का समा बाँध रखा था ......२
पर शाहनाई रोती ही रही , शायद उसको मेरे गम का पता था
मैंने जो भी लिखा था ..................

पछतावा कुछ भी नही हुआ उसे
उसके हंसी चेहरे पर ये लिखा हुआ था ......२
वफ़ा मगर मैं करता ही रहा उससे जिसने मुझे बेवफा कहा था
मैंने जो भी लिखा था ..................

मैंने जो लिखा था
उसे अपने दिल से लिखा था
महसूस किया था मैंने ......२
मुझसे जो महरूम हुआ था
मैंने जो भी लिखा था ..................

एक उत्तराखंडी

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बालकृष्ण डी ध्यानी
November 23
श्रण-भंगुर

श्रण-भंगुर है
अहसास वो
बस तू ही तू है
श्रण भंगुर है

हवा लहर
धुंआ उठा जो
छाया मन है
श्रण भंगुर है

किंचित है वो
उलझा तन है
दूजे ठानी में
अब सर फुर है

देख ना दिखा
गुजरा कैसा वो
रोकना था चाहा
दौड़ा सरपट है

श्रण-भंगुर है
अहसास वो
बस तू ही तू है
श्रण भंगुर है

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
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बालकृष्ण डी ध्यानी

साथी मेरे

कुछ तू याद रहेगा तुझे
वो ही तेरे साथ चलेगा
साथी मेरे

आप दोगे जो साथ मेरा
तब ही ये साथ बनेगा
साथी मेरे

नहीं तो ये व्यर्थ है ये जीवन
कैसे वो अकेला फलेगा
साथी मेरे

साथी मेरे तू साथ देना
हर पल ये मेरा दिल कहेगा
साथी मेरे

दुःख-सुख कि बरसात
एक का अंत तो एक आगाज
साथी मेरे

बस मै और ये मेरा दिल
खोजेगा तुझे हरबार
साथी मेरे

कुछ तू याद रहेगा तुझे
वो ही तेरे साथ चलेगा
साथी मेरे

शुभ प्रभात का प्रणाम

आप के स्नेह भरे आशीष का सदैव धन्यवाद जी ये करुणा सदा बनी रहे ये आशा करता हूँ

बालकृष्ण डी. ध्यानी

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बालकृष्ण डी ध्यानी

मेरा ध्यान

खेल दिवस दुखी हुआ
आज वो उदास हुआ
क्या बोलों कुछ ना सूझे आज
दिल का उबाल
रचना का रूप ले डूब गया
गुब्बार पानी से भरा था
वो आँखों से फुट गया
बस कहना है आज इसे
पिछला घुल सा गया
अगला दांत दिखाकर हंस सा गया
गोलाकार मैदान के सामने
आयताकार मैदान हार गया
बैट कि बल्ले बल्ले
हॉकी के हाथ से फिर वो छूट गया
यथार्थ की चका-चौंद
इतिहास फिर लुप्त हो गया
उठी मांग थी बार-बार
भूले इतिहास सजाने कि
नेताओं कि ठोकरों ने
उन्ह ल्हमों को भुला दिया
चंद के हाथों से
वो रत्न फिर छूट गया
ध्यान का किसीको
ना अब ध्यान रहा
सब सचिनमय हो गया
मै भूल गया था
अब मेरा भारत तो
अब इंडिया हो गया

एक उत्तराखंडी

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बस खोना है

क्या पाना है
क्या पाया है
जीवन का रस्ता
बस वो खोता जायेगा ........

रहता है
ना कुछ यंहा
ना यंहा कुछ
रह पायेगा
जीवन का रस्ता
बस वो खोता जायेगा ........

चलता है तू
बंदे आज किस भ्रम में
अहम तेरा तौलता है वो
हर उठे तेरे उस कदम में
जीवन का रस्ता
बस वो खोता जायेगा ......

बैठा है तू
गठरी माया कि भर के
संगी और साथी तेरे
बस यंहा छूट जायेगा
जीवन का रस्ता
बस वो खोता जायेगा ......


एक उत्तराखंडी

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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

मर जाना

किसी पल
चला जायेगा ये रैन बसेरा तेरा
नष्ट हो जायेगा
ये पल में खेल तेरा

ना मुहर लगाई
ना छाप छोड़ जायेगा
गुज़र जाना है उस पल को
उसमे तू क्या पायेगा

टूटना है उसमे तुझे
या फिर सो जाना तेरा
शिकायत करना वो तेरा
बस उस चेतनाशून्‍य खो जाना हुआ

किसी पल
चला जायेगा ये रैन बसेरा तेरा
नष्ट हो जायेगा
ये पल में खेल तेरा

एक उत्तराखंडी

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बालकृष्ण डी ध्यानी
November 27
शुभ प्रभात दोस्तों

************
पतझड़ में समेटो खुद को
ना करो बहारों का इन्तजार
ये आकर तो चली जायेंगी
पतझड़ से ही कर लो तुम प्यार
***********

ध्यानी प्रणाम

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी November 25मैंने जो भी लिखा था

मैंने जो भी लिखा था
उसे अपने दिल से लिखा था
महसूस किया था मैंने ......२
मुझसे जो महरूम हुआ था
मैंने जो लिखा था ..................

दर्द है कि बहता ही रहा
जमाने ने जिसे अश्क कहा था ......२
आंखों से गिरता ही रहा वो जो मुझसे दूर हुआ था
मैंने जो भी लिखा था ..................

वो बेरुखी तेरी बनी बे-तकलिफ मेरी
महफ़िलों ने तेरी मेरे विरानो का समा बाँध रखा था ......२
पर शाहनाई रोती ही रही , शायद उसको मेरे गम का पता था
मैंने जो भी लिखा था ..................

पछतावा कुछ भी नही हुआ उसे
उसके हंसी चेहरे पर ये लिखा हुआ था ......२
वफ़ा मगर मैं करता ही रहा उससे जिसने मुझे बेवफा कहा था
मैंने जो भी लिखा था ..................

मैंने जो लिखा था
उसे अपने दिल से लिखा था
महसूस किया था मैंने ......२
मुझसे जो महरूम हुआ था
मैंने जो भी लिखा था ..................

एक उत्तराखंडी

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