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Kumauni & Garhwali Poems by Various Poet-कुमाऊंनी-गढ़वाली कविताएं

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 05, 2011, 12:00:34 AM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

मौन है अविचल हिमालय राष्ट्र - रक्षा के लिये
ग्लेशियर गलता है तो गंगा सुरक्षा के लिय
हम सींचते हेैं देश को बस आबोदाने के लिये
मजबूर हॅूं मैं अब सियासत् को डिगाने के लिये!
पहाडों के स्वर
उत्तराखण्ड बर्बाद हुआ हैे राजनीति जज्बातों में
जनमत कहता है शासन हो केन्द्र समपित हाथों में
जो भी शासन में आया,उसने ही पहाड़ को नोचा हेै
उत्तराखण्ड का निर्णय दिल्ली में हो, कैसा लोचा है
गाॅंव बसाने से पहले भिखमंगे जमें पहाडों में
जल, जंगल,घरती को लूटा , राजनीति की आडों में
भू - माफिया बसे पडे़ हैं नेताओं के प्राणों में
अन्धे हैं सरदार यहां पर प्रजातंत्र के काणों में
टिहरी, पोडी क्षेत्र - वाद का वोट बैंक छंटवाते हो
ठाकुर,पण्डित , वैश्य ,शुद्र को आपस में कटवाते हो
गढवाल,कुमाउॅं की भांषा से उत्तराखण्ड को खोओगे
क्या मोक्ष - दायिनी घरती में बीज नाश के बोओगे
देख सियासी चिन्तन भी क्यों मजबूरी बन जाता है
आशीष देख लो बद्री का डाकू ही चुनकर आता है
राजनीति में स्वच्छ छवि फिर से परिणाम दिखायेगी
ये भाव-भंगिमा जनता की फिर से नालायक लायेगी
शिशुओं की तरह सियासत् जिन्हें पकड़ कर लाये थे
ये मोहरे थे सतरंजो के जो हमने स्वयं बिछाये थे
जिससे भी दगा मिला हमको उसमें आग लगादो अब
हे शिखरों के स्वाभिमान ऐसी अलख जगादो अब
विश्वास यदि खुद पर हेेै ,चल पढो स्वयं के पाॅंवों पर
स्वाभिमान हो शिखरों का गायेगें घर-घर गाॅंओं पर
हे वतन वीर हम यादों से वादों को पुनः दिखायेंगें
आन ,बान, सम्मान सुरक्षित, स्वाभिमान से गायेंगें
ये भृकुटि-बंक की भांषा है सब आयेंगें औकातों में
उत्तराखण्ड में यौवन हो बस, बातों में जज्बातों में
कवि आग भी लिखता हेै, रो-रो कर आज अनाथो में
जन-मत कहता है शासन हो केन्द समपित हाथों में।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

धरती दिवस छ बल आज......
मनखि धरती का परताप,
खाणु भिछ अर कमौणु,
धरती कू श्रृंगार कम करदु,
तब्बित वातावरण गर्म छ होणु......
हमारु जल्म यीं धरती मा,
धरती का श्रृंगार का खातिर होयुं छ,
लोभी लालची मनखि आज,
लोभ का वश ह्रवैक खोयुं छ......
हमारु कर्म छ धरती कू श्रृंगार करा,
नितर छत्यानाश ह्रवै जालु,
अन्न पाणी हर्चलु धरती मा,
मनखि क्या पेलु क्या खालु.....
चेति जावा आज धरती मां कू,
अपणा हातुन डाळि लगैक श्रृंगार करा,
तीस बुझौण का खातिर धरती मा,
बरखा कू पाणी खाळ बणैक जमा करा....
धरती सदबहार जब तक रलि,
मनखि भी यीं धरती मा रलु,
आज हि पैल करा संदेश छ,
हमारा खातिर होल काम भलु......
-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासू
धरती दिवस फर मेरा कविमन कू कबलाट
दिनांक 22.4.2016

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


सन्दीप कठैत
17 hrs
देवभूमि मा दोष
देवभूमि मा भारी ह्वेगै दोष,
मनखी नी टिकण लग्यां,
खेती- बाडी त्याड़ होंयी,
नाजी कुठार रीता होंया!!
साटी का सटड्यो,
झडूवा जमिगै,
ग्यों का गिवाणो,
दाणी नि फुटणी,
घोणो ह्वेगे दोष,
बल जांच करवा,
ओबरा नि रै अन्न,
मजुली नि रै धन,
बण लगी बणान्ग,
परदेशू भाज्या ज्वान,
ढान्गी जोडी बल्द,
सि भी बाघन हथयैन!!
ई भूमि मा भोती ह्वेगी दोष.........
लैन्दी गोडी दूध नी
मनख्यों मा बूध नी
चान्दू बेन्दू भेन्सी छे जु,
तौंका ऐण दाग लगी,
लोण मंत्रा जतन करा
दोष छेंच भारी क्वी......
मुख्य मंत्री कुर्सी फरो,
सब्सी पैली पुज्यैन,
जख द्वी साल तल्क,
मंत्री नी खे सकणू,
तख जनता क्य खाली!!
करा भै क्वीत करा,
पस्वा बुला, देव्ता गढा
दोष त छैंच घोणू दोष.........
जख लोग छंन तख,
काम काज नी,
जख पढण वाञ्ला छन,
तख पढोण वाञ्ला नी,
जख योजना छन,
तख कन्न वाञ्ला नी,
जख सूखु तख हहाकार,
जख पाणी च तख
सन्न वाञ्ला नी!!!
त मतबल.........
दोष त छेंच......
काञ्लु दोष.........!!!!
कविता@ संदीप कठैत
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Bhishma Kukreti

जैकी अपणी बोली नी वैको .. (गढ़वाली कविता )
रचना -- जगदीश बिजल्वाण ( जन्म - गडेरा , पौड़ी गढ़वाल )
Poetry by - Jagdish Bijlwan
( विभिन्न युग की गढ़वाली कविताएँ श्रृंखला )
-
इंटरनेट प्रस्तुति और व्याख्या : भीष्म कुकरेती
-
जैकि अपणी बोली नी।,
जैकि अपणी भाषा नी
वी चा क्वी हो , कख्यो हो
कुछ नी
वैको अपणो बुबा नी
वैकि अपणी ब्वे नी
( साभार --शैलवाणी , अंग्वाळ )
Poetry Copyright@ Poet
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

पोती की परलोक जात्रा ( करुण रसयुक्त कविता )
रचना -- दाक्षायाणी दत्त चन्दोला ( जन्म -कांसखेत , कळजीखाळ , मनियारस्यूं , पौड़ी गढ़वाल )
Poetry by - Dakshayani Datt Chandola
( विभिन्न युग की गढ़वाली कविताएँ श्रृंखला )
-
इंटरनेट प्रस्तुति और व्याख्या : भीष्म कुकरेती
-
तू ह्वेगे छे , हमुन समझे भाग्य भारी बढीगे
दादा दादी हम बणि गंवां , प्राप्त सम्मान ह्वेगे।
जै बैरी तैं रहि तु हमु मा , मोद -अमोद माँ
बूढी दादी बणिकि पिछनै मृत्यु बि साथ ऐगे।
प्यारी बच्चीकनक्वै यदि मि जणदो , दादी नी मृत्यु चा या
देणी दीन्दो किलइ त्वे तैं गोद माँ वींकी ठंडी।
हत्यारों ना हम सब ठग्यो गौळी तेरी मरोड़ी
बीमारी मा हमुन फिर भी क्वी कमी नि छोड़ी।
पैदा ह्वेकि जबकि सबुंकी गोद मा तू गई छै
दादा छोड़ी , बस इतनी सी बात माँ रुष्ट ह्वेगे ?
छोड़ी, का गै, जब हमुं सणि , इं अँधेरी निशा माँ
त्वै तैं कनक्वै , बतऊं कबतैं , पौलु कैं जि दिशा माँ।
शर्मिष्ठा हे प्रिय , लगि किलै गोद दादा की त्वै तैं
ना जो बच्ची ! वख बटि कभी लौटणो हि नि होंदों।
क्वी भी साथी वख नि मिल्दो , गर्त माँ क्या धर्युं छ
क्यौ रूठी तू ह्मरु त्वइकु क्या बुरु जि कर्युं च ?
तू दादा का हृदय -पट माँ लौटी शीघ्र ऐजा
मेरी पीड़ा करुण - रस की धार से बगै जा।
ऐ जा ! ऐ जा ! बणिकी कविता , कंठ खुल्युं छ
मेरी बाणी मुखरित बणौ , गीत मेरो भुल्युं छ।
( साभार --शैलवाणी , अंग्वाळ )
Poetry Copyright@ Poet
Copyright @ Bhishma Kukreti interpretation if any

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

पहाड़ हालत ख़राब हुणे,
पहाड़ हालत ख़राब हुणे,
मकान दिनों दिन बांज हूँणी,
बुड-बाड़ी घर में आश लगे रूनी,
कब घर आल म्यर नान...
यई आश बुड-बाड़ी लगे रुनी ।। ..........(1)
बुड-बाड़ी धेयी द्वारुं में टोप मार रूनी,
बाट-घ्वेंटा कें चाने-चिताने रूनी,
तली-मली जाणी पथिकों पूछने रूनी,
तली बटी ऐ-गोनल म्यर नान ..
येई आश बुड-बाड़ी लगे रुनी ।।...............(2)
बुड-बाड़ी आश-पड़ोस नानतिना कें,
अपुण नानतिना किस्स सुणोंनी,
नानछिना कशी लोट-पोट खेल्छी,
वार बटिक पार, धुरका-धुरुक नांच लागौन्छी,
यई सब याद कर बे बुड-बड़ी जी रूनी ।।...........(3)
पं. भास्कर जोशी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बाटो ना बिरड़ी (सिखन्दरि गढ़वाली कविता )
रचना -- सतेश्वर आजाद ( जन्म - गौचर , चमोली गढ़वाल )
Poetry by - Sateshwar Azad
( विभिन्न युग की गढ़वाली कविताएँ श्रृंखला )
-
इंटरनेट प्रस्तुति और व्याख्या : भीष्म कुकरेती
-
जिंदगी का चौड़ा चाकळा मा , अक्लि का रौंखा मौऴयाण मा
नौन्याळि का कुछ सुपिना होला , मम्ताणा सि यौवन होला
ज्वनि का रगर्याट मा बाटो ना बिरड़ी बट्वै कखि ?
बाटा मा कांडा त होला ही , झाड़ पात गाड़ गड़हरा भी होला
स्वाणा स्वाणा डांडा होला छळ छळ करदा छौड़ा होला
रूप की मृग तृष्णा मा बाटो ना बिरड़ी बट्वै कखि ?
ज्वनि का जबळयाट मा अक्लि का कबलाट मा
उबखण्या सी जीवन होलो ज्वन्नि छबळाणि देखिकी
छण भरै तुच्छ माया , मा बाटो ना बिरड़ी बट्वै कखि ?
बिरही भैर -भीतर मा सौणोs बादळ बरखणा होला
अब अपड़ा मन की जग्वाळि मा दिल हाथ आँखा फड़कणा होला
अब पैला मिलन का उलार मा बाटो ना बिरड़ी बट्वै कखि ?
जब सुपिना सब मिटि जाला कर्म को बाटो समिणी होला
दुनियादारी का चक्रचाळ मा दगड्यों की छिरमिंडाळी होली
तब खुसैक वूं टुकार्योंन बाटो ना बिरड़ी बट्वै कखि।
( साभार --शैलवाणी , अंग्वाळ )
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


सन्दीप कठैत
April 28 at 2:40pm
देवभूमि मा दोष
देवभूमि मा भारी ह्वेगै दोष,
मनखी नी टिकण लग्यां,
खेती- बाडी त्याड़ होंयी,
नाजी कुठार रीता होंया!!
साटी का सटड्यो,
झडूवा जमिगै,
ग्यों का गिवाणो,
दाणी नि फुटणी,
घोणो ह्वेगे दोष,
बल जांच करवा,
ओबरा नि रै अन्न,
मजुली नि रै धन,
बण लगी बणान्ग,
परदेशू भाज्या ज्वान,
ढान्गी जोडी बल्द,
सि भी बाघन हथयैन!!
ई भूमि मा भोती ह्वेगी दोष.........
लैन्दी गोडी दूध नी
मनख्यों मा बूध नी
चान्दू बेन्दू भेन्सी छे जु,
तौंका ऐण दाग लगी,
लोण मंत्रा जतन करा
दोष छेंच भारी क्वी......
मुख्य मंत्री कुर्सी फरो,
सब्सी पैली पुज्यैन,
जख द्वी साल तल्क,
मंत्री नी खे सकणू,
तख जनता क्य खाली!!
करा भै क्वीत करा,
पस्वा बुला, देव्ता गढा
दोष त छैंच घोणू दोष.........
जख लोग छंन तख,
काम काज नी,
जख पढण वाञ्ला छन,
तख पढोण वाञ्ला नी,
जख योजना छन,
तख कन्न वाञ्ला नी,
जख सूखु तख हहाकार,
जख पाणी च तख
सन्न वाञ्ला नी!!!
त मतबल.........
दोष त छेंच......
काञ्लु दोष.........!!!!
कविता@ संदीप कठैत
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शब्दों के इशारे
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Jivan Pathak
20 hrs
सर्दी जुखाम को 'ठन' कहते और बर्तनों को 'भान' ।
पिस्सू को कहते 'उपन' और छोटे बच्चों को 'नान' ।।
साथ को कहते हैं 'दगड', और फाइटिंग को 'झगड़' ।
मोटे को तो 'तगड़' कहते और मलने को कहें 'रगड़' ।।
शीशे को यहां 'कांच' कहते ,सच्चे को कहें 'सांच' ।
नृत्य को कहते 'नांच' तो बंजर को कहैं 'बांज' ।।
छोटा भाई यहां 'भुल' ठैरा, तो किचन को बोलते 'चुल'।
ब्रिज को कहते 'पुल' यहां और नहर को बोलते 'कुल'।।
पत्नी ठहरी 'सैणि' यहां, तो बहिन कहलाती 'बैणि'।
बहू हमारी 'दुलैणि' होती, ब्याई भैंस है 'लैणि'।।
आदमी हमारा 'मैंस' ठहरा और रुपया ठैरा 'पैंस'।
मौसी 'कैंज' कहलाती है, तो बफैलो है 'भैंस'।।
जीजाजी हमारे 'भिन' होते और सख्त आदमी 'जिन'।
गजक को यहां 'पिन' कहते और अंटौल को 'किन' ।।
चावल को यहां 'भात' बोलते और शादी को 'बारात'
बड़ी थाली को कहें 'परात' और पित्र तर्पण को 'श्राद्ध'।।
अपनी अपनी बोली भाषा, सबको लगती प्‍यारी।
कुमाउंनी बोली बोलन की, प्रभो आप करें तैयारी।।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बणौं मा आग
ऐंसु का साल म्यारु पाड़ फुके ग्याई।
चौछडि बणौं मा ऐंसु आग लगी ग्याई।।

ऐंसु का साल म्यारु पाड़ फुके ग्याई।
निरभगि कैल कनु आग लगै द्याई।।

बणौं मा डांगर पंछी भटगण ह्वाला।
आगि का पुटग वखी तडफण ह्वाला।।

बणौं मा वै हैरि डाळी कनि रूणि ह्वैली।
धरती डुंडरी मारी धै लगाणि ह्वैली।।

जल मा भी आग ह्वैली वायु मा भी आग।
कनुक्वै बचिलु तब त्वैन फ्वडी भाग।।

धरती की छाती जब धधकैणि रैली।
पाणी का सुरोत सभी वै सुखाणि रैली।।

जौं बणौं का डाळ्यूं छैल तू बैठणु रैई।
ऊं डाळ्यूं का जैड्युं आज आग लगै गेई।।

जल थैं ख्वजणु जगा जगा जाणु रैलू।
जख जख जैलु वख आग ई आग पैलू।।

अफु थैं बचाणू तू भी यख वख जैलू।
हवा पाणी का बान क्या तू आग खैलू?

जब जल अर वायु यख रूठि जाला।
सोचि लेदि त्यारा तब कना हाल ह्वाला।।

सोच सोच तू भी तब कनै कनै जैलू।
बेजुबान डाळ्यूं जनु धधकण रैलू।।

जरा काम इनु कैरी, धरती सजादी।
डाळ्यूं थैं लगादी अर बणौं थैं बचादी।।

ऐंसु का साल म्यारु पाड़ फुके ग्याई।
निरभगि कैल कनु आग लगै द्याई।।
सर्वाधिकार सुरक्षित @:-
दर्शनसिंह रावत "पडखंडाई"
दिनांक :-30/4/2016