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Kumauni & Garhwali Poems by Various Poet-कुमाऊंनी-गढ़वाली कविताएं

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 05, 2011, 12:00:34 AM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

आप सभी स्नेही मित्रों के सामने 'कुमगढ' पत्रिका में स्थान पाई मेरी एक कुमाउनी रचना "ब्यूँजै रयूँ मैं"--
जसि हुँण चैंछि उसि बात नि भै
जस हुँण चाँछी उस भाग नि भै
सारि रात ब्यूँजै रयूँ मैं
पर ऊ दगङी बात नि भै।
दिनि जो दगङ ऊ साथ नि भै
पुरि है जानी ऊ काथ नि भै
जस छी दिन उसी रात नि भै
सारि रात.........।
मायाक मरी भई मैं
पाछ वीक पङी भई मैं
वील विकल्प में धरी भई मैं
जाणि को नंबर छी म्यर
पुछण तलकैकि बात नि भै
सारि रात..........।
उ हूँ द्वार खुलियै छी
वीक द्वार खुलियै छन
मैं हूँ द्वार ढकिये छी
म्यारै द्वार ढकियै छन
सारि दुणी मैं भुलि गयूँ
जैक लिजी
वीकैं मेरि याद नि भै
सारि रात ब्यूँजै रयूँ मैं
पर ऊ दगङी बात नि भै
पर ऊ दगङी बात नि भै।।
राजेन्द्र ढैला,

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

कुमाउनी कविता--
...तुम पुछना किलै न ?...
मैं किलै हैर्यों यतुक दुबव
तुम पुछना किलै न
क्या छन मैं कणि दुख
देखना किलै न
मैं किलै.....।
दुणियैकि खबर सुणी
दिल में चरण फैगी छुरी
अलझी गयूं उलझनों में
निकाउना किलै न
मैं किलै.....।
घर घरैकि कहानी
सुणिबे हैरै हैरानी
क्या गलत छ क्या सई
बतोंना किले न
मैं किलै....।
ब्वारी हात में सासुकि लटी
सासुकि हैरै कुकुर गती
कस हैरौ झिकङ
इनर
उछङोंना किलै न
मैं किलै....।
दार पिबेर च्यल ऊना
बाब् कें आपण माण हूं जना
कसि हैरै य हकाहाक
सुणना किलै न
मैं किलै....।
भाई है गो दुश्मण
आज देखो भाई को
कसि हैरै य मारामार
समजोंना किलै न
मैं किलै....।
महंगाई कि मार य
कसि हैरै डङाडाङ य
भूखै छन कतुक नान्
खऊना किलै न
मैं किलै....।
हत्या लूटपाट डकैती
रोज हुनै रूनै यती
किलै बौइगो आजक मनखी
समाउना किलै न
मैं किलै....।
दुणियैकि पीङ देखी
मैंन आपुकें करिहा दुखी
कसी निकलूं य दुख बटी
बतोंना किलै न
मैं किलै....।
"एक तरबै संस्कृतीक नाश हुना
वीकि लै फिकर छु य मन में,
एक तरबै राजनीतीक नाश हुना
वीकि लै फिकर छु य मन में,
एक तरबै रिश्तोंक नाश हुना
और
एक तरबै सारी मानवताक नाश हुना
य सबनैकि फिकर छु य मन में,
तबत यतुक दुबव हैरयूं में
और
तुम पुछना तक न
यैकि लै फिकर छु य मन में।"
"फसक" किताब बटी....
---राजेंद्र ढैला,काठगोदाम।---

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


Jivan Pathak
1 hr
हमुकैनव निर्माण दे इजा सरस्वती वरदान दे।
हमुकैनव निर्माण दे इजा सरस्वती वरदान दे ।
भरिदे गागरि देवत्वकि देवभूमि के उत्थाँन दे।
एजो पवित्रता कर्मवचनकि एसिसपूत संतान दे।।
हमुकैनव निर्माण दे इजा सरस्वती वरदान दे ।
कर्मषक्ति देषभक्ति सेवा सद्भाव सदज्ञान दे।
पर पीड़ा कै जाँणि सकँू हम यसै हमुकंै अहसास दे।।
इजा हमुकैनव निर्माण दे इजा सरस्वती वरदान दे ।
कर्मनिर्मल भविष्य उज्वल सर्वाशिद्धि सद्भाव दे।
जन मन हियैकि पवित्रता सर्वधर्म सम्भाव दे।।
इजा हमुकैनव निर्माण दे इजा सरस्वती वरदान दे ।
सेवा समता और त्याग तप पातक मुक्त समाज दे।
प्यार कि सरिता छलकनै रैजो मुक्त प्रवाह अथाह दे।।
इजा हमुकैनव निर्माण दे इजा सरस्वती वरदान दे ।
ज्ञान ध्याँन धर्मदया में मादक मुक्त समाज दे।
कण कण माटी देवभूमिकि इजा यसै वरदान दे।।
इजा हमुकैनव निर्माण दे इजा सरस्वती वरदान दे ।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


Jivan Pathak with Jatin Pathak.
13 hrs
सासू ब्वारिक वार्तालाप (ब्वारी आपुण सास कैं धमकौने)
सौरज्यू म्यारा भान माजाल, और चूल लिपेली सास।
कचकच नी कर रंकरा, बखत एरा यस।
आंग रेशमी साड़ी बिलोजा, खुट चपल्ला काल।
कसकै हालुं आंग्वे सासू, त्येर गूबराक डाल।
कसकै काटू घा लाकाड़, धुर जंगला मांज।
कसकै कमु तेरी जमीन, कसके पालुं बांज।
कसकै जा मे हांग भीड़ा में, कसके गोडु खेत।
कसकै फूंकु चूल ओ सासू, कसके चीरु पेट।(शेरदा)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


Mahendra Thakurathi
April 24 at 6:20pm
heart emoticon जोहार (मुनस्यारी) क्षेत्र का एक प्रसिद्ध पारम्परिक लोकगीत smile emoticon
नैनीताल हाथी आयो, चाँदी क सुन केशर।
पाई क पोलिया लायूँ, त्वै दिन भुल बेसर।
बाली भौजा तेरी बलाय, त्वै दिन भुल बेसर॥ नैनीताल हाथी आयो.........॥
गाँठी की नेवड़ लायूँ, त्वै दिन भुल बेसर।
बाली भौजा तेरी बलाय, त्वै दिन भुल बेसर॥ नैनीताल हाथी आयो.........॥
आङै की कैंचुवा लायूँ, त्वै दिन भुल बेसर।
बाली भौजा तेरी बलाय, त्वै दिन भुल बेसर॥ नैनीताल हाथी आयो.......॥

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


Rajendra Dhaila
April 24 at 2:23pm
-कुमाउनी कविता--
...तुम पुछना किलै न ?...
मैं किलै हैर्यों यतुक दुबव
तुम पुछना किलै न
क्या छन मैं कणि दुख
देखना किलै न
मैं किलै.....।
दुणियैकि खबर सुणी
दिल में चरण फैगी छुरी
अलझी गयूं उलझनों में
निकाउना किलै न
मैं किलै.....।
घर घरैकि कहानी
सुणिबे हैरै हैरानी
क्या गलत छ क्या सई
बतोंना किले न
मैं किलै....।
ब्वारी हात में सासुकि लटी
सासुकि हैरै कुकुर गती
कस हैरौ झिकङ
इनर
उछङोंना किलै न
मैं किलै....।
दार पिबेर च्यल ऊना
बाब् कें आपण माण हूं जना
कसि हैरै य हकाहाक
सुणना किलै न
मैं किलै....।
भाई है गो दुश्मण
आज देखो भाई को
कसि हैरै य मारामार
समजोंना किलै न
मैं किलै....।
महंगाई कि मार य
कसि हैरै डङाडाङ य
भूखै छन कतुक नान्
खऊना किलै न
मैं किलै....।
हत्या लूटपाट डकैती
रोज हुनै रूनै यती
किलै बौइगो आजक मनखी
समाउना किलै न
मैं किलै....।
दुणियैकि पीङ देखी
मैंन आपुकें करिहा दुखी
कसी निकलूं य दुख बटी
बतोंना किलै न
मैं किलै....।
"एक तरबै संस्कृतीक नाश हुना
वीकि लै फिकर छु य मन में,
एक तरबै राजनीतीक नाश हुना
वीकि लै फिकर छु य मन में,
एक तरबै रिश्तोंक नाश हुना
और
एक तरबै सारी मानवताक नाश हुना
य सबनैकि फिकर छु य मन में,
तबत यतुक दुबव हैरयूं में
और
तुम पुछना तक न
यैकि लै फिकर छु य मन में।"
"फसक" किताब बटी....
---राजेंद्र ढैला,काठगोदाम।---

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

मेरा एक कुमाउनी गीत "चेली छूँ" आप सभी की नजर-
निमार इजा तू मैं कणी
तूकैं पाप लागलो
बचै ल्हे इजा तू मैं कणी
तूहैं पाप भाजलो
पुर पेट नि होलो खाणु
मैंकैं आदुक पेट दिये,
भुख लै होली तंग नि करूँ
मेरी इजा तू कसम ल्हिले
मनै ल्हे इजा तू बाबूकणी
तूहैं पाप भाजलो....
मेरी समझ नि आई इजू
त्वील जांच किलै कराई,
आपणि कोख में मेरी इजू
किलै भयूँ मैं त्वेहूं पराई
बतै दे इजा बात मैंकैं मनकि आपणी
तूहैं पाप भाजलो......
पैंल-पैली जब गर्भ में आयूं
घर में सब उसै खुशी भई,
जदिन बै त्वील जाँच करै
उदिन बै सब दुखी भई
बतै दे इजा किलै करै त्वील गर्भै जचांई
तूहैं पाप भाजलो.....
'चेली छूँ' कबेर इजू
तू म्यर अंश खतम निकर,
खालि अबरजाब लागौल
इजा आपुँ हूँ संस निकर
दिखै दे इजा दुणी मैंकैं तू आपणी
तूहैं पाप भाजलो.....
चेली हुँण में मेरी इजू
म्यरौ के कसूर नि छ,
चेलिका बगैर इजू
दुणियै कौ दस्तूर नि छ
बणैं ल्हे इजा रौनक मैंकैं घरकि आपणी तूहैं पाप भाजलो..........।
राजेंद्र ढैला

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


Darshan Singh
April 18 at 10:37am
निरभै दरोल्या
दुन्या छोडि की आज चली गे निरभै दरोल्या रै।
जब तक दुन्या मा छाई दरोल्या रैई घपरोल्या रै।

चल भलु ह्वैगे आज चली गे निरभै दरोल्या रै।
जब तक दुन्या मा छाई दरोल्या रैई घपरोल्या रै।

निरभै दरोल्या त्वैकु कतै भी शरम नि आई रै।
घटकांद घटकांद तेरि दरोल्या कनि मति मरी रै।।

जौं ब्वै बाबुल जलम त्वै द्याई उंथै धमकाणु रै।
नना तिन नौंना सैणि अपणि कनु चटकाणु रै।।

छै भै भैणा त्यारा दरोल्या यकुलु तू मतगुणु रै।
दारु नशा मा निरभै दरोल्या उंथै तू बिटमणु रै।।

ब्यो कारिज मा आंखा दरोल्या चाड़ तू लगणू रै।
पतळकु खाणु छोडि दरोल्या माटु तू बुखाणू रै।।

कुकर्या बरांड ग्वर्ख्या बरांड कनु कनु तू पीणू रै।
सिविल बटेक आर्मी वळों का खुटौं मा प्वडणू रै।

फुंगडी पटळि बेचि दरोल्या करज मा तू डुबणू रै
दारु पेकी भगवान दुन्या कु अफू थैं समझणु रै।।

द्वी सौकि बोतल निरभै दरोल्या सात मा ल्याणू रै
काकि बोडि्यूं का द्वार दरोल्या तू कनु भटकाणु रै।।

मवसी अपणि फूक दरोल्या तमशु तू द्यखणू रै।
भै बंधौं अर गौं कु नौं भि बदनाम तु करणू रै।।

जैं दारू का बान दरोल्या दिन-रात्यूं भटकणू रै।
पला मा पैंसा हाथ जोड़िकि भीख सि मंगणू रै।।

वीं दारू घतोलि दरोल्या लमसठ अब पोडि गै।
ननतिना सैंणी ब्वै बाब अपणा रूंदा यख छोडि गै।।

चल भलु ह्वैगे आज चली गे निरभै दरोल्या रै।
जब तक दुन्या मा छाई दरोल्या रैई घपरोल्या रै।
सर्वाधिकारसुरक्षित@:-
दर्शनसिंह रावत "पडखंडाई" दिनांक:-18/04/2016

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

विक्लांग उत्तराखण्ड
ये लावारिस उत्तराखण्ड के बाप हो गये
मूल निवासी आज यंहा अभिशाप हो गये
अब मेरा जूता, मेरे सिर पर मार रहे हैं
जब से उत्तराखण्ड बना ये भार रहे हैं
हम पञ्चायत के मोहरे ,ये खाप हो गये
ये लावारिस उत्तराखण्ड के बाप हो गये
बीडी ,सिगरेट मांग-मांग कर पीने वाले
जिस घर में भी जांये, रोटी मांग के खालें
कोदा, मंडवा खाने को मोहताज पडे थे
लावारिस थे, पहाडों पर चुपचाप खडे थे
कू-कर्मी अब देव-भूमि के पाप हो गये
ये लावारिस उत्तराखण्ड के बाप हो गये
नाली, मुट्ठी पास नही थी, भूमि हीन थे
फटे, पुराने , टल्ली, झगुले भी महीन थे
अब टैरीकोट है , जींस ,सपारी सूट बूट है
उत्तराखण्ड में डाका डालो, खुली छूट है
हम इज्जत को तरस रहे,ये आप हो गये
ये लावारिस उत्तराखण्ड के बाप हो गये
अब राज्यसभा के मुर्दे भी हम ही ढोयेंगे
फसल काट कर ये खायेंगे, हम बोयेंगे
बोट बैंक लायसेन्स लूट का इन्हे मिलेगा
कांग्रेस कंही बी.जे.पी का कमल खिलेगा
अब इनकी ही माला फेरो,ये जाप हो गये
ये लावारिस उत्तराखण्ड के बाप हो गये
ठाकुर, पण्डित, वैश्य, शुद्र की ठेकेदारी
सब टिहरी, पौडी और कुमैय्ये हैं घरबारी
अब देशी और पहाडी का भी भेद भरा है
निशाचरों ने देव - भूमि को सदा चरा है
राज्य बना, पर ये कैसे सन्ताप हो गये
ये लावारिस उत्तराखण्ड के बाप हो गये
हम अनाथ हैं, नेता ही असली मालिक हैं
उत्तराखण्ड की ये लावारिस ही कालिख है
आठ बाप सोलह सालों मैं हमने झेले
इस बीहड में सारे डाकू खुलकर खेले
अब कवि आग के शोले भी उत्ताप हो गये
ये लावारिस उत्तराखण्ड के बाप हो गये।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

उत्तराखण्ड की सियासत
जनता, नेता, अभिनेता सब बिक जाता है
प्रजातन्त्र का कूडा करकट दिख जाता है
प्रजातन्त्र में सबकी अपनी औखातें हैं
राजनीति में नेता बातो की खाते हैं
बडे. - बडे नेताओं की लगती है बोली
देखो जनमत की ये कैसी आंख मिचैली
जनता की ताकत से नेता बन जाता है
चौराहे में बिकता है बस, धन खाता है
टिहरी, पौडी और कुमाउॅं के देखो पंगे
उत्तराखण्ड को थाम रहे लावारिस नंगे
अपने - अपने दावे दोनो ठोंक रहे हैं
प्रजातन्त्र के परमिट देखो भौंक रहे हैं
एक चना भी भाड़ फोड़ कर दिखलाता है
यू.के.डी. की इज्जत का ये बईखाता है
इन सबका अब बाप यंहा पर पैसा ही हैे
ये राजनीति है ,इसमें सब कुछ ऐसा ही है
देव-भूमि की जनता ने इतिहास बनाया
फिर से पागल-पन का जनमत कैसेे आया
जनता , कारण बनती है इस बर्बादी का
अब जुगाड का खेल,खुशामद में खादी का
राजनीति में जयचन्दो की देखो लीला
आज सियासत सडा रही है कौम कबीला
बे- भाव का माल , कीमती बन जाता है
कमजोरी में गधा बाप क्यों कहलाता है
लोकतन्त्र का पत्थर हीरा काट रहा है
उत्तराखण्ड को लावारिस ही चाट रहा है
मुख्यमंत्री कौन बनेगा अब ये भी पंगे
मान , प्रतिष्ठा , अभिलाशा में सारे नंगे
लगे हुये हैं जोड़ -तोड़ में सभी खिलाडी
उॅंचे - उॅंचे पर्वत से बनती है खाडी
हरक सिंह फिर लक्षा-गृह में वापस लौटा
उत्तराखण्ड की सत्ता में अभ्यस्त मुखौटा
ताल ठोकता विजय बहुगुणा आगे आये
अधकच्चे भोजन अब तक किसने खाये
सतपाल भी अपने डोरे डाल रहा है
लावारिस मंत्री को कब से पाल रहा है
ये बेचारा नमक की कीमत चुका रहा है
अब टुच्चा नेता धर्मगुरू को झुका रहा है
अब निशंक भी मौन हुआ कुछ बोल रहा है
इसका मन भी कुर्सी में ही डोल रहा है
उॅंट, अष्व, प्यादे सतरंजी खेल रहे हैं
अपने - अपने सभी खटारा ठेल रहे हैं
अब तो एक्सीलेटर धूॅंआ छोड़ रहा है
पटक-पटक कर सिर कुर्सि से फोड़ रहा है
क्यों सभी जूगाडू सत्ता ने सिरमोर बनाये
अब मेरे घर में दिल्ली वाले हुक्म चलाये
आज नपुंसक राजनीति से क्या आशा है
ये कवि आग की आग धधकती परिभांषा है।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com