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Kumauni & Garhwali Poems by Various Poet-कुमाऊंनी-गढ़वाली कविताएं

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 05, 2011, 12:00:34 AM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


Shailendra Joshi 
April 17 at 6:24pm ·
तिमला का डाला
सुरिज भैजि पार जाला
स्यू सीन अँखियु का तीर
जब देखी घौर बिटि आज
खिस्सा बिटि
मुबेल निकाली तस्बीर खिंची ।।....शैलेन्द्र जोशी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


Shailendra Joshi 
ढलती जवानी का यौवन जब ढलता है तो पुराने भौरे भी फूलों नहीं मंडराते नरेन्द्र कठैत जी गंभीर हास्य से जुड़ी इसी प्रकार अन्या रचनाओ का उपहार बहुत जल्द उनकी काव्य पुस्तक "' आभारी तबरी"" मे पढने को मिलेगा ये पुस्तक विनसर पब्लिकेसन देहरादून प्रकाशन जल्द आप सभी साहित्य प्रेमियों के हाथ/
वरिष्ठ अग्रज भाईयो की सखियों को लोक भाषा की ये मौलिक साहित्यिक रचना क्षमा याचना एवं हिन्दी साहित्य पे्रमीयों को भावार्थ सहित - नरेन्द्र कठैत
तब अर अब
अहा !
यूंकि ज्वन्या बि
वो क्य दिन छया
हरीं - भ्वरीं
गात पर
हवा फफराट मा
फर्र - फर्र
उडणीं रौंदि छै धौंप्येली
नजर जमा नि
टिक्ण देंदि छै भुयां
अब त बग्तै मारन
सूखी-साखी
ह्वे ग्येनी सौब
खरसण्यां- पिंगलण्यां
कैका साबुत छन
कैका घुंणदा-सूटौं का सि
अदबळखा खयां
हे रां !
बिचारि मुंगर्यूं का
दांत हि दांत रयां !
हिंदी
(भावार्थ)
तब और अब
अहा !/इनकी जवानी के भी/
वे क्या दिन थे/हरी - भरी/देह पर/
हवा की फरफराहट में/
फर्र - फर्र/उड़ती रहती थी चुटिया/
नजर बिल्कुल नहीं
/टिकती थी जमीन पर/
अब तो वक्त की मार से/
सूख कर/हो गई सब/
जर्जर-पित वदन/किसी के साबुत हैं/
किसी के बिमारीयों से आधे - अधूरे खाये/
हे राम!/बेचारी मकईयों के/दांत ही दांत रहे

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासू
April 18 at 4:55pm · New Delhi ·
देखणु छौं.....
त्वै तेरा ज्वानि का दिनु बिटि,
ऊ गोरी गलोड़ि कख गैन,
स्वाणि थै तू भारी लठ्याळि,
मुखड़ि का रंग तेरा,
आज कख हर्चिग्यन,
देखणु छौं, देखणु छौं........
-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासू
दिनांक 18.4.2016
नेगी जी का गीत फर मेरा कविमन कू कबलाट
लग्युं छौं ऊकाळि का बाट....
देखणू छौं......
तेरी वीं बिगरैली ज्वनि को चळचलु घाम
अछळैंद दिखणु छौं
वी स्वाणी मुखड़ी चळ्पुड़ांस ढ़ळकेंद दिखणु छौं
ऊं गोरि गलड़ियों ढकौन्दी काळी झाईयों दिखणु छौं
रतन्यळि आख्युं का किनारा कुस्वाणा मूंजा प्वड़दा दिखणु छौं
वा गुलाबी रंगत मुसेंद अर गुन्दक्याळि हति-खुट्टि खरसेंद दिखणु छौं
वीं घुण्ड-घुण्डा धोंपेला थें कान्धम पौंचि
चुफलि होंद दिखणु छौं
एक स्वाणी बांद को कुस्वाणू भेस नि दिखण चाणू छों
पर दिखणु छौं, दिखणु छौं त्वे भी
अर तेरा वे रंग रूप की पुळ्व्ये मा लिख्यां
अपणा ऊं गीतों की उमर अर औकात भी दिखणु छौं..........नरेंद्र सिंह नेगी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


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जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासू
April 18 at 4:55pm · New Delhi ·
देखणु छौं.....
त्वै तेरा ज्वानि का दिनु बिटि,
ऊ गोरी गलोड़ि कख गैन,
स्वाणि थै तू भारी लठ्याळि,
मुखड़ि का रंग तेरा,
आज कख हर्चिग्यन,
देखणु छौं, देखणु छौं........
-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासू
दिनांक 18.4.2016
नेगी जी का गीत फर मेरा कविमन कू कबलाट
लग्युं छौं ऊकाळि का बाट....
देखणू छौं......
तेरी वीं बिगरैली ज्वनि को चळचलु घाम
अछळैंद दिखणु छौं
वी स्वाणी मुखड़ी चळ्पुड़ांस ढ़ळकेंद दिखणु छौं
ऊं गोरि गलड़ियों ढकौन्दी काळी झाईयों दिखणु छौं
रतन्यळि आख्युं का किनारा कुस्वाणा मूंजा प्वड़दा दिखणु छौं
वा गुलाबी रंगत मुसेंद अर गुन्दक्याळि हति-खुट्टि खरसेंद दिखणु छौं
वीं घुण्ड-घुण्डा धोंपेला थें कान्धम पौंचि
चुफलि होंद दिखणु छौं
एक स्वाणी बांद को कुस्वाणू भेस नि दिखण चाणू छों
पर दिखणु छौं, दिखणु छौं त्वे भी
अर तेरा वे रंग रूप की पुळ्व्ये मा लिख्यां
अपणा ऊं गीतों की उमर अर औकात भी दिखणु छौं..........नरेंद्र सिंह नेगी
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Manmohan Negi
Manmohan Negi सुंदर वृतांत
Like · Reply · April 18 at 6:37pm
Rakesh Mohan Thapliyal
Rakesh Mohan Thapliyal Kesher sing ka Hastchep dekha kya?
Like · Reply · Yesterday at 12:05am
Sunil Chauhan Dagar Patti
Sunil Chauhan Dagar Patti wah ........ bahut sunder sir ji
Like · Reply · Yesterday at 11:25am
Madhur Wadini Tiwari
Madhur Wadini Tiwari वाह कविराज
बहुत सुंदर चित्रण,,
Like · Reply · 23 hrs
Mahi Singh Mehta

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जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासू
April 18 at 11:13am · New Delhi ·
मोळ माटु.....
साहित्य संस्कृति दगड़ि,
भारी मजाक होणु छ,
मोळ माटु करिक,
हर क्वी नौं कमौणु छ......
गढ़वाळि कवि सम्मेलन,
जख भी उरेणा छन,
कुछ कवियौं का मुख सी,
गढ़वाळि कवितौं का बजै,
गढ़वाळि गीत अर गजल,
अब सुणेणा छन......
नागणी बजार गीत,
हमारी आज की पीढ़ी,
शकीरा कू विडियो,
गीत दगड़ि जोड़िक,
देखि आनंद लेणी छ,
हम संस्कृति पिरमियौं की,
ज्युकड़ि फुकेणि छ.....
-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासू,
मेरा कविमन कू कबलाट,
दिनांक 17.4.2016

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बंसत ऋृतु बौड़ि ऐगि,
छयुं छ मौळ्यार,
डांड्यौं मा मौळ्यां छन,
बांज, बुरांस, अयांर......
-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासू
मेरा कविमन कू कबलाट
मेरी कविता कू एक अंश
दिनांक 11.4.2016

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

घत्त.......गढ़वाळि भाषा कू अलंकारिक शब्द छ। सब्बि भाषा सीखा पर अपणि गढ़वाळि दूधबोलि भाषा कू पैलि मान सम्मान करा।
द्वी बोतळ पिग्यौं ब्याळि,
यनु आई घत्त,
मन चंचल ह्रवैई मेरु,
भ्वीं मा पड़्यौं भत्त......
उठि नि सक्यौं सब्यौं न बोलि,
त्वैन करयालि खत्त,
कनु थै तू कनु ह्रवैग्यें,
यनु क्या आई घत्त.....
मैंन बताई मेरा मन मा,
शब्द घूमि घत्त,
दगड़यौन मैकु पिलाई,
आज ह्रवैगि खत्त....
कवि छौं, भौत कबलाट होन्दु मेरा मन मा गढ़वाळि भाषा का हर शब्द फर।
मेरु प्रयास आपका मन मा गढ़वाळि भाषा पिरेम बढौंणु छ, बिंगि सकला जू आप।
आपकु कवि दगड़्या,
-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासू
दिनांक 6.4.2016
दूरभाष: 09654972366

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासू
April 5 at 4:37pm · New Delhi ·
चल मेरी दगड़या,
अब जख जौला,
गेर भरिक,
अब वखि खौला.......
-कवि जिज्ञासू
कबलाट, चल हे लग बाट
दिनांक 5.4.2016

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासू
April 5 at 12:37pm · New Delhi ·
मेरी कविता की एक झलक, बिंगि सकला जू आप।
नौ गरै....
जै मनखि का शांत होन,
खूब होन्दि खाणी बाणी,
बिफरि जान्दा जब,
तब होन्दि टोटग ऊताणि.....
-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासू,
मेरा कविमन कू कबलाट
ग्राम-बागी नौसा, पट्टी-चंद्रवदनी,
टिहरी गढ़वाळ(उत्तराखंड)
दूरभाष: 09654972366

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

इण्डिया की पहली ओलम्पिक क्वालिफाई जिम्नास्ट दीपा कर्माकार को हार्दिक बधाई शुभकामना । 9 अगस्त 1993 को अगरतला में जन्मी 22 वर्षीय दीपा ने इतिहास रचा ।
बेटियों फिर साबित किया
वो गोल्ड है
हर पथ प्रदर्शन में
युही लौह जलाती रहो
दीपा कर्माकर
युही शीश नवती रहे दुनिया
फिर भारत भूमिपर
दीपा कर्माकर का ये
प्रयास ये अभ्यास
रंग लाया ऐसा
रच दिया उसने इतिहास
भारत भूमि पर ।..............शैलेन्द्र जोशी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

त्वै बिना खुदीं च
मेरी छाली आंखी
जिकुडी मा बडुली तेरी
मेरी उबईं सांकी
दिन भर ड्यूटी मा
रात सुपिन मा गौं जांदु
जनम भूमि तेरी कुखली मा
माटु मा लपोड्यांणा रांदु
कबी सुपन्यु मा दीदों मी
गुंण्युं तै ढुंगादु
कभी आम की डाल्युं की
फौंट्यूं तै हिलांदु
सुपन्युं मा ही सरा गौं की
ककडी मुंगरी चुरांदु
डुंग पडल तुमर गैर्युं मा
गाली भी खुब खांदु
सुपिन म्यार सच ह्वै गेन
आंख्यूं मा च पांणी
अपण प्यारु ब्वांग बिना
जिकुडी च खुद्यांणी
त्वै बिना खुदीं च
मेरी छाली....
सुपिन मा गौं की यात्रा कु वर्णन क दगडी सर्वाधिकार @लेख सुदेश भट्ट"दगडया