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Kumauni & Garhwali Poems by Various Poet-कुमाऊंनी-गढ़वाली कविताएं

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 05, 2011, 12:00:34 AM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

फिर तिल जांण च कख

और्री कदगा चैनू तैथे तू मिथे इन बता
तेर मरजी कया च तू इन मेमा जता

इन रौंतेली धरती मिन तैथे दिंई
ईन बिगरेला पहाड़ मिल तै बान धर्याँ
गंगा बोई भी सरग बठै ऐेई यख
बद्री केदार नर नरयाण सब बैठ्या छन यख

और्री कदगा तिर्प्त तैथ करों तू मिथे बता
अपरि जिकुड़ी को उमाल भैर कडा तू मिसै बचा

कदगा जंगलों का बन मिल तै बान धर्याँ
ऐ फूलों की घाटी बी मिल पसारी यख
कदगा दिव्य आर्युवेद दवाई मिल लगाई च यख
भला सदा मनखी को ये मेरो उत्तराखंड

और्री कदगा तै बतओं तू खुद ही अनुभव कैरी
अपरि मनखी थे शुद कैरी तू अपरि आँखि खोली जरा

दिख जालो तैथे जो तिथे चैनू च यख
दौड़ी कि भेंटि ओलों तेथे जब मिथे धैए लाग लेलो तू जब
अपरि आप समजी जैलो जब तै बान कया धर्युं च यख
फिर तू सदनि यखी रै जालू फिर तिल जांण च कख

बालकृष्ण डी ध्यानी
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बालकृष्ण डी ध्यानी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

अब नि क्वी रैनू चैंदु रे

बुड्या बुडरि ही रैगे रे
ये ऊकाला तू इन कया कैगे रे
अब नि क्वी रैनू चैंदु रे

ब्वारी बी हमरी हरचन लगगि रे
बेटा हमरा रुपया जब खरचन लगगि रे
सैरा का बाटा मा झड़ी लगगि रे

संघुलों परी तला लतगि रे
बिकास का ऊ झूठ वादा करेगि रे
ज्वानो को धैर्य खचगि रे

अब नि क्वी रैनू चैंदु रे .... ?

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मि ऊनि कि ऊनि ही रेग्युं जी

मि ऊनि कि ऊनि ही रेग्युं जी
सुपन्या मेरा बुनि ऊ बुनि ही रैगे जी

कया पाई यख कया खोई मिल बल
दोई आँखि सन्तोस नि पाई बस रोई बल

अपरा ना क्वी यख ना क्वी बिराण जी
ये भेद जानि कि बी मि किलै अजाण राई जी

रात गुजरी गे अब ये दीना की बारी ऐई बल
अंधारु बितीगे किलै की मेरो ऊजाळू नि ऐई बल

आंख्युं समण सब चित्र चलोमांन जी होणा छन
जिकोडि माया सब किलै कि ऐमा सब पिसण छन

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मेरी बात से ..........

मेरी बात से तू इतगा नराज ना व्है
बैठ मेर समण मे सै तू दूर ना जै
मेरी बात से ..........

ये निरबगि पोटगि का बणा
बल टक्का छंन हम थे कमणा
रोटलो चोंवल भूजि लेकि
ये पियारी भूकी पोटगि कू भूक मिटाणा

बात मेर समझ जै इतगा नराज ना व्है
बैठ मेर समण मे सै तू दूर ना जै
मेरी बात से ..........

शौक चढ़ी छे मिथे की मि ते थे छोड़ीकि जोलों
ते छोड़ीकि मि तू बता मि कन कै यखुली रोलों
यूँ ना सतों मिथे यूँ ना ये जिकुड़ी झुरो
तू ही रामी छे मेरी तू ही छे रौतेली

इतगा झूठ नखरा ना कैर सुदी नराज ना व्है
बैठ मेर समण मे सै तू दूर ना जै
मेरी बात से ..........

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मि उन्दु उन्दु विंथे बोलन्दो बल

मि उन्दु उन्दु विंथे बोलन्दो बल
वा फुंडे फुंडे किलै जांदी छे
गीत मेरा माया का
वा मेर दगडी किलै नि लगन्दी छे
मि उन्दु उन्दु विंथे बोलन्दो बल ..... .

विं बान मि कख कख नि रौड़ी बल
बस मि और्री मेरी ये जिकुडि ही जंणदि छे
आंख्युं मा बस्य मेरा सपुनिया ऊ
में दगडी तू किलै नि देक जांदि छे
मि उन्दु उन्दु विंथे बोलन्दो बल .....

लोक लाज की चिंता बल ...... अ.
तै थे बी नि मि थे बी छे
हाँ बोलदे अपरि गिचि से छुची
मि तै थे मंगणा कुन तेरो घार आच आनु छौं
मि उन्दु उन्दु विंथे बोलन्दो बल .....

वा फुंडे फुंडे किलै जांदी छे
गीत मेरा माया का
वा मेर दगडी किलै नि लगन्दी छे
मि उन्दु उन्दु विंथे बोलन्दो बल .....

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होली की रस्याण

होली की रस्याण
कया देवरु कया जेठान
रंगमत बणया छन सबी का सबी
रंगी गे मेरो बी पहाड़
होली की रस्याण ...........

कया फ्योंली कया बुरांस
डंडा को टोक चङयूं च ये उल्यार
डळियू डळियू मा छैई मौल्यार
दीदी भुलियूं की मुखड़ी व्हैगे लाल
होली की रस्याण ...........

गद्नियों का छला बी रंग गैनी
बैरी मन बी गौळी से गौळी मिल गैनी
दानों स्याणौ अद्मुख पौडीकी
दीदा आच असीस छकैकी मिल गैनी
होली की रस्याण ...........

पाकी गै मीठा मीठा पकवान
भंगलो पकोड़ा खूब नाचै द्याई मिथे आच
गीतों को पिली मिल रसपान
धन्य मेरो पहाड़ धन्य मेरो कोमो-गढ़वाल
होली की रस्याण ...........

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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


बलबीर राणा 'अडिग'
April 19 at 5:39pm ·
नै मौल्यार कु रैबार काब्य गोष्ठी हेतु आमंत्रण
आवा बोड़ी आवा
कुछ सुणा कुछ सुणावा
तुमारु यु पाड़
सुलगणु छ या सिस्कणु छ
खिलक्वारी हैसणु या
भंगर्या ह्वे भट्कणु च
कुछ बींगा कुछ बिंगावा
आवा बोड़ी आवा ।
नै मोल्यार कु रैबार, काब्य और मंथन संगोष्ठी में आप सभी मित्र सादर आमंत्रित हैं । 24 अप्रैल अपराह्न 2 बजे से सांय 7 बजे तक हिंदी भवन सभागार देहरादून में जरूर अपनी गरिमामयी उपस्थिति देना न भूलना क्योंकि कार्यक्रम माटी के मर्म को मिटाने के संकल्पधारी पुत्रों/ टीम चकबंदी गरीब क्रांति अभियान उत्तराखंड द्वारा आयोजित किया जा रहा है।
www.garinkranti.in

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

गढ़वाली भाषा च मेरी बोली नि च

गढ़वाली भाषा च मेरी बोली नि च
ये भुल्हा मेरो भूली मेरी ईंथे घौर घौर सिंच
गढ़वाली भाषा च मेरी बोली नि च

कदगा रसैलि च ये कदगा मयली बांद
बडुली लगदा तिस बुझि खुठों लागि कुदग्लि परज
गढ़वाली भाषा च मेरी बोली नि च

मुखमा मिसरी घुलै जनवहैल पिंगली जलैबि
राग स्वर व्यंजन अलकरों दगडी वा च नटेलि
गढ़वाली भाषा च मेरी बोली नि च

गढ़ को ऊ स्वास च मेरो वा मेर जियु परण
विंका बिना दीदी भुल्यूँ हमरी कया पछाण
गढ़वाली भाषा च मेरी बोली नि च

हिमाल का हिंवाल च वा मेरी शीर्ष को मान
मेरा उत्तराखंड भूमि मा मेरा इष्टों का वा समान
गढ़वाली भाषा च मेरी बोली नि च

बालकृष्ण डी ध्यानी
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ये बारी छुट्टी मा बोई

ये बारी छुट्टी मा बोई मिल दून जणा
भौत खैल मिल तेरा हात को रुवाट भात झौल बोई
अब मिल वख जैकी चऔ मियों पिजा बरगर खाण
ये बारी छुट्टी मा बोई मिल देरादून जोंलो ....

भैर लियुंल मिल बी आँखि मा दूँन की रंगमत
कन कन कैन होली रति मा वख दिप दिप की चकमक
सबी धणी घूमी अोंलो अपरि मा मि झूमी की अोंलो
ये बारी छुट्टी मा बोई मिल देरादून जोंलो ......

अपरा भै भैना च क्या वख पता कैरी की अोंलो
शिष्टाचार अव भगत भी मि उंका तपसी की अोलों
कदग प्रित उंकी हम बाण मि आच बोई देकि अोंलो
ये बारी छुट्टी मा बोई मिल देरादून जोंलो ......

बालकृष्ण डी ध्यानी
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बरखा आ जाओ अब तुम
बरखा आ जाओ अब तुम
इस धरा पर
तपने लगी है सखी तुम्हारी
आ के अब इस धरा की प्यास बुझा जाओ
बरखा आ जाओ अब तुम
इस धरा पर
आँखों के अश्क
सूखने को अब बेकरार खड़े
पानी के साथ भूख ने
भी कर दिया अब बेजार हमे
अब ना हमे मारो तुम
ऐसे ना दम निकलो तुम
बरखा आ जाओ अब तुम
इस धरा पर
मना गलती हमारी है
वो गलती हम पर ही पड़ गयी भारी है
काटे हैं कितने पेड़ हमने
व्यर्थ बहाया है पानी खुद हम ने हम से
फेका है खाना उसे फिजूल समझकर
उस दाने की कीमत ना समझे हम अब तक
भूख प्यास तपन से हम हारे
आ जाओ हमारे तारण हारे
बरखा आ जाओ अब तुम
इस धरा पर
ना देर कर अब तो
फिर आके रहम कर दे हम पे अब तू
हमारी सजा क्यों औरों को देता है
इस सफर में इंसान तुझे बस धोखा देता है
पशु पक्षियों ने क्या तेरा बिगाड़ है
तू ही तो अब सब का सहारा है
देख आंखें मेरी पथराने से पहले
तेरे काले बादल आ के चुप चाप चले जाने से पहले
बरखा आ जाओ अब तुम
इस धरा पर
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