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Kumauni & Garhwali Poems by Various Poet-कुमाऊंनी-गढ़वाली कविताएं

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 05, 2011, 12:00:34 AM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

यो पापी कलेजी काटि खाँछी, लागँछी धुड़ुक.....!
नि बास घुघुती ओ चड़ी, दोफरी घामै मा...

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


Thakur Balam Negi
21 hrs
के भल मानीछों हो हमर पहाड़ मा
ठंडी हवा ठंडो पाणि हमार पहाड़ मा
हिटों अष्टमी कौतिक चौखुटीया बाजार मा
अग्नेरि मंदिर मा
हो
मासी भूमिया थान जै उला

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


Thakur Balam Negi
April 6 at 11:06am
सब झण खाया.
मिल बाँट बेर खाया
कजि झन करिया हाहाहा

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


Dinesh Dhyani
April 8 at 12:49pm
भाषा का सल्लि
गढ़ भारती धाद लगौणी
कख भाषा का सल्लि छां
हर्चदि जाणीं बोली-भाषा
तुम राजनीति मा टल्ली छां।
रीति-रिवाज तीज त्यौहार
जरा-जरा कै तुम छ्वडणां छां
ंअपणि बोलि-भाषा से तुम
किलै बिरूट होणां छां?
देश विदेशू नाम कमौणां
अगनै-अगनै बढणां छां
अपणी बोली अपणी भाषै
क्यो समाळ नि करणां छां।
जै सामज कि बोलि गूंगी चा
भाषा जैकि उन्नत नी चा
वै समाज की यीं दुन्या म
मान मर्यादा बचीं नि रैंदा।
गढ़वळि भाषा की मर्यादा
ये कु साहित्य भण्डार प्रगाढ चा
जरर्वत अमणी सत समाळ की
गढ़वळि कै भाषा से कम चा?
सर्वाधिकार/ दिनेश ध्यानी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


ढुँढते रै जाला'

बरातो मे रामढोल कै
भानकुना बै लागी झोल कै
गोर भैँसुक मोअ कै
फाटी खताङु खोअ कै
ढुँढते रै जाला,

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

टक्का (गढ़वाली कविता )
रचना -- बेनी माधव ध्यानी 'घुंघरू ' ( जन्म - 1945 , जुगर सैण , शीला , पौड़ी गढ़वाल )
Poetry by -Beni Madhav Dhayni 'Ghungharu'
( विभिन्न युग की गढ़वाली कविताएँ श्रृंखला )
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इंटरनेट प्रस्तुति और व्याख्या - भीष्म कुकरेती
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कविता मेरी सरा टका, पर टक लगावा सुणणा मा
काम काज थैं बिसरि जावा , टक्क लगवा बिंगणा मा।
बड़ा फर्क च ये टका को , सुणणा अर समझणा मा
कन कनू की मौ चली गे , ये टका तै खूणा मा।
देवी दिवता मनदा छन विकट शक्ति ये टक्का की
तब्बि भक्तगण पूजा करदीें भेंट चडाँदीं टक्का की।
सुण ल्या दगड्यों टका छीं मीमा सब्जी मंडी मीन जाण
फूल फल व रस कस भुज्जी सभी खरीदीs मीन लाण।
टक्का जु कीसा खाली च , टक बथेंदी खाणा की
टक्का बिना रोज मिताई टक बजार घुमणा की।
चीज खरीदी कुछ नी सकणो , टक प्वड़ी च दिखणा की
तनखा मिलदा टक्का रंदीना तल्या मल्या कीसा मा।
मैना आखरी टपरान्दू रैंदु , टका नि मिल्दा कीसा मा
टका छैंद मि टकटकु रैंदु , बिना टका कु चिंता मा।
टका बगैर खर्च नि चल्दु , पगाळ गडणैं सुद बुद मा
बड़ी शक्ति च ये टका मा , चै छ्वटु च दिखणा मा
मनखी तैं कुमनखी बणान्दा ये टका ही दुनिया मा
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( साभार --शैलवाणी , अंग्वाळ )
Poetry Copyright@ Poet
Copyright @ Bhishma Kukreti interpretation if any

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बो ये निजाणु निजाणु मेरी बो सुरीला...
बो ये सतपुली का सैना मेरी बो सुरीला....

खाई जाला केला... खाई जला केला ...
बो ये सतपुली नि जानू बो ये...
बो ये पंचमी का मेला मेरी बो सुरीला.
बो येह निज़णू निज़णू मेरी बो सुरीला.....
बो ये सतपुली का सैना मेरी बो सुरीला....

लूंन भ्वारी दूंन ....लूंन भ्वा री दूंन दूंन...
सतपुली नि जानू बो ये..
बो ये घपला ला हूना मेरी बो सुरीला.....
बो येह निज़णू निज़णू मेरी बो सुरीला.....
बो ये सतपुली का सैना मेरी बो सुरीला....

बो ये खाई जाला औला.. खाई जला औला औला....
सतपुली आयन बो ये..
बो येह तारा दत्ता का नोना मेरी बो सुरीला....
बो येह निज़णू निज़णू मेरी बो सुरीला.....
बो ये सतपुली का सैना मेरी बो सुरीला...
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सुभप्रभात दगड्यों ... लाल चन्द निराला ...

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

श्री गोविंद गीत
रचना -- आत्मा राम फौंदणी 'कमल ' ( जन्म - 1944 ,कफिल्ड -पाली , डागर , टिहरी गढ़वाल )
Poetry by - Atma Ram Faundani 'Kamal'
( विभिन्न युग की गढ़वाली कविताएँ श्रृंखला )
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इंटरनेट प्रस्तुति और व्याख्या - भीष्म कुकरेती
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श्री श्याम गोविन्द हरे मुरारी
गीता गति ज्ञान जुगौं गवैया
श्रीकृष्ण जी कू रसपान गीता
गोविन्द दामोदर माधवेति
क्रोधी व कामी जब भूप होंदा
गीता तभी शंख बणी सुणेन्दा
तू कर्म की बात न छोड़ मन से
गोविन्द दामोदर माधवेति
........
श्री धन्य जो गोकुल जन्म लेंदा
माँ धन्य सी गोकुल बलशाली
वा जीव भी धन्य जु रोज गांदी
गोविन्द दामोदर माधवेति
.......
वा धन्य भूमि जख कृष्ण होवन
गाये यही गीत अर्जुनन
भग्यानी गोपी छन पुण्यवळि
गोविन्द दामोदर माधवेति
( साभार --शैलवाणी , अंग्वाळ )
Poetry Copyright@ Poet Copyright @ Bhishma Kukreti interpretation if any

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

उचि डाँड्युं की गोद मा
रचना -- महेश तिवाड़ी ( जन्म - 1943-1997, पोखरी , सितौनस्यूं पौड़ी गढ़वाल )
Poetry by - Mahesh Tiwari
( विभिन्न युग की गढ़वाली कविताएँ श्रृंखला )
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इंटरनेट प्रस्तुति और व्याख्या - भीष्म कुकरेती
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उचि डाँड्युं कि गोदि मा
लौंकि जांद कुएडी स्य बरसात मा ।
वखि रौंद मेरि देवी राजेश्वरी
वींकि छाया हमकू हरीं च भरीं
कुणजा दुबला का फूल चढ़दन वख
ट्वखणी पाणी कि रौंद थमी हात मा।
ऋतू बौड़ी आंदन बारा बनी
गाड गदन्यूँ स्वींसाट होंद तनी
सौण भादों कि बरखा का झुमणाट मा
बिजली घाम लगौंद जनू रात मा।
मेल्वड़ी बासदन डाँड्यूं चैता मासा
उचि डाँड्यूं मा जमदु हौरु हौरु घास
मैता कि बेटी सैसुर जांदन जबा
कंडी कलेउ थमीं रौंद हात मा।
उचि डाँड्युं कि गोदि मा
लौंकि जांद कुएडी स्य बरसात मा ।
( साभार --शैलवाणी , अंग्वाळ )
Poetry Copyright@ Poet
Copyright @ Bhishma Kukreti interpretation if any

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

खुलिगे सरग
रचना -- योगेश पांथरी ( जन्म - 1945, पौड़ी गढ़वाल )
Poetry by - Yogesh Panthari
( विभिन्न युग की गढ़वाली कविताएँ श्रृंखला )
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इंटरनेट प्रस्तुति और व्याख्या - भीष्म कुकरेती
(s =आधी अ)
खुलिगे सरग चलणू बथाऊँ
डांडी सुकीली , खल्याणी सराऊँ
छ्वटि छ्वटि गदनि घुंघरू बजौणी
बsड़ि बsड़ि गाडs ढोलू थाप
रौलों को स्वींसाट सिणई सि बाजा
छंछडों को छमछ्याट होणु च आप
भजदि कुएड़ी ढळकीं दमाली
निमड़ोदो घाम गदबदी गैरी
सूरजल जन सपकु सरकायो
मुलकंदि मुखडी च डैरि डैरी
चखुल्यूं कि डार असमान उड़दीं
रजबाटो जांद कै गौं को बासो
हफराट करदीं लंग लंगी डाळो
स्वाणि गितार जन करदs सांसो
अच्छांद सूरज की छाप बिंदी
चांदी सि गैण जन छ्वया रौली
रंगीन मुंडेड़ी बांधीं घणेट
डांड की सार्युं क्वी ब्योली होली
तिगबंद सी कखि तिरछी दिवाल
कखि धार धार हार माला
कखि कखिम मा छन जन मूंग मोती
काजोळ लाजोळ छुबडळि छाला
धार धार डाळो की लम्बी लंगेत
बरात जाणी जन कैइ गौं
अच्छांद घाम कन छिं लगणा
फरड़ा सरैयां ढोल दमाऊ
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( साभार --शैलवाणी , अंग्वाळ )
Poetry Copyright@ Poet
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