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Uttarayani घुघुतिया उत्तरायणी (मकर संक्रान्ति) उत्तराखण्ड का सबसे बड़ा पर्व

Started by पंकज सिंह महर, January 08, 2008, 12:52:56 PM

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Risky Pathak

Surya Jab Makar Rashi Me Pravesh Karta Hai Us din Ko hi Makar Sankraanti(Ghugutiya) mnaayi jaati Hai....
Amooman ye din 14january ko hi padta hai.. Par kabhi kabhi 13 january ko bhi padta hai...
Quote from: खीमसिंह रावत on January 19, 2010, 01:24:21 PM
राजेन जी नमस्कार
मकर सक्रांति को ही हमारे पहाड़ में उत्तरायणी सज्ञान (सक्रांति) कहते हैं मैं जहां तक जानता हूँ हमारे यहाँ  उत्तरायणी सज्ञान (सक्रांति) अग्रेजी कलेंडर के हिसाब से १४ जनवरी को ही नहीं मनाई जाती है बल्कि पहाड़ के पचांग के हिसाब से माघ एक गते को मनाते हैं यह दिन हो सकता है ज्यादा बार १४ जनवरी को पड़ जाता होगा |


पंकज सिंह महर


Devbhoomi,Uttarakhand


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उत्तरायणी मेले का शुभारंभ करेंगे सीएम
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बागेश्वर: मकर संक्रांति से शुरू होने वाले उत्तरायणी मेले का शुभारंभ मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक करेंगे। गत दिनों देहरादून में चिकित्सा शिक्षा मंत्री बलवंत सिंह भौर्याल के नेतृत्व में मिले शिष्टमंडल ने बागेश्वर आने का आमंत्रण दिया जिस पर मुख्यमंत्री ने सहमति जताते हुए कार्यक्रम निर्धारित करने का आदेश दिया है।

मुख्यमंत्री से मुलाकात करने के बाद नगर पालिका अध्यक्ष सुबोध साह ने कहा कि मेले को भव्य व आकर्षक बनाने के लिए पालिका सारे उपाय कर रही है। बेहतरीन कलाकारों को आमंत्रित किया जा रहा है। मेले के शुभारंभ के लिए मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक को आमंत्रित किया गया है। उन्होंने बताया कि जिला प्रशासन, मेला समिति सहित नगर के गणमान्य व वरिष्ठ नागरिकों की राय लेकर मेले को आकर्षक स्वरूप प्रदान किया जा रहा है। मेले के शुभारंभ के लिए मुख्यमंत्री ने सहमति जताई है। शिष्टमंडल में विधायक कपकोट शेर सिंह गढि़या, पालिका अध्यक्ष सुबोध साह, जिला पंचायत उपाध्यक्ष विक्रम शाही, केएमवीएन निदेशक मंडल सदस्य रमेश साह व भाजपा जिला उपाध्यक्ष जगदीश जोशी शामिल थे।

http://in.jagran.yahoo.com/news/local/uttranchal/4_5_7089515.html

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उत्तरायणी पर्व से शुरू होगा नया पर्व काल
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मकर राशि में सूर्य देव का प्रवेश होते ही उत्तरायणी पर्व प्रारंभ हो जाएगा। सूर्य देव की दक्षिण यात्रा अब उत्तर की ओर होने लगेगी। मकर प्रवेश के तत्काल बाद विवाह आदि सभी प्रकार के मांगलिक कार्य भी शुरू हो जाएंगे। होलाष्टक लगने तक मांगलिक कार्य जारी रहेंगे।
सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करते ही धनु राशि की शीतलता कुछ और बढ़ जाती है। अभी सूर्य लगभग एक माह तक शीतल रहेंगे। मकर संक्रांति से ही शिशिर ऋतु प्रारंभ होगी।

अभी तक हेमंत ऋतु चल रही है। सूर्य देव की दक्षिणायन यात्रा १३ जनवरी तक जारी रहती है। १४ जनवरी को जैसे ही सूर्य का प्रवेश मकर में होता है, शिशिर ऋतु का आगाज हो जाता है और सूर्य उत्तर की ओर चलने लगते हैं। उत्तरायणी पर्व देश के विभिन्न भागों में अनेक नामों से मनाया जाता है। दक्षिण में इसे पोंगल कहते हैं तो पूरब में बिहू। उत्तर भारत में मकर संक्रांति स्नान पर्व के रूप में विख्यात है।

हरिद्वार सहित गंगा के अनेक तटों पर इस दिन लाखों श्रद्धालु स्नान करेंगे। भगवती गंगा जहां समुद्र में मिलती हैं, उस गंगा सागर पर भी विशाल मेला लगेगा। इसी दिन से प्रयाग का विश्व प्रसिद्ध माघ मेला प्रारंभ हो जाएगा। होली से आठ दिन पूर्व तक सभी प्रकार के १५ संस्कार संपन्न कराए जा सकते हैं। सोलहवें संस्कार के लिए पहले से ही कोई प्रतिबंध नहीं लगाया गया है।

विनोद सिंह गढ़िया

उत्तरायण
सूर्य हमारे जीवन का केन्द्र है। सौर मंडल में अनेकानेक तारे, ग्रह, नक्षत्र, और कितने ही क्षुद्र ग्रह हैं, जो अपनी स्थिति, प्रकाश, गति, उष्मा, ऊर्जा और वेग से हमारे जीवन तथा भविष्य को प्रभावित करते हैं। संपूर्ण चराचर को उद्भासित करने वाले सूर्य वास्तव में इस जगत के कारण तथा परिणाम दोनों ही हैं। इस जगत की चर तथा अचर सृष्टि के उद्भव, निर्माण, विकास, रक्षा, संहार तथा संहारेत्तर समापन प्रक्रिया प्रत्यक्षत: इन्हीं से निर्देशित है। जीवन के सभी रूपों यथा देवता, जरायुज, अण्डज, स्वेदज और उद्भिज का आधार इन्हीं सूर्यदेव में है। यही कारण है कि इन्हें जगत की आत्मा कहा गया है। पद्मपुराण में तो उन्हें ईश्वर से भी विशिष्ट बताया गया है। कहा है कि श्रीविष्णु, श्रीशिव के दर्शन सभी मनुष्यों को नहीं होते हैं; ध्यान में ही उनका स्वरूप का साक्षात्कार किया जाता है, किन्तु भगवान सूर्य के दर्शन संसार की अंतिम सीमा तक के संचरण काल में सभी मनुष्यों सहित सम्पूर्ण चर एवं अचर सृष्टि को होते हैं।
खगोल विज्ञान के अनुसार सूर्य एक जाज्वल्यमान ज्योति-स्वरूप तारा है जिसके चारों ओर एक निश्चित माप की पट्टी में बुध, शुक्र, पृथ्वी, मंगल, बृहस्पति तथा शनि आदि ग्रह गोलाकार अथवा अंडाकार होकर इसकी परिक्रमा करते हैं।
पृथ्वी से देखने पर सूर्य घूमता हुआ प्रतीत होता है। वास्तव में ऐसा है नहीं। पृथ्वी और दूसरे ग्रह भी सूर्य के आसपास घूमते हैं। लेकिन इस तथ्य से जीवन और जगत पर सूर्य के होने वाले प्रभाव में कोई अंतर नहीं पड़ता। इसी कथित-भ्रमित भ्रमणशीलता के आधार पर सूर्य नभमंडल के भचक्र में 30 दिन की अवधि पूरी होने पर एक राशि से दूसरी राशि में संक्रमण करते हैं। जिसे खगोलशास्त्री सूर्य संक्रमण-सक्रांति की कहते हैं। विवेचित पट्टी (भचक्र) को मेष, वृष, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक धनु, मकर, कुंभ तथा मीन में विभाजित किया गया है। बारह राशियों में सूर्य का प्रति मास संक्रमण होता है। सूर्य के राशि संक्रमण से प्रति मास संक्रांति होती है। इस संक्रमण में दो बदलाव मुख्य हैं। उत्तरायण अर्थात 'मकर संक्रांति'।
उत्तरायण अर्थात सूर्य का उत्तर अयन अधिक शुभ माना जाता है। जब सूर्य धनु राशि में संचार पूरा करके मकर राशि में प्रवेश करता है तब सूर्य का उत्तरायण संचार प्रारम्भ होता है। मकर, कुंभ, मीन, मेष, वृष तथा मिथुन राशियों में संचरण अवधि में पूर्ण होता है। सूर्य जब मिथुन राशि से जब कर्क राशि में प्रवेश करता है तब सूर्य दक्षिण अयन की यात्रा प्रारंभ करता है।
पद्म, मत्स्य आदि पुराण ग्रंथों के अनुसार सूर्य के उत्तरायण होते समय मकर संक्रांति में किए धार्मिक कार्य, यथा सूर्योदय पूर्व तिल-स्नान, तर्पण, दान, देवपूजन, तुलादान, वस्त्रदान, स्वर्ण-मणिमाणिक्य, हव्य-कव्य दान, दीपदान, शय्यादान, पिण्डरहित श्राद्ध, व्रत, जप, तप, होम इत्यादि का मिलना है। इन पुण्य कार्यों के फल अन्य अवसरों पर किए जाने वाले इन्हीं सब धार्मिक कार्यों से प्राप्त फल की तुलना में अपेक्षाकृत अधिक और कल्याण कारी होते हैं। शास्त्रीय संदर्भों के अनुसार हजार, लाख और करोड़ गुना फल मिलते हैं। संक्रांति काल में की गई सूर्य पूजा हेतु अनेक मंत्र हैं, जिनके श्रद्धापूर्वक जप से मनुष्य अपने संपूर्ण अभिष्ट एवं अभिलक्षित पदार्थों, सर्वसिद्धियों तथा स्वर्गादि के भोग प्राप्त करता है।
धर्मसिंधु और पुराण शास्त्रों के अनुसार मकर संक्रांति के पुण्य काल में स्नान-दान करते हुए तीन दिन उपवास के साथ शिवपूजा का विधान है। संक्रांति के पहले दिन उपवास करके संक्रांति दिवस पर तिल का उबटन लगाकर, तिल से स्नान कर तिल से ही तर्पण करके शिव को गाय के घी से मर्दन कर शुद्धजल से नहला कर सुवर्ण-मणिमाणिक इत्यादि अर्पित कर तिल-दीप-सुवर्ण-अक्षत-तिल से पूजन कर घी-कंबल इत्यादि का ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए। उपयुक्त पात्रों और जरूरतमंदों को दान दक्षिणा देने के पश्चात ही तिलसहित पंचगव्य से व्रत का पारण करें।
मकर संक्रांति दिवस एक अन्य स्वरूप भी लोकाचार में प्रचलित है। बाधित संबंधों, टूटी हुई मित्रताओं एवं पारिवारिक संबंधों को फिर से जोड़ने के प्रयास इस दिन किए जाते हैं। परिवार के अन्य सदस्यों को सम्मान देते और बिगड़े हुए संबंधों को सुधारने के लिए कोशिश करते हैं।
मकर संक्रांति का एक आयाम खेती से जुड़ा भी है। रबी की फसल में बीज पड़ना प्रारम्भ होता है। फसल की पकाई के लिए सूर्य की अच्छी धूप का अपना एक महत्व है। दिन-रात की अवधि इस तिथि के बाद समान होने लगने से कृषि का मिजाज बदलता है। इस दिन से सूर्य की अधिक धूप उपलब्ध होती है जो अन्तत: फसल के पकने में सहायक होती है। धूप में उत्तरोत्तर वृद्धि फसल को उपयुक्त रूप से पकने में मदद करती है।
सूर्य की उर्जा एवं उष्मा से वर्र्षा है। इसी से नदियों और सरोवरों में जल है। सूर्य के प्रभाव से ही बर्फ भी है। यही सब मनुष्य के लिए जीवनदायी अमृत है। इस जल का प्रयोग सुविधाजनक एवं सम्मानपूर्वक करना नितान्त आवश्यक है। इसीलिए श्रद्धालु पवित्र नदियों में स्नान करके अपनी कृतज्ञता सूर्य-पूजा के माध्यम से भगवान सूर्य के प्रति अभिव्यक्त करते ह
सूर्य के प्रकाश का एक कोण बदल जाने से पृथ्वी पर फैले जीवन और विस्तार में भौतिक और आध्यात्मिक बदलाव आने लगते हैं। प्रतिवर्ष बदलने वाले इस कोण का नियत दिन है मकर संक्रांति

उत्तरायणपर्व

मकर संक्रांति देश भर में तरह-तरह से मनाई जाती है। इस मौके पर व्यक्त किए जाने वाले उल्लास के विविध रूप और नाम

बिहु - असम मेंमकर संक्रांति को माघ बिहु अथवा भोगाली बिहु का नाम से जाना जाता है। बिहु में असम के लोग नृत्यों की बानगी देखते ही बनती है। समूचा असम क्षेत्र बिहु के रंग में रंग जाता है। पारंपरिक लोक गीत गाए जाते हैं। बिहु कई स्वरूपों में मनाया जाता है।

लोहड़ी- पंजाब और आसपास के इलाकों में यह पर्व लोहड़ी के रूप में मनाया जाता है। जो संक्रांति के एक दिन पहले संपन्न होती है। अंधेरा होते ही आग जलाकर अग्निपूजा करते हुए तिल, गुड़, चावल और भुने हुए मक्के की आहुति दी जाती है।

पोंगल - तमिलनाडु में यह वहां नए वर्ष का प्रतीक है। पर्व चार दिन तक मनता है। यही वर्ष का नया और पहला दिन भी माना जाता है।

खिचड़ी - उत्तर भारत में चावल दाल से बने खास आहार लेने और दान देने का पर्व है मनाया जाता है।

संकरात - गुजरात और आसपास के इलाकों में पतंग उड़ाने और कबड्डी कुश्ती आदि देसी खेलों के आयोजन का उत्सव मनाया जाता है। दिन भर याचकों को दान देने का रिवाज भी है।
----आचार्य मीतू गौड़ ---

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मकर संक्रांति सूर्य की उपासना का पर्व है। इस दिन सूर्य भूमध्य रेखा को पार करके उत्तर की ओर अर्थात मकर रेखा की ओर बढ़ना शुरू करता है। इसी को सूर्य का उत्तरायण स्वरूप कहते हैं। इससे पूर्व वह दक्षिणायन होता है। सूर्य के उत्तरायण होने का महत्व इसी कथा से स्पष्ट है कि शर शैया पर पड़े भीष्म पितामह अपनी मृत्यु को उस समय तक टालते रहे, जब तक कि सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण नहीं हो गया। मकर संक्रांति होने पर ही उन्होंने देह त्यागी। हमारे ऋषि इस अवसर को अत्यंत शुभ और पवित्र मानते थे। उपनिषदों में इसे 'देवदान' कहा गया है।

जब सूर्य किसी एक राशि को पार करके दूसरी राशि में प्रवेश करता है, तो उसे संक्रांति कहते हैं। यह संक्रांति काल प्रतिमाह होता है। वर्ष के 12 महीनों में वह 12 राशियों में चक्कर लगा लेता है। इस प्रकार संक्रांति तो हर महीने होती है, मगर मकर संक्रांति वर्ष में केवल एक बार होती है, जब सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है। यह पर्व सामान्य तौर पर 14 जनवरी को ही पड़ता है।

सूर्य की गति से संबंधित होने के कारण यह पर्व हमारे जीवन में गति, नव चेतना, नव उत्साह और नव स्फूर्ति का प्रतीक है। इस समय से दिन बड़े होने लगते हैं और रातें छोटी। दिन बड़े होने का अर्थ जीवन में अधिक सक्रियता है। फिर इससे हमें सूर्य का प्रकाश भी अधिक समय तक मिलने लगता है, जो हमारी फसलों के लिए अत्यंत आवश्यक है। इससे यह पर्व अधिक क्रियाशीलता और अधिक उत्पादन का भी प्रतीक है।

यह पर्व सूर्य के दक्षिणायन और उत्तरायण होने का संधिकाल भी है। दक्षिणायन में चंदमा का प्रभाव अधिक होता है और उत्तरायण में सूर्य का। सृष्टि पर जीवन के लिए जो आवश्यकता सूर्य की है, वह चंद्रमा की नहीं है। इस प्रकार यह पर्व सूर्य के महत्व को भी उजागर करता है।

यह पर्व शिशिर के अंत तथा बसंत के आगमन का सूचक है। बसंत की मादकता और प्रफुल्लता इसके साथ जुड़ी हुई है। जिन लोगों की यह धारणा है कि आर्य मूलत: भारत के निवासी नहीं थे, बल्कि उत्तरी ध्रुव से आए थे, उनके विचारों के अनुसार सूर्य के उत्तरायण काल को अधिक महत्व देने के पीछे आर्यों की अपने मूल स्थान के प्रति निष्ठा भावना भी थी। उत्तरी ध्रुव पर छह महीने का दिन और छह महीने की रात होती है। इसी प्रकार सूर्य का दक्षिणायन और उत्तरायण काल भी छह-छह महीने का ही होता है। इससे आर्य, सूर्य के उत्तरायण काल को ही अपने लिए शुभ और पवित्र मानते थे तथा मकर संक्रांति को उसके प्रारंभ पर उत्सव मनाते थे।

योगेश चंद्र शर्मा



विनोद सिंह गढ़िया

मकर संक्रांति : घुघुतिया / उत्तरायणी (उत्तराखंड का सबसे बड़ा पर्व)

जनवरी माह में उत्तर भारत में मकर संक्रान्ति, दक्षिण में पोंगल और पंजाब में लोहड़ी बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। इस अवसर में उत्तराखंड में एक अलग ही नजारा देखने को मिलता है, कुमाँऊ में अगर आप मकर संक्रान्ति में चले जायें तो आपको शायद कुछ ये सुनायी पड़ जाय -

    काले कौव्वा, खाले,
    ले कौव्वा पूड़ी,
    मैं कें दे ठुल-ठुलि कूड़ी,
    ले कौव्वा ढाल,
    दे मैं कें सुणो थाल,
    ले कौव्वा तलवार,
    बणे दे मैं कें होश्यार।


साथ में दिखायी देंगे गले में घुघुत की माला पहने हुए छोटे-छोटे बच्चे, जिसमें वे डमरू, तलवार, ढाल, जांतर (घर में आटा पीसने के लिए एक छोटा सा पत्थर का घराट जो अब विलुप्त सा होने लगा है)  भी पिरोये रहते हैं ।

मकर संक्रान्ति का महत्व

शास्त्रों के अनुसार ऐसी मान्यता है कि इस दिन सूर्य (भगवान) अपने पुत्र शनि से मिलने उनके घर जाते हैं। अब ज्योतिष के हिसाब से शनिदेव हैं मकर राशि के स्वामी, इसलिये इस दिन को जाना जाता है मकर संक्रांति के नाम से। सर्वविदित है कि महाभारत की कथा के अनुसार भीष्म पितामह ने अपनी देह त्यागने के लिए मकर संक्रांति का ही दिन चुना। यही नहीं, कहा जाता है कि मकर संक्रान्ति के दिन ही गंगाजी भगीरथ के पीछे-पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होकर सागर में जा मिली थी। यही नही इस दिन से सूर्य उत्तरायण की ओर प्रस्थान करते हैं, उत्तर दिशा में देवताओं का वास भी माना जाता है। इसलिए इस दिन जप- तप, दान-स्नान, श्राद्ध-तर्पण आदि धार्मिक क्रियाकलापों का विशेष महत्व है। ऐसी भी मान्यता है कि इस अवसर पर दिया गया दान सौ गुना बढ़कर पुन: प्राप्त होता है।

मकर संक्रान्ति के दिन से ही माघ महीने की शुरूआत भी होती है। मकर संक्रान्ति का त्यौहार पूरे भारत में बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है लेकिन देश के अलग अलग हिस्सों में ये त्यौहार अलग-अलग नाम और तरीके से मनाया जाता है। और इस त्यौहार को उत्तराखण्ड में "उत्तरायणी" के नाम से मनाया जाता है। कुमाऊं क्षेत्र में यह घुघुतिया के नाम से भी मनाया जाता है तथा गढ़वाल में इसे खिचड़ी संक्रान्ति के नाम से जाना जाता है। इस अवसर में घर घर में आटे के घुघुत बनाये जाते हैं और अगली सुबह को कौवे को दिये जाते हैं (ऐसी मान्यता है कि कौवा उस दिन जो भी खाता है वो हमारे पितरों (पूर्वजों) तक पहुँचता है), उसके बाद बच्चे घुघुत की माला पहन कर कौवे को आवाज लगाते हैं – काले कौव्वा काले, मेरी घुघुती माला खाले।

कुमाँऊ के गाँव-घरों में घुघुतिया त्यार (त्यौहार) से सम्बधित एक कथा प्रचलित है। ऐसा कहा जाता है कि किसी एक एक राजा का घुघुतिया नाम का कोई मंत्री राजा को मारकर ख़ुद राजा बनने का षड्यन्त्र बना रहा था लेकिन एक कौव्वे को ये पता चल गया और उसने राजा को इस बारे में सब बता दिया। राजा ने फिर मंत्री घुघुतिया को मृत्युदंड दिया और राज्य भर में घोषणा करवा दी कि मकर संक्रान्ति के दिन राज्यवासी कौव्वों को पकवान बना कर खिलाएंगे, तभी से इस अनोखे त्यौहार को मनाने की प्रथा शुरू हुई।

यही नही मकर संक्रान्ति या उत्तरायणी के इस अवसर पर उत्तराखंड में नदियों के किनारे जहाँ-तहाँ मेले लगते हैं। इनमें दो प्रमुख मेले हैं – बागेश्वर का उत्तरायणी मेला (कुमाँऊ क्षेत्र में) और उत्तरकाशी में माघ मेला (गढ़वाल क्षेत्र में)।

बागेश्वर का उत्तरायणी मेला

इतिहासकारों की अगर माने तो माघ मेले यानि उत्तरायणी मेले की शुरूआत चंद वंशीय राजाओं के शासनकाल से हुई, चंद राजाओं ने ही ऐतिहासिक बागनाथ मंदिर में पुजारी नियुक्त किये। यही ही नही शिव की इस भूमि में उस वक्त कन्यादान नहीं होता था।

पुराने जमाने से ही माघ मेले के दौरान लोग संगम पर नहाने थे और ये स्नान एक महीने तक होते थे। यहीं बहने वाली सरयू नदी के तट को सरयू बगड़ भी कहा जाता है। इसी सरयू के तट के आस-पास दूर-दूर से माघ स्नान के लिए आने वाले लोग छप्पर डालना प्रारंभ कर देते थे। तब रोड वगैरह नही होती थी तो दूर-दराज के लोग स्नान और कुटुम्बियों से मिलने की लालसा में पैदल ही चलकर आते। पैदल चलने की वजह से महीनों पूर्व ही कौतिक (मेला) के लिये चलने का क्रम शुरु होता। धीरे-धीरे स्वजनों से मिलने के लिये जाने की प्रसन्नता में हुड़के की थाप भी सुनायी देने लगी फलस्वरुप मेले में लोकगीतों और नृत्यों की महफिलें जमने लगी। प्रकाश की व्यवस्था अलाव जलाकर होती, कँपकँपाती सर्द रातों में अलाव जलाये जाते और इसके चारों ओर झोड़े, चांचरी, भगनौले, छपेली जैसे नृत्यों का मंजर देखने को मिलता। दानपुर और नाकुरु पट्टी की चांचरी होती, नुमाइश खेत में रांग-बांग होता जिसमें दारमा लोग अपने यहाँ के गीत गाते। सबके अपने-अपने नियत स्थान थे, नाचने गाने का सिलसिला जो एक बार शुरु होता तो चिड़ियों के चहकने और सूर्योदय से पहले खत्म ही नहीं होता।

धीरे-धीरे धार्मिक और सांस्कृतिक रुप से समृद्ध यह मेला व्यापारिक गतिविधियों का भी प्रमुख केन्द्र बन गया, भारत और नेपाल के व्यापारिक सम्बन्धों के कारण दोनों ही ओर के व्यापारी इसका इन्तजार करते। तिब्बती व्यापारी यहाँ ऊनी माल, चँवर, नमक व जानवरों की खालें लेकर आते। भोटिया-जौहारी लोग गलीचे, दन, ऊनी कम्बल, जड़ी बूटियाँ लेकर आते, नेपाल के व्यापारी लाते शिलाजीत, कस्तूरी इत्यादि । स्थानीय व्यापारी भी अपने-अपने सामान को लाते, दानपुर की चटाइयाँ, नाकुरी के डाल-सूपे, खरही  के ताँबे के बर्तन, काली कुमाऊँ के लोहे के भदेले (कड़ाही), गढ़वाल और लोहाघाट के जूते आदि सामानों का तब यह प्रमुख बाजार था। गुड़ की भेली और मिश्री और चूड़ी चरेऊ से लेकर टिकूली बिन्दी तक की खरीद फरोख्त होती, माघ मेला तब डेढ़ माह चलता। दानपुर के सन्तरों, केलों व बागेश्वर के गन्नों का भी बाजार लगता और इनके साथ ही साल भर के खेती के औजारों का भी मोल भाव होता।

उत्तरकाशी का माघ मेला

उत्तरकाशी में माघ मेला काफी समय से मनाया जा रहा है ये धार्मिक, सांस्कृति तथा व्यावसायिक मेले के रूप में प्रसिद्ध है। इस मेले का शुभारंभ प्रतिवर्ष मकर संक्राति के दिन पाटा-संग्राली गांवों से कंडार देवता और अन्य देवी देवताओं की डोलियों के उत्तरकाशी पहुंचने से होता है। यह मेला 14 जनवरी (मकर संक्राति) से प्रारम्भ हो कर 21 जनवरी तक चलता है। इस मेले में जिले के दूर दराज से धार्मिक प्रवृत्ति के लोग जहाँ भागीरथी नदी में स्नान के लिये आते है। वहीं सुदूर गांव के ग्रामवासी अपने-अपने क्षेत्र से ऊन एवं अन्य हस्तनिर्मत उत्पादों को बेचन के लिये भी इस मेले में आते है। इसके अतिरिक्त प्राचीन समय में यहाँ के लोग स्थानीय जडी-बूटियों को भी उपचार व बेचने के लिये लाते थे लेकिन सरकार ने अब इस पर प्रतिबन्ध लगा दिया है।

उत्तरकाशी बाबा विश्वनाथ जी की नगरी के रूप में भी प्रसिद्ध है इसलिये कई शिव भक्त भी दूर दूर से इस मेले में हिस्सा लेने आते हैं। वर्तमान काल में यह मेला धार्मिक एवं सांस्कृतिक कारणों के अलावा पर्यटक मेले के रूप में भी अपनी पहचान बना रहा है। यही वजह है कि आजकल के दौर में इस मेले में सर्कस वगैरह भी देखने को मिलता है। यही नही साल के उस महीने में होने के कारण जब इस क्षेत्र में अत्यधिक बर्फ रहती है पर्यटन विभाग ने दयारा बुग्याल को स्कीइंग सेंटर के रूप में विकसित कर इस क्षेत्र को पर्यटन के लिये भी प्रचारित किया है।

अंत में, सबै भै बैणियों के मकर संक्रान्तिक ढेर सारी शुभकामनायें  -

    काले कौवा काले , घुघुति माला खाले,
    लै कौवा बड़ा, आपू सबुनै के दिये सुनक ठुल ठुल घड़ा,
    रखिये सबुने कै निरोग, सुख सम़ृद्धि दिये रोज रोज।


अर्थात, सभी भाई बहिनों को मकर संक्रान्ति की बहुत बहुत बधाई -

    काले कौवा आकर घुघुति (इस दिन के लिये बनाया गया पकवान) खाले,
    ले कौव्वे खाने को बड़ा ले, और सभी को सोने के बड़े बड़े घड़े दे,
    सभी लोगों को स्वस्थ्य रख, हर रोज सुख और समृद्धि दे।