• Welcome to MeraPahad Community Of Uttarakhand Lovers.
 

Uttarayani घुघुतिया उत्तरायणी (मकर संक्रान्ति) उत्तराखण्ड का सबसे बड़ा पर्व

Started by पंकज सिंह महर, January 08, 2008, 12:52:56 PM

Linked Events

हेम पन्त

SSB के प्रशिक्षित गुरिल्ला बेरोजगारों का बगङ पर प्रदर्शन

खीमसिंह रावत

Hem ji is foto me ek chij mujhe bahut achchhi lagi O hai topi
hame apane karykramo me yah koshish karani chahiye ki pahichan bane


Quote from: H.Pant on January 17, 2009, 10:59:17 AM
मोहन पाठक की अगुवाई में उत्तराखण्ड के बेरोजगारों की जनसभा




Risky Pathak

Ghoogootia sabd sunte hi bachpan ke wo din yaad aa jate hai, jab gale me ghoggot ki maala daalke hum sab bache yha wha daudte the... Kaale kwaa kaale shor machaate the....



ka gyaan u din :(

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


By hem da.

घुघुतिया त्यार से सम्बधित एक कथा प्रचलित है....
कहा जाता है कि एक राजा का घुघुतिया नाम का मंत्री राजा को मारकर ख़ुद राजा बनने का षड्यन्त्र बना रहा था... एक कौव्वे ने आकर राजा को इस बारे में सूचित कर दिया.... मंत्री घुघुतिया को मृत्युदंड मिला और राजा ने राज्य भर में घोषणा करवा दी कि मकर संक्रान्ति के दिन राज्यवासी कौव्वो को पकवान बना कर खिलाएंगे......तभी से इस अनोखे त्यौहार को मनाने की प्रथा शुरू हुई

पंकज सिंह महर

बच्चों के मन को भाने वाला एक लोक त्यौहार-घुघत्या







आज काले कौआ है। छुटपन में काले कौआ का इन्तजार हम बड़ी शिददत से किया करते थे। एक हफते पहले ही दिलों की धड़कनें तेज हो जाया करती थी। और बच्चों में आपस में प्रतियोगिता होती थी कि इस बार कौन सबसे ज्यादा बड़ी माला पहनेगा। इस माला में एक खास बात थी। यह फूलों की नहीं बल्कि सूजी, आटे मास आदि पदार्थों से बने तरह तरह के पकवानों की होती थी। घुघुतिया, खजूरे, बड़ा, पूरी नारंगी, गुजिया और न जाने क्या क्या इस माला में पिरोया जाता था। माला बहुत भारी हो जाती थी लेकिन वो भार भार थोड़े ही लगता था हमें। मम्मी और दीदियों को मनाकर किसी तरह अपनी अपनी मालाओं को ज्यादा बड़ा बनवाने की एक अजीब सी ललक होती थी। माला बनने के बाद रात में छुपकर पता नहीं कितनी बार पहनके देखा करते थे। सुबह होते ही सबसे पहले परम्परा के मुताबिक कौवे को बड़ा और पूड़ी खिलाते थे। छत में जाकर कौवे का बुलाते थे। काले कौआ आ जा, पूरी बड़ा खा जा।


उस समय सारा वातावरण कितने ही बच्चों की आवाज से गूंज उठता था। सुबह के सन्नाटे को चीरती बच्चों की इस आवाज में एक अजीब सी खुशी होती थी जिसे बयान तो नहीं ही किया जा सकता। बस एक बार कौवा आकर बड़ी पूड़ी खाले तो उसके बाद कुछ देर माला पहनके इतराने और फिर एक एक करके अपनी माला के खजूरे, घुघुत, बड़े आदि को एक एक करके खाते चले जाने का अपना ही एक सुख था। काले कौवा के उस त्यौहार का वो उत्साह आज के दिन कहीं खोजे नहीं मिल रहा। सच कहूं तो याद भी नहीं थी कि आज वही काले कौवा है जिसके लिए बचपन में इतना उत्साह हुआ करता था। मम्मी आफिस से घर लौटकर वहां घर में शायद यही सोच रही होंगी कि काश बच्चे घर में होते और यहां दीदी आफिस से अभी घर नहीं लौटी है। लेकिन मेल खोला तो महेश पुनेठा जी द्वारा भेजी गयी ये तस्वीरें मिली। लगा जैसे काले कौवा के पकवानों की वही खुशबू किसी ने भेंट कर दी हो। और साथ ही अभिषेक का ये लेख भी मिला जो आपको काले कौवा के पहाड़ी त्यौहार का पूरा परिचय दे देने के लिए काफी है। बच्चे अपने त्यौहार को अपने तरीके से बयान करें तो उसे जानने का मजा और बढ़ जाता है। है ना।

-अभिषेक पुनेठा
काले कौवा 'काले
घुघते की माला खाले

ले कौव्वा पूरी
मैं दे सुनै छूरी

ले कौव्वा बड़ो
मैं दे चाड़न खिन घोड़ो

काले कौवा काले
पुसैं पकायूॅं माघ खाले

काले कौवा काले़
घुघते की माला खाले


मकर संक्रांति की ठिइुरती प्रातः बेला में ये स्वर बच्चों के कंठों से निकलकर वातावरण को गंुजायमान कर कर रहे हैं। एक नयी ताजगी पूरे वातावरण में फैल गयी है ।बच्चों की आवाज सुनकर ठंड जैसे कहीं दुबकर जा बैठी हो ।सूरज दादा अभी पूरी तरह उठे नहीं पर बच्चे आज उनसे भी जल्दी उठकर नहा-धो कर तरोताजा हो चुके हैं और घुघती माला पहनकर अपनी-अपनी छतोें,बरामदों मे जाकर कुछ पकवान एक प्लेट में सजाकर जोर-जोर से गा कर काले-काले की ध्वनि से कौव्वों को बुला रहे हैं। चारों तरफ बच्चों की काले-काले की मधुर ध्वनि गूज रही है।बच्चों में एक होड़ सी लगी हुई है कि कौव्वा पहले किस के पकवान खाता है। जैसेे ही किसी बच्चे के पकवान को कौव्वा उठा लेता है तो वह खुशी के मारे झूम उठता है और फिर दुगुने उत्साह के साथ कौव्वों को बुलाने में जुट जाता है। कौव्वों को बुलाने के लिए बच्चे तुकबंदी करते जा रहे हैं।उनके इस खेल में बड़े भी शामिल हो जाते हैं। बच्चों का कौव्वों को बुलाने का ये दृश्य अत्यंत मनोहारी प्रतीत होता है।आज बच्चों का उत्साह भी दर्शनीय है। और आखिर हो भी क्यों न मौका है उनके प्यारे त्यौहार घुघत्या का। माना जाता है कि इस दिन कौव्वे बागेश्वर की पवित्र नदी गंगा में स्नान कर आते हैं। इस त्यौहार की तैयारियाॅ एक दिन पहले से ही शुरू हो जाती हैं। पहले दिन से ही आटे की लोई से जानवर,पक्षी,फल,तलवार,ढाल आदि विभिन्न आकृतिया बनायी जाती हैं ।बच्चों मे इस त्यौहार को लेकर खास उत्साह रहता है। बच्चे खुद घुघते की माला सीते है।घुघतें की माला में माल्टा-नारंगी भी डाले जाते हैं। ये माला बच्चे पहनते हैं। इस सब के अलावा इस त्यौहार के बारे में अनेक लोक कथाएॅं प्रचलित हैं जिसमें से एक इस प्रकार है-


एक समय की बात है। एक गाॅंव में एक आदमी रहता था।वह काफी धनी था। किन्तु वह किसी के दुख-सुख में काम आता, न किसी को दान देता। वह कृपण के नाम से प्रसिद्ध था।एक बार वह गम्भीर रूप से बिमार पड़ गया। काफी इलाज कराया गया,दूर-दूर से वैद्य बुलाए गए,किन्तु वह ठीक न हुआ।एक दिन अचानक गाॅंव में एक साधु आया।धनी आदमी के घर वालों ने साधु से रोगी को आश्ीार्वाद देने और उसे स्वस्थ कर देने का अनंुरोध किया। तब साधु ने विचार करते हुए कहा-'' एक युक्ति है। यदि इसके अनुसार काम किया जाए तो रोगी ठीक हो सकता है।'' परिवार वालों ने अनुनय विनय की-''महाराज,आप बताइए। जैसा आप कहेंगे,हम वैसा ही करेंगे।''
साधु ने कहा''तो सुनिए। कल मकर संक्रांति का पुण्य पर्व है।आज आप एक उत्सव मनाकर गाॅंव के सारे लोगों को भोजन कराइए।कल सुबह स्नानादि करके गाॅंव के सभी बच्चों को पकवानों का उपहार दें।जब वे बच्चे काले कौओं को बुलाएॅंगे,तो रोगी ठीक हो जाएगा। साधु ने जो कुछ कहा था,वैसा ही किया गया। उसी दिन गाॅंव के सभाी लोगों को स्नान कराया गया।अगले दिन सुबह रोगी को स्नान कराकर गांव के सभी बच्चों को तरह-तरह के पकवान दिए गए। सभी लोगों ने खुशी मनाई। बच्चों ने सुबह ही स्नान किया और काले कौव्वों को बुलाया।

कुछ देर बात पता चला रोगी वास्तव पें ठीक हो गया है। सबके सुख तथा आनंद के साथ वह धनी आदमी भाी प्रसन्न हुआा। तभी से इस घटना को लेकर 'घुघुतिया' त्यौहार मनाया जाने लगा। इस सब के साथ-साथ इस त्यौहार का ऐतिहासिक महत्व भी कम नहीं है।18वीं शताब्दि में गोरखेंा का शासन कुमाऊॅं में आया।जिसके अत्याचारों ने कुमाऊं को दास प्रथों के क्रूर युग में धकेल दिया। कोई पुरूष हो या स्त्री, वृद्ध हो या जवान, स्वस्थ हो या रोगग्रस्त एक दास के रूप में था। लूट-पाट अत्याचार और अनाचार का नंगा नाच था कुलीबेगार। कुलीबेगाार उत्तराखंड में एक सामान्य बात हो गई थी। 25 वर्ष तक यह आतंक झेलने के बाद अंग्रजों की कम्पनी सरकार से मदद ली गई। लेकिन बात वही ढाक के तीन पात। सन् 1921 मकर संक्रांति का पर्व बागेश्वर में सरयू और गोमती का वही संगम,कुमाऊं के सभी अंचलों से आई प्रताड़ित ,शोषित और मुक्तिगाामी जनता का संगम बन गया था। जिसका नेतृत्व कर रहे लोगों को बुलाकर डिप्टी कमिश्नर ने कहा''बागेश्वर छोड़ दो'। तभी उन लोगों ने जनता के समक्ष जा कर पूछ''आप लोगों ने बेगार के लिए भविष्य में कुली देने हैं तो हम जा रहे हैं नही ंतो हम नहीं हमारी लाश जाएगी।कुली बेगाार नहीं देंगे की आवाज से पूरी घाटी गूॅंज उठी। तभाी ऐसा लगा जैसे हजारों पक्षी उड़ रहे हों और फिर गिर पड़े हों। ये पक्षी नहीं,कुली बेगार प्रथा के सरकारी कुली रजिस्टरों के पन्ने थे जिन्हें हजारों ग्राम प्रधानों ने सरयू मे प्रववहित कर दिया।इस प्रकार इतिहास का एक बर्बरता पूर्ण और अमानवीय दौर खत्म हुआ।
बागेश्वर में आज भी मकर संका्रति के दिन उत्तराखण्ड के विभिन्न अंचलों से लोग प्रसिद्ध सात दिवसीय उत्तरायणी मेले को देखने आतेे हैं। सातों दिन तक उत्तरायणी मेले की बड़ी धूम रहती है। लोग दूर-दूर से अपनी कलाओं का प्रदर्शन करने यहाॅं आते हैं।
घुघुत्या त्यौहार न सिर्फ हमको अपनी परंपरा से जोड़ता है बल्कि शोषण के विरूद्ध संघर्ष की प्रेरणा भी हमें देता है।

- कक्षाः8
जे0बी0एस0जी0 विद्या मन्दिर,गगंगोलीहाट


साभार-http://naisoch.blogspot.com/

Devbhoomi,Uttarakhand

मकर संक्रांति पर होंगे सामूहिक यज्ञोपवीत व विवाह

अल्मोड़ा। प्रखर गायत्री साधना केंद्र व शक्ति पीठ की एक बैठक में मकर संक्रान्ति के अवसर पर नि:शुल्क सामूहिक यज्ञोपवीत व आदर्श विवाह संस्कार समारोह चितई में आयोजित करने का निर्णय लिया गया। बैठक में कहा गया कि इस आयोजन का उद्देश्य दहेज रहित विवाह, कम से कम खर्च कर समरसता का संदेश इसकी मंशा है। बैठक में ग्रामीण इलाकों से गरीब लड़कियों की खरीद फरोख्त पर गहरी चिंता व्यक्त की गई। इसके लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग बैठक के माध्यम से की गई। बैठक की अध्यक्षता केंद्र के अध्यक्ष गणेश भट्ट व संचालन आरएस बिष्ट ने किया।

http://in.jagran.yahoo.com/news/local/uttranchal/4_5_6032049.html

Devbhoomi,Uttarakhand

इस पर्व को उत्तराँचल में धूमधाम से मनाया जाता है.यही से उत्तरायणी मेले का आरम्भ हुआ है. पर्व को उत्साहपूर्वक मनाने तथा कुमाऊँ-गढ़वाल की संस्कृति का प्रचार-प्रसार करने के लिये उत्तरायणी मेला समिति का गठन किया गया है. यही समिति हर साल उत्तरायणी मेले का आयोजन करती है.

इस आयोजन में कुमाऊँ-गढ़वाल के बड़े-बड़े नेता-अभिनेता भी सहयोग प्रदान करते हैं.यही नही कुमाऊँ-गढ़वाल के लोग जो कि बरेली में रह रहे हैं,इस आयोजन में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेते हैं. उत्तरायणी मेले का मुख्य आकर्षण यहाँ दो दिन तक लगातार चलने वाला साँस्कृतिक कार्यक्रम है.

उत्तरायणी मेला कुमाऊँ-गढ़वाल का एक ऐसा संगम है जहाँ दोनों ही मंडलों कि विभिन्न लोक कलाओं रूपी नदियाँ देखने को मिलती हैं. कुमाऊँ-गढ़वाल मंडल के विभिन्न शहरों से आये कलाकार यहाँ साँस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत करते हैं.

उत्तरायणी मेले का आरम्भ 14 जनवरी को शहर में शोभा यात्रा निकालकर किया जाता है. विभिन्न कलाकार सड़कों पर नृत्य करते हुए चलते हैं.

इन झाँकियों को देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे पूरा उत्तराँचल बरेली में समाहित हो गया है. शहर की शोभा देखते ही बनती है. शोभायात्रा मेला परिसर में पहुँचकर समाप्त होती है. उसके पश्चात साँस्कृतिक कार्यक्रमों का सिलसिला शुरु हो जाता है.

Devbhoomi,Uttarakhand

उत्तरायणी मेले की तैयारियों को दिया गया अंतिम रूप

बागेश्वर। 13 जनवरी से लगने वाले उत्तरायणी मेले को अंतिम रूप दिया गया। मेले के सफल संचालन के लिए विभिन्न समितियों का गठन किया गया। बैठक में झांकी को आकर्षक बनाने व नगर की भव्य सजावट करने का निर्णय लिया।

मेलाध्यक्ष व नपा अध्यक्ष सुबोध साह की अध्यक्षता में आयोजित बैठक में मेले की सफलता की तैयारियों पर चर्चा की गई। मेलाध्यक्ष सुबोध साह ने सूचना विभाग द्वारा पंजीकृत दलों की सूची विभाग द्वारा अब तक न सौंपने पर नाराजगी व्यक्त की व कहा कि 5 जनवरी तक सूची सौंप दी जाय। बैठक में मेला संचालन के लिए अलाव, सांस्कृतिक, भोजन, आवास, मंच, स्वागत आदि समितियों का गठन किया गया व सदस्यों को जिम्मेदारी सौंपी। बैठक में मेलाधिकारी व एसडीएम सीएस इमराल ने कहा कि कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए हरसंभव उपाय किए जाएंगे।

http://in.jagran.yahoo.com/news/local/uttranchal/4_5_6066333.html

पंकज सिंह महर

कौव्वों को पकवान खिलाने के लिये लोकगाथायें भी हैं और मान्यता भी कि कौव्वे के रुप में हमारे पितर आकर इन घुघुतों को स्वीकारते हैं। लेकिन पुराने लोगों का तर्क इसके पीछे शायद यह रहा होगा कि जहां मौसम के बदलते ही अन्य पंछी प्रवास पर जाते हैं या आते रहते हैं। लेकिन कौव्वा ही एक ऐसा पक्षी है, जो सुख-दुःख, हर मौसम में हमारे इर्द-गिर्द रहता है, सो इस सर्द मौसम में उसे एक दिन अपने साथ त्यौहार में शामिल करने की परम्परा बनी हो।