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Technological Methods Of Uttarakhand - उत्तराखण्ड की प्रौद्यौगिकी पद्धतियाँ

Started by पंकज सिंह महर, April 16, 2008, 11:09:25 AM

पंकज सिंह महर

तेल का कोल्हू

कुमाउनी में कोल्हू के लिए "कोलु' या कोलू शब्द प्रचलित है। जिस स्थान पर कोल्हू जुता रहता है, उसे "कोल्यूड़' कहा जाता है। हर गाँव में या दो - एक गाँवों के बीच गाँव का एक कोल्हू अवश्य होता है, जिसमें गाँव वाले विभिन्न प्रकार के तिलहनों को पेरते हैं। तिलहनों में सरसों (Brassica campeatris var sarson ), तिल, भंगीरा (perilla frutescents ) पीली सरसों, लाही, अलसी आदि का तेल निकाला जाता है। इसके अतिरिक्त च्यूरा, अखरोट, खुबानी, आडू, भांग आदि के बीजों से भी तेल निकाला जाता है। तेल के कोल्हू में डेढ़ से दो फीट चौड़ी और चार से पाँच फीट तक लंबी तथा ३ से ४ फीट मोटी आधार की वजनदार तख्ती स्थापित की जाती है, इसे "घानि' या "घाचि' कहा जाता है। इस आयताकार घानि में चारों ओर लगभग १/२ इंच की बाड़ बनी रहती है तथा बीच में ओखली बनी रहती है। ओखली के तले में एक संकरा छेद होता है इसे मजबूत पत्थरों पर टिका दिया जाता है, जिससे यह हिले-डुले नहीं। इस तख्ती के नीचे की कुछ जमीन खोद कर चूल्हानुमा जगह बनाई जाती है, जहाँ बर्तन रखा जाता है, जिसमें तेल इकट्ठा होता है। घानी के नीचे टिन या लकड़ी का एक पतला पनेला लगा रहता है, जिसमें से तेल की धार नीचे रखे बर्तन में गिरती है। यह घानि जामुन, बौंज, फयाँट, फल्दा आदि किसी भी लकड़ी से बनाई जाती है। इस घानि के ओखलीनुमा छेद के खांचे में नीचे की ओर मोटा तथा ऊपर की ओर पतला लगभग ५ से ६ फीट लंबा खंभा स्थापित किया जाता है। इसे 'बी' या 'बियो' (स्तंभ) कहते है। बी की लकड़ी साल, बाँज, मेहल आदि किसी की भी हो सकती है। बी से एक आड़ी तथा कमर तक की ऊँचाई पर एक तिरछी लकड़ी जुड़ी रहती है। ये लकड़ियाँ 'बी' को संतुलित रखती है। बी का संतुलन सही बनाये रखने के लिए तिरछी व आड़ी लकड़ी में जोड़ कर पत्थर का भार रख दिया जाता है। जोड़ के कुछ बाहर की ओर निकला हुआ तिरछी लकड़ी का भाग हत्थे का काम करता है। तेल पेरने से पहले बीजों या तिलहनों को भली भाँति सुखा लिया जाता है। फिर सूखे बीजों को कोल्हू के ही पास बने चूल्हे की आँच में हल्का सा भून लिया जाता है। फिर इन भुने बीजों को घानि में डाला जाता है। कोल्हू पर बने हत्थे को गोलाई में घुमाते ही लकड़ी का बी (खंभा) घानि में घूमने लगता है और तेल की धार पनेले से होती हुई नीचे गिरने लगती है। तेल पैरने के लिए दो व्यक्तियों की आवश्यकता होती है। एक कोल्हू घुमाता है और दूसरा तिलहन घाने में डालता जाता है। तिलहनों की पेरी हुई खली को कई-कई बार घाने में डाला जाता है, ताकि उसमें तेल शेष न रहे। खली को बीच-बीच में गरम भी किया है।........

पंकज सिंह महर

........उस पर हल्का सा गरम पानी का छिड़काव भी बीच-बीच में किया जाता है। इस खली को कुमाउनी में 'पिन' कहा जाता है। यह खली कई रुपों में उपयोग में लाई जाती है। खली का उपयोग साबुन बनाने तथा पशुओं के खाद्य के रुप में होता है। च्यूरा की खली बिवाइयों पर लगाने से बिवाइयाँ ठीक हो जाती है। तिल और अखरोट की खली खाई भी जाती है। भाँग की खली की तरी बनती है। इस तरी को 'भंगज्वाव' (भांग का रस) कहा जाता है। नमक, मिर्च मसाले के साथ यह तरी बड़ी स्वादिष्ट होती है। इसकी तासीर गर्म होती है। भाँग की खली को छान कर उसका रस सब्जियों में भी डाला जाता है। भाँग की खली को छान कर उसका रस सब्जियों में भी डाला जाता है। भँगीरा की खली पशुओं के 'दामड़ी' रोग के उपचार में भी काम आती है।
तेल की पिराई दोपहर की धूप में अधिक उपयोगी होती है। कोल्हू द्वारा तेल पिराई का अर्थ अब समाप्तप्राय है। ग्रामीण क्षेत्रों में च्यूरा, अखरोट तथा तिलहनों आदि के बीजों से हाथ से भी तेल निकाला जाता है। च्यूरा के बीजों के छिलके पानी में उबाल कर भी निकाले जाते है। इन सूखे बीजों या तिलहनों को हल्की आँच में गरम कर ओखली या सिल पर कूट-पीस लिया जाता है। फिर लुग्दी को एक-दो घंटे कड़ाके की धूप में रखने के बाद उसे दोनों हथेलियों से दबा कर तेल निकाला जाता है। कभी इस लुग्दी को गरम पानी में डाल कर भी तेल प्राप्त किया जाता है। च्यूरा का तेल घी की भाँति उपयोग में लाया जाता है। इसे पशुओं से प्राप्त घी में भी मिलाया जाता है। इस तेल को 'च्यूरे का घी' कहा जाता है। इस च्यूरे के घी के पराठे अत्यधिक स्वादिष्ट होते है, इसलिए गाँववासी च्यूरे के पेड़ को घी का पेड़ भी कहते है। कम मात्रा में तेल निकालने के लिए यही विधि काम में लाई जाती है। च्यूरा से निकाला तेल स्वाद में तीता और कडुवा होता है। इसके तीतेपन को दूर करने के लिए लगभग ४ लीटर तेल में लगभग ७५० मिलीलीटर मट्ठा डाल कर इस मिश्रण को तब तक उबाला जाता है, जब तक उसमें से मट्ठा उड़ न जाए, इस प्रक्रिया में बीच-बीच में बर्तन से झाग निकालते रहना पड़ता है। जब झाग आना पूरी तरह बंद हो जाता है, तो तेल चूल्हे से उतार लिया जाता है। इस तेल का स्वाद विशुद्ध घी की भाँति होता है। घी की ही भाँति यह दानेदार भी होता है। घी को साफ करने के लिए कभी गरम करते समय उसमें थोड़ा नमक भी डाल दिया जाता है।

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गन्ने का कोल्हू

कुमाऊँ के कई घाटी क्षेत्रों में गन्ने (Saccharum officiarum ) की खेती भी की जाती है। पहले जब आवागमन के साधन कम थे, तब गन्ने की खेती का महत्व अधिक था। लोग अपनी आवश्यकता का गुड़, शीरा, खुदा (साफ शीरा, जो पिया भी जाता है) आदि घर पर ही बना लेते थे। गन्ने के कच्चे रस में चावल पका कर 'रसौट' नामक मीठा खाद्य बनता था। दो प्रकार का गुड़ बनाता था चिमड्या और ठिणक्या। ठिणक्या गुड़ खाँड की भाँति टूट जाता है। चिमड्या गुड़ की दो सेरी और ढाई सेरी भेलियाँ बनती थी, किन्तु अब पर्वतीय क्षेत्र में गन्ने की खेती भी लगभग समाप्तप्राय है।

कुमाऊँ में दो प्रकार के गन्ने के कोल्हू मिलते है- (१) छोटा कोल्हू और (२) बड़ा कोल्हू।

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(१) छोटा कोल् - इस कोल्हू में कल या बोलन तिरछी जोती जाती है। इनका भार कम और आकार लंबा बेलनाकार होता है। दो खंभों में बने खाँचों में फँसा कर उसे खंभे पर लगी चाबी से मजबूती से कस दिया जाता है। यह ऊपर की कल स्थिर रहती है। ऊपर की कल से सटा कर नीचे की कल भी लकड़ी के खंभे के खाँचों में फंसा दी जाती है। नीचे की कल के एक ओर काँटेदार घिर्री होती है, जो ऊपरी कल की घिर्री में फँसी रहती है। ऊपर की घिर्री का संबंध हत्थे से रहता है, जो उस ओर के खंभे से होकर बाहर निकला रहता है। निचली कल के नीचे दोनों खंभों के बीच में एक तिरछी लकड़ी उन्हें संतुलित रखती है। इस तिरछी लकड़ी के बीचोबीच एक चौड़े मुँह वाली टिन की कुप्पी लगी रहती है। उस कुप्पी के नीचे गन्ने का रस एकत्र करने हेतु एक बर्तन रखा जाता है। दोनों कलों के बीच गन्ना डाल कर हत्था घुमाने से निचली कल घूमने लगती है और गन्नों से रस निकल कर कुप्पी से होता हुआ बर्तन में इकट्ठा होने लगता है। कलों को कसने के लिए चाबी की सहायता ली जाती है। गन्नों को कलम की तरह काटा जाता है। जिससे कले उनके सिरों को पकड़ कसे। गन्ने मोटे होने की दशा में हाँसिए से उन्हें बीचोबीच चीर लिया जाता है। कम मात्रा में रस निकालने के लिए प्राय: छोटा कोल्हू उपयोग में लाया जाता है।

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(२) बड़ा कोल्हू - इसकी कले भारी होती है और अपेक्षाकृत लंबाई में छोटी होती है। इसमें कलों को खड़े रख कर जोता जाता है। कोल्हू जोतने के लिए पहले जमान पर साल या बाँज की लकड़ी के दो मजबूत चौकोर खंभे गाड़े जाते है। इन खंभों के बीच में एक चौकोर तिरछी लकड़ी फँसाई जाती है। इसमें दोनों कलों के खाँचों में कलों को निचले भाग में रखा जाता है। कलों और लकड़ी के बीच में पान के पत्ते के आकार का एक पनालेदार टीन का पत्ता रखा जाता है, जिसकी धार के नीचे गन्ने का रस जमा करने का बड़ा बर्तन रखा जाता है। कलों के ऊपर एक छेदयुक्त चौकोर तिरछी कड़ी रखी जाती है। दोनों खड़े खंभों को अच्छी तरह कील दिया जाता है, जिससे कोल्हू हिले नही। इन खड़ी कलों को कसने के लिए एक ओर के खड़े खंभे पर चाबी बनी रहती है। एक कल के ऊपरी उठे भाग में बीच में छिद्रयुक्त यू रोमन (छ्) आकार के लोहे के टुकड़े को फँसाया जाता है। उसके ऊपर बीच में छेद वाली लम्बी तिरछी लकड़ी इस प्रकार रखी जाती है कि लोहे के यू आकार के दोनों सिरे उसमें अच्छी तरह फँस जाएँ। इस लकड़ी के दोनों ओर १५ से २० व्यक्ति बल लगाकर जब उसे घुमाते है, तो दोनों कले घूमने लगती है। इन कलों के बीच में गन्ने फँसा कर उन्हें पेर लिया जाता है। सुरक्षा की दृष्टि से कलों के बाहर से दोनों खंभों पर बीच में छेदयुक्त एक लगभग ४ इंच चौड़ा लकड़ी का तख्ता ठोंक दिया जाता है। इसे 'पटका' कहते है, इसके बीच के छेद से एक व्यक्ति गन्ने कोल्हू में लगाता जाता है, बाकी लोग शीर्ष की तिरछी लकड़ी घुमाते जाते है, इस प्रकार एक कोल्हू में एक दिन में सात-आठ तौले (लगभग ५०लीटर की माप का एक तौला होता है) गन्ने का रस निकल आता है। यह कोल्हू आकार-प्रकार में छोटा-बड़ा हो सकता है। आदमियों के स्थान पर कोल्हू में बैल भी जोते जाते है। बैल जोतने की दशा में शीर्ष की तिरछी लकड़ी से जुआ बाँधा जाता है, जिसे बैलों के कंधों पर रखा जाता है। पीछे से एक आदमी बैलों को हाँकता जाता है। गन्ना पेरने के बाद प्राप्त रस को कलघर (कोल्हूघर) में ले जाकर उबाला और पकाया जाता है। कलघर वस्तुत: गुड़ और शीरा बनाने की भट्टी होता है। इसमें आग जलाने के लिए एक नाली बनी होती है। इस आग की नाली के ऊपर एक साथ सात-आठ तौलों में रस ऊबाला जाता है। ये तौले ताँबे के बने होते है। उबाल आते समय इनमें से अलग-अलग छलनियों द्वारा झाग निकाला जाता है। गुड़ बनाने के लिए लकड़ियों के 'दाबलों' से रस के गाड़े हो जाने पर उसे लगातार घोटा जाता है। गुड़ तैयार होने की पाक का समय आते ही उसे लकड़ी की नाद में उलटकर भेलियों की शक्ल दे दी जाती है।

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कुमाऊँ में तीन प्रकार का गन्ना पाया जाता है - १. काला २. सफेद और ३. पीला। काले व पीले गन्ने के तने मोटे होते है। काले गन्ने का रस व गुड़ थोड़ा फीका होता है। पीला गन्ना कम उगाया जाता है और प्राय: खाने के काम में लाया जाता है। इस 'पौठ्या' गन्ना कहते है। गुड़ प्राय: सफेद (देशी) गन्ने का ही बनता है। दीपावली के दिन गन्ने का तना काट कर पत्तों सहित मंदिर व द्वारा पर रशा जाता है। यह समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। दीपावली में गन्ने के तने (culm ) से लक्ष्मी की मूर्ति भी बनाई जाती है।

उपर्युक्त दोनों प्रकार के कोल्हुओं में मुख्यत: बाँज (Quercxux) leucotrichophora and Q. glaucs, Q. semicarpifolia ), साल (shorea robusta ), सानड़ (Ougeinia oojeinensis ), हरड़ (Terminalia chebula ), साज (Terminalia alata) , कटूँज आदि की लकड़ियाँ प्रयोग में लाई जाती (Castanopsis tribuloides) है।

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ज्वांत-

यह लकड़ी से निर्मित एक यंत्र होता है। यह चूख (बड़ा नींबू- Citrus lirmon ), नींबू, जँभीरा (जामिर- Citrus sinensis ), माल्टा (Citrus hystrix ), संतरा (Citrus reticulata ), दाड़िम (Punica granatum ) आदि फलों से रस निकालने के काम आता है। इन खट्टे फलों का रस निकाल कर उसे गाढ़ा पका कर सुरक्षित कर लिया जाता है।
चूख, नींबू, जँभीरा, दाड़िम आदि का गाढ़ा पका रस 'चूख' कहा जाता है। पकने के बाद इस रस का रंग भूरा या गहरा काला हो जाता है। चूख बेमौसम में खटाई, चटनी, अचार आदि के प्रयोग में लाया जाता है। विभिन्न दालों, सब्जियों तथा मछलयों के सूप में भी चूख की थोड़ी मात्रा डाली जाती है। सादे नमक में चूख मिलाकर चटनी की भाँति इसका उपयोग होता है।

इस लकड़ी के यंत्र-ज्वाँत, को निर्मित करने के लिए भूमि पर सर्वप्रथम बाँज (Quercus leucotrichophor ), फयाँट (Q. glauca ) या किसी भी उपलब्ध लकड़ी के तीन पाये गाड़े जाते है। फिर दो खंभों पर एक तिरछी तख्ती रखी जाती है। इसके तख्ती के बीच में तीसरे पाये के ऊपर बाँज, साल, फयाँट या किसी अन्य उपलब्ध नालीनुमा लकड़ी को स्थापित किया जाता है। इस नालीनुमा लकड़ी के दोनों सिरे बंद होते है तथा इसके मध्य भाग में रस निकलने के लिए छेद बना होता है। इस छेद के ठीक नीचे रस जमा करने के लिए भूमि पर मिट्टी का घड़ा या कोई बर्तन रख दिया जाता है। इस तिखटी का आकार अंग्रेजी वर्णमाला के 'टी' (T) जैसा होता है। नालीदार लकड़ी के सिरे से एक हत्था जुड़ा रहता है, जो बीच में उभरा रहता है और ऊपर की ओर उठा रहता है। इस नाली में नींबू, माल्टा आदि के दाने काट कर डाले जाते है। हत्थे को दबाते ही फलों का रस नाली में बने छेद द्वारा बर्तन में गिरता है। लकड़ी में खुदी यह नाली छेद की ओर ढलवाँ होती है, जिससे रस नाली में नहीं अटकता है, छिलकों और बीजों से भर जाने पर नाली व छेद को साफ कर लिया जाता है। प्राप्त रस को उबाल कर गाढ़ा होने पर बोतलों में रख लिया जाता है।

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रेशा उद्योग

कुमाऊँ में पुराने समय से ही भाँग (Cannabis stivs ), अल (Griardinia palmata) , भकुवा (grewia optiva ), उदाल, रामबाँस (Agava americana ), युका, (Yuca gloriosa ), बाबिल (Eulaliopsis binata ), मालू (Bauhinia bahloo ), मोथा (Cyperus sp. ), मूँज (Saccharum munja ), गेहूँ का नलौ (cilm of Whear Triticum aestivum ), धान का पुआल (Dry straw of Oryzastiva ), कुचि बाजुर वस्तुत: ज्वार (Pennisetum typhoides ) थाकल (Phoenix humilis ) आदि वनस्पतियों से रेशा प्राप्त किया जाता है, इन रेशों से दैनिक उपयोग में आने वाली चीजें जैसे- रस्सियाँ, बोरे, कुथले, ज्यौड़, गल्याँ (जानवरों को बाँधने वाली रस्सियाँ), मौले, गादे, दरी, पट्टी, चटाई, कपड़े, थैलियाँ आदि निर्मित की जाती है। रस्सियाँ बनाने के लिए पहले बाबिल, भाँग आदि के रेशों को थोड़ी देर पानी में भिगो दिया जाता है। भाँग और अल के रेशों के बने बुदलों (कम्बलों), कुथलों एवं रस्सियों, धागों सुतलियों आदि की बहुत अधिक माँग थी। मछली पकड़ने के जाल तो केवल अल के ही बनाए जाते है। भाँग, बाबिल, रामबाँस आदि पतली रस्सियों से धान के पुआल तथा गेहूँ के नलौ (डंठलों) को बाँधकर फीड़े एवं चट्टाइयाँ निर्मित की जाती है। इन फीड़ों को पाली पछाऊँ क्षेत्र में मानिरा या 'मिनरा' कहा जाता था। (पाण्डे १२६, १९३७)। कही-कही पर मालू (bauhinia vahlii ) के छाल से बने डोरों से गेहूँ के नलौ (Clum ) के साथ हल्दी (Curcuma longa ) की सूखी पत्तियों को भी फौड़े में बाँधा जाता है। मोथा घास से मजबूत व सुन्दर फीड़ा (चटाई) बनाई जाती है, इसे भाँग या अन्य रेशों से बिना जाता है। मोथा घास की चटाई की मजबूती के लिए घास को काटकर उसके ऊपर गरम पानी डालते है, पानी के सूख जाने पर चटाई बुन लेते है। बाबिल घास के बहुत सुन्दर एवं टिकाऊ झाडू बनाए जाते है। कभी हत्थे की ओर बिनाई करके उसे कलात्मकता भी प्रदान की जाती है। झाडू बनने के बाद उसमें चावल के दाने डाले जाते है। इसके पीछे यह लोक मान्यता काम करती है कि यह झाडू सदा अनाज बटोरने के ही काम आये। इसके अलावा कुचिया बाजुर, थाकल, मूँज, सीक एवं पाती (Artemisia spp ) के सूखे डंठलों, चीड़ की पत्तियों (leaves of Pinus longifolia ) आदि से भी झाडू बनाया जाता है। रामबाँस के रेशों से मौले, हल्यूण व ज्यूड़ तथा बैलों के सिर पर लगाये जाने वाले फुन्दे भी बनाए जाते है। इसके अलावा पुराने फटे कपड़ों को भाँ के तागे से सिलकर उनके थैले या खोल बनाये जाते थे, जिनमें पुआल, सेमस (Bombax ceiba ) की रुई या पिरुल (Pinus needle ) भर कर गद्दे बनाए जाते थे।

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बांस और रिंगाल उद्योग

पर्वतीय जनपदों में बाँस और किंरगाल (Chimnobambusa Falcati, C jaunsarensis ) पर आधारित कुटीर उद्योग बहुत पहले से ही प्रचलित है। बाँस (Dendrocalamus strictus ) की अपेक्षा किंरगाल से बनी वस्तुएँ अधिक मजबूत व टिकाऊ होती है। इन दोनों से दैनिक एवं कृषि में काम आने वाली अनेक उपयोगी वस्तुएँ निर्मित की जाती है, जिनमें मोस्टा, डोका छापरी डाला, सोजा, टुपर, टोकरी, छत्यूर, कुरा, घुघि या मोड़, छत्री, डलिया, थलिया, पसौल्या, गोदा, पुतका, कंडी, सूपा, कच्यल, हुक्के की नली, दरवाजों व खिड़कियों के पर्दे (झिड़की), खोका, पिचकारी, औजारों के हत्थे, बाँसुरी आदि मुख्य है।
बाँस व किंरगाल से वस्तुएँ निर्मित करने से पहले जंगल से बाँस तथा किंरगाल काट लिया जाता है। इसके हरे पत्ते जानवरों को खिला दिए जाते है। डंठलों से छोटी टहनियाँ काट ली जाती है। प्राय: पाँच वर्ष से कम आयु के पौधों को नही काटा जाता है। सुखने से पहले डंठलों से छिलके उतार लिए जाते है। बाहरी छिलके उतारने के बाद भीतरी डंठलों की खपच्चियाँ उतारी जाती है। सूखी खपच्चियाँ अपेक्षाकृत सस्ती व घटिया मानी जाती है। सूखी खपच्चियों में लचीलापन बनाए रखने के लिए उन पर पानी तथआ गोसूत्र का छिड़काव किया जाता है। खपच्चियों के पतली पट्टियाँ तैयार हो जाने के बाद तानों-बानें के रुप में बुनाई करके वस्तु विशेष का आकार दे दिया जाता है। बाँस व किंरगाल से बनी अक्सर सभी वस्तुएँ इन्ही पौधों के बाहरी छलके व डंठलों की खपच्चियों से बनाई जाती है, परन्तु इनमें मोड़ (घुघि) में बाँस या किंरगाल के अलावा जालीदार बुनाइयों के बीच मालू की पत्तियाँ या भोजपत्र की छाल के टुकड़े लगाए जाते है।

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ऊनी वस्त्र उद्योग-

कुमाऊँ के सीमावर्ती क्षेत्रों में प्राचीन काल से भेड़ पालन का कार्य होता आया है, भेड़ों से प्राप्त ऊन से दस्तकारी एवं ऊनी वस्र निर्माण का कार्य जुड़ा है। भेड़ों के बालों को कैंची से काटकर ऊन एकत्र किया जाता है, फिर ऊन को भली भाँति धोकर सुखा लिया जाता है, सूखे ऊन को तारों के दाँतों वाली पट्टियों से साफ किया जाता है। फिर साफ किए गए ऊन को तकली तथा चरखे से भिन्न-भिन्न मोटाई के तागों में आवश्यकतानुसार कात कर गोले बना लिए जाते है। भारत-तिब्बत मार्ग जब व्यापार के लिए खुला था, तब तिब्बत से पर्याप्त मात्रा में ऊन का आयात होता था। आजकल लुधियाना आदि मैदानी भागों से ऊन की आपूर्ति होती है। भिन्न-भिन्न मोटाई के तागों को राँच तथा अड्डों की सहायता से तानो-बानों के रुप में बुनाई करके कालीन, पश्मीना, कंबल, पंखी, चुटका, दन, थुलमा, गुदमा, डौटी, शाल आदि ऊनी वस्र निर्मित किए जाते है। ऊनी वस्त्रों के निर्माण की २ प्रमुख विधियां हैं....