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Technological Methods Of Uttarakhand - उत्तराखण्ड की प्रौद्यौगिकी पद्धतियाँ

Started by पंकज सिंह महर, April 16, 2008, 11:09:25 AM

Risky Pathak

चारा इक्कठा    करने के साथ साथ लोग गोठ मे पशुओ के लिए पत्याल और पिरूल भी स्वेरते(इक्कठा )  है| पत्याल व पिरूल  गोठ मे बिछाया जाता है, ताकि पशुओ को गोठ मे सोने मे आसानी हो, उन्हें पाथर(पत्थर)  चुभे नही| पत्याल(पिरूल) को इक्कठा करके इनका खात बनाया जाता है| खात बनाने की भी १ शैली होती है|  
Quote from: पंकज सिंह महर on April 16, 2008, 11:39:44 AM
चारा इकट्ठा करने की विधि

पशुओं को विभिन्न प्रकार का चारा उपलब्ध करने के लिए अनेक प्रकार की विधियों से चारे को संरक्षित किया जाता है, जिससे बेमौसम भी पशु चारे से वंचित न रहे। चारा इकट्ठा करने के लिए निम्नलिखित विधियाँ अपनाई जाती है- १. लूटा, २. भराड़, ३. गोठ में चारा एकत्र करना। फसलों की मढ़ाई के बाद धान, कोदो, मादिर (Echinochloa frumentacea ), कौणी (Setaria glacuca ) आदि के पुआल को सुखाकर उसे गठ्ठरों में बाँधकर लकड़ी के खंभे के सहारे चारों ओर शंक्वाकार एकत्रित कर 'लूटा' बना लिया जाता है या जमीन में चार खंभे गाढ़कर उसमें चारे को एकत्रित कर संरक्षित कर लिया जाता है, इसे भराड़ कहते है।


Risky Pathak

सिचाई के लिए  लोहे के पन्ह्याव भी आते है|  जिनसे रोपाई मे गाड़  व गध्यार दूर होने पर भी पानी पहुँच सकता है|   

Quote from: पंकज सिंह महर on April 16, 2008, 11:49:29 AM
जल संचय की तकनीक

पर्वतीय क्षेत्रों में फैले गाँव प्राय: नदियों, गाड़-गधरों के किनारे अवस्थित है। पानी के स्रोतों से दूर बसे गाँवों में सिंचाई तथा पेयजल सुविधा के लिए कई परम्परागत विधियाँ है, इनमें कुछ प्रमुख निम्न है -

(i) बड़ी गूले- (बड़ी गूल बनाते समय यदि कहीं खाई या नाला आए तो वहाँ चीड़ (Pinus iongigola ) या जामुन (Eugenia Jambolana ) के तने को नालीदार बनाकर पानी दूसरे छोर पर पहुँचाया जाता है। (ii ) छोटी गूले- (इनमें भी प्राय: खाई या नाले आने की दशा में चीड़, जामुन या केले के पत्तों (Musa spp. ) की नलियाँ काम में लाई जाती है (iii) धारे (iv) नौले (v) तालाब, (vi ) चुपटौल आदि अन्य विधियाँ है, धारे के पास अधिकतर छायादार वृक्ष जैसे आम (Mangifera indica ), पीपल (Ficus religiosa ), बाँज (Quercus leuotrichophora ), काफल (Myrica esculenta ) च्यूरा (Diploknema butyracea ) आदि लगाए जाते है।


पंकज सिंह महर

Quote from: Himanshu Pathak on April 16, 2008, 12:22:01 PM
सिचाई के लिए  लोहे के पन्ह्याव भी आते है|  जिनसे रोपाई मे गाड़  व गध्यार दूर होने पर भी पानी पहुँच सकता है|   

Quote from: पंकज सिंह महर on April 16, 2008, 11:49:29 AM
जल संचय की तकनीक

पर्वतीय क्षेत्रों में फैले गाँव प्राय: नदियों, गाड़-गधरों के किनारे अवस्थित है। पानी के स्रोतों से दूर बसे गाँवों में सिंचाई तथा पेयजल सुविधा के लिए कई परम्परागत विधियाँ है, इनमें कुछ प्रमुख निम्न है -

(i) बड़ी गूले- (बड़ी गूल बनाते समय यदि कहीं खाई या नाला आए तो वहाँ चीड़ (Pinus iongigola ) या जामुन (Eugenia Jambolana ) के तने को नालीदार बनाकर पानी दूसरे छोर पर पहुँचाया जाता है। (ii ) छोटी गूले- (इनमें भी प्राय: खाई या नाले आने की दशा में चीड़, जामुन या केले के पत्तों (Musa spp. ) की नलियाँ काम में लाई जाती है (iii) धारे (iv) नौले (v) तालाब, (vi ) चुपटौल आदि अन्य विधियाँ है, धारे के पास अधिकतर छायादार वृक्ष जैसे आम (Mangifera indica ), पीपल (Ficus religiosa ), बाँज (Quercus leuotrichophora ), काफल (Myrica esculenta ) च्यूरा (Diploknema butyracea ) आदि लगाए जाते है।


धन्यवाद हिमांशु,
      कि पूरे लेख को आपने पढ़ा और उसमें आंशिक सुधार किये।

पंकज सिंह महर


पहाडों में पानी संग्रहण करने की कुछ पारम्परिक पर वैज्ञानिक विधियां रहीं हैं जो आज लुप्त हो रही हैं। यदि उनके बारे में अच्छे से समझा जाये और उन्हें आज फिर अपनाया जाये तो पानी की समस्याआ से छुटकारा मिल सकता है।

नौले - हममें से कई लोग ऐसे हैं जो नौलों के बारे में बचपन से सुनते आ रहे हैं क्योंकि नौले हमारे गावों के अभिन्न अंग रहे हैं। नौलों का निर्माण भूमिगत पानी के रास्ते पर गड्डा बनाकर चारों ओर से सुन्दर चिनाई करके किया जाता था। ज्यादातर नौलों का निर्माण कत्यूर व चंद राजाओं के समय में किया गया इन नौलों का आकार वर्गाकार होता है और इनमें छत होती है तथा कई नौलों में दरवाजे भी बने होते हैं। जिन्हें बेहद कलात्मकता के साथ बनाया जाता था। इनमें देवी-देवताओं के सुंदर चित्र बने रहते हैं। यह नौले आज भी शिल्प का एक बेजोड़ नमूना हैं। चंपावत के बालेश्वर मंदिर का नौला इसका प्रमुख उदाहरण है। इसके अलावा अल्मोड़ा के रानीधारा तथा द्वाराहाट का जोशी नौला तथा गंगोलीहाट में जान्हवी नौला व डीडीहाट का छनपाटी नौला प्रमुख है। गढ़वाल में टिहरी नरेशों द्वारा नौलों का निर्माण किया गया था। यह नौले भी कलाकारी का अदभुत नमूना हैं। ज्यादातर नौले उन स्थानों पर मिलते हैं जहां पानी की कमी होती है। इन स्थानों में पानी को एकत्रित कर लिया जाता था और फिर उन्हें अभाव के समय में इस्तेमाल किया जाता था।

धारे - पहाडों में अकसर किसी-किसी स्थान पर पानी के स्रोत फूट जाते हैं। इनको ही धारे कहा जाता है। यह धारे तीन तरह के होते हैं। पहला सिरपत्या धारा - इस प्रकार के धारों में वह धारे आते हैं जो सड़कों के किनारे या मंदिरों में अकसर या धर्मशालाओं के पास जहाँ पैदल यात्री सुस्ता सकें ऐसे स्थानों में मिल जाते हैं। इनमें गाय, बैल या सांप के मुंह की आकृति बनी रहती है जिससे पानी निकलता है और इसके पास खड़े होकर आराम से पानी पिया जा सकता है। इसका एक आसान सा उदाहरण नैनीताल से हल्द्वानी जाते हुए रास्ते में एक गाय के मुखाकृति वाला पानी का धारा है। दूसरा मुणपत्या धारा - यह धारे प्राय: थोड़ा निचाई पर बने होते हैं। इनका निर्माण केले के तने या लकड़ी आदि से किया जाता है। तीसरा पत्बीड़या धारा - यह कम समय के लिये ही होते हैं क्योंकि यह कच्चे होते हैं। नैनीताल, पिथौरागढ़, अल्मोड़ा आदि स्थानों में भी इस तरह के धारे पाये जाते हैं।

कूल व गूल - यह एक तरह की नहर होती हैं। जो पानी को एक स्थान से दूसरे स्थान में ले जाने के काम आती हैं। गूल आकार में कूल से बड़ी होती है। इनका इस्तेमाल प्राचीन काल से खेतों में सिंचाई करने के लिये किया जाता है। आज भी यह सिंचाई विभाग में इसी नाम के साथ दर्ज हैं।खाल - खाल वह होते हैं जिन्हें जमीन को खोद कर पानी इकट्ठा किया जाता है या वर्षा के समय पर किसी क्षेत्र विशेष पर पानी के इकट्ठा हो जाने से इनका निर्माण हो जाता है। इनका उपयोग जानवरों को पानी पिलाने के लिये किया जाता है। यह जमीन की नमी को भी बनाये रखते हैं साथ ही पानी के अन्य स्रोतों के लिये भी पानी की कमी नहीं होने देते हैं। यह जल संग्रहण की बेहद आसान लेकिन अत्यन्त उपयोगी विधि है।

ताल-तलैया - किसी भी भूभाग के चारों ओर ऊंची जमीन के बीच में जो जल इकट्ठा होता है उसे ताल कहते हैं। यह ताल कभी कभार भूस्खलनों से भी बन जाते थे और इनमें वर्षा के समय में पानी इकट्ठा हो जाता था। इन तालों में सा्रेतों के द्वारा भी पानी इकट्ठा होता है और वर्षा का पानी भी भर जाता है। ताल का सबसे बेहतरीन उदाहरण है नैनीताल में पाये जाने वाले 12 ताल और पिथौरागढ़ में श्यामला ताल। इन तालों से पानी का प्रयोग पीने के लिये एवं सिंचाई के लिये किया जाता है। तलैया होती तो ताल की तरह ही हैं पर आकार में ताल से छोटी होती हैं।

जल कुंड - यह पानी के वह स्रोत होते हैं जिन्हें धारे, नौलों से रिसने वाले पानी को इकट्ठा करके बनाया जाता है। इनके पानी का इस्तेमाल जानवरों आदि के लिये किया जाता है। कुमाऊं मंडल में इन जल कुंडों की अभी भी काफी संख्या बची हुई है।

चुपटौला - यह भी जलकुंड के तरह की एक व्यवस्था और होती है। इसे उन स्थानों पर बनाया जाता है जहा पर पानी की मात्रा अधिक होती है। इसका पानी भी जानवरों के पीने के लिये इस्तेमाल किया जाता है। छोटा कैलाश और गुप्त गंगा में इस तरह के कई चुपटोले मिल जाते हैं।

ढाण - इनका निर्माण इधर-उधर बहने वाले छोटे-बड़े नालों को एकत्रित करके किया जाता है और उसे तालाब का आकार दे दिया जाता है। इनसे नहरें निकाल कर सिंचाई की जाती है और इन स्थानों पर पशुओं को नहलाने का भी कार्य किया जाता है। ढाण का उपयोग अकसर तराई में ज्यादा किया जाता है।

कुंए - वर्षा के मौसम में पानी को एकत्रित करने के लिये जमीन में काफी गहरे कुए खोदे जाते थे जिनकी गहराई 25 से 35 मी . तक होती थी और इनमें नीचे उतरने के लिये सीढ़ियां बनी रहती थी। पिथौरागढ़ का भाटकोट का कुंआं तथा मांसूग्राम का कुंआं जिनमें 16 सीढ़ियां उतरने पर पानी लाया जा सकता है आज भी जल संग्रहण के रूप में अनूठे उदाहरण हैं। इन्हें कोट का कुंआ भी कहा जाता है।

सिमार - ढलवा जमीन में पानी के इकट्ठा होने को सिमार कहा जाता है। सिमारों का इस्तेमाल भी सिंचाई के लिये किया जाता है। यह भी मिट्टी को नम बनाये रखते हैं और वातावरण को ठंडा रखने में भी अपना योगदान देते हैं।इन प्राचीन जल संग्रहण विधाओं का महत्व सिर्फ इतना भर नहीं है कि इनसे पानी का इस्तेमाल किया जाता है। इनका एक और भी बहुत बड़ा महत्व है और वह है इनका सांस्कृतिक महत्व। इनमें एक भरी-पूरी संस्कृति मिलती है। आज जरूरत है इनके साथ-साथ अपनी संस्कृति को भी बचाने की। हमारी जल संग्रहण की यह प्राचीन विधि आज के युग में भी उतनी ही प्रासंगिक हैं जितनी की उस युग में थी जब इन्हें खोजा गया था। यह परम्परागत विधिया टिकाऊ और कम खर्चीली तो हैं ही साथ ही साथ हमारे वातावरण के लिये भी अनुकूल हैं। इनको संचालित करने के लिये किसी भी तरह की ऊर्जा की जरूरत नहीं पड़ती है और यह हमेशा हर परिस्थिति में काम करती हैं बस जरूरत है तो इन्हें बचाने की। वैसे भी जिस तरह से दिन-ब-दिन पानी की किल्लत होने लगी है और प्रदूषित पानी से जिस तरह प्रत्येक जीव का जीवन असुरक्षित होता जा रहा है तो इन परंपरागत विधियों के बारे में सोचना हमारी मजबूरी भी होगी क्योंकि यह तो तय है कि आने वाले समय में पानी की एक बहुत गंभीर समस्या हम सबके सामने आने वाली है।

हेम पन्त

अनाज नापने का एक पारम्परिक बर्तन, नाली
यह लकड़ी से बना होता है....



हेम पन्त

अनाज भण्डारण का साधन - भकार/भकारी

लकडी से निर्मित भकार अनाज भण्डारण के लिये अब भी पहाडों में प्रयोग होते हैं. वैसे इसका एक उपयोग और भी है, इसके ऊपर एक आदमी आराम से सो सकता है... ;D ;D


खीमसिंह रावत

आनाज भंडारण के तरीके भी समय के साथ साथ बदलते गए भकार के बाद हमारे यहा दुकिर (बांस से बनाया जाता है) का प्रयोग होता था ये १ पिड्ये से 4 पिड्ये तक के होते थे धान, गेहू , जौ, झुंगर मड्दुवा आदि रख कर ऊपर से लीप देते थे / आनाज का उत्पादन कम होने से लोगो ने इसे भी फेक दिया है/ अब बोरी मे ही रखते है किसी किसी के यहा अभी भी मिल जायेगे/

khim

खीमसिंह रावत

मिर्च और अनाज को जिस चटाई मे सुखाते है उसे हमारे यहा पर मानिर कहते है/ बिशेस कर इसे चौमास मे बनते है आकार मे यह अलग अलग होते है जैसे ढाई हाथ चौडा ५ हाथ लंबा /
सामग्री :- पाट, (यह माऊ की बेल की छाल होती है) नहुव, ( गेहू की घास )
साधन : पत्थर के १ या २ किलो वजन के टुकडे, २ मजबूत खंभे, लकडी का गोल ४ या ५ हाथ लंबा १
        हाथ मोटा ( धाच कहते है )
           
             अब कुछ लोग इसे बेच कर पैसा कमाते है/ पाट की समस्या ज्यादा है यह भावर के जंगलो से
        लाना पड़ता है/

khim

हेम पन्त

देहरादून। घराट का आटा खाइए और सेहत बनाइए। जी हां, अगर आप बिजली से चलने वाली चक्कियों और मिलों का आटा खाते-खाते ऊब चुके हैं तो आपके लिए घराट का आटा उत्तम विकल्प है। घराट में पानी के वेग से ढाई से तीन सौ आरपीएम पर पिसने वाले गेहूं के आटे में प्रोटीन समेत अन्य पौष्टिक तत्वों की अधिकता होती है। साथ ही यह पारंपरिक उद्योग गांव के विकेंद्रीकृत विकास की वह कड़ी भी साबित होगा, जिसकी संपूर्ण बागडोर अन्यत्र न होकर सीधे समुदाय या व्यक्ति विशेष के हाथों में निहित है।

घराट परंपरागत ऐसी विधा है, जो जरूरतों को पूरा करने के साथ ही रोजगार की कड़ी से भी जोड़ती है। स्थानीय संसाधनों पर आधारित यह उद्योग गांव व समाज की भागीदारी का उत्कृष्ट उदाहरण है। सदियों से लोग गाड-गदेरों के किनारे स्थित घराटों को गेहूं, मक्का, जौ, मंडुवा, कौंणी से आटा प्राप्त करने के लिए उपयोग में ला रहे हैं। एक दौर वह भी था, जब लोग घंटों तक घराट में अनाज पिसने का इंतजार करते थे। बाद में अन्य साधनों के विकसित होने पर इस विधा का लोप होने लगा। बदली परिस्थितियों में आज एक बार फिर घराट की जरूरत महसूस की जाने लगी है। लोग घराट का पिसा आटा पसंद कर रहे हैं। इसकी वजह बताते हुए शोध संस्था हेस्को की महिला समन्वयक डा.किरन नेगी बताती हैं कि घराट का पिसा आटा आधुनिक चक्कियों के आटे की अपेक्षा कई गुना अधिक पौष्टिक होता है। डा. किरन के अनसार विद्युतचालित चक्कियों व मिलों से 12 सौ से 15 सौ गति चक्र प्रति मिनट पर गरम व जला आटा प्राप्त होता है। इन चक्कियों से चार भागों में चोकर, आटा, मैदा व रफ आटा तैयार किया जाता है। गेहूं के भीतरी हिस्से से मैदा व बाहर के हिस्से से मुर्गी दाना बनता है। गेहूं के इन्हीं दो हिस्सों में प्रोटीन का बाहुल्य है, जबकि घराट में पानी के वेग से 250 से 300 गति पर पिसे आटे में प्रोटीन, वसा, रेशा, कार्बोहाइड्रेट्स, रबर व निकोटिनिक अम्ल, थायमीन, कोलीन फ्लोराइड जैसे रासायनिक संघटक मिलते हैं। वे बताती हैं कि देहरादून में फिलहाल दो उन्नत घराटों में रोजाना दो क्विंटल गेहूं पीसा जा रहा है। इसकी डिमांड दिनोदिन बढ़ रही है। घराट से पिसे आटे से बिस्कुट आदि भी बनाए जा रहे हैं।