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Technological Methods Of Uttarakhand - उत्तराखण्ड की प्रौद्यौगिकी पद्धतियाँ

Started by पंकज सिंह महर, April 16, 2008, 11:09:25 AM

Risky Pathak


पंकज सिंह महर

खेल सामग्री के निर्माण की विधियां

कुमाऊँ में बाल मनोरंजन के लिए विविध प्रकार की खेल सामग्री भी परम्परागत रुप से निर्मित की जाती थी। आधुनिक खिलौनों के प्रचलन तथा खेलों के बदलते रुपों ने परंपरागत खेलों और खेल सामग्री को मैदान से बाहर कर दिया है। ये परम्परागत खेल कई प्रकार के है जैसे- झिटालू की बन्दूक, बाँस की पिचकारी, बाजा, पिपरी, गिल्ली-डंडा, घुर्रा या लट्टू, बाघ-बकरी की गोटें, गाड़ी, अडु, गट्टा या दानी, अंठी, दमुवे, बाल्ली, घुच्ची, राजा-रानी खेल आदि। इन परंपरागत खेलों में कई प्रकार की स्थानीय वनस्पतियाँ प्रयोग में लायी जाती है, जो इस प्रकार है- Princepia Utilis का तना, Leaves of Anaphalis Contorta, Culm of Dendrocalamus Strictus Strictus and Chimnobambusa Spp. and Phragmites karka, Seeds of Magifera indica nad Prunus persica Stem and bark of Pinus longifolia, Acorn of Quercus spp. seeds of Sapindis mukorossi, Musa paradisics, Stem of Quercus spp. etc.

पंकज सिंह महर

कृषि तकनीक

कुमाऊँ में तराई भावर की कृषि का तौर-तरीका प्रदेश के अन्य मैदानी क्षेत्रों की तरह का है, किन्तु कुमाऊँ हिमालय के पहाड़ी भागों में ज्यों-ज्यों ऊँचाई बढ़ती जाती है, त्यों-त्यों खेती के तौर तरीकों में थोड़ी बहुत भिन्नता आ जाती है। घाटियों को छोड़कर सर्वत्र ढालूदार पहाड़ी सीढ़नुमा खेल मिलते है। इन सीढ़ीदार खेतों के किनारे मेढ़ बनाई जाती है। कृषि योग्य अधिकांश भूमि असिंचित है। पुराने समय में झूम खेती में आलू (Solanum tuberisum ) की खेती मुख्य रुप से की जाती थी। सिंचित भूमि पर रबी, खरीफ और जायद की फसल मुख्य रुप से ली जाती है। खरपतवार को नष्ट करने के लिए खेतों में चीड़ आदि की पत्तियाँ (Pine needles ) बिछाई जाती है, जिन्हें सूखने पर जला दिया जाता है। इसे 'आगज्याल' डालना कहते है, फसल बोने से काटने तक कई विधियाँ अपनाई जाती है, जैसे जुताई-बोआई, दनेला लगाना, गुड़ाई, निराई, कटाई, चुटाई/मड़ाई, आदि।
इसके अलावा एक साथ कई फसलें एक खेत से लेते है।  खेत की उर्वरा शक्ति बढ़ाने के लिए खेतों को छ: माह के लिए खाली छोड़ देते है। ले हमेशा कम्पोस्ट या गोबर की खाद का ही प्रयोग किया करते थे (अब रासायनिक खाद भी प्रयोग करते है) तथा जिस खेत में दाल वाली फसलें बोते है, उस खेत में दूसरे साल दूसरी फलस बोते है। गूलों द्वारा पानी लाकर असिंचित भूमि को सिंचाई योग्य बनाया जाता है।

पंकज सिंह महर

जल संचय की तकनीक

पर्वतीय क्षेत्रों में फैले गाँव प्राय: नदियों, गाड़-गधरों के किनारे अवस्थित है। पानी के स्रोतों से दूर बसे गाँवों में सिंचाई तथा पेयजल सुविधा के लिए कई परम्परागत विधियाँ है, इनमें कुछ प्रमुख निम्न है -

(i) बड़ी गूले- (बड़ी गूल बनाते समय यदि कहीं खाई या नाला आए तो वहाँ चीड़ (Pinus iongigola ) या जामुन (Eugenia Jambolana ) के तने को नालीदार बनाकर पानी दूसरे छोर पर पहुँचाया जाता है। (ii ) छोटी गूले- (इनमें भी प्राय: खाई या नाले आने की दशा में चीड़, जामुन या केले के पत्तों (Musa spp. ) की नलियाँ काम में लाई जाती है (iii) धारे (iv) नौले (v) तालाब, (vi ) चुपटौल आदि अन्य विधियाँ है, धारे के पास अधिकतर छायादार वृक्ष जैसे आम (Mangifera indica ), पीपल (Ficus religiosa ), बाँज (Quercus leuotrichophora ), काफल (Myrica esculenta ) च्यूरा (Diploknema butyracea ) आदि लगाए जाते है।

पंकज सिंह महर

समय व मौसम विज्ञान संबंधी तकनीक

पर्वतीय समाज के समय, कृषि, वर्षा तथा मौसम आदि के सम्बन्ध में जानकारी के लिए कोई वैज्ञानिक उपकरण नही मिलते है। विशेषकर मौसम का अनुमान विभिन्न प्रकार के लोक विश्वासों के आधार पर लगाया जाता है। लोक विश्वास लोगों के अनुभव सिद्ध ज्ञान पर आधूत होते है। अत: इनकी उपयोगिता लोक जीवन में विज्ञानवत् एवं निर्विवाद रहती है। इनमें प्रमुख लोक विश्वास निम्न है-

(i) घड़ियों के प्रचलन से पहले कुमाऊँ में ताँबे का समय मापक यंत्र 'जलघड़ी' का प्रयोग होता था। चारों पहरों में ६४ घड़ियाँ होती है, घड़ी की गिनती प्रथम पहर से होती है।
(ii) शुक्रतारे के क्षितिज पर प्रकट होने पर रात खुल जाती है।
(iii ) मुर्गा बाँग देने लगे तो रात खुलने का संकेत होता है।
(ब) मौसम आदि का अनुमान
(i) बाँज (Accipiter nisus ) पक्षी आकाश में उड़ते-उड़ते यदि एक स्थआन पर रुक जाए तो वर्षा होने का अनुमान लगाया जाता है।
(i i ) गौतार (Spus affinis ) पक्षियों की चहल-पहल बढ़ जाए, तो वर्षा होने का अनुमान लगाया जाता है।
(i ii ) चींटियाँ अपनी बाँबी से अण्डों को लेकर एक कतार में बाहर निकले, तो वर्षा होने का अनुमान लगाया जाता है।
(i v ) पशु जंगल में पूँछ उठाकर भागने लगे, तो वर्षा का अनुमान लगाया जाता है।
(v ) यदि चील (Gyps himlayensis ) आकाश में उड़ते-उड़ते "सरुल दिदी पाणि-पाणि" बोले और लमपूछिया (Cissa sp. ) पक्षी 'द्यो काका पाणि-पाणि' बोले तो वर्षा होने का अनुमान लगाया जाता है।
(vi ) आकाश में यदि इन्द्र-धनुष (धनौला) दिखलाई पड़े तो वर्षा रुकने का संकेत माना जाता है।
(vii ) पूर्व व उत्तर दिशा में बिजली चमके तो वर्षा होती है।
(viii ) कुछ विशेष प्रकार की दीमकें (धनपुतली) पंख लग जाने पर उड़ने लगती है, तो धानों की बुआई प्रारम्भ कर देनी चाहिए।
(i x ) पूस में बर्फ पड़ने पर गेहूँ की फसल चौपट हो जाती है, परन्तु माघ से बर्फ पड़ने पर गेहूँ की फसल अच्छी होती है।

पंकज सिंह महर

मौन पालन उद्योग

पर्वतीय क्षेत्र की परम्परागत रुप से मौन पालन होता है। मधुमक्खियों के घरौंदे दो प्रकार से बनाए जाते है- (i) मकान की दीवारों में जाले (आले) बनाकर, (i i ) किसी पेड़ के तने को खोखला कर और उसे दोनों ओर से बन्द कर बॉक्सनुमा आकार देकर। आलों में बाहर की ओर मधुमक्खियों के आने-जाने के लिए छेद छोड़ देते है तथा भीतर की ओर व आले के छत पर अक्सर साल (Sjoers tobudya ), साज (Terminalia lalata ), चीड़ (Pinus longifolia ), जामुन (Eugenia jambolana ) की तख्ती लगाई जाती है। मधुमक्खियाँ आले के अन्दर डालने से पहले आले के अन्दर सम्यौ (Valerikia hatamansu और V. Wallichii ) की जड़ से बनी धूप को जला देते है। बॉक्स विधि में पेड़ के तने के खोखल में मधुमक्खियाँ डाल दी जाती है। फिर खोखल को दोनों ओर से चीड़ के तख्तों से बन्द कर देते है। इसे 'ढ़ाड़ा' कहा जाता है। ढाड़ा के बीचोबीच में मधुमक्खियों के आने-जाने के लिये दो छेद बने होते है, ढाड़ा प्राय: जामुन की लकड़ियों का बनाया जाता है।

पंकज सिंह महर

चर्म उद्योग

पुराने समय में कुमाऊँ में चमड़े के शोधन, चमड़े के वस्तुओं के निर्माण तथा चमड़े की रंगाई का कार्य परम्परागत रुप से किया जाता था। मृत पशुओं की खालें निकालकर उन्हें पूरे फैलाव से जमीन में खींचकर लकड़ी की कीलें ठोकी जाती थी। चमड़े को कमाने तथा रंगाने के लिए पानी से भरे गड्ढों का प्रयोग किया जाता था। कई बार पानी में धोने, भिगोने, सुखाने तथा रंगने के बाद दो तीन माह में खाल चमड़े के रुप में उपयोग में आती थी। चमड़ा रंगने के लिए किलमोड़ा (Derderis Spp. ) और काफल (Myrica esculenta ) की छाल का घोल बनाकर चमड़े के एक ओर रगड़ा जाता था।
इसके अतिरिक्त कुमाऊँ में काष्ठ उद्याग, लौह एवं ताम्र उद्योग, आभूषण निर्माण तथा मिट्टी के बर्तनों के निर्माण की भी कई परम्परागत पद्धतियाँ प्रचलित है। इनमें कई पारम्परिक पद्धतियाँ आज समाप्तप्राय हो गई है। समय के साथ-साथ आवश्यकताओं में वृद्धि तथआ आरामदायक ढंग से जीवन-यापर करने का प्रभाव ग्रामीण अंचलों में भी पड़, जिससे इन परम्परागत प्रौद्योगिकी पद्धतियों पर बहुत बुरा असर पड़ा है। यदि समय रहते इनमें से उपयोगी विधियों को लघु एवं वृहद् उद्योगों के रुप में उन्नत तकनीक द्वारा विकसित और परिष्कृत कर संरक्षित न किया गया, तो यह प्राचीन तकनीकी ज्ञान इस क्षेत्र से सदा के लिए विलुप्त हो जायेगा।

पंकज सिंह महर

इसके अतिरिक्त उत्तराखण्ड में काष्ठ उद्याग, लौह एवं ताम्र उद्योग, आभूषण निर्माण तथा मिट्टी के बर्तनों के निर्माण की भी कई परम्परागत पद्धतियाँ प्रचलित है। इनमें कई पारम्परिक पद्धतियाँ आज समाप्तप्राय हो गई है। समय के साथ-साथ आवश्यकताओं में वृद्धि तथआ आरामदायक ढंग से जीवन-यापर करने का प्रभाव ग्रामीण अंचलों में भी पड़, जिससे इन परम्परागत प्रौद्योगिकी पद्धतियों पर बहुत बुरा असर पड़ा है। यदि समय रहते इनमें से उपयोगी विधियों को लघु एवं वृहद् उद्योगों के रुप में उन्नत तकनीक द्वारा विकसित और परिष्कृत कर संरक्षित न किया गया, तो यह प्राचीन तकनीकी ज्ञान इस क्षेत्र से सदा के लिए विलुप्त हो जायेगा।
       पर्यावरण सन्तुलन बनाये रखने में सहायक जो पारम्परिक प्रौद्योगिकी तकनीक उपयोगी एवं लाभकारी सिद्ध हो सकती है, उन पद्धतियों को इस क्षेत्र की उपलब्ध खनिज तथा वन सम्पदा के आधार पर परिवर्धित कर कार्यसाधक बनाया जाय तथा उन्हें लघु एवं वृहद् उद्योगों के रुप में विकसित किया जाय। इस क्षेत्र के सम्यक् विकास की दृष्टि से ऐसा किया जाना अपरिहार्य है। इससे स्थानीय रुप से उपलब्ध कच्चे माल से सम्बन्धित लघु उद्योग धन्धों का विकास तो होगा ही, साथ ही हम प्रदूषण रहित पर्यावरण को जन्म दे पायेगें। इन लघु उद्योगों द्वारा निर्मित की गई विभिन्न वस्तुओं के विपणन की भई समुचित किया जाना नितान्त आवश्यक है। ये लघु तथा कुटीर उद्योग पर्वतीय क्षेत्र में व्याप्त बेरोजगारी को भी कुछ हद तक कम करने में कारगर सिद्ध होंगे।

Risky Pathak

१ संसोधन:  पान - चक्की  तो सिर्फ़ चोमास (वर्षा ऋतु ) के मौसम मे ही चलाई जाती है| या फ़िर जब गार(नदी )  मे पानी अधिक मात्रा मे हो|

और वक़्त पहाडो  मे जतार चलाया जाता है| जतार के २ पाट होते है| नीचे वाला पाट फिक्स होता है| ऊपर वाला घुमाने के लिए  होता है| ऊपर वाले पाट मे साइड मे १ लकड़ी का हेंडल  होता है| जिसके  द्वारा  जतार चलाया   जाता है| ऊपर वाले पाट के बीच मे १ छेद होता है जिसमे गेहू आदि डाले जाते है| पीसा हुआ आटा दोनों पाटो  के बीच के साइड से निकलता  है| 

अब जतार करीबन करीबन विलुप्त हो चुका है|


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Quote from: पंकज सिंह महर on April 16, 2008, 11:12:28 AM
पनचक्की (घराट/घट)

पर्वतीय क्षेत्र में आटा पीसने की पनचक्की का उपयोग अत्यन्त प्राचीन है। पानी से चलने के कारण इसे "घट' या "घराट' कहते हैं। पनचक्कियाँ प्राय: सदानीरा नदियों के तट पर बनाई जाती हैं। गूल द्वारा नदी से पानी लेकर उसे लकड़ी के पनाले में प्रवाहित किया जाता है जिससे पानी में तेज प्रवाह उत्पन्न हो जाता है। इस प्रवाह के नीचे पंखेदार चक्र (फितौड़ा) रखकर उसके ऊपर चक्की के दो पाट रखे जाते हैं। निचला चक्का भारी एवं स्थिर होता है। पंखे के चक्र का बीच का ऊपर उठा नुकीला भाग (बी) ऊपरी चक्के के खांचे में निहित लोहे की खपच्ची (क्वेलार) में फँसाया जाता है। पानी के वेग से ज्यों ही पंखेदार चक्र घूमने लगता है, चक्की का ऊपरी चक्का घूमने लगता है।


हेम पन्त