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Technological Methods Of Uttarakhand - उत्तराखण्ड की प्रौद्यौगिकी पद्धतियाँ

Started by पंकज सिंह महर, April 16, 2008, 11:09:25 AM


Devbhoomi,Uttarakhand


sanjupahari


Devbhoomi,Uttarakhand

Quote from: devbhoomi on July 26, 2009, 06:46:07 PM


हवा में हो रहे घराट सुधार के दावे

पुरोला (उत्तरकाशी)। रवांई घाटी में घराट सुधार के तमाम सरकारी दावे खोखले साबित हो रहे हैं। घराटों से ऊर्जा उत्पादन तो दूर गेहूं पीसने का परम्परागत सिलसिला भी अब धीरे -धीरे समाप्ति की कगार पर है।

विकासखंड पुरोला में कभी गाड़ गदेरों में 32 घराट हुआ करते थे, लेकिन अब ढकारा में 2, सांखाल और मटियालोड़ में एक-एक और सरबडियार में 2 घराटों में पिसाई का काम हो रहा है। इसी प्रकार मोरी प्रखंड में कभी आराकोट, पंचगाई, बडासू, फत्तेपर्वत, अडोर पटटी में 52 घराट हुआ करते थे। इनमें अब आराकोट पट्टी सहित सांदरा, नैटवाड और मोताड़ में एक-एक, खरसाडी, भद्रासू, कुमणाई में 9 तथा पर्वत क्षेत्र में 7 घराट ही चल रहे हैं।

इसके अलावा ठडियार क्षेत्र के सर, किमडार, पोन्टी, लेवटाड़ी व मोल्टाड़ी में पांच घराटों में से केवल तीन ही काम कर रहे हैं। जैसे-जैसे विद्युत लाइन गांवों तक पहुंच रही है, घराटों पर बंदी की मार पड़ रही है।

विद्युत संचालित चक्की स्थापित होने से घराट की उपयोगिता सिमटती जा रही है। उरेडा के जिला परियोजना प्रबन्धक बंदना जनवेजा का कहना है कि घराटों के आधुनिकीकरण के लिए उत्तरा घराट विकास समिति का गठन किया गया है।

अभी तक उरेडा के के तहत पुरोला विकास खंड के स्वील और नौगांव में 5 घराटों के आधुनिकीकरण पर काम चल रहा है। इसके अलावा मोरी प्रखंड से एक भी प्रस्ताव नहीं मिला। क्षेत्र पंचायत प्रमुख लोकेन्द्र सिंह रावत का कहना है कि कभी घराट गामीणों के लिए रोजगार का साधन हुआ करते थे, लेकिन अब घराट खत्म होते जा रहे हैं।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


उत्तरकाशी, जागरण कार्यालय: पहाड़ में पायी जाने वाली कंटीली झाड़ी किनगोड़ आमतौर पर खेतों की बाड़ के लिए प्रयोग होती है। आपको यह जानकर हैरानी होगी कि यह औषधीय गुणों से भी भरपूर है। इसका व्यावसायिक उपयोग किया जाए तो यह आय का जरिया भी बन सकता है। किनगोड़ का पेड़ फल से लेकर जड़ तक अपने में कई औषधीय गुणों को समेटे हुए है। शुगर जैसी बीमारी का तो यह रामबाण इलाज है।
समुद्रतल से 1200 से 1800 मीटर की ऊंचाई पर उगने वाले किनगौड़ का वानस्पतिक नाम बरबरीस एरिसटाटा है। बरबरीन नामक रसायन की मौजूदगी के चलते इसका रंग पीला होता है। एंटी डायबेटिक गुण के चलते यह पौधा बाकि औषधीय पादपों से थोड़ा अलग है। शुगर से पीड़ित रोगियों के लिए यह रामबाण औषधी है। किनगौड़ की जड़ों को पानी में भिगोकर रोज सुबह पीने से शुगर के रोग से बेहतर ढंग से लड़ा जा सकता है। साथ ही यह पानी पीलिया रोग से लड़ने में भी काफी मदद करता है। इसके अलावा किनगौड़ के पौधे पर मानसून के दौरान लगने वाले लाल काले दाने भी औषधीय गुणों से भरपूर होते हैं। फलों का सेवन मूत्र संबंधी बीमारियों से निजात दिलाता है। इसके फलों में मौजूद विटामीन सी त्वचा रोगों के लिए भी फायदेमंद है। वहीं इसके तने का पीला रंग चमड़े के रंग को भी रंगने के काम में लाई जाती है। हालांकि कई हिस्सों में इसके जड़ों को दोहन किया जा रहा है। स्थानीय लोगों को इस पेड़ के औषधीय गुणों की जानकारी न होने से बाहरी क्षेत्रों के ठेकेदार इसकी जड़ों को लेकर जाते हैं। रैथल फार्म हाऊस में भी साल 2007-08 में दिल्ली निवासी एक ठेकेदार ने किनगोड़ की जड़ों को खोद कर मोटा मुनाफा कमाया था।
'दारू हल्दी जिसे स्थानीय भाषा में किनगोड़ कहा जाता है, एक जबरदस्त एंटी डायबेटिक पौधा है। साथ ही इसमें अन्य औषधीय गुण भी है। प्रशासन चाहे तो लोगों को इसे रोपने के लिए प्रेरित कर इसके लिए एक अच्छा बाजार तैयार किया जा सकता है। इससे यह आय का जरिया भी बन सकता है।'
डॉ. जीके ढींगरा, प्रोफेसर वनस्पति विज्ञान, पीजी कॉलेज उत्तरकाशी।
http://www.jagran.com/uttarakhand/uttarkashi-9195740.html