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Technological Methods Of Uttarakhand - उत्तराखण्ड की प्रौद्यौगिकी पद्धतियाँ

Started by पंकज सिंह महर, April 16, 2008, 11:09:25 AM

पंकज सिंह महर

१. अड्डा द्वारा बुनाई

दन (कालीन) तथा आसन बुनने के लिए अड्डों का उपयोग होता है। अड्डा वस्तुत: लकड़ियों (बल्लियों) का आयताकार या वर्गाकार चौखट होता है। इसकी लंबाई-चौड़ाई सामान्यत: ६-१/२X ४-१/२ फीट होती है, किन्तु यह इससे छोटा-बड़ा भी हो सकता है। इसमें दो तिरछी बल्लियों के ऊपर दो खंभे स्थाई रुप से गढ़े होते है। दो तिरछी बल्लियों के आधार पर दोनों के ऊपर बैठने के लिए खाँचों पर एक बल्ली का टुकड़ा रखा रहता है। जमीन से ४ अंगुल ऊपर दोनों खड़े खंभों के खाँचों में एक षट्कोणात्मक रुप में गोल लकड़ी फँसी रहती है। इसमें लम्बवत् छेद बने रहते है, जिनमें रस्सियाँ डालकर उसे घुमाते या कसते है। इस लकड़ी के दोनों ओर से दो-दो तागों के खड़े ताने ठीक ऐसे ही खंभों के ऊपर लकड़ी पर फँसे रहते है। एक गोल डंडे से इन तागों के कस दिया जाता है, कसावट जितनी अधिक होती है, बुनाई उतनी अधिक आती है। इन तानों के बीच में किंरगाल का एक बीच से फटा डंडा व सूत फँसा रहता है। इससे नीचे प्रत्येक ताने से फँसा कर एक बाना भी किंरगाल के पतले डंडे पर लिपटा रहता है, जो ऊपर-नीचे किया जाता है। इसमें बानों के तागे फँसा कर बुनाई पर बाहर लगभग १ या १-१/४ से.मी. झुलाया जाता है। ग्राफ पेपर सामने रखकर कालीन में तदनुरुप डिजाइन बनाया जाता है। लोहे के बने पंजे में लोहे के मुड़े हुए दाँत लगे होते है। ३-४ इंच बुनाई हो जाने पर लटके हुए ऊन के तागों को खुक्यार (उल्टी धार वाली छोटी हँसिया) से काट दिया जाता है। ऊन की कटाई को बराबर करने के लिए लोहे की चिमटीनुमा कैंची दोनों हाथों से ऊन पर चलाई जाती है। इससे ऊन बराबर में कटता है तथा उसमें सफाई आती है। इस विधि से कुछ थुलमा भी अड्डे में बुनते है। थुलमे में चार बाने सूत तथा एक बाना मोटे ऊन को क्रम से रखकर बुनाई की जाती है। पर अड्डे में दन व आसन ही अधिकतर बुने जाते है। कुछ लोग ऊन के तागे की कताई और रंगाई भी स्वयं करते है, किन्तु अधिकांशत: अब कता व रंगा तागा प्रयोग में लाया जाने लगा है। एक ६फीट लंबा ४फीट चौड़ा दन बनने में लगभग १० से १५ दिन तक लग जाते है। कालीन (दन) में इच्छानुरुप कलात्मकता लाने के लिए विविध प्रकार के रंगों का प्रयोग किया जाता है। एक आसन सामान्यत: १-१/२X १-१/२फीट तथा सोफे की लम्बाई-चौड़ाई, ५X १-१/२फीट का होता है। इसे बुनने के लिए छोटे या कम चौड़े अड्डे से ही काम चल जाता है। माँग व आवश्यकतानुसार कालीन या दन आकार-प्रकार में छोटे-बड़े भी हो सकते है। धारचूला और मुनस्यारी में कालीन निर्माण की अलग-अलग शैलियाँ है।

पंकज सिंह महर

रांच द्वारा बुनाई

राँच भी अड्डे के समान ही बुनाई की लकड़ी की एक मशीन है। कुमाऊँ क्षेत्र में दो प्रकार के राँच देखने को मिलते है- १. विशुद्ध परंपरागत राँच तथा २. परिवर्धित राँच को बुनाई की मशीन भी कहा जाता है। यह प्राय: उद्योग केन्द्रों या बुनकर केन्द्रों में उपयोग में लाया जाता है।
सुदूर ग्रामीण अंचलों में परंपरागत राँच ही बुनाई में उपयोग में लाया जाता है। यह लकड़ी के चार या छ: खंभों पर टिका लगभग ५ से ६फीट चौड़ा तथा ६ से १२फीट लंबा चौखटा या छ: खटा होता है। इसमें बीच में फँसी दो या अधिक गोल ##ंगिाल की लकड़ियों में तानों को लपेटकर लम्बाई में दुहरे कर फैलाते है। फिर एक-एक ताना छोड़कर बाना फँसाया जाता है। ताना बाने के रेशे के ऊपर एक नीचे क्रम-क्रम से फँसता है। फिर लकड़ी की या लोहे की कैंची से बानों को कस कर दबा देते है। तानों-बानों को फटकारने या दुरस्त करने के लिए लकड़ी के चौखट की चौड़ाई के बराबर लम्बे पट्टे काम में लाये जाते है। कभी बानों को कसने के लिए सारे तानों को समेटकर कमर पर लपेटकर पीछे की ओर जोर लगाकर खींचा जाता है। अलग-अलग आकार-प्रकार के वस्र बुनने के लिए अलग-अलग आकार व नाप के राँचों का उपयोग किया जाता है। राँच में कम्बल, थुलमा, पट्टू, चुटका, कालीन, पंखी, पश्मीना (शाल) आदि वस्र बुने जाते है।
परिस्कृत राँच का चौखटा लगभग ६फीट चौड़ा, ६फीट लम्बा तथा ६फीट ऊँचा रहता है। यह इस नाप से छोटा-बड़ा भी हो सकता है। इसकी लंबाई व गोलाई (ऊँचाई) में ताने बिछे रहते है। ये ताने मध्य भाग में लगभग १-१/२फीट की ऊँचाई पर २ से ४ बत्तों पर लिपटे हुए तागों में फँसे रहते है। प्रत्येक बत्ते पर एक घिर्री रहती है, जिससे बानों का तागा तानों में फँसता जाता है। चौखटे पर बुनाई को कसने के लिए लकड़ी के पट्टे व पेंच होते है, चौखटे के पृष्ठ भाग में कुर्सीनुमा बैठने का स्थान बना रहता है। कभी कुर्सी को अलग से रखकर भी बैठा जाता है। लकड़ी के ऊपरी बत्तों का संबंध नीचे पैडलों से होता है। मशीन में जितने बत्ते होते है, उतने ही पैडल होते है। पैडलों पर पाँव का दबाव पड़ते ही बत्तों द्वारा घिर्री का तागा बानों के रुप में तानों में फँस जाता है। सूत और ऊन के तागों का अलग-अलग वस्रों की बुनाई में भिन्न-भिन्न अनुपात रहता है। तागों को लपेटने के लिए लकड़ी की नलकियों का प्रयोग किया जाता है, तागे काटने के लिए खुक्यार या कैंची का प्रयोग किया जाता है। डिजाइन निकालने के लिए ग्राफ पेपर पर बने डिजाइन को सामने रखा जाता है।

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औषधि निर्माण उद्योग

पर्वतीय क्षेत्रों में परंपरागत रुप से औषधीय वनस्पतियों से कई प्रकार की दवाइयाँ बनाई जाती है। फलों और बीजों से बनने वाली कुछ दवायों सुखाकर भी रखी जाती है। पत्तियों, फलों व बीजों को पीसकर कुछ दवायें ताजी भी प्रयोग में लाई जाती है। वैद्य दवाइयों को सिल-बट्टे र पीस या घिस कर या खरल में मूसली से कूट कर दवायें तैयार करते हैं। कुछ पेशेवर वैद्य दवाइयों को पहले से तैयार करके रखते है। दवाई के काम आने वाले पक्षियों के अण्डे गोबर से ढक कर सुरक्षित रखे जाते है। दवाई के काम आने वाला जानवरों का मांस धूप में सूखाकर या माला बनाकर सुरक्षित रखा जाता है। सींग आदि के छोटे-छोटे टुकड़े सुखाकर रखे जाते है। कुछ वनस्पतियों, उनके फलों और बीजों का चूर्ण बनाकर बोतलों या कपड़े में लपेटकर रखा जाता है।

पंकज सिंह महर

पेड़-पौधों की प्रवर्द्धन विधियाँ

कुमाऊँ में पेड़-पौधों के प्रवर्द्धन की कई परंपरागत विधियाँ है। जिनमें निम्नलिखित प्रमुख है- १. क्यारियाँ, २. बिन (गीली क्यारी), ३. भूसा रोपण, ४. कलम रोपण, ५. दब्बा लगाना, ६. कशारोपण आदि। क्यारियाँ बिन एवं भूसा रोपण द्वारा प्रवर्द्धन मुख्यत: सब्जियों दालों आदि के लिए किया जाता है जबकि कलम रोपण, दब्बा लगाना एवं कशारोपण गन्ना, गुलाब, अप्रैलिया, बाड़, गुड़हल एवं विभिन्न फलदार पेड़-पौधों के लिए किया जाता है।

पंकज सिंह महर

तम्बाकू निर्माण

कुछ समय पूर्व तक पहाड़ों में तम्बाकू की भी खेती की जाती थी। तम्बाकू की कलियों और कोमल पत्तियों को तोड़कर, उन्हे विशेष रुप से सैत-सुखाकर ओखली में कूटकर धूसा बनाया जाता था। इस धूसे में आवश्यकतानुरुप सीरा या गुड़ मिलाकर मीच लिया जाता था। अब बाजार में उपलब्ध तम्बाकू के अधिक प्रचलन के कारण तम्बाकू निर्माण समाप्ति की ओर है।

पंकज सिंह महर

चारा इकट्ठा करने की विधि

पशुओं को विभिन्न प्रकार का चारा उपलब्ध करने के लिए अनेक प्रकार की विधियों से चारे को संरक्षित किया जाता है, जिससे बेमौसम भी पशु चारे से वंचित न रहे। चारा इकट्ठा करने के लिए निम्नलिखित विधियाँ अपनाई जाती है- १. लूटा, २. भराड़, ३. गोठ में चारा एकत्र करना। फसलों की मढ़ाई के बाद धान, कोदो, मादिर (Echinochloa frumentacea ), कौणी (Setaria glacuca ) आदि के पुआल को सुखाकर उसे गठ्ठरों में बाँधकर लकड़ी के खंभे के सहारे चारों ओर शंक्वाकार एकत्रित कर 'लूटा' बना लिया जाता है या जमीन में चार खंभे गाढ़कर उसमें चारे को एकत्रित कर संरक्षित कर लिया जाता है, इसे भराड़ कहते है।

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साबुन निर्माण

वर्तमान साबुन और डिटर्जेन्ट पाउडर के प्रचलन से पूर्व कुमाऊँ में परंपरागत रुप से विभिन्न प्रकार की वनस्पतियों तथा उनके फलो, बीजों आदि से साबुन बनाया जाता था। यह नहाने, सिर धोने और कपड़ा धोने के काम में आता था। रीठा (Sapindus mukorossi) , कुछ तैलीय पदार्थों- सरसों, च्यूरा (Diploknema butyracea ), तिल आदि की खली, तुन (Toona ciliata ) के छिलकों की राख, चावलों का माँड बेसन, अटन (Parietaria deilis ), भौरड़ (Ipoea nil) , भीमल (Grewi aoptiva ), रामबाँस (Agave ameriacana ), आँवला, कोदो के भूसे की राख और कभी-कभी मट्ठा आदि चीजे साबुन के रुप में प्रयोग की जाती थीं।

पंकज सिंह महर

धूप निर्माण

कुमाऊँ में प्राचीन काल से ही पाती (Artemisia spp. ), सम्यौ (Valariana jatamansi and V vallichii ), नैर (Skimmia laureola ), गुग्गलु (Tenasutun longifolium ) के पौधों को धूप बनाने में प्रयोग किया जाता है। कुछ लोग धूप बनाते समय सुगंध के लिए गोला, जौ, तिल तथा मोरपंखी की पत्तियों को भी इसमें मिला देते थे।

पंकज सिंह महर

नदी पार करने की विधियां

प्राचीन काल में पुलों के अभाव में नदियों को पार करने के लिए लंबे लठ्ठों रस्सियों आदि की सहायता ली जाती थी। तैराकी के लिए चमघोड़ा और तुम्बी विधियाँ प्रचलित थीं।
(i ) चमघोड़ा विधि से (भैंस के कटिया/कटरे की खाल से)- चमड़े का हवा भरा थैला बनाया जाता था। इसे चमघोड़ा कहा जाता था। इन घोड़ों को बगल में दबाकर नदी पार की जाती थी।
(ii ) तुम्बी विधि (गोल लौकी या तुम्बियों)- को मजबूत डोरे से कमर में बाँधकर नदी पार करते थे।
(iii ) झूला विधि
(iv) लकड़ी का पुल आदि साधन भी नदी पार करने में उपयोग में आते है।

पंकज सिंह महर

आखेट की विधियां

कुमाऊँ में पशुओं, पक्षियों तथा जलचरों की आखेट की कई परंपरागत विधियाँ प्रचलित है। इन विधियों में गुलेल, वंशी, जाल, गोदा, सुर्का, मैड़, गड्ढा, जिबाला, चूहेदानी, धुँआ लगाना आदि आखेट के मुख्य साधन है। आखेट की अन परम्परागत विधियों में मुख्यत: बाँज (Auercus spp. ), पय्याँ (Prunus Carasoides ), घिंघारु (Pyracantha crenulata ), अल (Girardinia palata ), केला (Musa paracantha ), cktjk (Pennisetum typhoides) , ज्वार (Sorghum vulgare ), सैलिक्स (Salix sp. ), रामबांस (Agave americacana ), रवीना (Sapium insigne ) आदि पौधों का प्राय: उपयोग किया जाता है।