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Today's Thought - पहाड़ के मुहावरों/कथाओं एवं लोक गीतों पर आधारित: आज का विचार

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, May 08, 2008, 02:02:13 PM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

अपणि-बोली-भाषा का बगैर न त अपणि उन्नति हवै कद और न ही समाज की। जु समाज अपणि-बोली भाषा-अर-रिती-रिवाज से शर्म करदू ऊ वैकू पतन कू सबसे बडू कारण छ।

पंकज सिंह महर


पंकज सिंह महर

गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण, गैरसैंण,

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


"तेरी हाथो घर की लाज, मेरी हाथ देश कि
दिना रिये राजी खुशी, अपुन घर की"

बाटा घाटा मे, ओह सुवा झन रोये तो झन

Oh Meri Kamala to Rooye Naa..



एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


आज का विचार नरेंदर सिह नेगी के माया को मुडारो एल्बम से

देव भूमि को नू (नाम) बदली
बिजली भूमि करा देली
उत्तराखंड की धरती कै
डाम ले डामाली दी

इस गाने मे बताया गया जी जिस दंग उत्तराखंड पर जगह डाम बन रहे है उससे यहाँ के जनता को किस प्रकार का खतरा है !

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720



आज का विचार यह मुहावरे के रूप में

" पितरो करी नातर कै लागो "

मतलब :  पितरो का किया पुण्य, उनके आने वाली कई पीड़ीयो के फलदायक होती है !

हलिया


हेम पन्त

ये Repeat हो गया... लेकिन बहुत अच्छी सीख है, जितनी बार मिले उतनी ही अच्छी बात है.

Quote from: एम् एस मेहता /M S Mehta on February 05, 2009, 11:08:11 AM


आज का विचार यह मुहावरे के रूप में

" पितरो करी नातर कै लागो "

मतलब :  पितरो का किया पुण्य, उनके आने वाली कई पीड़ीयो के फलदायक होती है !


Quote from: H.Pant on June 19, 2008, 02:22:13 PM
पितर कि कमै, नातर लिजि..

बुजुर्गों/पुरखों द्वारा किये गये अच्छे-बुरे कर्मों का फल उनकी आने वाली पीढी को मिलता है

Lalit Mohan Pandey

ऊना रया जाना रया, ये पहाड़का गुन गाना रया
(जाते हुए मुसाफिरू को देखकर पहाड़ की एक महिला के मुह से निकलते हुए बोल)