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उत्तराखंड पर कवितायें : POEMS ON UTTARAKHAND ~!!!

Started by Dinesh Bijalwan, August 05, 2008, 02:18:42 PM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Garhwali Classes "गढ़वाली छुई"
June 24
छोरा फेशबुक चैट पर........
छोरा- हलो।
छोरी- हेलो को चा?
छोरा- जै थे तु खिज्याणी छै।
छोरी- दिखणू क्य छै?
छोरा- तेरी मुखडी लठ्याली।
छोरी- क्य चाणू छै?
छोरा- माँ कसम
तेरी माया मिली जा बस।
छोरी- तेरू दिमाक ता ठीक चा?
छोरा- ब्याली रिपेयर कैरी लौँ पट्ट
500 Rs लगीन ये पर।
छोरी- बहुत पछतैल्यू।
छोरा- क्वी बात नीच।
छोरी-सोच ली।
छोरा- सोच्याली किसमत छै तु मेरी।
छोरी- ल्वाला मादा मेरू ब्यौ बन्द
हुयूंच।
छोरा- ओ सौरी बौ जी रोँग नम्बर
लग गी सायद। और बाल
बच्चा खूब छन?
छोरी- हाँ देवर जी सब बडिया बस
तुमरा भैजी कू फोन
नि आयी बिजाँ दिन बटी।
कन काँडा लगीन रै।

#BOLYA

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Garhwali Classes "गढ़वाली छुई"
June 23
हरीश दा का गौळा मा
हक़डाक पुणी च बल
दगड मा चसग
दफाग भी हूणी च बल
घौर कूड़ा मा
भिबडाट भी हूणु च बल
आपदा त बहुगुणा न खाई छै
यख असगार
किले हुणु च बल।
कुज्यणी भै कुज्यणी
दुवा त मी भी कनु छौ
फिर भी एक मुख्यमंत्री
तयार कौरी ल्या ति तब।
अतुल गुसाईं@atulgusain

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Garhwali Classes "गढ़वाली छुई"
9 hours ago
गढवाली F.I.R डाइलोग

ब्यौ मा पकोडे के बाद बनता है #कल्यौ इज दा,

हसीनायें अगर #बाडी हैं तो मैं हूँ #पल्यौ इज दा।

ई हा हा हा हा हा।।

#BOLYA

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Garhwali Classes "गढ़वाली छुई"
July 1
मंगतू रेल की टिकट लीणु छायी।
मंगतू :भाई साब बच्चों कु अधा टिकट लगलू की न?
बुकिंग क्लर्क: हाँ भुल्ला अगर 12 से कम हवाला ता।
मंगतू : हाँ भेजी म्यारा ता अभी 9 ही छी।
हा हा हा

साभार: गढ़वाली झांजी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Garhwali Classes "गढ़वाली छुई"
June 27
यीं माया, प्रीत, प्यार मा इतगा नि रूण लाटा ।
नि हुँदिन जब फुंजण वाला,
ता अंसधरि फोकट मा न खेत्या कर..!!!......बौल्या।

#BOLYA

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Garhwali Classes "गढ़वाली छुई"
June 27
एक दिन मेरी आँख्यूं न भी थकी कै बोल हि द्याई,
बल लाटा सुपन्या वो देखा कर जु पूरा होई जा...
रोज रोज हमरा बस कू रूण भि नीच..!!!.........बौल्या।।

शुभ दुफरा दगडयों।।

#BOLYA

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी
Yesterday
यूँ ही तन्हा उभरे हैं

यूँ ही तन्हा उभरे हैं
ये जो जिस्म के अंदर मेरे ये ख़याल
उन से ही जाके जा पूछों मै
इनके वो अनसुलझे सवाल

यूँ ही तन्हा उभरे हैं
दिल की दीवारों में जा जकड़े हैं
छोड़े ना छूटते ना टूटते
आँखों की वो अकेली रोती धार

यूँ ही तन्हा उभरे हैं
मौसम खड़ा उदास उजाड़ा मेरे द्वार
बादल बिन बरसे गरजे है ये क्यों प्यास
कैसा है ये सावन आया अब की बार

यूँ ही तन्हा उभरे हैं
मलते मलते पलकों का बुरा हाल
कैद में पंछी उड़ने को बेकरार
रहा ना कुछ बस रह गयी वो मिलन की चाह

यूँ ही तन्हा उभरे हैं
ये जो जिस्म के अंदर मेरे ये ख़याल
उन से ही जाके जा पूछों मै
इनके वो अनसुलझे सवाल

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
http:// balkrishna_dhyani.blogspot.com
में पूर्व प्रकाशित -सर्वाधिकार सुरक्षित

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

मुझको पहाड़ ही प्यारे है / चन्द्रकुंवर बर्त्वाल

मुझको पहाड़ ही प्यारे है - चन्द्रकुंवर बर्त्वाल

मुझको पहाड़ ही प्यारे है
प्यारे समुंद्र मैदान जिन्हें
नित रहे उन्हें वही प्यारे
मुझ को हिम से भरे हुए
अपने पहाड़ ही प्यारे है
पावों पर बहती है नदिया
करती सुतीक्षण गर्जन धवानिया
माथे के ऊपर चमक रहे
नभ के चमकीले तारे है
आते जब प्रिय मधु ऋतु के दिन
गलने लगता सब और तुहिन
उज्ज्वल आशा से भर आते
तब क्रशतन झरने सारे है
छहों में होता है कुजन
शाखाओ में मधुरिम गुंजन
आँखों में आगे वनश्री के
खुलते पट न्यारे न्यारे है
छोटे छोटे खेत और
आडू -सेबो के बागीचे
देवदार-वन जो नभ तक
अपना छवि जाल पसारे है
मुझको तो हिम से भरे हुए
अपने पहाड़ ही प्यारे है

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

घर की याद-1 / चन्द्रकुंवर बर्त्वाल

घर छोड़े वर्षों बीत गए
मैं हिमगिरी पर हूँ घूम रहा
देखता दृश्य जब नए-नए
वर्षा भी, बर्फ़ानी पहाड़
घनघोर शोर करती नदियाँ
सुनसान पर्वतों पर फैली
पीड़ा से पीली चांदनियाँ
नव-देवदार के जंगल में
छिप कर गाने वाली चिड़ियाँ
ये ही सब मेरे साथी रहे
घर छोड़े वर्षों बीत गए

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

मैं किस प्रदेश में आ पहुँचा

है चारों ओर घिरे पर्वत
जिनका हिम झरनों में झरता
जिनके प्राणों को झरनों का
संगीत मधुर मुखरित रखता

जिनके नीचे सुंदर घाटी
धानों की पीली पड़ी हुई
जिससे सुगंध की मृदु लहरें
मरूत में उड़ती विकल रहीं

पर्वत से निकली हुई नदी
घाटी में गाती घूम रही
अपने लहरीले हाथों में
हिम के फूलों को नचा रही

जिसके तट पर फूलों से पड़
पीली लतिकाएँ झुकी हुईं
भौरों के व्याकुल चुम्बन से
आवेश-अवश हो काँप रहीं