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उत्तराखंड पर कवितायें : POEMS ON UTTARAKHAND ~!!!

Started by Dinesh Bijalwan, August 05, 2008, 02:18:42 PM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Bhaskar Joshi
2 hrs · Edited ·

ओ बाज्यू मैं फेसबूकी गयु,
नन्तिनको टीटाट, सैणी को कचकचाट
ईजा को नौराट, बाबु को बडबडाट
मेरी है रे यो चाटमचाट
घर वालों कें भूली गयुं ,
ओ बाज्यू मैं फेसबूकी गयूँ ,

गों गाड कि दोस्ती छूटी गे
को छू पडोसी पत न होई
जे के न देखरे ले एक बार
यस छन म्यार फ्रेंड हज़ार
दिन रात फ्रेंड रेकुएस्ट भेज्न्यु
ओ बाज्यू मैं फेसबूकी गयुं

को सैणी को मैस, को बैनी को कैंज
को दाज्यू को भौजी को मामी को मौसी
ठुल नान सब को फ्रेंड कुन्यु
ओ बाज्यू मैं फेसबूकी गयुं

खान का पैली, खाना का बाद
दिन भर ऑफिस में घर में आदुक रात
फटाफट लोग इन कर न्यु
ओ बाज्यू मैं फेसबूकी गयुं....

Copied from WhatsApp n paste on FB .... मेरी एक प्रिय भतीजी ने भेजा है मुझे ... शायद मुझे सीख देने की कोशिस है ... मुझे पता नहीं था कि वो इतनी कुमओनी भाषा समझती होगी ... बोल तो खेर सखती ही नहीं

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

साथ तेरु दे दे

दगड तेरु दे दे हाथ तेरु दे दे
साथ तेरु दे दे

दे गेल्या मी थे
तेरु दगड तेरु हाथ
रे गेल्या रे मेर दगङया
सुनले छुईं तू मेरी तू मेरी बात

छुईं छुईं मा कया लगिचा
ना कैर तू इनि फिजूलू बात
देक ले देक मेरी इन आँखि मा
भूली जा ये दिन च की रात
रे गेल्या रे मेर दगङया
सुनले छुईं तू मेरी तू मेरी

पहाड़े की छोरी तू
कैर दे मेर दिल की चोरी तू
ना छोड़ी जै ना बॉडी जै तू
बस जी मेर ब्यौली बणी मेर घैर ऐ तू
रे गेल्या रे मेर दगङया
सुनले छुईं तू मेरी तू मेरी

दे गेल्या मी थे
तेरु दगड तेरु हाथ
रे गेल्या रे मेर दगङया
सुनले छुईं तू मेरी तू मेरी बात

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
http:// balkrishna_dhyani.blogspot.com
में पूर्व प्रकाशित -सर्वाधिकार सुरक्षित

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

साथ तेरु दे दे

दगड तेरु दे दे हाथ तेरु दे दे
साथ तेरु दे दे

दे गेल्या मी थे
तेरु दगड तेरु हाथ
रे गेल्या रे मेर दगङया
सुनले छुईं तू मेरी तू मेरी बात

छुईं छुईं मा कया लगिचा
ना कैर तू इनि फिजूलू बात
देक ले देक मेरी इन आँखि मा
भूली जा ये दिन च की रात
रे गेल्या रे मेर दगङया
सुनले छुईं तू मेरी तू मेरी

पहाड़े की छोरी तू
कैर दे मेर दिल की चोरी तू
ना छोड़ी जै ना बॉडी जै तू
बस जी मेर ब्यौली बणी मेर घैर ऐ तू
रे गेल्या रे मेर दगङया
सुनले छुईं तू मेरी तू मेरी

दे गेल्या मी थे
तेरु दगड तेरु हाथ
रे गेल्या रे मेर दगङया
सुनले छुईं तू मेरी तू मेरी बात

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
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कविता उत्तराखंड की बालकृष्ण डी ध्यानी
23 hours ago
ऐ जावा ये मेरु संसार च

बस जी
सब कूच ठीक ठाक च
यु जी कु जंजाल च
अत्ग्युं रैग्युं जी मी
ये पिछने भगदा रैग्युं जी

जीकोडी मा ऐगे रेगे
सुपनियों जनि दढ़ी सी
मूल मूल कै की
गोड़ी हैंसी वा दंत पंक्ति जी

बस जी
सब कूच ठीक ठाक च
यु माया को मोंड्यार च
आँखि आँखि की भासा मा
यूँ जियूं मा चढ़ी बुखार च

बौल्या बणु रौलूं हिंडो
किन्गोड़ा हिसोला जनि
विंकी हैंसी मी टिपदा रओं
गद्नियों ये माया बगदि रैंयां

बस जी
सब कूच ठीक ठाक च
यु मेरु माया मा ये हाल च
कया तुम पर चढ़ी बुखार च
ऐ जावा ये मेरु संसार च

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

कविता उत्तराखंड की बालकृष्ण डी ध्यानी
July 11
बैठ्युं छों

बैठ्युं छों चैय की दुकनि मा
चिनी दूध चैय की पाती की गुडगुड़ी मा
बैठ्युं छों चैय की दुकनि मा

कांसे की पिंगली पतेली वा
ताज कांचे की गिलास का एक सुर सुरा ला
बैठ्युं छों चैय की दुकनि मा

खुदेंनु मीथे ऊ घुल घुल घुटेंनु जी
जिकोड़ी मा जै की माया छलैनु जी
बैठ्युं छों चैय की दुकनि मा

बोई बाबा भुला भूली पाडे तस्बीर ऐमा
देके जांद चुस्का जिबि मा लगे जांद
बैठ्युं छों चैय की दुकनि मा

बैठ्युं छों चैय की दुकनि मा
चिनी दूध चैय की पाती की गुडगुड़ी मा
बैठ्युं छों चैय की दुकनि मा

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

कविता उत्तराखंड की बालकृष्ण डी ध्यानी
July 10 · Edited
रैग्युं मी बिस्तरा भीतर

कोय्डी पौडीच ,कोय्डी छंईंच
म्यारा डंडा कठियों मा
म्यारा हिमवंती पहाड़ों मा .......... २

झिर झिर ऐगे घिर घिर ऐगे
मनख्यूं का दार कैलाश का घार
पैंयां पडन बद्री-केदार

म्यारा डंडा कठियों मा
म्यारा हिमवंती पहाड़ों मा .......... २

बयार बथों की सर सर सरहट
चखुला उडण गुणि यूं चखलाट
जंगलात कैगे हैंरू नचण छन भैरो

म्यारा डंडा कठियों मा
म्यारा हिमवंती पहाड़ों मा .......... २

भैर-भीतर तितर-बितर
जिकोड़ी मैया व्हैगे छितर छितर
रैग्युं मी सुबेर भतिक बिस्तरा भीतर

कोय्डी पौडीच ,कोय्डी छंईंच
म्यारा डंडा कठियों मा
म्यारा हिमवंती पहाड़ों मा .......... २

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

कविता उत्तराखंड की बालकृष्ण डी ध्यानी
July 9 · Edited
लग्गे मड़ाण मौरी कू

पांडव जी आव बैठक लगवा
बैठक लगवा पांडव जी आव

उत्तराखंड भूमि जिला पौड़ी गढ़वाल
गगवाड़स्यूं पट्टी ग्राम तमलगा कुंजेठा मा

पांडव जी आव पंगत लगवा
पंगत लगवा पांडव जी आव

छै मास बेला २२ गते मार्गशीर्ष अ
भैरव मंदिर सजावा मंडाण लगाण

पांडव जी आव नाच लगाण
नाच लगाण पांडव जी आव

माहौरु लगाण भूमि सजाण
बांज पड़ी भूमि हैराली पशरयांण

पांडव जी आव एक डाली जमावा
एक डाली जमावा पांडव जी आव

कुसमा कु यौवन नारयण भूलेंण
रुपेणा बिसरेण राजपाठ गवेंन

पांडव जी आव नारयण याद दिलाण
नारयण याद दिलाण पांडव जी आव

रैबार पूछेनी हस्तिनापुर दरबार
दीदी कुंती ने बचन दिनी माहौरु लगाण

पांडव जी आव अपरा बचन निभावा
अपरा बचन निभावा पांडव जी आव

हैरी भैरी व्हैगे धरती रुपेणा मिले नारयण
ज्यूंदल पुजावा चवालों हल्दू पांडव न्यूत लगाव

पांडव जी फिर आव बारहा बरसा बाद
डाली जमी गे आज २२ गतै अषाड़ प्रस्थान करा सरकार

एक उत्तराखंडी

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Shailendra Joshi
July 9 · Edited
यु त हर भाषा मा होंदी चा
गीत कबिता गजल
जब लोक भाषा मा होंदी
क्वी गीत कविता गजल
त वा बस होंदी अपणी
छवीबथ
ज्यू जुकुदी कर देंदी तर
रचना........................शैलेन्द्र जोशी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

आज सभी दरोळो तै धरना देण चैंद।
दरोळो तै सरकार कु पुतला फुकण चैंद।
आखिर दारू पेण भी त
हमरू जन्मसिद्ध अधिकार च।
चला हडताल करा सब दरोला।
आखिर सरकार की हम फर क्य खार च।
दरोलो कु भी आम बजट हूण चैंद।
अगर क्वी दरोळो पी के मोरी गे।
वे कू फेमली पेंसन हुण चैंद।
अतुल गुसाई

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
54 minutes ago
कुतग्‍याळि.....

कलम सी अपणि,
मयाळु मन मा,
तुमारा लगौन्‍दु छौं,
बुरु नि माण्‍यां भै बंधु,
पहाड़ प्रेम जगौन्‍दु छौं,
नखरि भलि प्‍यारा पहाड़ की,
याद दिलौंदु छौं.....

-कवि जिज्ञासु की कलम सी
मेरी प्रकाशित रचना कू एक अंश
15.7.2014