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उत्तराखंड पर कवितायें : POEMS ON UTTARAKHAND ~!!!

Started by Dinesh Bijalwan, August 05, 2008, 02:18:42 PM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Shailendra Joshi
July 9 · Edited
यु त हर भाषा मा होंदी चा
गीत कबिता गजल
जब लोक भाषा मा होंदी
क्वी गीत कविता गजल
त वा बस होंदी अपणी
छवीबथ
ज्यू जुकुदी कर देंदी तर
रचना........................शैलेन्द्र जोशी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Shailendra Joshi
July 9 · Edited
यु त हर भाषा मा होंदी चा
गीत कबिता गजल
जब लोक भाषा मा होंदी
क्वी गीत कविता गजल
त वा बस होंदी अपणी
छवीबथ
ज्यू जुकुदी कर देंदी तर
रचना........................शैलेन्द्र जोशी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
July 10
हमारी सगोड़ी मा.....

मुंगरी पकीं,
तोमड़ी, गोदड़ि, चचेंडी लगिं,
काखड़यौं की लबद्यारी,
ऐजा खैजा, हे प्‍यारा बेटा,
टक्‍क लगिं छ हमारी......

-तेरा ब्‍वै बाब,
उत्‍तराखंड तेरा गौं बिटि

-कवि जिज्ञासु की कलम सी
10.7.14

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
July 9 · Edited
मेरु परिचय....

डांडी कांठ्यौं बीच भैजि,
मेरु प्‍यारु गौं,
टिहरी गढ़वाळ,
बागी-नौसा,
सचि तुमारा सौं.....

-कवि जिज्ञासु की कलम सी एक परिचय....
9.7.14

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
July 9
दगड़यान बोलि......

बल भैजि,
कब होलि हमारी मुलाकात,
मैंन बोलि,
जिज्ञासा मेरा मन मा भिछ,
मिल्‍दा उत्‍तराखण्‍ड की एक,
ऊंचि धार ऐंच,
बैठदा बांज बुरांस की डाळी नीस,
पर यथगा आजाद निछौं हम,
झटट पटट ह्रवै जाऊ,
जग्‍वाळ करा,
एक दिन आलु,
मेरा प्‍यारा "आजाद" भैजि,
गौळा लगिक भेंट्यौला,......
-कवि जिज्ञासु की अनुभूति
9.7.14
संपर्क: 9654972366

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
July 8
भौंकुछ नि बोन्‍नु भुला,
बात यनि बोलिं चैंदि,
मन खुश ह्रवै जाऊ,
जिंदगी या चार दिन की,
भोळ कुजाणि क्‍या,
हम दगड़ि ह्रवै जाऊ......
-कवि जिज्ञासु की कलम से
8.7.14

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
July 7 · Edited
कोदा की करकरी रोठठी मा,
कंडाळि कू साग,
खालु ऊ भग्‍यान जैका,
होला बड़ा भाग...

कवि जिज्ञासु की कलम से.....
स्‍वरचित रचना का एक अंश, 7.7.14

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
July 4
एक दिन भैजी,
या धरती छोड़िक,
हम्‍न चलि जाण,
याद रखणु,
यी जिंदगी मा,
नि मान्‍नु पापी पराण.....
-कवि जिज्ञासु की कलम कू
कबलाट....4.7.2014

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
July 3 · Edited
त्‍वैकु तेरा सौं छन भैजि,
ह्वै सकु त ऐजै,
त्‍वैकु आम रख्‍यां मेरा,
हे चुचा तू खैजै......

दगड़यौं मेरा,
झटट आवा,
अपणा बांठा का,
तुम भी खावा....

बाटु बतौंदु,
अपणा गौं कू,
वख फुंड तुम ऐजा,
आम पक्‍यां छन,
बाटा बाटी तुम ऐजा.....

-कविमन कू कबलाट.....कवि ज्‍िाज्ञासु
3.7.14

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
June 30
मेरा कविमन कू कबलाट.....

बोडि बोल्‍दि थै,
मेरा न घ्‍यू कब्‍बि नि खाई,
किलै नि खाणु छैं,
जब जब पूछि,
वेन बताई,
घ्‍यू मैं इलै नि खांदु,
कब आलि ताकत खैक,
दारु पेवा त,
मैं धम्‍म धम्‍म हिटदु ऊकाळ.....

-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु, 30.6.14